अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: माता-पिता का मोह त्यागने-योग्य है। भाईयों सन्बंधियों का मोह भी खराब है। स्त्री-पुत्र के मोह का आनंद भी त्यागने लायक है। घर के पदार्थों की कसक भी बुरी है (क्योंकि ये सारे नाशवंत है। और इनका मोह प्यार भी सदा कायम नहीं रह सकता)। सत्संग से (किया हुआ) प्यार सदा स्थिर रहता है। और। हे नानक ! (सत्संग से प्यार करने वाले मनुष्य) आत्मिक आनंद से जीवन व्यतीत करते हैं। 2।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: (ये) शरीर तो नाशवंत है। (इसका) बल भी घटता रहता है। (पर ज्यों-ज्यों) बुढ़ापा बढ़ता है। माया का मोह भी (बढ़ता जाता है।) (पदार्थों की) आसा तीव्र होती जाती है (वैसे जीव यहाँ) घर के मेहमान (की तरह) हैं। डरावना धर्मराज (इसकी उम्र की) सांसें गिनता रहता है। यह अमोलक मनुष्य शरीर मोह के कूएं में गिरा रहता है। हे नानक ! एक गोबिंद गोपाल की मेहर ही (बचा सकती हे)। उसी का आसरा (लेना चाहिए)। 3।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: (यह शरीर) कच्चा किला है। (जो) पानी (भाव। वीर्य) का बना हुआ है। और लहू और चमड़ी के साथ लिंबा हुआ है। (इसके) नौ दरवाजे (गोलकें) हैं। पर (पर दरवाजों के) भिक्त नहीं हैं। साँसों की (इसको) स्तंभ (लगा हुआ) है। मूर्ख जीव (इस शरीर को) सदा-स्थिर रहने वाला जानते हैं। और परमात्मा का नाम कभी याद नहीं करते। हे नानक ! वे इस दुर्ल भ इस शरीर को (नित्य की मौत के मुँह से) बचा लेते हैं। जो लोग साध-संगति में आ के परमात्मा का नाम जपते हैं। 4।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: हे अविनाशी ! हे गुणों के जानने वाले ! हे सर्व-व्यापक ! आप बड़ा कृपालु है। आप (सब जगह) शोभा दे रहा है। आप अथाह है। ऊँचा है। सबका जानने वाले है। और बेअंत है। आप अपने सेवकों का प्यारा है। आपके चरण (उनके लिए) आसरा हैं। हे नानक ! (कह-) हे अनाथों के नाथ ! हम आपकी शरण आए हैं। 5।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: (एक) हिरनी को देख के (एक) शिकारी निशाना लगा के शस्त्रों से चोट मारता है। पर वाह ! हे नानक ! जिसकी रक्षा के लिए परमात्मा हो। उसका कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता। (जो मनुष्य) बड़े यतन कर सकता हैं। बड़ा बलवान हो। चारों तरफ से कई शूरवीर जिसकी सेवा करने वाले हों। जो मुश्किल ऊँची जगह पर बैठा हो। (जहाँ उसको) मौत की कभी याद भी ना आए। हे नानक ! एक कीड़ी उसके प्राण खींच लेती है जब भगवान अकाल-पुरख का हुकम हो (उसको मारने का)। 7।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: गुरू-शबद में प्रीति। जीव दया से हित। परमात्मा सें सिफतसालाह -इस जगत में जो मनुष्य ये काम करता है (शब्दों से। यह कर्म करके)। वहाँ आए हुए (भाव। उसके) भरम और मोह मिट जाते हैं। उसको भगवान हर जगह व्यापक दिखता है। हे नानक ! (कह-) हे हरी ! (संत जनों को) आपका नाम जपना प्यारा लगता है। आप संतों की जीभ पर बसता है। आपका दीदार आपकी (मेहर की) नज़र कभी निष्फल नहीं हैं। 8।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: रूप नाशवंत है। (सातों) द्वीप नाशवान हैं। सूरज चंद्रमा तारे आकाश नाशवान हैं। धरती पहाड़। वृक्ष। ऊँची चोटी वाले। नाशवान हैं। स्त्री पुत्र भाई और संबन्धी नाशवंत हैं। सोना मोती माया के सारे सरूप नाशवंत हैं। हे नानक ! केवल अविनाशी गोपाल प्रभू नाशवंत नहीं। और उस की साध-संगति भी सदा-स्थिर है। 9।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: धर्म कमाने में ढील ना करनी। पाप करने में विलम्ब करना। नाम (हृदय में) दृढ़ करना और लोभ त्यागना। संतों की शरण जा के पापों का नाश करना- धर्म के ये लक्षण हे नानक ! उस मनुष्य को प्राप्त होते हैं जिस पर परमात्मा मेहर करता है। 10।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: होछी मति वाला मनुष्य नाशवान पदार्थों के मोह में लीन रहता है। स्त्री के विनोद और चावों में मस्त रहता है। जवानी। ताकत। सोने के कुण्डल (आदि)। रंग-बिरंगे महल-माढ़ियों। सुंदर वस्त्र- इन तरीकों से उसको माया व्यापती है (अपना प्रभाव डालती है)। हे नानक ! (कह-) हे अविनाशी ! हे संतों के सहारे ! हे भगवान ! आपको हमारा नमस्कार है (आप ही माया के प्रभाव को बचाने वाला है)। 11।
जनमं त मरणं हरखं त सोगं भोगं त रोगं ॥ ऊचं त नीचं नान॑ा सु मूचं ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: (जहाँ) जनम है (वहाँ) मौत भी है। खुशी है तो ग़मी भी है। (मायावी पदार्थों के) भोग हैं तो (उनसे उपजते) रोग भी हैं। जहाँ ऊँचा-पन है। वहां नीच-पना भी आ जाता है। जहाँ गरीबी है। वहाँ बड़प्पन भी आ सकता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “माता-पिता का मोह त्यागने-योग्य है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।