Lulla Family

अंग 1360

अंग
1360
राग Fifth Mehl, Gaathaa
राग: Fifth Mehl, Gaathaa · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ब्रहमणह संगि उधरणं ब्रहम करम जि पूरणह ॥
आतम रतं संसार गहं ते नर नानक निहफलह ॥65॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य हरी-सिमरन के काम में पूरा है वह है असल ब्राहमण। उसकी संगति में (औरों का भी) उद्धार हो सकता है। (पर) हे नानक ! जिन मनुष्यों का मन संसार में रति होया हुआ है वह (जगत से) निष्फल ही जाते हैं। 65।
पर दरब हिरणं बहु विघन करणं उचरणं सरब जीअ कह ॥
लउ लई त्रिसना अतिपति मन माए करम करत सि सूकरह ॥66॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य अपनी उपजीविका के लिए पराया धन चुराते हैं। औरों के कामों में रोड़ा अटकाते हैं। कई किस्मों के बोल बोलते हैं। जिनके मन में (सदा) माया की भूख है। तृष्णा के अधीन हो के (और माया) ले लूँ ले लूँ (ही सोचते रहते हैं)। वे लोग सूअरों वाले काम करते हैं (सूअर सदा गंदगी ही खाते हैं)। 66।
मते समेव चरणं उधरणं भै दुतरह ॥
अनेक पातिक हरणं नानक साध संगम न संसयह ॥67॥4॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य (प्रभू की याद में) मस्त हो के (प्रभू-चरणों में) लीन रहते हें। वे भयानक और दुस्तर (संसार) से पार लांघ जाते हें। हे नानक ! इसमें (रक्ती भर भी) शक नहीं कि ऐसे गुरमुखों की संगति अनेकों पाप दूर करने में समर्थ है। 67। 4।
महला 5 गाथा
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
करपूर पुहप सुगंधा परस मानुख्य देहं मलीणं ॥
मजा रुधिर द्रुगंधा नानक अथि गरबेण अग्यानणो ॥1॥
परमाणो परजंत आकासह दीप लोअ सिखंडणह ॥ गछेण नैण भारेण नानक बिना साधू न सिध्यते ॥2॥
जाणो सति होवंतो मरणो द्रिसटेण मिथिआ ॥
कीरति साथि चलंथो भणंति नानक साध संगेण ॥3॥
माया चित भरमेण इसट मित्रेखु बांधवह ॥
लबध्यं साध संगेण नानक सुख असथानं गोपाल भजणं ॥4॥
मैलागर संगेण निंमु बिरख सि चंदनह ॥
निकटि बसंतो बांसो नानक अहं बुधि न बोहते ॥5॥
गाथा गुंफ गोपाल कथं मथं मान मरदनह ॥
हतं पंच सत्रेण नानक हरि बाणे प्रहारणह ॥6॥
बचन साध सुख पंथा लहंथा बड करमणह ॥
रहंता जनम मरणेन रमणं नानक हरि कीरतनह ॥7॥
पत्र भुरिजेण झड़ीयं नह जड़ीअं पेड संपता ॥
नाम बिहूण बिखमता नानक बहंति जोनि बासरो रैणी ॥8॥
भावनी साध संगेण लभंतं बड भागणह ॥
हरि नाम गुण रमणं नानक संसार सागर नह बिआपणह ॥9॥
गाथा गूड़ अपारं समझणं बिरला जनह ॥
संसार काम तजणं नानक गोबिंद रमणं साध संगमह ॥10॥
सुमंत्र साध बचना कोटि दोख बिनासनह ॥
हरि चरण कमल ध्यानं नानक कुल समूह उधारणह ॥11॥
सुंदर मंदर सैणह जेण मध्य हरि कीरतनह ॥
मुकते रमण गोबिंदह नानक लबध्यं बड भागणह ॥12॥
हरि लबधो मित्र सुमितो ॥
बिदारण कदे न चितो ॥
जा का असथलु तोलु अमितो ॥
सोुई नानक सखा जीअ संगि कितो ॥13॥
अपजसं मिटंत सत पुत्रह ॥
सिमरतब्य रिदै गुर मंत्रणह ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गाथा महला 5 का वह परमात्मा केवल एक (ऑकार-स्वरूप) है, सतगुरु की कृपा से प्राप्ति होती है। मुश्क कपूर। फूल व अन्य सुगंधियां मनुष्य के शरीर को छू के मैलियां हो जाती हैं। (मनुष्य के शरीर में) मज्जा लहू और और दुर्गंन्धियां हैं; फिर भी। हे नानक ! अज्ञानी मनुष्य (इस शरीर का) माण करता है। 1। हे नानक ! अगर मनुष्य अति-छोटा अणु बन के आकाशों तक सारे द्वीपों लोकों और पहाड़ों पर आँख की एक झपक में ही हो आए। (इतनी सिद्धि होते हुए भी) गुरू के बिना उसका जीवन सफल नहीं होता। 2। मौत का आना ही अटल समझो। ये दिखता जगत (अवश्य) नाश होने वाला है (इसमें से किसी ने साथ नहीं निभना)। नानक कहता है-साध-संगति के आसरे की हुई परमात्मा की सिफतसालाह ही (मनुष्य) के साथ जाती है। 3। माया (मनुष्य के) मन को प्यारे मित्रों-संबन्धियों (के मोह) में भटकाती रहती है (और भटकना के कारण इसको सुख नहीं मिलता)। हे नानक ! सुख मिलने की जगह (केवल) परमात्मा का भजन ही है। जो साध-संगति के द्वारा मिल सकता है। चँदन की संगति से नीम का वृक्ष चंदन ही हो जाता है। पर। हे नानक ! चँदन के नजदीक बसता बाँस अपनी अकड़ के कारण सुगन्धि वाला नहीं बनता। 5। परमात्मा की सिफतसालाह की कहानियों का गुंदन मनुष्य के अहंकार को कुचल देता है। हे नानक ! परमात्मा (की सिफतसालाह) का तीर चलाने से (कामादिक) पाँचों वैरी नाश हो जाते हैं। 6। गुरू के (परमात्मा की सिफतसालाह के) बचन सुख का रास्ता हैं। पर ये वचन सौभाग्य से मिलते हैं। हे नानक ! परमात्मा की सिफतसालाह करने से जनम-मरण का चक्कर समाप्त हो जाता है। 7। (जैसे वृक्ष के) पत्ते भुर-भुर के (वृक्ष से) झड़ जाते हैं। (और दोबारा) वृक्ष की शाखाओं के साथ जुड़ नहीं सकते। (वैसे ही) हे नानक ! नाम से टूटे हुए मनुष्य दुख सहते हैं और। दिन-रात (और-और) जूनियों में पड़े भटकते हैं। 8। साध-संगति से (परमात्मा के नाम में) श्रद्धा बहुत भाग्यों से मिलती है। हे नानक ! परमात्मा के नाम और गुणों की याद से संसार-समुंद्र (जीव पर) अपना जोर नहीं डाल सकता। 9। बेअंत परमात्मा की सिफतसालाह करनी एक गहरी (रम्ज़ वाला) काम है। इसको कोई विरला मनुष्य समझता है। हे नानक ! सत्संग में रह के परमात्मा का सिमरन करने से दुनिया की वासनाएं त्यागी जा सकती हैं। 10। गुरू के वचन (ऐसे) श्रेष्ठ मंत्र हैं (जो) करोड़ों पापों का नाश कर देते हैं। हे नानक ! (उन वचनों से) प्रभू के कमल फूलों जैसे सुंदर चरणों का ध्यान सारी कुलों का उद्धार कर देता है। 11। उन घरों में ही बसना सुहावना है जिनमें परमात्मा की सिफतसालाह होती हैं। जो मनुष्य परमात्मा का सिमरन करते हैं वे (दुनिया के बँधनों से) मुक्त हो जाते हैं। पर। हे नानक ! (यह सिमरन) बड़े भाग्यों से मिलता है। मैंने वह श्रेष्ठ मित्र परमात्मा पा लिया है। जो कभी (मेरा) दिल नहीं तोड़ता। और जिसका ठिकाना असीम तोल वाला है। हे नानक ! मैंने उस परमात्मा को अपनी जिंद (के साथ रहने वाला) साथी बनाया है 13। (जैसे) सपुत्र के पैदा होने पर सारी कुल की (पिछली कोई) बदनामी धुल जाती है। गुरू का उपदेश हृदय में बसा के रखना चाहिए (और परमात्मा का सिमरन करना चाहिए)

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो मनुष्य हरी-सिमरन के काम में पूरा है वह है असल ब्राहमण।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।