किउ न हरि को नामु लेहि मूरख निलाज रे ॥1॥
राम भगति हीए आनि छाडि दे तै मन को मानु ॥
नानक जन इह बखानि जग महि बिराजु रे ॥2॥4॥
सलोक सहसक्रिती महला 1 ॥
पड़ि॑ पुस्तक संधिआ बादं ॥
सिल पूजसि बगुल समाधं ॥
मुखि झूठु बिभूखन सारं ॥
त्रैपाल तिहाल बिचारं ॥
गलि माला तिलक लिलाटं ॥
दुइ धोती बसत्र कपाटं ॥
जो जानसि ब्रहमं करमं ॥
सभ फोकट निसचै करमं ॥
कहु नानक निसचौ ध्यिावै ॥
बिनु सतिगुर बाट न पावै ॥1॥
निहफलं तस्य जनमस्य जावद ब्रहम न बिंदते ॥
सागरं संसारस्य गुर परसादी तरहि के ॥
करण कारण समरथु है कहु नानक बीचारि ॥
कारणु करते वसि है जिनि कल रखी धारि ॥2॥
जोग सबदं गिआन सबदं बेद सबदं त ब्राहमणह ॥
ख्यत्री सबदं सूर सबदं सूद्र सबदं परा क्रितह ॥
सरब सबदं त एक सबदं जे को जानसि भेउ ॥
नानक ता को दासु है सोई निरंजन देउ ॥3॥
एक क्रिस्नं त सरब देवा देव देवा त आतमह ॥ आतमं स्री बास्वदेवस्य जे कोई जानसि भेव ॥
नानक ता को दासु है सोई निरंजन देव ॥4॥
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
कतंच माता कतंच पिता कतंच बनिता बिनोद सुतह ॥
कतंच भ्रात मीत हित बंधव कतंच मोह कुटंब्यते ॥
कतंच चपल मोहनी रूपं पेखंते तिआगं करोति ॥
रहंत संग भगवान सिमरण नानक लबध्यं अचुत तनह ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिस (अपने) शरीर को आप सदा कायम रहने वाला समझे बैठा है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।