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अंग 1358

अंग
1358
राग Salok Sehskritee
राग: Salok Sehskritee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
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भै अटवीअं महा नगर बासं धरम लख्यण प्रभ मइआ ॥
साध संगम राम राम रमणं सरणि नानक हरि हरि दयाल चरणं ॥44॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: डरावना जंगल अच्छा-खासा बसता शहर प्रतीत होने लगता है- यह है धर्म के लक्षण जो प्रभू की मेहर से प्राप्त होते हैं। हे नानक ! (वह धर्म है-) साध-संगति में जा के परमात्मा का नाम सिमरना और दयालु प्रभू के चरणों का आसरा लेना। 44।
हे अजित सूर संग्रामं अति बलना बहु मरदनह ॥
गण गंधरब देव मानुख्यं पसु पंखी बिमोहनह ॥
हरि करणहारं नमसकारं सरणि नानक जगदीस्वरह ॥45॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे ना जीते जाने वाले (मोह) ! आप युद्ध का सूरमा है। आप अनेकों महाबलियों को मॅल देने वाला है। गण-गन्धर्व देवतागण मनुष्य पशु पक्षी -इन सबको आप मोह लेता है। (पर इसकी मार से बचने के लिए) हे नानक ! जगत के मालिक प्रभू की शरण ले और जगत के राखनहार हरी को नमस्कार कर। 45।
हे कामं नरक बिस्रामं बहु जोनी भ्रमावणह ॥
चित हरणं त्रै लोक गंम्यं जप तप सील बिदारणह ॥
अलप सुख अवित चंचल ऊच नीच समावणह ॥
तव भै बिमुंचित साध संगम ओट नानक नाराइणह ॥46॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे काम ! आप (जीवों को अपने वश में कर के) नर्क में पहुँचाने वाला है और कई जूनियों में भटकाने वाला है। आप जीवों के मन भ्रमा लेता है। तीनों ही लोकों में आपकी पहुँच है। आप जीवों के जप-तप और शुद्ध-आचरण का नाश कर देता है। हे चँचल काम् ! आप सुख तो थोड़ा ही देता है। पर इसके साथ आप जीवों को (शुद्व-आचरण के) धन से वंचित कर देता है। जीव ऊँचे हों। नीचे हों। सबमें आप पहुँच जाता है। साध-संगति में पहुँचने से आपके डर से निजात मिलती है। हे नानक ! (साध-संग में जा के) प्रभू की शरण ले। 46।
हे कलि मूल क्रोधं कदंच करुणा न उपरजते ॥
बिखयंत जीवं वस्यं करोति निरत्यं करोति जथा मरकटह ॥
अनिक सासन ताड़ंति जमदूतह तव संगे अधमं नरह ॥
दीन दुख भंजन दयाल प्रभु नानक सरब जीअ रख्या करोति ॥47॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे झगड़े के मूल क्रोध ! (आपके अंदर) कभी दया नहीं पैदा होती। आप विषयी जीवों को अपने वश में कर लेता है। आपके वश में आया जीव ऐसे नाचता है जैसे बँदर। आपकी संगत में जीव नीच (स्वभाव वाले) बन जाते हैं। जमदूत उनको अनेकों हुकम और दण्ड देते हैं। हे नानक ! दीनों के दुख दूर करने वाला दयालु प्रभू ही (इस क्रोध से) सब जीवों की रक्षा करता है (और कोई नहीं कर सकता)। 47।
हे लोभा लंपट संग सिरमोरह अनिक लहरी कलोलते ॥
धावंत जीआ बहु प्रकारं अनिक भांति बहु डोलते ॥
नच मित्रं नच इसटं नच बाधव नच मात पिता तव लजया ॥
अकरणं करोति अखाद्यि खाद्यं असाज्यं साजि समजया ॥
त्राहि त्राहि सरणि सुआमी बिग्याप्ति नानक हरि नरहरह ॥48॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे लोभ ! मुखी लोग (भी) आपकी संगति में (रह के विकारों में) डूब जाते हैं। आपकी लहरों में (फस के) अनेकों कलोल करते हैं। आपके वश में आए हुए जीव कई तरह से भटकते फिरते हैं। अनेकों तरीकों से डोलते हैं। आपके असर के नीचे रहने के कारण उन्हें ना किसी मित्र की। ना गुरू पीर की। ना सम्बन्धियों की। और ना ही माता-पिता की कोई शर्म रहती है। आपके प्रभाव से जीव खुले तौर पर समाज में वह काम करता है जो नहीं करने चाहिए। वह चीजें खाता है जो नहीं खानी चाहिए। वह बातें करता है जो नहीं करनी चाहिए। हे नानक ! (लोभ से बचने के लिए) इस तरह अरदास कर- हे प्रभू ! हे स्वामी ! मैं आपकी शरण आया हूँ। मुझे इससे बचा ले। बचा ले। 48।
हे जनम मरण मूलं अहंकारं पापातमा ॥
मित्रं तजंति सत्रं द्रिड़ंति अनिक माया बिस्तीरनह ॥
आवंत जावंत थकंत जीआ दुख सुख बहु भोगणह ॥
भ्रम भयान उदिआन रमणं महा बिकट असाध रोगणह ॥
बैद्यं पारब्रहम परमेस्वर आराधि नानक हरि हरि हरे ॥49॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे पापी अहंकार ! आप जीवों के जनम-मरण का कारण है। माया के अनेकों खिलारे पसार के आप मित्रों का त्याग करा के वैरी पक्के कराए जाता है। (आपके वश में हैं के) जीव जनम-मरण के चक्करों में पड़ के थक जाते हैं। अनेकों दुख-सुख भोगते हैं। भटकनों में पड़ कर। जैसे। डरावने जंगल में से गुजरते हैं। और बड़े भयानक ला-इलाज रोगों में फसे हुए हैं। (अहंकार के रोग से बचाने वाला) हकीम परमात्मा ही है। हे नानक ! उस प्रभू को हर वक्त सिमर। 49।
हे प्राण नाथ गोबिंदह क्रिपा निधान जगद गुरो ॥
हे संसार ताप हरणह करुणा मै सभ दुख हरो ॥
हे सरणि जोग दयालह दीना नाथ मया करो ॥
सरीर स्वसथ खीण समए सिमरंति नानक राम दामोदर माधवह ॥50॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे गोबिंद ! हे जीवों के मालिक ! हे कृपा के खजाने ! हे जगत के गुरू ! हे दुनिया के दुखों के नाश करने वाले ! हे तरस-स्वरूप प्रभू ! (जीवों के) सारे दुख-कलेश दूर कर। हे दया के घर ! हे शरण आए हुओं की सहायता करने-योग्य प्रभू ! हे दीनों के नाथ ! मेहर कर। हे राम ! हे दामोदर ! हे माधो ! शारीरिक आरोगता के समय और शरीर के नाश होने के वक्त (हर वक्त) नानक आपको सिमरता रहे। 50।
चरण कमल सरणं रमणं गोपाल कीरतनह ॥
साध संगेण तरणं नानक महा सागर भै दुतरह ॥51॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (संसार) एक बड़ा भयानक समुंद्र है। जिसमें से पार लांघना बहुत मुश्किल है। साध-संगति से प्रभू के सुंदर चरणों का आसरा (लेने से)। जगत के पालनहार परमात्मा की सिफत-सालाह उचारने से (इसमें से) पार लांघा जा सकता है। 51।
सिर मस्तक रख्या पारब्रहमं हस्त काया रख्या परमेस्वरह ॥
आतम रख्या गोपाल सुआमी धन चरण रख्या जगदीस्वरह ॥
सरब रख्या गुर दयालह भै दूख बिनासनह ॥
भगति वछल अनाथ नाथे सरणि नानक पुरख अचुतह ॥52॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सिर। माथा। हाथ। शरीर। जीवात्मा। पैर। धन-पदार्थ -जीवों की हर तरह से रक्षा करने वाला पारब्रहम परमेश्वर गोपाल। स्वामी। जगदीश्वर। सबसे बड़ा दया का घर परमात्मा ही है। वही सारे दुखों का नाश करने वाला है। हे नानक ! वह प्रभू निआसरों का आसरा है। भगती को प्यार करने वाला है। उस अविनाशी सर्व-व्यापक प्रभू का आसरा ले। 52।
जेन कला धारिओ आकासं बैसंतरं कासट बेसटं ॥
जेन कला ससि सूर नख्यत्र जोत्यिं सासं सरीर धारणं ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जिस (परमात्मा) ने अपनी कला से आकाश को टिकाया हुआ है और आग को लकड़ी में ढका हुआ है; जिस प्रभू ने अपनी ताकत से चँद्रमा सूर्य और तारों में अपना प्रकाश टिकाया हुआ है और सब शरीरों में साँसें टिकाई हुई हैं;

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “डरावना जंगल अच्छा-खासा बसता शहर प्रतीत होने लगता है- यह है धर्म के लक्षण जो प्रभू की मेहर से प्राप्त होते हैं।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।