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अंग 1361

अंग
1361
राग Fifth Mehl, Gaathaa
राग: Fifth Mehl, Gaathaa · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
प्रीतम भगवान अचुत ॥
नानक संसार सागर तारणह ॥14॥
मरणं बिसरणं गोबिंदह ॥
जीवणं हरि नाम ध्यावणह ॥
लभणं साध संगेण ॥
नानक हरि पूरबि लिखणह ॥15॥
दसन बिहून भुयंगं मंत्रं गारुड़ी निवारं ॥
ब्याधि उपाड़ण संतं ॥
नानक लबध करमणह ॥16॥
जथ कथ रमणं सरणं सरबत्र जीअणह ॥
तथ लगणं प्रेम नानक ॥
परसादं गुर दरसनह ॥17॥
चरणारबिंद मन बिध्यं ॥
सिध्यं सरब कुसलणह ॥
गाथा गावंति नानक भब्यं परा पूरबणह ॥18॥
सुभ बचन रमणं गवणं साध संगेण उधरणह ॥ संसार सागरं नानक पुनरपि जनम न लभ्यते ॥19॥
बेद पुराण सासत्र बीचारं ॥
एकंकार नाम उर धारं ॥
कुलह समूह सगल उधारं ॥
बडभागी नानक को तारं ॥20॥
सिमरणं गोबिंद नामं उधरणं कुल समूहणह ॥
लबधिअं साध संगेण नानक वडभागी भेटंति दरसनह ॥21॥
सरब दोख परंतिआगी सरब धरम द्रिड़ंतणः ॥
लबधेणि साध संगेणि नानक मसतकि लिख्यणः ॥22॥
होयो है होवंतो हरण भरण संपूरणः ॥
साधू सतम जाणो नानक प्रीति कारणं ॥23॥
सुखेण बैण रतनं रचनं कसुंभ रंगणः ॥
रोग सोग बिओगं नानक सुखु न सुपनह ॥24॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: अविनाशी प्यारे परमात्मा (का सिमरन) हे नानक ! संसार-समुंद्र (के विकारों) से बचा लेता है। 14। गोबिंद को बिसारना (आत्मिक) मौत है। और परमात्मा का नाम चेते रखना (आत्मिक) जीवन है पर प्रभू (का सिमरन) साध-संगति में हे नानक ! पूर्बले लिखे अनुसार मिलता है। 15। (जैसे) गरुड़-मंत्र जानने वाला मनुष्य साँप को दंत-हीन कर देता है और (साँप के जहर को) मंत्रों से दूर कर देता है। (वैसे ही) संत-जन (मनुष्य के आत्मिक) रोगों का नाश कर देते हैं। पर। हे नानक ! (संतों की संगति) सौभाग्य से मिलती है। 16। जो परमात्मा हर जगह व्यापक है और सारे जीवों का आसरा है। उसमें। (जीव का) प्यार हे नानक ! गुरू के दीदार की बरकति से ही बनता है। 17। (जिस मनुष्य का) मन (परमात्मा के) सुंदर चरणों में भेदित होता है। (उसको) सारे सुख मिल जाते हैं। पर। हे नानक ! वही लोग परमात्मा की सिफतसालाह गाते हैं जिनके पूर्बले भाग्य हों। 18। (जो मनुष्य) साध-वंगति में जा के परमात्मा की सिफतसालाह की बाणी उच्चारते हैं (उनका) उद्धार हो जाता है। हे नानक ! उनको (इस) संसार-समुंद्र में बार-बार जनम नहीं लेना पड़ता। 1। जो वेद पुराण शास्त्र (आदि धर्म-पुस्तकों को) का विचार व् एक परमात्मा का नाम अपने हृदय में बसाता है। वह (स्वयं) तैर जाता है और अपनी अनेकों सारी कुलों को तैरा लेता है। हे नानक ! कोई ही ऐसा भाग्यशाली मनुष्य होता है 20। गोबिंद का नाम सिमरने से सारी कुलों का उद्धार हो जाता है। पर। (गोबिंद का नाम) हे नानक ! साध-संगति में मिलता है। (और साध-संगति का) दर्शन बड़े भाग्यशाली (व्यक्ति) करते हैं। 21। सारे विकार अच्छी तरह त्याग देने और धर्म को पककी तरह (हृदय में) टिकाना- (यह दाति उस बंदे को) हे नानक ! साध-संगति में मिलती है (जिसके) माथे पर (अच्छा) लेखा लिखा हो। 22। जो परमात्मा भूत वर्तमान भविष्य में सदा ही स्थिर रहने वाला है। जो सब जीवों का नाश करने वाला है सबको पालने वाला है और सबमें व्यापक है। हे नानक ! उसके साथ प्यार डालने का कारण निष्चय ही संतों को समझो। 23। कसुंभ के रंगों में और (माया संबन्धी) सुखदाई सुंदर बोलों में रहने से हे नानक ! रोग चिंता और दुख ही व्यापते हैं। (माया से -) सुख सपने में भी नहीं मिल सकता। 24।
फुनहे महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हाथि कलंम अगंम मसतकि लेखावती ॥
उरझि रहिओ सभ संगि अनूप रूपावती ॥
उसतति कहनु न जाइ मुखहु तुहारीआ ॥
मोही देखि दरसु नानक बलिहारीआ ॥1॥
संत सभा महि बैसि कि कीरति मै कहां ॥
अरपी सभु सीगारु एहु जीउ सभु दिवा ॥
आस पिआसी सेज सु कंति विछाईऐ ॥
हरिहां मसतकि होवै भागु त साजनु पाईऐ ॥2॥
सखी काजल हार तंबोल सभै किछु साजिआ ॥
सोलह कीए सीगार कि अंजनु पाजिआ ॥
जे घरि आवै कंतु त सभु किछु पाईऐ ॥
हरिहां कंतै बाझु सीगारु सभु बिरथा जाईऐ ॥3॥
जिसु घरि वसिआ कंतु सा वडभागणे ॥
तिसु बणिआ हभु सीगारु साई सोहागणे ॥
हउ सुती होइ अचिंत मनि आस पुराईआ ॥
हरिहां जा घरि आइआ कंतु त सभु किछु पाईआ ॥4॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: फुनहे महला 5 सतिगुर प्रसादि॥ हे नानक ! (कह-) हे अपहुँच प्रभू ! (आपके) हाथ में कलम है (जो सब जीवों के) माथे पर (लेख) लिखती जा रही है। हे अति सुंदर रूप वाले ! आप सब जीवों के साथ मिला हुआ है। (किसी भी जीव द्वारा अपने) मुँह से आपकी उपमा बयान नहीं की जा सकती। मैं आपसे सदके हूँ। आपके दर्शन करके मेरा मन मोहा गया है।1। (हे सहेली ! मेरी ये तमन्ना है कि) साध-संगति में उठना-बैठना हो जाए ताकि मैं (परमात्मा की) सिफतसालाह करती रहूँ। (उस पति-प्रभू के मिलाप के बदले में) मैं (अपना) सारा श्रृंगार भेट कर दूँ मैं अपनी जिंद भी हवाले कर दॅूँ। (दर्शन की) आस की तमन्ना वाली की मेरी हृदय-सेज कंत-प्रभू ने (स्वयं) बिछाई है। हे सहेलिए ! अगर माथे के भाग्य जाग उठें तब ही सज्जन-प्रभू मिलता है।2। हे सहेलिए ! (यदि) काजल हार पान – ये सब कुछ तैयार भी कर लिया जाए (यदि) सोलह श्रृंगार भी कर लिए जाएं और (आँखों में) सुरमा भी लगा लिया जाए तो भी अगर पति ही घर आए तब ही सब कुछ प्राप्त होता है। पति (के मिलाप) के बिना सारा श्रृंगार व्यर्थ चला जाता है (यही हाल है जीव-स्त्री का)।3। हे सहेलिए ! जिस (जीव-सत्री) के (हृदय-) घर में प्रभू-पति बस जाता है वह भाग्यशाली हो जाती है। (आत्मिक जीवन ऊँचा करने के लिए उसका सारा उद्यम) उसका सारा श्रंृगार उसको फब जाता है वह (जीव-स्त्री) ही पति वाली (कहलवा सकती है)। (इस प्रकार की सोहागन की संगति में रह के) मैं (भी अब) चिंता-रहित हो के (प्रभू-चरणों में) लीन हो गई हूँ मेरे मन में (मिलाप की पुरानी) आशा पूरी हो गई। हे सहेलिए ! जब (हृदय-) घर में पति (प्रभू) आ जाता है तब हरेक मांग पूरी हो जाती है।4।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अविनाशी प्यारे परमात्मा (का सिमरन) हे नानक ! संसार-समुंद्र (के विकारों) से बचा लेता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।