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अंग 1356

अंग
1356
राग Salok Sehskritee
राग: Salok Sehskritee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
घटि घटि बसंत बासुदेवह पारब्रहम परमेसुरह ॥
जाचंति नानक क्रिपाल प्रसादं नह बिसरंति नह बिसरंति नाराइणह ॥21॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: परमात्मा पारब्रहम परमेश्वर हरेक के दिल में बसता है। नानक उस कृपालु नारायण से कृपा का यह दान माँगता है कि वह मुझे कभी ना भूले। कभी ना बिसरे। 21।
नह समरथं नह सेवकं नह प्रीति परम पुरखोतमं ॥
तव प्रसादि सिमरते नामं नानक क्रिपाल हरि हरि गुरं ॥22॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे परम उक्तम अकाल पुरख ! हे कृपालु हरी ! हे गुरू हरी ! (मेरे अंदर सिमरन की) ना ही स्मर्थता है। ना ही मैं सेवक हूँ। ना ही मेरे अंदर (आपके चरनों की) प्रीति है। (आपका दास) नानक आपकी मेहर से (ही) आपका नाम सिमरता है। 22।
भरण पोखण करंत जीआ बिस्राम छादन देवंत दानं ॥
स्रिजंत रतन जनम चतुर चेतनह ॥
वरतंति सुख आनंद प्रसादह ॥
सिमरंत नानक हरि हरि हरे ॥
अनित्य रचना निरमोह ते ॥23॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारे जीवों का पालन-पोषण करता है। कपड़ा आसरा आदि दातें देता है। समर्थ चेतन्य-स्वरूप परमात्मा श्रेष्ठ मनुष्य जनम देता है। उस आनंद-रूप प्रभू की कृपा से जीव सुखी रहते हैं। हे नानक ! जो जीव उस हरी को सिमरते हैं। वे इस नाशवान रचना से निर्मोह रहते हैं। 23
दानं परा पूरबेण भुंचंते महीपते ॥
बिपरीत बुध्यं मारत लोकह नानक चिरंकाल दुख भोगते ॥24॥
ब्रिथा अनुग्रहं गोबिंदह जस्य सिमरण रिदंतरह ॥
आरोग्यं महा रोग्यं बिसिम्रिते करुणा मयह ॥25॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पिछले जन्मों में किए पुन्य कर्मों के सदका राजे (यहाँ राज-मिलख की) मल्कियत पाते हैं। पर। हे नानक ! यहाँ नाशवंत जगत में (उन सुखों के कारण) जिनकी बुद्धि उल्टी हो जाती है। वे चिरंकाल तक दुख भोगते हैं। 24। जो मनुष्य गोबिंद की मेहर से खाली रह गए हैं। जिनके हृदय उसके सिमरने से वंचित हैं। वे नरोए मनुष्य भी बहुत बड़े रोगी हैं। क्योंकि वे दया-स्वरूप गोबिंद को बिसार रहे हैं।
रमणं केवलं कीरतनं सुधरमं देह धारणह ॥
अंम्रित नामु नाराइण नानक पीवतं संत न त्रिप्यते ॥26॥
सहण सील संतं सम मित्रस्य दुरजनह ॥
नानक भोजन अनिक प्रकारेण निंदक आवध होइ उपतिसटते ॥27॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: केवल सिफतसालाह करनी मनुष्य का श्रेष्ठ धर्म है। हे नानक ! संत जन परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीते हुए अघाते नहीं। 26। संत जनों के लिए मित्र और शत्रु एक समान होते हैं। दूसरों की ज्यादती को सहना – ये उनका स्वभाव बन जाता है। हे नानक ! मित्र तो अनेकों किस्मों का भोजन ले के। पर निंदक (उनको मारने के लिए) शस्त्र ले के उनके पास जाते हैं (वे दोनों को प्यार की दृष्टि से देखते हैं)। 27।
तिरसकार नह भवंति नह भवंति मान भंगनह ॥
सोभा हीन नह भवंति नह पोहंति संसार दुखनह ॥
गोबिंद नाम जपंति मिलि साध संगह नानक से प्राणी सुख बासनह ॥28॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: उनकी कभी निरादरी नहीं हो सकती। उनका कभी अपमान नहीं हो सकता। उनकी कभी भी शोभा नहीं मिटती। और उनको संसार के दुख छू नहीं सकते। हे नानक ! जो लोग साध-संगति में मिल के गोबिंद का नाम जपते हें। वह सुखी बसते हैं 28।
सैना साध समूह सूर अजितं संनाहं तनि निंम्रताह ॥
आवधह गुण गोबिंद रमणं ओट गुर सबद कर चरमणह ॥
आरूड़ते अस्व रथ नागह बुझंते प्रभ मारगह ॥
बिचरते निरभयं सत्रु सैना धायंते गोुपाल कीरतनह ॥
जितते बिस्व संसारह नानक वस्यं करोति पंच तसकरह ॥29॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: संत-जन अजीत शूरवीरों की सेना है। गरीबी स्वभाव उनके शरीर पर संजोअ है। गोबिंद के गुण गाने उनके पास शस्त्र हैं। गुरू-शबद की ओट उनके हाथ की ढाल है। संत-जन परमात्मा (के मिलाप) का रास्ता तलाशते रहते हैं- ये मानो। वे घोड़े रथ हाथियों की सवारी करते हैं। संत-जन परमात्मा की सिफतसालाह (की सहायता) से (कामादिक) वैरी-दल पर हमला करते हैं। और (इस तरह उनमें) निडर हो के उनमें चलते फिरते हैं। हे नानक ! संत-जन उन पाँच चोरों को अपने वश में कर लेते हैं जो सारे संसार को जीत रहे हैं।
म्रिग त्रिसना गंधरब नगरं द्रुम छाया रचि दुरमतिह ॥
ततह कुटंब मोह मिथ्या सिमरंति नानक राम राम नामह ॥30॥
नच बिदिआ निधान निगमं नच गुणग्य नाम कीरतनह ॥
नच राग रतन कंठं नह चंचल चतुर चातुरह ॥
भाग उदिम लबध्यं माइआ नानक साधसंगि खल पंडितह ॥31॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: दुर्मति वाला व्यक्ति मृग मारीचिका को हवाई किले को और वृक्ष की छाया को सही समझ लेता है। उसी तरह नाशवंत कुटंब का मोह है। हे नानक ! (इसको त्याग के संत-जन) परमात्मा के नाम का सिमरन करते हें। 30। ना ही मैं वेद-विद्या का खजाना हूँ। ना ही मैं गुणों का पारखू हूँ। ना ही मेरे पास परमात्मा की सिफत-सालाह है। मेरे गले में श्रेष्ठ राग भी नहीं। ना ही मैं चुस्त और बहुत समझदार हूँ। पूर्बले भाग्यों अनुसार उद्यम करने से माया मिलती है (वह भी मेरे पास नहीं)। (पर) हे नानक ! साध-संगति में आ के मूर्ख भी पंडित (बन जाता है। यही मेरा भी आसरा है)। 31।
कंठ रमणीय राम राम माला हसत ऊच प्रेम धारणी ॥
जीह भणि जो उतम सलोक उधरणं नैन नंदनी ॥32॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य (गले से) परमात्मा के नाम के उच्चारण को गले की सुंदर माला बनाता है। (हृदय में) प्रेम टिकाने को माला की थैली बनाता है। जो मनुष्य जीभ से सिफत-सालाह की बाणी उचारता है। वह माया के प्रभाव से बच जाता है। 32।
गुर मंत्र हीणस्य जो प्राणी ध्रिगंत जनम भ्रसटणह ॥
कूकरह सूकरह गरधभह काकह सरपनह तुलि खलह ॥33॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य सतिगुरू के उपदेश से वंचित है। उस भ्रष्ट बुद्धि वाले का जीवन धिक्कार-योग्य है। वह मूर्ख कुत्ते। सूअर। गधे। कौए। साँप के बराबर है। 33।
चरणारबिंद भजनं रिदयं नाम धारणह ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य अपने हृदय में परमात्मा का नाम बसाता है। परमात्मा के चरण-कमलों को सिमरता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 11 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “परमात्मा पारब्रहम परमेश्वर हरेक के दिल में बसता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।