आतम रतं संसार गहं ते नर नानक निहफलह ॥65॥
लउ लई त्रिसना अतिपति मन माए करम करत सि सूकरह ॥66॥
अनेक पातिक हरणं नानक साध संगम न संसयह ॥67॥4॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
करपूर पुहप सुगंधा परस मानुख्य देहं मलीणं ॥
मजा रुधिर द्रुगंधा नानक अथि गरबेण अग्यानणो ॥1॥
परमाणो परजंत आकासह दीप लोअ सिखंडणह ॥ गछेण नैण भारेण नानक बिना साधू न सिध्यते ॥2॥
जाणो सति होवंतो मरणो द्रिसटेण मिथिआ ॥
कीरति साथि चलंथो भणंति नानक साध संगेण ॥3॥
माया चित भरमेण इसट मित्रेखु बांधवह ॥
लबध्यं साध संगेण नानक सुख असथानं गोपाल भजणं ॥4॥
मैलागर संगेण निंमु बिरख सि चंदनह ॥
निकटि बसंतो बांसो नानक अहं बुधि न बोहते ॥5॥
गाथा गुंफ गोपाल कथं मथं मान मरदनह ॥
हतं पंच सत्रेण नानक हरि बाणे प्रहारणह ॥6॥
बचन साध सुख पंथा लहंथा बड करमणह ॥
रहंता जनम मरणेन रमणं नानक हरि कीरतनह ॥7॥
पत्र भुरिजेण झड़ीयं नह जड़ीअं पेड संपता ॥
नाम बिहूण बिखमता नानक बहंति जोनि बासरो रैणी ॥8॥
भावनी साध संगेण लभंतं बड भागणह ॥
हरि नाम गुण रमणं नानक संसार सागर नह बिआपणह ॥9॥
गाथा गूड़ अपारं समझणं बिरला जनह ॥
संसार काम तजणं नानक गोबिंद रमणं साध संगमह ॥10॥
सुमंत्र साध बचना कोटि दोख बिनासनह ॥
हरि चरण कमल ध्यानं नानक कुल समूह उधारणह ॥11॥
सुंदर मंदर सैणह जेण मध्य हरि कीरतनह ॥
मुकते रमण गोबिंदह नानक लबध्यं बड भागणह ॥12॥
हरि लबधो मित्र सुमितो ॥
बिदारण कदे न चितो ॥
जा का असथलु तोलु अमितो ॥
सोुई नानक सखा जीअ संगि कितो ॥13॥
अपजसं मिटंत सत पुत्रह ॥
सिमरतब्य रिदै गुर मंत्रणह ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो मनुष्य हरी-सिमरन के काम में पूरा है वह है असल ब्राहमण।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।