अंग
1362
फुनहे महला 5
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आसा इती आस कि आस पुराईऐ ॥
आसा इती आस कि आस पुराईऐ ॥
सतिगुर भए दइआल त पूरा पाईऐ ॥
मै तनि अवगण बहुतु कि अवगण छाइआ ॥
हरिहां सतिगुर भए दइआल त मनु ठहराइआ ॥5॥
कहु नानक बेअंतु बेअंतु धिआइआ ॥
दुतरु इहु संसारु सतिगुरू तराइआ ॥
मिटिआ आवा गउणु जां पूरा पाइआ ॥
हरिहां अंम्रितु हरि का नामु सतिगुर ते पाइआ ॥6॥
मेरै हाथि पदमु आगनि सुख बासना ॥
सखी मोरै कंठि रतंनु पेखि दुखु नासना ॥
बासउ संगि गुपाल सगल सुख रासि हरि ॥
हरिहां रिधि सिधि नव निधि बसहि जिसु सदा करि ॥7॥
पर त्रिअ रावणि जाहि सेई ता लाजीअहि ॥
नितप्रति हिरहि पर दरबु छिद्र कत ढाकीअहि ॥
हरि गुण रमत पवित्र सगल कुल तारई ॥
हरिहां सुनते भए पुनीत पारब्रहमु बीचारई ॥8॥
ऊपरि बनै अकासु तलै धर सोहती ॥
दह दिस चमकै बीजुलि मुख कउ जोहती ॥
खोजत फिरउ बिदेसि पीउ कत पाईऐ ॥
हरिहां जे मसतकि होवै भागु त दरसि समाईऐ ॥9॥
डिठे सभे थाव नही तुधु जेहिआ ॥
बधोहु पुरखि बिधातै तां तू सोहिआ ॥
वसदी सघन अपार अनूप रामदास पुर ॥
हरिहां नानक कसमल जाहि नाइऐ रामदास सर ॥10॥
चात्रिक चित सुचित सु साजनु चाहीऐ ॥
जिसु संगि लागे प्राण तिसै कउ आहीऐ ॥
बनु बनु फिरत उदास बूंद जल कारणे ॥
हरिहां तिउ हरि जनु मांगै नामु नानक बलिहारणे ॥11॥
मित का चितु अनूपु मरंमु न जानीऐ ॥
गाहक गुनी अपार सु ततु पछानीऐ ॥
चितहि चितु समाइ त होवै रंगु घना ॥
हरिहां चंचल चोरहि मारि त पावहि सचु धना ॥12॥
सुपनै ऊभी भई गहिओ की न अंचला ॥
सुंदर पुरख बिराजित पेखि मनु बंचला ॥
खोजउ ता के चरण कहहु कत पाईऐ ॥
हरिहां सोई जतंनु बताइ सखी प्रिउ पाईऐ ॥13॥
नैण न देखहि साध सि नैण बिहालिआ ॥
करन न सुनही नादु करन मुंदि घालिआ ॥
रसना जपै न नामु तिलु तिलु करि कटीऐ ॥
हरिहां जब बिसरै गोबिद राइ दिनो दिनु घटीऐ ॥14॥
पंकज फाथे पंक महा मद गुंफिआ ॥
अंग संग उरझाइ बिसरते सुंफिआ ॥
सतिगुर भए दइआल त पूरा पाईऐ ॥
मै तनि अवगण बहुतु कि अवगण छाइआ ॥
हरिहां सतिगुर भए दइआल त मनु ठहराइआ ॥5॥
कहु नानक बेअंतु बेअंतु धिआइआ ॥
दुतरु इहु संसारु सतिगुरू तराइआ ॥
मिटिआ आवा गउणु जां पूरा पाइआ ॥
हरिहां अंम्रितु हरि का नामु सतिगुर ते पाइआ ॥6॥
मेरै हाथि पदमु आगनि सुख बासना ॥
सखी मोरै कंठि रतंनु पेखि दुखु नासना ॥
बासउ संगि गुपाल सगल सुख रासि हरि ॥
हरिहां रिधि सिधि नव निधि बसहि जिसु सदा करि ॥7॥
पर त्रिअ रावणि जाहि सेई ता लाजीअहि ॥
नितप्रति हिरहि पर दरबु छिद्र कत ढाकीअहि ॥
हरि गुण रमत पवित्र सगल कुल तारई ॥
हरिहां सुनते भए पुनीत पारब्रहमु बीचारई ॥8॥
ऊपरि बनै अकासु तलै धर सोहती ॥
दह दिस चमकै बीजुलि मुख कउ जोहती ॥
खोजत फिरउ बिदेसि पीउ कत पाईऐ ॥
हरिहां जे मसतकि होवै भागु त दरसि समाईऐ ॥9॥
डिठे सभे थाव नही तुधु जेहिआ ॥
बधोहु पुरखि बिधातै तां तू सोहिआ ॥
वसदी सघन अपार अनूप रामदास पुर ॥
हरिहां नानक कसमल जाहि नाइऐ रामदास सर ॥10॥
चात्रिक चित सुचित सु साजनु चाहीऐ ॥
जिसु संगि लागे प्राण तिसै कउ आहीऐ ॥
बनु बनु फिरत उदास बूंद जल कारणे ॥
हरिहां तिउ हरि जनु मांगै नामु नानक बलिहारणे ॥11॥
मित का चितु अनूपु मरंमु न जानीऐ ॥
गाहक गुनी अपार सु ततु पछानीऐ ॥
चितहि चितु समाइ त होवै रंगु घना ॥
हरिहां चंचल चोरहि मारि त पावहि सचु धना ॥12॥
सुपनै ऊभी भई गहिओ की न अंचला ॥
सुंदर पुरख बिराजित पेखि मनु बंचला ॥
खोजउ ता के चरण कहहु कत पाईऐ ॥
हरिहां सोई जतंनु बताइ सखी प्रिउ पाईऐ ॥13॥
नैण न देखहि साध सि नैण बिहालिआ ॥
करन न सुनही नादु करन मुंदि घालिआ ॥
रसना जपै न नामु तिलु तिलु करि कटीऐ ॥
हरिहां जब बिसरै गोबिद राइ दिनो दिनु घटीऐ ॥14॥
पंकज फाथे पंक महा मद गुंफिआ ॥
अंग संग उरझाइ बिसरते सुंफिआ ॥
हिन्दी अर्थ: हे सहेलिए ! (मेरे अंदर) इतनी सी तमन्ना बनी रहती है कि (प्रभू-मिलाप की मेरी) आशा पूरी हो जाए। पर सर्व-गुण-भरपूर प्रभू तब ही मिलता है जब गुरू दयावान हो। हे सहेलिए ! मेरे शरीर में (इतने) ज्यादा अवगुण हैं कि (मेरा स्वै) अवगुणों से ढका रहता है। पर जब गुरू दयावान होता है तब मन (विकारों की ओर) डोलने से हट जाता है। 5। हे नानक ! कहें- (हे सहेलिए !) इस संसार-समुंद्र से पार लांघना बहुत मुश्किल है। पर जिस मनुष्य ने बेअंत परमात्मा का नाम सिमरना शुरू कर दिया। गुरू ने उसको पार लंघा दिया (गुरू ने उसको पूरन प्रभू से जोड़ दिया। और) जब उसने पूरन प्रभू का मिलाप हासिल कर लिया। उसका जनम मरन का चक्कर (भी) समाप्त हो गया। हे सहेलिए ! परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम गुरू से ही मिलता है। 6। (अब) मेरे हाथ में कमल-फूल (की रेखा बन गई) है (मेरे भाग्य जाग उठे हैं) मेरे (हृदय के) आँगन में आत्मिक आनंद की सुगंधी (बिखरी रहती) है। (जैसे बच्चों के गले में नज़र-पट्टू डाला होता है) हे सहेलिए ! मेरे गले में रतन लटक रहा है (मेरे गले में नाम-रतन परोया गया है) जिसको देख के (हरेक) दुख दूर हो गया है। जो परमात्मा सारे सुखों का श्रोत है (गुरू की मेहर के सदका) मैं उस सृष्टि के पालनहार के साथ (सदा) बसती हूँ। हे सहेलिए ! जिस (परमात्मा) के हाथ में सारी ताकतें और (धरती के सारे) नौ खजाने सदा टिके रहते हैं।7। हे भाई ! जो मनुष्य पराई स्त्री भोगने जाते हैं। वे (प्रभू की हजूरी में) अवश्य शर्मशार होते हैं। जो मनुष्य सदा पराया धन चुराते रहते हैं (हे भाई ! उनके यह) कुकर्म कहीं छुपे रह सकते हैं। (परमात्मा सब कुछ देख रहा है)। हे भाई ! परमात्मा के गुण याद करते हुए मनुष्य (स्वयं) पवित्र जीवन वाला बन जाता है (और अपनी) सारी कुलों को (भी संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। (जो मनुष्य परमात्मा की सिफतसालाह) सुनते हैं। वे सारे पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। 8। हे सहेलिए ! ऊपर (तारों आदि से) आकाश फब रहा है। नीचे पैरों की तरफ (हरियाली आदि से) धरती सज रही है। दसों दिशाओं में बिजली चमक रही है। मुँह पर लिश्कारे मार रही है (ईश्वरीय ज्योति का कैसा सुंदर साकार सरूप है !) पर मैं (उसके इस सरगुण स्वरूप की कद्र ना समझ के) परदेस में (जंगल आदि में) ढूँढती फिरती हूँ कि प्रीतम-प्रभू कहीं मिल जाए। हे सहेलिए ! अगर माथे के भाग्य जाग उठे तो (हर जगह उसके) दीदार में लीन हुआ जा सकता है। 9। हे राम के दासों के शहर ! (मैंने) सारी जगहें देखी हैं आपके बराबर कुछ नहीं हे राम के दासों के शहर ! (हे सत्संगी !) आपकी नींव अकाल-पुरख सृजनहार ने स्वयं रखी हुई है। इसी लिए आप (उसके आत्मिक गुणों की बरकति से) सुंदर दिखाई दे रहे हैं। हे राम के दासों के शहर ! (हे सत्संग !) (आपके अंदर उच्च आत्मिक गुणों की) बहुत ही सघन आबादी है। बेअंत है। बेमिसाल है। हे नानक ! (कहें-) हे राम के दासों के सरोवर ! (हे सत्संग ! आपके में आत्मिक) स्नान करने से ! (मनुष्य के सारे) पाप दूर हो जाते हैं। 10। हे भाई ! पपीहे की तरह सचेत चित्त हो के उस सज्जन-प्रभू को प्यार करना चाहिए। जिस सजजन से प्राणों की प्रीति बन जाए। उसको ही (मिलने की) तमन्ना करनी चाहिए। (हे भाई ! देखिए। पपीहा बरखा के) पानी की एक बूँद के लिए (दरियाओं-टोभों के पानी से) उपराम हो के जंगल (ढूँढता) फिरता है। हे नानक ! (कहें-जो) प्रभू का सेवक (पपीहे की तरह परमात्मा का नाम) माँगता है। मैं उससे कुर्बान जाता हूँ। 11। हे भाई ! (परमात्मा-) मित्र का चित्त बहुत सुंदर है। (उसका) भेद नहीं जाना जा सकता। पर उस बेअंत प्रभू के गुणों के गाहक संत-जनों द्वारा वह भेद समझ लिया जाता है। (वह भेद यह है कि) अगर उस परमात्मा के चित्त में (मनुष्य का) चित्त लीन हो जाए। तो (मनुष्य के अंदर) बहुत आत्मिक आनंद पैदा हो जाता है। सो। हे भाई ! अगर आप (प्रभू के चित्त में लीन करके) इस सदा भटकते (मन-) चोर की (चंचलता) मार लें, तो आप सदा कायम रहने वाला नाम-धन हासिल कर लेंगे। 12। हे सहेलिए ! सपने में (प्रभू-पति को देख के) मैं उठ खड़ी हुई (पर। मैं उसका पल्ला ना पकड़ सकी)। मैंने (उसका) पल्ला क्यों ना पकड़ा। (इसलिए नही पकड़ सकी क्योंकि) उस सुंदर दग-दग करते प्रभू-पति को देख के (मेरा) मन मोहित हो गया (मुझे अपने आप की सुधि ही ना रही)। अब मैं उसके कदमों की खोज करती फिरती हूँ। बताइए। हे सखिए ! वह कैसे मिले। हे सखी ! मुझे वह यतन बताएँ जिससे वह प्यारा मिल जाए। 13। हे सहेलिए ! जो आँखें सत्संगियों का दर्शन नहीं करतीं। वे आँखें (दुनिया के पदार्थों और रूप को देख-देख के) बेहाल हुई रहती हैं। जो कान परमात्मा की सिफतसालाह नहीं सुनते। वे कान (आत्मिक आनंद की धुनि सुनने से) बंद किए हुए होते हैं। जो जीभ परमात्मा का नाम नहीं जपती। वह जीभ (दुनिया के झमेलों की बातें और आनंदा आदि की कैंची से हर वक्त) कटती जा रही है। हे सहेलिए ! जब प्रभू-पातशाह (की याद) भूल जाए। जब दिन-ब-दिन (आत्मिक जीवन) कमजोर होता जाता है। (सो। हे सहेलिए ! साध-संगति में प्रभू की सिफत-सालाह सुनते रहना। जीभ से नाम जपते रहना- यही है यतन उसको पा सकने का)। 14। हे भाई ! (कमल-फूल की) तीव्र सुगंधी में मस्त हो जाने के कारण (भौरे के) पंख कमल-फूल (की पंखड़ियों) में फस जाते हैं। (उन) पंखड़ियों से उलझ के (भौरे को) उड़ानें भरनी भूल जाती हैं (यही हाल है जीव-भौरे का)।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1362 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।