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अंग 1359

अंग
1359
राग Salok Sehskritee
राग: Salok Sehskritee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जेन कला मात गरभ प्रतिपालं नह छेदंत जठर रोगणह ॥
तेन कला असथंभं सरोवरं नानक नह छिजंति तरंग तोयणह ॥53॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: जिस अकाल-पुरख ने अपनी सक्ता से माँ के पेट में जीवों की रक्षा (का प्रबंध किया हुआ है)। माँ के पेट की आग-रूप रोग जीव का नाश नहीं कर सकता। हे नानक ! उस प्रभू ने इस (संसार-) सरोवर को अपनी ताकत का आसरा दिया हुआ है। इस सरोवर के पानी की लहरें (जीवों का) नाश नहीं कर सकतीं। 53।
गुसांई गरिस्ट रूपेण सिमरणं सरबत्र जीवणह ॥
लबध्यं संत संगेण नानक स्वछ मारग हरि भगतणह ॥54॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: जगत का मालिक परमात्मा सबसे बड़ी हस्ती है। उसका सिमरन सब जीवों का जीवन (सहारा) है। हे नानक ! परमात्मा की भगती हर (इनसानी जिंदगी के सफर का) निर्मल रास्ता है। जो साध-संगति में मिलता है।
मसकं भगनंत सैलं करदमं तरंत पपीलकह ॥
सागरं लंघंति पिंगं तम परगास अंधकह ॥
साध संगेणि सिमरंति गोबिंद सरणि नानक हरि हरि हरे ॥55॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! जो मनुष्य साध-संगति के माध्यम से परमात्मा की ओट ले के गोबिंद का सिमरन करता है। वह (पहले) मच्छर (की तरह निताणा होते हुए भी अब) पहाड़ (अहंकार) को तोड़ लेता है। वह (पहले) कीड़ी (की तरह कमजोर होते हुए भी) कीचड़ (मोह) पर से तैर जाता है। वह (पहले) पिंगले जैसा (निआसरा होते हुए भी अब संसार-) समुंद्र से पार लांघ जाता है। वह (पहले अज्ञानी) अंधे का अंधकार (अब) रौशनी बन जाता है। 55।
तिलक हीणं जथा बिप्रा अमर हीणं जथा राजनह ॥
आवध हीणं जथा सूरा नानक धरम हीणं तथा बैस्नवह ॥56॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: जैसे तिलक के बिना ब्राहमण। जैसे हुकम (की समर्थता) के बगैर राजा। जैसे शस्त्र के बिना शूरवीर (शोभा नहीं पाता)। वैसे। हे नानक ! धर्म से टूटा हुआ विष्णु-भगत (समझो)। 56।
न संखं न चक्रं न गदा न सिआमं ॥
अस्चरज रूपं रहंत जनमं ॥
नेत नेत कथंति बेदा ॥
ऊच मूच अपार गोबिंदह ॥
बसंति साध रिदयं अचुत बुझंति नानक बडभागीअह ॥57॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: उसके हाथ में ना शंख है ना चक्र है ना गदा है। ना ही वह काले रंग वाला है। (उसका रूप आश्चर्य है (जो बयान नहीं हो सकता)। वह जनम से रहित है। वेद कहते हैं कि उस जैसा और कोई नहीं। गोबिंद बेअंत है। (बहुत) ऊँचा है। (बहुत) बड़ा है। हे नानक ! बड़े भाग्यों वाले लोग ही (ये बात) समझते हैं। 57।
उदिआन बसनं संसारं सनबंधी स्वान सिआल खरह ॥
बिखम सथान मन मोह मदिरं महां असाध पंच तसकरह ॥
हीत मोह भै भरम भ्रमणं अहं फांस तीख्यण कठिनह ॥
पावक तोअ असाध घोरं अगम तीर नह लंघनह ॥
भजु साधसंगि गोुपाल नानक हरि चरण सरण उधरण क्रिपा ॥58॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जीव का वासा एक ऐसे संसार जंगल में है जहाँ कुत्ते। गीदड़। गधे इसके सम्बन्धी हैं (भाव। जीव का स्वभाव कुत्ते। गीदड़। गधे जैसा है)। जीव का मन बड़ी कठिन जगह (फसा हुआ) है। मोह की शराब (में मस्त है)। बड़े ही अजेय पाँच (कामादिक) चोर (इस के पीछे पड़े हैं)। हित। मोह। (अनेकों) सहम। भटकना (में जीव काबू आया हुआ है)। अहंकार का कठिन तेज़ फंदा (इसके गले में पड़ा हुआ है)। (जीव एक ऐेसे समुंद्र में गोते खा रहा है जहाँ) तृष्णा की आग लगी हुई है। भयानक असाध्य विषियों का पानी (लबालब भरा पड़ा है)। (उस समुंद्र का) किनारा अपहुँच है अगम्य है। पार नहीं लांघा जा सकता। हे नानक ! साध-संगति में जाकर गोपाल का भजन कर। प्रभू के चरणों की ओट लेने से ही उसकी मेहर से (इस भयानक संसार-समुंद में से) बचाव हो सकता है। 58।
क्रिपा करंत गोबिंद गोपालह सगल्यं रोग खंडणह ॥
साध संगेणि गुण रमत नानक सरणि पूरन परमेसुरह ॥59॥
सिआमलं मधुर मानुख्यं रिदयं भूमि वैरणह ॥
निवंति होवंति मिथिआ चेतनं संत स्वजनह ॥60॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: जब गोबिंद गोपाल (जीव पर) कृपा करता है तब (उसके) सारे रोग नाश कर देता है। हे नानक ! साध-संगति द्वारा ही परमात्मा की सिफत-सालाह की जा सकती है। और पूरन परमेश्वर का आसरा लिया जा सकता है। 59। मनुष्य (देखने में) सुंदर हो। और बोल (उसके) मीठे हों। पर अगर उसके हृदय-धरती में वैर (-विरोध) (का बीज) हो। तो उसका (दूसरों के आगे) झुकना (सिर्फ) ठॅगी है। भले मनुष्य संत जन (इस कमी से) सावधान रहते हैं। 60।
अचेत मूड़ा न जाणंत घटंत सासा नित प्रते ॥
छिजंत महा सुंदरी कांइआ काल कंनिआ ग्रासते ॥
रचंति पुरखह कुटंब लीला अनित आसा बिखिआ बिनोद ॥
भ्रमंति भ्रमंति बहु जनम हारिओ सरणि नानक करुणा मयह ॥61॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: बेसमझ मूर्ख मनुष्य यह नहीं जानता कि साँसें घटती जा रही हैं। बड़ा सुंदर शरीर (दिन-ब-दिन) कमजोर होता जाता है। वृद्ध-अवस्था अपना जोर डालती जा रही है। (ऐसी हालत में भी) व्यक्ति अपने परिवार के कलोलों में मस्त रहता है। और नित्य ना रहने वाली माया की खुशियों की आशाएं (बनाए रखता है)। (नतीजा ये निकलता है कि) अनेकों जूनियों में भटकता जीव थक जाता है। हे नानक ! (इस कलेष से बचने के लिए) दया-स्वरूप प्रभू का आसरा ले। 61।
हे जिहबे हे रसगे मधुर प्रिअ तुयं ॥
सत हतं परम बादं अवरत एथह सुध अछरणह ॥
गोबिंद दामोदर माधवे ॥62॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे जीभ ! हे (सब) रसों को जानने वाली ! (हे चस्कों से सांझ डाल के रखने वाली ! हे चस्कों में फसी हुई !) मीठे पदार्थ आपको प्यारे लगते हैं। परमात्मा के नाम (-सिमरन) के प्रति आप मरी हुई है। और बड़े-बड़े झगड़े सहेड़ती है। हे जीभ ! गोबिंद दामोदर माधो ! -ये पवित्र शबद आप बार-बार उच्चरण कर (तब ही आप जीभ कहलवाने के योग्य होगी)। 62।
गरबंति नारी मदोन मतं ॥
बलवंत बलात कारणह ॥
चरन कमल नह भजंत त्रिण समानि ध्रिगु जनमनह ॥
हे पपीलका ग्रसटे गोबिंद सिमरण तुयं धने ॥
नानक अनिक बार नमो नमह ॥63॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (जो) मनुष्य स्त्री के मद में मस्ताया हुआ अपने आप को बलवान जान के अहंकार करता है। और (औरों पर) ज्यादती करता है। वह परमात्मा के सुंदर चरणों का ध्यान नहीं धरता। (इसके कारण उसकी हस्ती) तीले के बराबर है। उसका जीवन धिक्कारयोग्य है। हे कीड़ी ! (अगर) गोबिंद का सिमरन आपका धन है। (तो आप छोटी सी होते हुए भी) भारी है (आपके मुकाबले में वह बलवान मनुष्य हल्का तीले के समान है)। हे नानक ! अनेकों बार परमत्मा के आगे नमस्कार कर। 63।
त्रिणं त मेरं सहकं त हरीअं ॥
बूडं त तरीअं ऊणं त भरीअं ॥
अंधकार कोटि सूर उजारं ॥
बिनवंति नानक हरि गुर दयारं ॥64॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: वह तीले से सुमेर पर्वत बन जाता है। सूखे से हरा हो जाता है। (विचारों में) डूबता तैर जाता है। (गुणों से) वंचित (गुणों से) भर जाता है। (उसके लिए) अंधेरे से करोड़ों सूर्यों की रोशनी हो जाती है। नानक विनती करता है (जिस पर) गुरू परमात्मा दयाल हो जाए। 64।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 11 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिस अकाल-पुरख ने अपनी सक्ता से माँ के पेट में जीवों की रक्षा (का प्रबंध किया हुआ है)।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।