राग: Salok Sehskritee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
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कीरतनं साधसंगेण नानक नह द्रिसटंति जमदूतनह ॥34॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: साध-संगति में जुड़ के परमात्मा की सिफतसालाह करता है। हे नानक ! जमराज के दूत उस मनुष्य की ओर देख (भी) नहीं सकते (क्योंकि विकार उसके नजदीक नहीं आते)। 34।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: धन और रूप पाना बहुत मुश्किल नहीं। ना ही स्वर्ग का राज। स्वादिष्ट मसालेदार खाने प्राप्त करने मुश्किल नहीं। ना ही साफ-सुथरे कपड़े। पुत्र। मित्र भाई रिश्तेदारों का मिलना बहुत मुश्किल नहीं। ना ही स्त्री के लाड-प्यार। विद्या हासिल करके समझदार बनना भी बहुत मुश्किल नहीं। ना ही कठिन है (विद्या की सहायता से) चालाक और तीक्ष्ण बुद्धि होना। हाँ। हे नानक ! केवल परमात्मा का नाम मुश्किल से मिलता है। नाम साध-संगति में ही मिलता है (पर तब मिलता है जब) परमात्मा की मेहर हों
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! जिस व्यक्ति ने सर्व-व्यापक परमात्मा को सवर्ग। मातलोक। पाताल लोक – हर जगह देख लिया है। वह विकारों के पोचे से नहीं लिबड़ता। 36।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: जहर उसके लिए अमृत बन जाता है। दोखी उसके मित्र और करीबी रिश्तेदार बन जाते हैं। दुख-कलेश सुख बन जाते हैं। अगर वह (पहले) अनेकों डरों से सहमा रहता था। तो (वह अब) निडर हो जाता है; अनेकों जूनों में भटकते को परमात्मा का नाम सहारा-आसरा मिल जाता है। हे नानक ! परमात्मा-का-रूप-सतिगुरू (जिस मनुष्य पर) कृपालु हो जाए। 37 ।
सरब सील ममं सीलं सरब पावन मम पावनह ॥ सरब करतब ममं करता नानक लेप छेप न लिप्यते ॥38॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: जो प्रभू सब जीवों को शांति-स्वभाव देने वाला है मुझे भी वही शांति देता है; जो सबको पवित्र करने के समर्थ है। मेरा भी वही पवित्र कर्ता है; हे नानक ! जो प्रभू सब जीवों को रचने के योग्य है। वही मेरा भी कर्ता है। वह प्रभू विकारों के पोचे से नहीं लिबड़ता। 38।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! चँद्रमा (उतनी) ठंढक पहुँचाने वाला नहीं। ना ही सफेद चँदन (उतनी) शीतलता दे सकता है। ना ही सर्दियों की बहार (उतनी) ठंढक ला सकती है। (जितनी) ठंढ-शांति गुरमुख साध-जन देते हैं। 39।
मंत्रं राम राम नामं ध्यानं सरबत्र पूरनह ॥ ग्यानं सम दुख सुखं जुगति निरमल निरवैरणह ॥ दयालं सरबत्र जीआ पंच दोख बिवरजितह ॥ भोजनं गोपाल कीरतनं अलप माया जल कमल रहतह ॥ उपदेसं सम मित्र सत्रह भगवंत भगति भावनी ॥ पर निंदा नह स्रोति स्रवणं आपु त्यिागि सगल रेणुकह ॥ खट लख्यण पूरनं पुरखह नानक नाम साध स्वजनह ॥40॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: परमात्मा का नाम (जीभ से) जपना और उसको सर्व-व्यापक जान के उसमें सुरति जोड़नी; सुखों-दुखों को एक-समान समझना तथा पवित्र और वेर-रहित जीवन जीना; सारे जीवों के साथ प्यार-हमदर्दी रखनी और कामादिक पाँचों विकारों से बचे रहना; परमात्मा की उपमा को जिंदगी का आसरा बनाना और माया से इस प्रकार निर्लिप रहना जैसे कमल का फूल पानी में। सज्जन और वैरी से एक जैसा प्रेम-भाव रखने की शिक्षा गहण करनी और परमात्मा की भगती में प्यार बनाना; पराई निंदा अपने कानों से ना सुननी और स्वै भाव त्याग के सबके चरणों की धूल बनना। हे नानक ! पूरन पुरखों में ये छे लक्षण होते हैं। उनको ही साध गुरमुखि कहा जाता हैं। 40।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: बकरी गाजरमूली आदि खाती हैं। पर शेर के नजदीक बसती हैं (उसे मन-भाता खाना मिलने की प्रसन्नता तो जरूर है पर हर वक्त शेर का डर भी बना रहता है); हे नानक ! यही है हाल जगत का। इसको खुशी और गमी दोनों व्यापते हैं। 41।
छलं छिद्रं कोटि बिघनं अपराधं किलबिख मलं ॥ भरम मोहं मान अपमानं मदं माया बिआपितं ॥ म्रित्यु जनम भ्रमंति नरकह अनिक उपावं न सिध्यते ॥ निरमलं साध संगह जपंति नानक गोपाल नामं ॥ रमंति गुण गोबिंद नित प्रतह ॥42॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: (दूसरों को) धोखा (देना)। (किसी के) ऐब (फरोलने)। (औरों के रास्ते में) करोड़ों रुकावटें (डालनी)। विकार। पाप। भटकना। मोह। आदर। निरादरी। अहंकार- (जिन लोगों को इन तरीकों से) माया अपने दबाव तले रखती है। वे जनम-मरण में भटकते रहते हैं। नर्क भोगते रहते हैं। अनेकों उपाय करने से भी (इन दुखों में से) निकलने में कामयाब नहीं होते। हे नानक ! जो मनुष्य सदा साध-संगति में रह के परमात्मा का नाम जपते हैं सदा गोबिंद के गुण गाते हैं। वे पवित्र (-जीवन) वाले हो जाते हैं। 42।
तरण सरण सुआमी रमण सील परमेसुरह ॥ करण कारण समरथह दानु देत प्रभु पूरनह ॥ निरास आस करणं सगल अरथ आलयह ॥ गुण निधान सिमरंति नानक सगल जाचंत जाचिकह ॥43॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: परमात्मा सब करिष्मों को करने वाला है। सबका मालिक है। उसकी शरण (जीवों के लिए। मानो) जहाज है। पूरन प्रभू जीवों को दातें देता है। वह जगत का मूल है। सब कुछ करने योग्य है। प्रभू निराशों की आशाएं पूरी करने वाला है। सारे पदार्थों का घर है। हे नानक ! सारे (जीव) मंगते (बन के उसके दर से) माँगते हैं। और सब गुणों के खजाने प्रभू को सिमरते हैं। 43।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: दुर्गम स्थान सुगम हो जाते हैं। बड़े-बड़े सुख सारे ही सुख बन जाते हैं। जो लोग जीवन के गलत रास्ते पर पड़ के खरवें वचनों से (औरों के मन) भेदते (छेदते) रहते थे वे माया-ग्रसित चुग़लखोर बंदे। नेक बन जाते हैं। चिंता। खुशी में जा बदल जाती है। (बदल के खुशी बन जाती है)। डरों से सहमा हुआ बँदा निडर हो जाता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 11 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “साध-संगति में जुड़ के परमात्मा की सिफतसालाह करता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।