मनि तनि पिआस दरसन घणी कोई आणि मिलावै माइ ॥ संत सहाई प्रेम के हउ तिन कै लागा पाइ ॥ विणु प्रभ किउ सुखु पाईऐ दूजी नाही जाइ ॥ जिंन॑ी चाखिआ प्रेम रसु से त्रिपति रहे आघाइ ॥ आपु तिआगि बिनती करहि लेहु प्रभू लड़ि लाइ ॥ जो हरि कंति मिलाईआ सि विछुड़ि कतहि न जाइ ॥ प्रभ विणु दूजा को नही नानक हरि सरणाइ ॥ असू सुखी वसंदीआ जिना मइआ हरि राइ ॥8॥ कतिकि करम कमावणे दोसु न काहू जोगु ॥ परमेसर ते भुलिआं विआपनि सभे रोग ॥ वेमुख होए राम ते लगनि जनम विजोग ॥ खिन महि कउड़े होइ गए जितड़े माइआ भोग ॥ विचु न कोई करि सकै किस थै रोवहि रोज ॥ कीता किछू न होवई लिखिआ धुरि संजोग ॥ वडभागी मेरा प्रभु मिलै तां उतरहि सभि बिओग ॥ नानक कउ प्रभ राखि लेहि मेरे साहिब बंदी मोच ॥ कतिक होवै साधसंगु बिनसहि सभे सोच ॥9॥ मंघिरि माहि सोहंदीआ हरि पिर संगि बैठड़ीआह ॥ तिन की सोभा किआ गणी जि साहिबि मेलड़ीआह ॥ तनु मनु मउलिआ राम सिउ संगि साध सहेलड़ीआह ॥ साध जना ते बाहरी से रहनि इकेलड़ीआह ॥ तिन दुखु न कबहू उतरै से जम कै वसि पड़ीआह ॥ जिनी राविआ प्रभु आपणा से दिसनि नित खड़ीआह ॥ रतन जवेहर लाल हरि कंठि तिना जड़ीआह ॥ नानक बांछै धूड़ि तिन प्रभ सरणी दरि पड़ीआह ॥ मंघिरि प्रभु आराधणा बहुड़ि न जनमड़ीआह ॥10॥ पोखि तुखारु न विआपई कंठि मिलिआ हरि नाहु ॥ मनु बेधिआ चरनारबिंद दरसनि लगड़ा साहु ॥ ओट गोविंद गोपाल राइ सेवा सुआमी लाहु ॥ बिखिआ पोहि न सकई मिलि साधू गुण गाहु ॥ जह ते उपजी तह मिली सची प्रीति समाहु ॥ करु गहि लीनी पारब्रहमि बहुड़ि न विछुड़ीआहु ॥ बारि जाउ लख बेरीआ हरि सजणु अगम अगाहु ॥ सरम पई नाराइणै नानक दरि पईआहु ॥ पोखु सोुहंदा सरब सुख जिसु बखसे वेपरवाहु ॥11॥ माघि मजनु संगि साधूआ धूड़ी करि इसनानु ॥ हरि का नामु धिआइ सुणि सभना नो करि दानु ॥ जनम करम मलु उतरै मन ते जाइ गुमानु ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: मेरे मन में मेरे तन में प्रभू के दर्शन की बड़ी प्यास लगी हुई है (चित्त चाहता है कि) कोई (उस पति को) ला के मेल करा देवे। (ये सुन के कि) संत जन प्रेम बढ़ाने में सहायता किया करते हैं, मैं उनके चरणों में लगी हूँ। (हे माँ !) प्रभू के बगैर सुख आनंद नहीं मिल सकता (क्योंकि सुख आनंद की) और कोई जगह ही नहीं। जिन (भाग्यशालियों) ने प्रभू प्यार का स्वाद (एक बार) चख लिया है (उन्हें माया के स्वाद भूल जाते हैं, माया की ओर से) वे तृप्त हो जाते हैं। स्वै भाव छोड़ के वे सदा अरदासें ही करते रहते हैं, हे प्रभू ! हमें अपने साथ जोड़ के रखो। जिस जीव-स्त्री को पति प्रभू ने अपने साथ मिला लिया है, वह (उस मिलाप में से) विछुड़ के अन्य किसी जगह नहीं जाती। (क्योंकि) हे नानक ! (उसे निश्चय आ जाता है कि सदीवी सुख के वास्ते) प्रभू की शरण के बिना और कोई जगह नहीं। वह सदा प्रभू की शरण पड़ी रहती है। असू (की मीठी मीठी ऋतु) में वह जीव सि्त्रयां सुखी बसती हैं, जिनपे परमात्मा की कृपा होती है। 8। कार्तिक (की सुहावनी ऋतु) में (भी अगर प्रभू पति से विछोड़ा रहा तो ये अपने) किए कर्मों का नतीजा है, किसी और के माथे कोई दोश नहीं लगाया जा सकता। परमेश्वर की याद से टूटने से (दुनिया के) सारे दुख कलेश आ चिपकते हैं। जिन्होंने (इस जन्म में) परमात्मा की याद से मुंह मोड़े रखा, उन्हें (फिर) लम्बे विछोड़े पड़ जाते हैं। जिन माया की मौजों (की खातिर प्रभू को भुला दिया था, वह भी) एक पल में दुखदायी हैं जाती हैं। (उस दुखी हालत में) कहीं भी नित्य रोने रोने का लाभ नहीं होता, (क्योंकि दुख तो है विछोड़े के कारण, और विछोड़े को दूर) कोई बिचोलापन नही कर सकता। (दुखी जीव की अपनी) कोई पेश नही चलती। (पिछले कर्मों अनुसार) धुर से ही लिखे लेखों की बिधि आ बनती है। (हां !) अगर सौभाग्य से प्रभू (स्वयं) आ मिले, तो बिछोड़े से पैदा हुए सारे दुख मिट जाते हैं। (नानक की तो यही बिनती है) हे माया के बंधनों से छुड़ाने वाले मेरे मालिक ! नानक को (माया के मोह से) बचा ले। कार्तिक (की मजेदार ऋतु) में जिन्हें साध-संगति मिल जाए, उनके (विछोड़े वाली) सारी चिंताएं फिक्रें समाप्त हो जाती हैं। 9। मंघर (के ठण्डे मीठे) महीने में वह जीव-सि्त्रयां सुंदर लगती हैं, जो हरी पति के साथ बैठी होती हैं। जिन्हें मालिक प्रभू ने अपने साथ मिला लिया, उनकी शोभा बयान नहीं हो सकती। सत्संगी सहेलियों की संगति में प्रभू के साथ (चित्त जोड़ के) उनका शरीर उनका मन सदा खिला रहता है। पर जो जीव सि्त्रयां सत्संगियों (की संगति) से वंचित रह जाती है, वह एकेली (छुटॅड़) ही रहती हैं (जैसे सड़े हुए तिलों का पौधा खेत में बेआसरा ही रहता है। अकेली बगैर पति जिंद को देख के कामादिक कई वैरी आ के घेर लेते हैं, और) उनका (विकारों से उपजा) दुख कभी उतरता नहीं। वे जमों के वश पड़ी रहती हैं। जिन जीव-सि्त्रयों ने पति प्रभू का साथ भोगा है, वह (विकारों के हमलों से) सदा सावधान दिखती हैं (विकार उन पर चोट नहीं कर सकते, क्योंकि) परमात्मा के गुणानुवाद उनके हृदय में परोए रहते हैं, जैसे हीरे जवाहरात व लालों का हार गले में डाला होता है। नानक उन सत्संगियों के चरणों की धूड़ मांगता है जो प्रभू के दर पर पड़े रहते हैं, जो प्रभू की शरण में रहते हैं। मंघर में परमात्मा का सिमरन करने से दुबारा जनम मरण का चक्र नही पड़ता। 10। पोह के महीने जिस जीव स्त्री के गले से (हृदय में) प्रभू पति लगा हुआ हो उसे कक्कर (मन की कठोरता, कोरापन) जोर नहीं डाल सकते। (क्योंकि) उसकी बिरती प्रभू के दीदार की तांघ में जुड़ी रहती है। उसका मन प्रभू के सोहने चरणों में बेधा रहता है। जिस जीव स्त्री ने गोबिंद गोपाल का आसरा लिया है, उसने प्रभू पति की सेवा का लाभ कमाया है। माया उसको छू नहीं सकती। गुरू को मिल के उसने प्रभू की सिफत सालाह में डुबकी लगाई है। जिस परमात्मा से उसने जन्म लिया है, उसी में वह जुड़ी रहती है। उसकी लिव प्रभू की प्रीति में लगी रहती है। पारब्रह्म ने (उसका) हाथ पकड़ कर (उसे अपने चरणों में) जोड़ा हुआ है, वह मुड़ (उसके चरणों से) बिछुड़ती नहीं। (पर) वह सज्जन प्रभू बड़ा अपहुँच है, बड़ा गहरा है, मैं उससे लाखो बार कुर्बान हूँ। हे नानक ! (वह बड़ा दयालु है) दर पर गिरने से उस प्रभू को इज्जत रखनी ही पड़ती है। जिस प रवह बेपरवाह प्रभू मेहर करता है, उसे पोह का महीना सुहावना लगता है उसे सारे ही सुख मिल जाते हैं। 11। माघ में (माघी वाले दिन लोग प्रयाग आदिक तीर्थों पे स्नान करना बड़ा पुन्य का काम समझते हैं, पर आप हे भाई !) गुरमुखों की संगति में (बैठ, यही है तीर्थों का) स्नान, उनकी चरण धूड़ में स्नान कर (निम्रता भाव से गुरमुखों की संगति कर, वहां) परमात्मा का नाम जप, परमात्मा की सिफत सालाह सुन। और सभी को इस नाम की दाति बाँट। (इस तरह) कई जन्मों के किए कर्मों से पैदा हुई विकारों की मैल (आपके मन में से) उतर जाएगी। आपके मन में से अहंकार दूर हैं जाएगा।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “मेरे मन में मेरे तन में प्रभू के दर्शन की बड़ी प्यास लगी हुई है (चित्त चाहता है कि) कोई (उस पति को) ला के मेल करा देवे।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।