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अंग
1357
सहसकृती सलोक
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- कीरतनं साधसंगेण नानक नह द्रिसटंति जमदूतनह ॥34॥
- नच दुरलभं धनं रूपं नच दुरलभं स्वरग राजनह ॥
- जत कतह ततह द्रिसटं स्वरग मरत पयाल लोकह ॥
- बिखया भयंति अंम्रितं द्रुसटां सखा स्वजनह ॥
- सरब सील ममं सीलं सरब पावन मम पावनह ॥
- नह सीतलं चंद्र देवह नह सीतलं बावन चंदनह ॥
- मंत्रं राम राम नामं ध्यानं सरबत्र पूरनह ॥
- अजा भोगंत कंद मूलं बसंते समीपि केहरह ॥
- छलं छिद्रं कोटि बिघनं अपराधं किलबिख मलं ॥
- तरण सरण सुआमी रमण सील परमेसुरह ॥
- दुरगम सथान सुगमं महा दूख सरब सूखणह ॥
कीरतनं साधसंगेण नानक नह द्रिसटंति जमदूतनह ॥34॥
कीरतनं साधसंगेण नानक नह द्रिसटंति जमदूतनह ॥34॥
हिन्दी अर्थ: साध-संगति में जुड़ के परमात्मा की सिफतसालाह करता है। हे नानक ! जमराज के दूत उस मनुष्य की ओर देख (भी) नहीं सकते (क्योंकि विकार उसके नजदीक नहीं आते)। 34।
नच दुरलभं धनं रूपं नच दुरलभं स्वरग राजनह ॥
नच दुरलभं धनं रूपं नच दुरलभं स्वरग राजनह ॥
नच दुरलभं भोजनं बिंजनं नच दुरलभं स्वछ अंबरह ॥
नच दुरलभं सुत मित्र भ्रात बांधव नच दुरलभं बनिता बिलासह ॥
नच दुरलभं बिदिआ प्रबीणं नच दुरलभं चतुर चंचलह ॥
दुरलभं एक भगवान नामह नानक लबध्यिं साधसंगि क्रिपा प्रभं ॥35॥
नच दुरलभं भोजनं बिंजनं नच दुरलभं स्वछ अंबरह ॥
नच दुरलभं सुत मित्र भ्रात बांधव नच दुरलभं बनिता बिलासह ॥
नच दुरलभं बिदिआ प्रबीणं नच दुरलभं चतुर चंचलह ॥
दुरलभं एक भगवान नामह नानक लबध्यिं साधसंगि क्रिपा प्रभं ॥35॥
हिन्दी अर्थ: धन और रूप पाना बहुत मुश्किल नहीं। ना ही स्वर्ग का राज। स्वादिष्ट मसालेदार खाने प्राप्त करने मुश्किल नहीं। ना ही साफ-सुथरे कपड़े। पुत्र। मित्र भाई रिश्तेदारों का मिलना बहुत मुश्किल नहीं। ना ही स्त्री के लाड-प्यार। विद्या हासिल करके समझदार बनना भी बहुत मुश्किल नहीं। ना ही कठिन है (विद्या की सहायता से) चालाक और तीक्ष्ण बुद्धि होना। हाँ। हे नानक ! केवल परमात्मा का नाम मुश्किल से मिलता है। नाम साध-संगति में ही मिलता है (पर तब मिलता है जब) परमात्मा की मेहर हों
जत कतह ततह द्रिसटं स्वरग मरत पयाल लोकह ॥
जत कतह ततह द्रिसटं स्वरग मरत पयाल लोकह ॥
सरबत्र रमणं गोबिंदह नानक लेप छेप न लिप्यते ॥36॥
सरबत्र रमणं गोबिंदह नानक लेप छेप न लिप्यते ॥36॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! जिस व्यक्ति ने सर्व-व्यापक परमात्मा को सवर्ग। मातलोक। पाताल लोक - हर जगह देख लिया है। वह विकारों के पोचे से नहीं लिबड़ता। 36।
बिखया भयंति अंम्रितं द्रुसटां सखा स्वजनह ॥
बिखया भयंति अंम्रितं द्रुसटां सखा स्वजनह ॥
दुखं भयंति सुख्यं भै भीतं त निरभयह ॥
थान बिहून बिस्राम नामं नानक क्रिपाल हरि हरि गुरह ॥37॥
दुखं भयंति सुख्यं भै भीतं त निरभयह ॥
थान बिहून बिस्राम नामं नानक क्रिपाल हरि हरि गुरह ॥37॥
हिन्दी अर्थ: जहर उसके लिए अमृत बन जाता है। दोखी उसके मित्र और करीबी रिश्तेदार बन जाते हैं। दुख-कलेश सुख बन जाते हैं। अगर वह (पहले) अनेकों डरों से सहमा रहता था। तो (वह अब) निडर हो जाता है; अनेकों जूनों में भटकते को परमात्मा का नाम सहारा-आसरा मिल जाता है। हे नानक ! परमात्मा-का-रूप-सतिगुरू (जिस मनुष्य पर) कृपालु हो जाए। 37 ।
सरब सील ममं सीलं सरब पावन मम पावनह ॥
सरब सील ममं सीलं सरब पावन मम पावनह ॥
सरब करतब ममं करता नानक लेप छेप न लिप्यते ॥38॥
सरब करतब ममं करता नानक लेप छेप न लिप्यते ॥38॥
हिन्दी अर्थ: जो प्रभू सब जीवों को शांति-स्वभाव देने वाला है मुझे भी वही शांति देता है; जो सबको पवित्र करने के समर्थ है। मेरा भी वही पवित्र कर्ता है; हे नानक ! जो प्रभू सब जीवों को रचने के योग्य है। वही मेरा भी कर्ता है। वह प्रभू विकारों के पोचे से नहीं लिबड़ता। 38।
नह सीतलं चंद्र देवह नह सीतलं बावन चंदनह ॥
नह सीतलं चंद्र देवह नह सीतलं बावन चंदनह ॥
नह सीतलं सीत रुतेण नानक सीतलं साध स्वजनह ॥39॥
नह सीतलं सीत रुतेण नानक सीतलं साध स्वजनह ॥39॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! चँद्रमा (उतनी) ठंढक पहुँचाने वाला नहीं। ना ही सफेद चँदन (उतनी) शीतलता दे सकता है। ना ही सर्दियों की बहार (उतनी) ठंढक ला सकती है। (जितनी) ठंढ-शांति गुरमुख साध-जन देते हैं। 39।
मंत्रं राम राम नामं ध्यानं सरबत्र पूरनह ॥
मंत्रं राम राम नामं ध्यानं सरबत्र पूरनह ॥
ग्यानं सम दुख सुखं जुगति निरमल निरवैरणह ॥
दयालं सरबत्र जीआ पंच दोख बिवरजितह ॥
भोजनं गोपाल कीरतनं अलप माया जल कमल रहतह ॥
उपदेसं सम मित्र सत्रह भगवंत भगति भावनी ॥
पर निंदा नह स्रोति स्रवणं आपु त्यिागि सगल रेणुकह ॥
खट लख्यण पूरनं पुरखह नानक नाम साध स्वजनह ॥40॥
ग्यानं सम दुख सुखं जुगति निरमल निरवैरणह ॥
दयालं सरबत्र जीआ पंच दोख बिवरजितह ॥
भोजनं गोपाल कीरतनं अलप माया जल कमल रहतह ॥
उपदेसं सम मित्र सत्रह भगवंत भगति भावनी ॥
पर निंदा नह स्रोति स्रवणं आपु त्यिागि सगल रेणुकह ॥
खट लख्यण पूरनं पुरखह नानक नाम साध स्वजनह ॥40॥
हिन्दी अर्थ: परमात्मा का नाम (जीभ से) जपना और उसको सर्व-व्यापक जान के उसमें सुरति जोड़नी; सुखों-दुखों को एक-समान समझना तथा पवित्र और वेर-रहित जीवन जीना; सारे जीवों के साथ प्यार-हमदर्दी रखनी और कामादिक पाँचों विकारों से बचे रहना; परमात्मा की उपमा को जिंदगी का आसरा बनाना और माया से इस प्रकार निर्लिप रहना जैसे कमल का फूल पानी में। सज्जन और वैरी से एक जैसा प्रेम-भाव रखने की शिक्षा गहण करनी और परमात्मा की भगती में प्यार बनाना; पराई निंदा अपने कानों से ना सुननी और स्वै भाव त्याग के सबके चरणों की धूल बनना। हे नानक ! पूरन पुरखों में ये छे लक्षण होते हैं। उनको ही साध गुरमुखि कहा जाता हैं। 40।
अजा भोगंत कंद मूलं बसंते समीपि केहरह ॥
अजा भोगंत कंद मूलं बसंते समीपि केहरह ॥
तत्र गते संसारह नानक सोग हरखं बिआपते ॥41॥
तत्र गते संसारह नानक सोग हरखं बिआपते ॥41॥
हिन्दी अर्थ: बकरी गाजर-मूली आदि खाती हो, पर शेर के नज़दीक बसती हो (उसे मन-भाता खाना मिलने की प्रसन्नता तो जरूर है पर हर वक्त शेर का डर भी बना रहता है); हे नानक ! यही है हाल जगत का। इसको खुशी और गमी दोनों व्यापते हैं। 41।
छलं छिद्रं कोटि बिघनं अपराधं किलबिख मलं ॥
छलं छिद्रं कोटि बिघनं अपराधं किलबिख मलं ॥
भरम मोहं मान अपमानं मदं माया बिआपितं ॥
म्रित्यु जनम भ्रमंति नरकह अनिक उपावं न सिध्यते ॥
निरमलं साध संगह जपंति नानक गोपाल नामं ॥
रमंति गुण गोबिंद नित प्रतह ॥42॥
भरम मोहं मान अपमानं मदं माया बिआपितं ॥
म्रित्यु जनम भ्रमंति नरकह अनिक उपावं न सिध्यते ॥
निरमलं साध संगह जपंति नानक गोपाल नामं ॥
रमंति गुण गोबिंद नित प्रतह ॥42॥
हिन्दी अर्थ: (दूसरों को) धोखा (देना)। (किसी के) ऐब (फरोलने)। (औरों के रास्ते में) करोड़ों रुकावटें (डालनी)। विकार, पाप, भटकना। मोह, आदर, निरादरी, अहंकार- (जिन लोगों को इन तरीकों से) माया अपने दबाव तले रखती है। वे जनम-मरण में भटकते रहते हैं। नर्क भोगते रहते हैं। अनेकों उपाय करने से भी (इन दुखों में से) निकलने में कामयाब नहीं होते। हे नानक ! जो मनुष्य सदा साध-संगति में रह के परमात्मा का नाम जपते हैं सदा गोबिंद के गुण गाते हैं। वे पवित्र (-जीवन) वाले हो जाते हैं। 42।
तरण सरण सुआमी रमण सील परमेसुरह ॥
तरण सरण सुआमी रमण सील परमेसुरह ॥
करण कारण समरथह दानु देत प्रभु पूरनह ॥
निरास आस करणं सगल अरथ आलयह ॥
गुण निधान सिमरंति नानक सगल जाचंत जाचिकह ॥43॥
करण कारण समरथह दानु देत प्रभु पूरनह ॥
निरास आस करणं सगल अरथ आलयह ॥
गुण निधान सिमरंति नानक सगल जाचंत जाचिकह ॥43॥
हिन्दी अर्थ: परमात्मा सब करिष्मों को करने वाला है। सबका मालिक है। उसकी शरण (जीवों के लिए। मानो) जहाज है। पूरन प्रभू जीवों को दातें देता है। वह जगत का मूल है। सब कुछ करने योग्य है। प्रभू निराशों की आशाएं पूरी करने वाला है। सारे पदार्थों का घर है। हे नानक ! सारे (जीव) मंगते (बन के उसके दर से) माँगते हैं। और सब गुणों के खजाने प्रभू को सिमरते हैं। 43।
दुरगम सथान सुगमं महा दूख सरब सूखणह ॥
दुरगम सथान सुगमं महा दूख सरब सूखणह ॥
दुरबचन भेद भरमं साकत पिसनं त सुरजनह ॥
असथितं सोग हरखं भै खीणं त निरभवह ॥
दुरबचन भेद भरमं साकत पिसनं त सुरजनह ॥
असथितं सोग हरखं भै खीणं त निरभवह ॥
हिन्दी अर्थ: दुर्गम स्थान सुगम हो जाते हैं। बड़े-बड़े सुख सारे ही सुख बन जाते हैं। जो लोग जीवन के गलत रास्ते पर पड़ के खरवें वचनों से (औरों के मन) भेदते (छेदते) रहते थे वे माया-ग्रसित चुग़लखोर बंदे। नेक बन जाते हैं। चिंता। खुशी में जा बदल जाती है। (बदल के खुशी बन जाती है)। डरों से सहमा हुआ बँदा निडर हो जाता है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1357 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।