Lulla Family

अंग 1355

अंग
1355
राग Salok Sehskritee
राग: Salok Sehskritee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
राजं त मानं अभिमानं त हीनं ॥
प्रविरति मारगं वरतंति बिनासनं ॥
गोबिंद भजन साध संगेण असथिरं नानक भगवंत भजनासनं ॥12॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जहाँ राज है। वहाँ अहंकार भी है। जहाँ अहंकार है। वहाँ निरादरी भी है। सो दुनिया के रास्ते में हरेक चीज़ का अंत (भी) है। सदा-स्थिर रहने वाली परमात्मा की भगती ही है साध-संगति (के आसरे की जा सकती है)। (इस वास्ते) हे नानक ! भगवान के भजन का भोजन (अपनी जीवात्मा को दे)। 12।
किरपंत हरीअं मति ततु गिआनं ॥
बिगसीध्यि बुधा कुसल थानं ॥
बस्यिंत रिखिअं तिआगि मानं ॥
सीतलंत रिदयं द्रिड़ु संत गिआनं ॥
रहंत जनमं हरि दरस लीणा ॥
बाजंत नानक सबद बीणां ॥13॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: जहाँ परमातमा की कृपा हो वहाँ मनुष्य की बुद्धि को जीवन की सही सूझ आ जाती है। (ऐसी बुद्धि) सुख का ठिकाना बन जाती है। (ऐसी बुद्धि वाले) ज्ञानवान लोग सदा खिले रहते हैं। मान त्यागने के कारण उनकी इन्द्रियां वश में रहती हें। उनका हृदय (सदा) शीतल रहता है। यह शांति वाला ज्ञान उनके अंदर पक्का रहता है। हे नानक ! परमात्मा के दीदार में मस्त ऐसे लोगों का जन्म (-मरण) खत्म हो जाता है। उनके अंदर परमात्मा की महिमा की बाणी के बाजे (सदा) बजते हैं। 13।
कहंत बेदा गुणंत गुनीआ सुणंत बाला बहु बिधि प्रकारा ॥
द्रिड़ंत सुबिदिआ हरि हरि क्रिपाला ॥
नाम दानु जाचंत नानक दैनहार गुर गोपाला ॥14॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: जो कुछ वेद कहते हैं। उसको विद्वान मनुष्य कई ढंग-तरीकों से विचारते हैं। और (उनके) विद्यार्थी सुनते हैं। पर। जिन पर परमात्मा की कृपा हो। वे (परमात्मा के सिमरन की) श्रेष्ठ विद्या को (अपने हृदय में) दृढ़ करते हैं। हे नानक ! वह भाग्यशाली मनुष्य देवनहार गुरू परमात्मा से (सदा) नाम की दाति ही माँगते हैं। 14।
नह चिंता मात पित भ्रातह नह चिंता कछु लोक कह ॥
नह चिंता बनिता सुत मीतह प्रविरति माइआ सनबंधनह ॥
दइआल एक भगवान पुरखह नानक सरब जीअ प्रतिपालकह ॥15॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: इनके वास्ते किसी तरह की चिंता व्यर्थ है। (जो) माता। पिता। भाई। स्त्री। पुत्र मित्र और लोग जो माया में प्रवृति होने के कारण (हमारे) संबन्धी हैं। हे नानक ! सारे जीवों को पालने वाला दया का समुंद्र एक भगवान अकाल-पुरख ही है। 15।
अनित्य वितं अनित्य चितं अनित्य आसा बहु बिधि प्रकारं ॥
अनित्य हेतं अहं बंधं भरम माइआ मलनं बिकारं ॥
फिरंत जोनि अनेक जठरागनि नह सिमरंत मलीण बुध्यं ॥
हे गोबिंद करत मइआ नानक पतित उधारण साध संगमह ॥16॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: धन नित्य रहने वाला नहीं। (इसलिए धन की) सोचें व्यर्थ (का उद्यम) है। और धन की कई किस्मों की आशाएं (बनानी भी) व्यर्थ हैं। नित्य ना रहने वाले पदार्थों के मोह के कारण अहंकार का बँधा हुआ जीव माया की खातिर भटकता है। और। मलीन बुरे कर्म करता है। मैली मति वाला बंदा अनेकों जूनियों में भटकता है और (माँ के) पेट के आग को याद नहीं रखता (जो जूनियों में पड़ने पर सहनी पड़ती है)। हे नानक ! (विनती कर-) हे गोबिंद ! मेहर कर। और जीव को साध-संगति बख्श जहाँ से बड़े कुकर्मी भी बच निकलते हैं। 16।
गिरंत गिरि पतित पातालं जलंत देदीप्य बैस्वांतरह ॥
बहंति अगाह तोयं तरंगं दुखंत ग्रह चिंता जनमं त मरणह ॥
अनिक साधनं न सिध्यते नानक असथंभं असथंभं असथंभं सबद साध स्वजनह ॥17॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पहाड़ से गिर के पाताल में जा गिरना। भड़कती आग में जलना। गहरे पानी की लहरें में बह जाना- ऐसे अनेकों (कठिन) साधन। घर की चिंता (माया के मोह) और जनम मरन के दुखों से (बचने के लिए) सफल नहीं होते। हे नानक ! सदा के लिए जीव का आसरा गुरू-शबद ही है जो साध-संगति में मिलता है। 17।
घोर दुख्यं अनिक हत्यं जनम दारिद्रं महा बिख्यादं ॥
मिटंत सगल सिमरंत हरि नाम नानक जैसे पावक कासट भसमं करोति ॥18॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: भयानक दुख-कलेश। (किए हुए) अनेकों खून। जन्मों-तन्मांतरों की गरीबी। बड़े-बड़े झगड़े- ये सारे। हे नानक ! परमात्मा का नाम सिमरने से मिट जाते हैं। जैसे आग लकड़ियों को राख कर देती है। 18।
अंधकार सिमरत प्रकासं गुण रमंत अघ खंडनह ॥
रिद बसंति भै भीत दूतह करम करत महा निरमलह ॥
जनम मरण रहंत स्रोता सुख समूह अमोघ दरसनह ॥
सरणि जोगं संत प्रिअ नानक सो भगवान खेमं करोति ॥19॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: परमात्मा का नाम सिमरने से (अज्ञानता का) अंधेरा (दूर हो के) (आत्मिक जीवन की सूझ का) प्रकाश हो जाता है। प्रभू के गुण याद करने से पापों का नाश हो जाता है। प्रभू का नाम हृदय में बसने से जमदूत भी डरते हैं। वह मनुष्य बड़े पवित्र कर्म करने वाला बन जाता है। प्रभू की सिफत-सालाह सुनने वाले का जनम-मरण (का चक्कर) समाप्त हो जाता है। प्रभू का दीदार फल मिलता है। अनेकों सुख मिलते हैं। हे नानक ! वह भगवान जो संतों का प्यारा है और शरण आए हुओं की सहायता करने के समर्थ है (भगतों को) सब सुख देता है। 19।
पाछं करोति अग्रणीवह निरासं आस पूरनह ॥
निरधन भयं धनवंतह रोगीअं रोग खंडनह ॥
भगत्यं भगति दानं राम नाम गुण कीरतनह ॥
पारब्रहम पुरख दातारह नानक गुर सेवा किं न लभ्यते ॥20॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: वह प्रभू पीछे चलनों वालों को आगू बना देता है। निराश लोगों की आशाएं पूरी कर देता है। (उसकी मेहर से) कंगाल धन वाला बन जाता है। वह मालिक रोगियों का रोग नाश करने-योग्य है। प्रभू अपने भक्तों को अपनी भगती। नाम और गुणों की सिफत-सालाह की दाति देता है। मनुष्य का आचरण ऊँचा बन जाता है। सर्व-व्यापक प्रभू सब दातें देने वाला है। हे नानक ! गुरू की सेवा से (उससे) क्या कुछ नहीं मिलता। 20।
अधरं धरं धारणह निरधनं धन नाम नरहरह ॥
अनाथ नाथ गोबिंदह बलहीण बल केसवह ॥
सरब भूत दयाल अचुत दीन बांधव दामोदरह ॥
सरबग्य पूरन पुरख भगवानह भगति वछल करुणा मयह ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: परमात्मा का नाम निआसरों को आसरा देने वाला है। और धन-हीनों का धन है। गोबिंद अनाथों का नाथ है और केशव प्रभू निताणियों का ताण है (निर्बलों का बल है)। अविनाशी प्रभू सब जीवों पर दया करने वाला है और कंगालों का बँधु है। सर्व-व्यापक भगवान सब जीवों के दिल की जानने वाला है। भगती को प्यार करता है और तरस का घर है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।