लुल्ला परिवारLulla Family
English
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1354 · सहसकृती सलोक

इस पृष्ठ पर
अंग
1354
सहसकृती सलोक
अंग बदलें या अंश चुनें · 10 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. ध्रिगंत मात पिता सनेहं ध्रिग सनेहं भ्रात बांधवह ॥
  2. मिथ्यंत देहं खीणंत बलनं ॥
  3. काच कोटं रचंति तोयं लेपनं रकत चरमणह ॥
  4. सुभंत तुयं अचुत गुणग्यं पूरनं बहुलो क्रिपाला ॥
  5. म्रिगी पेखंत बधिक प्रहारेण लख्य आवधह ॥
  6. सबदं रतं हितं मइआ कीरतं कली करम क्रितुआ ॥
  7. घटंत रूपं घटंत दीपं घटंत रवि ससीअर नख्यत्र गगनं ॥
  8. नह बिलंब धरमं बिलंब पापं ॥
  9. मिरत मोहं अलप बुध्यं रचंति बनिता बिनोद साहं ॥
  10. जनमं त मरणं हरखं त सोगं भोगं त रोगं ॥

ध्रिगंत मात पिता सनेहं ध्रिग सनेहं भ्रात बांधवह ॥

ध्रिगंत मात पिता सनेहं ध्रिग सनेहं भ्रात बांधवह ॥
ध्रिग स्नेहं बनिता बिलास सुतह ॥
ध्रिग स्नेहं ग्रिहारथ कह ॥
साधसंग स्नेह सत्यिं सुखयं बसंति नानकह ॥2॥

हिन्दी अर्थ: माता-पिता का मोह त्यागने-योग्य है। भाईयों सन्बंधियों का मोह भी खराब है। स्त्री-पुत्र के मोह का आनंद भी त्यागने लायक है। घर के पदार्थों की कसक भी बुरी है (क्योंकि ये सारे नाशवंत हैं। और इनका मोह प्यार भी सदा कायम नहीं रह सकता)। सत्संग से (किया हुआ) प्यार सदा स्थिर रहता है। और। हे नानक ! (सत्संग से प्यार करने वाले मनुष्य) आत्मिक आनंद से जीवन व्यतीत करते हैं। 2।

मिथ्यंत देहं खीणंत बलनं ॥

मिथ्यंत देहं खीणंत बलनं ॥
बरधंति जरूआ हित्यंत माइआ ॥
अत्यंत आसा आथित्य भवनं ॥
गनंत स्वासा भैयान धरमं ॥
पतंति मोह कूप दुरलभ्य देहं तत आस्रयं नानक ॥
गोबिंद गोबिंद गोबिंद गोपाल क्रिपा ॥3॥

हिन्दी अर्थ: (ये) शरीर तो नाशवंत है। (इसका) बल भी घटता रहता है। (पर ज्यों-ज्यों) बुढ़ापा बढ़ता है। माया का मोह भी (बढ़ता जाता है।) (पदार्थों की) आसा तीव्र होती जाती है (वैसे जीव यहाँ) घर के मेहमान (की तरह) हैं। डरावना धर्मराज (इसकी उम्र की) सांसें गिनता रहता है। यह अमोलक मनुष्य शरीर मोह के कूएं में गिरा रहता है। हे नानक ! एक गोबिंद गोपाल की मेहर ही (बचा सकती है)। उसी का आसरा (लेना चाहिए)। 3।

काच कोटं रचंति तोयं लेपनं रकत चरमणह ॥

काच कोटं रचंति तोयं लेपनं रकत चरमणह ॥
नवंत दुआरं भीत रहितं बाइ रूपं असथंभनह ॥
गोबिंद नामं नह सिमरंति अगिआनी जानंति असथिरं ॥
दुरलभ देह उधरंत साध सरण नानक ॥
हरि हरि हरि हरि हरि हरे जपंति ॥4॥

हिन्दी अर्थ: (यह शरीर) कच्चा किला है। (जो) पानी (भाव। वीर्य) का बना हुआ है। और लहू और चमड़ी के साथ लिंबा हुआ है। (इसके) नौ दरवाजे (गोलकें) हैं। पर (पर दरवाजों के) भिक्त नहीं हैं। साँसों का (इसको) स्तंभ (लगा हुआ) है। मूर्ख जीव (इस शरीर को) सदा-स्थिर रहने वाला जानते हैं। और परमात्मा का नाम कभी याद नहीं करते। हे नानक ! वे इस दुर्ल भ इस शरीर को (नित्य की मौत के मुँह से) बचा लेते हैं। जो लोग साध-संगति में आ के परमात्मा का नाम जपते हैं। 4।

सुभंत तुयं अचुत गुणग्यं पूरनं बहुलो क्रिपाला ॥

सुभंत तुयं अचुत गुणग्यं पूरनं बहुलो क्रिपाला ॥
गंभीरं ऊचै सरबगि अपारा ॥
भ्रितिआ प्रिअं बिस्राम चरणं ॥
अनाथ नाथे नानक सरणं ॥5॥

हिन्दी अर्थ: हे अविनाशी ! हे गुणों के जानने वाले ! हे सर्व-व्यापक ! आप बड़े कृपालु हैं। आप (सब जगह) शोभा दे रहे हैं। आप अथाह हैं। ऊँचे हैं। सबका जानने वाले हैं। और बेअंत हैं। आप अपने सेवकों के प्यारे हैं। आपके चरण (उनके लिए) आसरा हैं। हे नानक ! (कहें-) हे अनाथों के नाथ ! हम आपकी शरण आए हैं। 5।

म्रिगी पेखंत बधिक प्रहारेण लख्य आवधह ॥

म्रिगी पेखंत बधिक प्रहारेण लख्य आवधह ॥
अहो जस्य रखेण गोपालह नानक रोम न छेद्यते ॥6॥
बहु जतन करता बलवंत कारी सेवंत सूरा चतुर दिसह ॥
बिखम थान बसंत ऊचह नह सिमरंत मरणं कदांचह ॥
होवंति आगिआ भगवान पुरखह नानक कीटी सास अकरखते ॥7॥

हिन्दी अर्थ: हिरनी को देखकर शिकारी निशाना साधता है और शस्त्र से प्रहार करता है। पर नानक कहते हैं: जिसकी रक्षा परमात्मा करे, उसका कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता। 6। कोई मनुष्य बड़े प्रयत्न करने वाला और बहुत बलवान हो, चारों ओर शूरवीर उसकी सेवा में हों, वह किसी दुर्गम ऊँचे स्थान में रहता हो जहाँ उसे मृत्यु का विचार भी न आए; फिर भी भगवान का आदेश होने पर एक चींटी उसके प्राण हर सकती है। नानक यही कहते हैं। 7।

सबदं रतं हितं मइआ कीरतं कली करम क्रितुआ ॥

सबदं रतं हितं मइआ कीरतं कली करम क्रितुआ ॥
मिटंति तत्रागत भरम मोहं ॥
भगवान रमणं सरबत्र थान्यिं ॥
द्रिसट तुयं अमोघ दरसनं बसंत साध रसना ॥
हरि हरि हरि हरे नानक प्रिअं जापु जपना ॥8॥

हिन्दी अर्थ: गुरू-शबद में प्रीति। जीव दया से हित। परमात्मा सें सिफतसालाह -इस जगत में जो मनुष्य ये काम करता है (शब्दों से। यह कर्म करके)। वहाँ आए हुए (भाव। उसके) भरम और मोह मिट जाते हैं। उसको भगवान हर जगह व्यापक दिखता है। हे नानक ! (कहें-) हे हरी ! (संत जनों को) आपका नाम जपना प्यारा लगता है। आप संतों की जीभ पर बसते हैं। आपका दीदार आपकी (मेहर की) नज़र कभी निष्फल नहीं हैं। 8।

घटंत रूपं घटंत दीपं घटंत रवि ससीअर नख्यत्र गगनं ॥

घटंत रूपं घटंत दीपं घटंत रवि ससीअर नख्यत्र गगनं ॥
घटंत बसुधा गिरि तर सिखंडं ॥
घटंत ललना सुत भ्रात हीतं ॥
घटंत कनिक मानिक माइआ स्वरूपं ॥
नह घटंत केवल गोपाल अचुत ॥
असथिरं नानक साध जन ॥9॥

हिन्दी अर्थ: रूप नाशवंत है। (सातों) द्वीप नाशवान हैं। सूरज चंद्रमा तारे आकाश नाशवान हैं। धरती पहाड़, वृक्ष। ऊँची चोटी वाले। नाशवान हैं। स्त्री पुत्र भाई और संबन्धी नाशवंत हैं। सोना मोती माया के सारे सरूप नाशवंत हैं। हे नानक ! केवल अविनाशी गोपाल प्रभू नाशवंत नहीं। और उस की साध-संगति भी सदा-स्थिर है। 9।

नह बिलंब धरमं बिलंब पापं ॥

नह बिलंब धरमं बिलंब पापं ॥
द्रिड़ंत नामं तजंत लोभं ॥
सरणि संतं किलबिख नासं प्रापतं धरम लख्यिण ॥
नानक जिह सुप्रसंन माधवह ॥10॥

हिन्दी अर्थ: धर्म कमाने में ढील ना करनी। पाप करने में विलम्ब करना। नाम (हृदय में) दृढ़ करना और लोभ त्यागना। संतों की शरण जा के पापों का नाश करना- धर्म के ये लक्षण हे नानक ! उस मनुष्य को प्राप्त होते हैं जिस पर परमात्मा मेहर करता है। 10।

मिरत मोहं अलप बुध्यं रचंति बनिता बिनोद साहं ॥

मिरत मोहं अलप बुध्यं रचंति बनिता बिनोद साहं ॥
जौबन बहिक्रम कनिक कुंडलह ॥
बचित्र मंदिर सोभंति बसत्रा इत्यंत माइआ ब्यापितं ॥
हे अचुत सरणि संत नानक भो भगवानए नमह ॥11॥

हिन्दी अर्थ: होछी मति वाला मनुष्य नाशवान पदार्थों के मोह में लीन रहता है। स्त्री के विनोद और चावों में मस्त रहता है। जवानी, ताकत। सोने के कुण्डल (आदि)। रंग-बिरंगे महल-माढ़ियों। सुंदर वस्त्र- इन तरीकों से उसको माया व्यापती है (अपना प्रभाव डालती है)। हे नानक ! (कहें-) हे अविनाशी ! हे संतों के सहारे ! हे भगवान ! आपको हमारा नमस्कार है (आप ही माया के प्रभाव को बचाने वाले हैं)। 11।

जनमं त मरणं हरखं त सोगं भोगं त रोगं ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

जनमं त मरणं हरखं त सोगं भोगं त रोगं ॥
ऊचं त नीचं नान॑ा सु मूचं ॥

हिन्दी अर्थ: (जहाँ) जनम है (वहाँ) मौत भी है। खुशी है तो ग़मी भी है। (मायावी पदार्थों के) भोग हैं तो (उनसे उपजते) रोग भी हैं। जहाँ ऊँचा-पन है। वहां नीच-पना भी आ जाता है। जहाँ गरीबी है। वहाँ बड़प्पन भी आ सकता है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1354 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।