नानक संसार सागर तारणह ॥14॥
मरणं बिसरणं गोबिंदह ॥
जीवणं हरि नाम ध्यावणह ॥
लभणं साध संगेण ॥
नानक हरि पूरबि लिखणह ॥15॥
दसन बिहून भुयंगं मंत्रं गारुड़ी निवारं ॥
ब्याधि उपाड़ण संतं ॥
नानक लबध करमणह ॥16॥
जथ कथ रमणं सरणं सरबत्र जीअणह ॥
तथ लगणं प्रेम नानक ॥
परसादं गुर दरसनह ॥17॥
चरणारबिंद मन बिध्यं ॥
सिध्यं सरब कुसलणह ॥
गाथा गावंति नानक भब्यं परा पूरबणह ॥18॥
सुभ बचन रमणं गवणं साध संगेण उधरणह ॥ संसार सागरं नानक पुनरपि जनम न लभ्यते ॥19॥
बेद पुराण सासत्र बीचारं ॥
एकंकार नाम उर धारं ॥
कुलह समूह सगल उधारं ॥
बडभागी नानक को तारं ॥20॥
सिमरणं गोबिंद नामं उधरणं कुल समूहणह ॥
लबधिअं साध संगेण नानक वडभागी भेटंति दरसनह ॥21॥
सरब दोख परंतिआगी सरब धरम द्रिड़ंतणः ॥
लबधेणि साध संगेणि नानक मसतकि लिख्यणः ॥22॥
होयो है होवंतो हरण भरण संपूरणः ॥
साधू सतम जाणो नानक प्रीति कारणं ॥23॥
सुखेण बैण रतनं रचनं कसुंभ रंगणः ॥
रोग सोग बिओगं नानक सुखु न सुपनह ॥24॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हाथि कलंम अगंम मसतकि लेखावती ॥
उरझि रहिओ सभ संगि अनूप रूपावती ॥
उसतति कहनु न जाइ मुखहु तुहारीआ ॥
मोही देखि दरसु नानक बलिहारीआ ॥1॥
संत सभा महि बैसि कि कीरति मै कहां ॥
अरपी सभु सीगारु एहु जीउ सभु दिवा ॥
आस पिआसी सेज सु कंति विछाईऐ ॥
हरिहां मसतकि होवै भागु त साजनु पाईऐ ॥2॥
सखी काजल हार तंबोल सभै किछु साजिआ ॥
सोलह कीए सीगार कि अंजनु पाजिआ ॥
जे घरि आवै कंतु त सभु किछु पाईऐ ॥
हरिहां कंतै बाझु सीगारु सभु बिरथा जाईऐ ॥3॥
जिसु घरि वसिआ कंतु सा वडभागणे ॥
तिसु बणिआ हभु सीगारु साई सोहागणे ॥
हउ सुती होइ अचिंत मनि आस पुराईआ ॥
हरिहां जा घरि आइआ कंतु त सभु किछु पाईआ ॥4॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अविनाशी प्यारे परमात्मा (का सिमरन) हे नानक ! संसार-समुंद्र (के विकारों) से बचा लेता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।