अंग 1362

अंग
1362
राग Phunhay Fifth Mehl
राग: Phunhay Fifth Mehl · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आसा इती आस कि आस पुराईऐ ॥
सतिगुर भए दइआल त पूरा पाईऐ ॥
मै तनि अवगण बहुतु कि अवगण छाइआ ॥
हरिहां सतिगुर भए दइआल त मनु ठहराइआ ॥५॥
कहु नानक बेअंतु बेअंतु धिआइआ ॥
दुतरु इहु संसारु सतिगुरू तराइआ ॥
मिटिआ आवा गउणु जां पूरा पाइआ ॥
हरिहां अंम्रितु हरि का नामु सतिगुर ते पाइआ ॥६॥
मेरै हाथि पदमु आगनि सुख बासना ॥
सखी मोरै कंठि रतंनु पेखि दुखु नासना ॥
बासउ संगि गुपाल सगल सुख रासि हरि ॥
हरिहां रिधि सिधि नव निधि बसहि जिसु सदा करि ॥७॥
पर त्रिअ रावणि जाहि सेई ता लाजीअहि ॥
नितप्रति हिरहि पर दरबु छिद्र कत ढाकीअहि ॥
हरि गुण रमत पवित्र सगल कुल तारई ॥
हरिहां सुनते भए पुनीत पारब्रहमु बीचारई ॥८॥
ऊपरि बनै अकासु तलै धर सोहती ॥
दह दिस चमकै बीजुलि मुख कउ जोहती ॥
खोजत फिरउ बिदेसि पीउ कत पाईऐ ॥
हरिहां जे मसतकि होवै भागु त दरसि समाईऐ ॥९॥
डिठे सभे थाव नही तुधु जेहिआ ॥
बधोहु पुरखि बिधातै तां तू सोहिआ ॥
वसदी सघन अपार अनूप रामदास पुर ॥
हरिहां नानक कसमल जाहि नाइऐ रामदास सर ॥१०॥
चात्रिक चित सुचित सु साजनु चाहीऐ ॥
जिसु संगि लागे प्राण तिसै कउ आहीऐ ॥
बनु बनु फिरत उदास बूंद जल कारणे ॥
हरिहां तिउ हरि जनु मांगै नामु नानक बलिहारणे ॥११॥
मित का चितु अनूपु मरंमु न जानीऐ ॥
गाहक गुनी अपार सु ततु पछानीऐ ॥
चितहि चितु समाइ त होवै रंगु घना ॥
हरिहां चंचल चोरहि मारि त पावहि सचु धना ॥१२॥
सुपनै ऊभी भई गहिओ की न अंचला ॥
सुंदर पुरख बिराजित पेखि मनु बंचला ॥
खोजउ ता के चरण कहहु कत पाईऐ ॥
हरिहां सोई जतंनु बताइ सखी प्रिउ पाईऐ ॥१३॥
नैण न देखहि साध सि नैण बिहालिआ ॥
करन न सुनही नादु करन मुंदि घालिआ ॥
रसना जपै न नामु तिलु तिलु करि कटीऐ ॥
हरिहां जब बिसरै गोबिद राइ दिनो दिनु घटीऐ ॥१४॥
पंकज फाथे पंक महा मद गुंफिआ ॥
अंग संग उरझाइ बिसरते सुंफिआ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे सहेलिए ! (मेरे अंदर) इतनी सी तमन्ना बनी रहती है कि (प्रभू-मिलाप की मेरी) आशा पूरी हो जाए। पर सर्व-गुण-भरपूर प्रभू तब ही मिलता है जब गुरू दयावान हो। हे सहेलिए ! मेरे शरीर में (इतने) ज्यादा अवगुण हैं कि (मेरा स्वै) अवगुणों से ढका रहता है। पर जब गुरू दयावान होता है तब मन (विकारों की ओर) डोलने से हट जाता है। 5। हे नानक ! कह- (हे सहेलिए !) इस संसार-समुंद्र से पार लांघना बहुत मुश्किल है। पर जिस मनुष्य ने बेअंत परमात्मा का नाम सिमरना शुरू कर दिया। गुरू ने उसको पार लंघा दिया (गुरू ने उसको पूरन प्रभू से जोड़ दिया। और) जब उसने पूरन प्रभू का मिलाप हासिल कर लिया। उसका जनम मरन का चक्कर (भी) समाप्त हो गया। हे सहेलिए ! परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम गुरू से ही मिलता है। 6। (अब) मेरे हाथ में कमल-फूल (की रेखा बन गई) है (मेरे भाग्य जाग उठे हैं) मेरे (हृदय के) आँगन में आत्मिक आनंद की सुगंधी (बिखरी रहती) है। (जैसे बच्चों के गले में नज़र-पट्टू डाला होता है) हे सहेलिए ! मेरे गले में रतन लटक रहा है (मेरे गले में नाम-रतन परोया गया है) जिसको देख के (हरेक) दुख दूर हो गया है। जो परमात्मा सारे सुखों का श्रोत है (गुरू की मेहर के सदका) मैं उस सृष्टि के पालनहार के साथ (सदा) बसती हूँ। हे सहेलिए ! जिस (परमात्मा) के हाथ में सारी ताकतें और (धरती के सारे) नौ खजाने सदा टिके रहते हैं।7। हे भाई ! जो मनुष्य पराई स्त्री भोगने जाते हैं। वे (प्रभू की हजूरी में) अवश्य शर्मशार होते हैं। जो मनुष्य सदा पराया धन चुराते रहते हैं (हे भाई ! उनके यह) कुकर्म कहीं छुपे रह सकते हैं। (परमात्मा सब कुछ देख रहा है)। हे भाई ! परमात्मा के गुण याद करते हुए मनुष्य (स्वयं) पवित्र जीवन वाला बन जाता है (और अपनी) सारी कुलों को (भी संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। (जो मनुष्य परमात्मा की सिफतसालाह) सुनते हैं। वे सारे पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। 8। हे सहेलिए ! ऊपर (तारों आदि से) आकाश फब रहा है। नीचे पैरों की तरफ (हरियाली आदि से) धरती सज रही है। दसों दिशाओं में बिजली चमक रही है। मुँह पर लिश्कारे मार रही है (ईश्वरीय ज्योति का कैसा सुंदर साकार सरूप है !) पर मैं (उसके इस सरगुण स्वरूप की कद्र ना समझ के) परदेस में (जंगल आदि में) ढूँढती फिरती हूँ कि प्रीतम-प्रभू कहीं मिल जाए। हे सहेलिए ! अगर माथे के भाग्य जाग उठे तो (हर जगह उसके) दीदार में लीन हुआ जा सकता है। 9। हे राम के दासों के शहर ! (मैंने) सारी जगहें देखि है आपके बराबर कुछ नहीं हे राम के दासों के शहर ! (हे सत्संगी !) आपकी नींव अकाल-पुरख सृजनहार ने स्वयं रखी हुई है। इसी लिए आप (उसके आत्मिक गुणों की बरकति से) सुंदर दिखाई दे रहा है। हे राम के दासों के शहर ! (हे सत्संग !) (आपके अंदर उच्च आत्मिक गुणों की) बहुत ही सघन आबादी है। बेअंत है। बेमिसाल है। हे नानक ! (कह-) हे राम के दासों के सरोवर ! (हे सत्संग ! आपके में आत्मिक) स्नान करने से ! (मनुष्य के सारे) पाप दूर हो जाते हैं। 10। हे भाई ! पपीहे की तरह सचेत चिक्त हो के उस सज्जन-प्रभू को प्यार करना चाहिए। जिस सजजन से प्राणों की प्रीति बन जाए। उसको ही (मिलने की) तमन्ना करनी चाहिए। (हे भाई ! देख। पपीहा बरखा के) पानी की एक बूँद के लिए (दरियाओं-टोभों के पानी से) उपराम हो के जंगल (ढूँढता) फिरता है। हे नानक ! (कह-जो) प्रभू का सेवक (पपीहे की तरह परमात्मा का नाम) माँगता है। मैं उससे कुर्बान जाता हूँ। 11। हे भाई ! (परमात्मा-) मित्र का चिक्त बहुत सुंदर है। (उसका) भेद नहीं जाना जा सकता। पर उस बेअंत प्रभू के गुणों के गाहक संत-जनों द्वारा वह भेद समझ लिया जाता है। (वह भेद यह है कि) अगर उस परमात्मा के चिक्त में (मनुष्य का) चिक्त लीन हो जाए। तो (मनुष्य के अंदर) बहुत आत्मिक आनंद पैदा हो जाता है। सो। हे भाई ! अगर आप (प्रभू के चिक्त में लीन करके) इस सदा भटकते (मन-) चोर की (चंचलता) मार ले। तो आप सदा कायम रहने वाला नाम-धन हासिल कर लेगा। 12। हे सहेलिए ! सपने में (प्रभू-पति को देख के) मैं उठ खड़ी हुई (पर। मैं उसका पल्ला ना पकड़ सकी)। मैंने (उसका) पल्ला क्यों ना पकड़ा। (इसलिए नही पकड़ सकी क्योंकि) उस सुंदर दग-दग करते प्रभू-पति को देख के (मेरा) मन मोहित हो गया (मुझे अपने आप की सुधि ही ना रही)। अब मैं उसके कदमों की खोज करती फिरती हूँ। बताओ। हे सखिए ! वह कैसे मिले। हे सखी ! मुझे वह यतन बता जिससे वह प्यारा मिल जाए। 13। हे सहेलिए ! जो आँखें सत्संगियों का दर्शन नहीं करतीं। वे आँखें (दुनिया के पदार्थों और रूप को देख-देख के) बेहाल हुई रहती हैं। जो कान परमात्मा की सिफतसालाह नहीं सुनते। वे कान (आत्मिक आनंद की धुनि सुनने से) बंद किए हुए होते हैं। जो जीभ परमात्मा का नाम नहीं जपती। वह जीभ (दुनिया के झमेलों की बातें और आनंदा आदि की कैंची से हर वक्त) कटती जा रही है। हे सहेलिए ! जब प्रभू-पातशाह (की याद) भूल जाए। जब दिन-ब-दिन (आत्मिक जीवन) कमजोर होता जाता है। (सो। हे सहेलिए ! साध-संगति में प्रभू की सिफत-सालाह सुनते रहना। जीभ से नाम जपते रहना- यही है यतन उसको पा सकने का)। 14। हे भाई ! (कमल-फूल की) तीव्र सुगंधी में मस्त हो जाने के कारण (भौरे के) पंख कमल-फूल (की पंखड़ियों) में फस जाते हैं। (उन) पंखड़ियों से उलझ के (भौरे को) उड़ानें भरनी भूल जाती हैं (यही हाल है जीव-भौरे का)।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “हे सहेलिए ! (मेरे अंदर) इतनी सी तमन्ना बनी रहती है कि (प्रभू-मिलाप की मेरी) आशा पूरी हो जाए।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।