Lulla Family

अंग 1353

अंग
1353
राग Salok Sehskritee
राग: Salok Sehskritee · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
असथिरु जो मानिओ देह सो तउ तेरउ होइ है खेह ॥
किउ न हरि को नामु लेहि मूरख निलाज रे ॥1॥
राम भगति हीए आनि छाडि दे तै मन को मानु ॥
नानक जन इह बखानि जग महि बिराजु रे ॥2॥4॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: जिस (अपने) शरीर को आप सदा कायम रहने वाला समझे बैठा है। आपका वह (शरीर) तो (अवश्य) राख हैं जाएगा। हे मूर्ख ! हे बे-शर्म ! (फिर) आप क्यों परमात्मा का नाम नहीं जपता। 1। दास नानक (आपको बार-बार) यही बात कहता है कि (अपने) मन का अहंकार छोड़ दे। परमात्मा की भगती (अपने) हृदय में बसा ले। इस तरह का सदाचारी जीवन जी। 2। 4।
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
सलोक सहसक्रिती महला 1 ॥
पड़ि॑ पुस्तक संधिआ बादं ॥
सिल पूजसि बगुल समाधं ॥
मुखि झूठु बिभूखन सारं ॥
त्रैपाल तिहाल बिचारं ॥
गलि माला तिलक लिलाटं ॥
दुइ धोती बसत्र कपाटं ॥
जो जानसि ब्रहमं करमं ॥
सभ फोकट निसचै करमं ॥
कहु नानक निसचौ ध्यिावै ॥
बिनु सतिगुर बाट न पावै ॥1॥
निहफलं तस्य जनमस्य जावद ब्रहम न बिंदते ॥
सागरं संसारस्य गुर परसादी तरहि के ॥
करण कारण समरथु है कहु नानक बीचारि ॥
कारणु करते वसि है जिनि कल रखी धारि ॥2॥
जोग सबदं गिआन सबदं बेद सबदं त ब्राहमणह ॥
ख्यत्री सबदं सूर सबदं सूद्र सबदं परा क्रितह ॥
सरब सबदं त एक सबदं जे को जानसि भेउ ॥
नानक ता को दासु है सोई निरंजन देउ ॥3॥
एक क्रिस्नं त सरब देवा देव देवा त आतमह ॥ आतमं स्री बास्वदेवस्य जे कोई जानसि भेव ॥
नानक ता को दासु है सोई निरंजन देव ॥4॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: केवल एक है, उसका नाम सत्य है, वही संसार को बनाने वाला है, वह सर्वशक्तिमान है, वह भय से रहित है, वह वैर भावना से परे है, वह कालातीत ब्रह्म मूर्ति चिरजीवी है, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त है, वह स्वतः प्रगट हुआ है, गुरु की कृपा से प्राप्त होता है। सलोक सहसक्रिती महला 1 ॥ पंडित (वेद आदि धार्मिक) पुस्तकें पढ़ के संध्या करता है। और (औरों के साथ) चर्चा करता है। मूर्ति पूजता है और बगुले की तरह समाधि लगाता है; मुँह से झूठ बोलता है (पर उस झूठ को) बड़े सुंदर गहनों की तरह सुंदर करके दिखलाता है; (हर रोज) तीनों वक्त गायत्री मंत्र को विचारता है; गले में माला रखता है। माथे पर तिलक लगाता है; सदा दो धोतियां (अपने पास) रखता है। और (संधिया करते वक्त) सिर पर एक वस्त्र रख लेता है। पर। जो मनुष्य परमात्मा की भगती का काम जानता हैं। तब निष्चय करके जान लो कि उसके लिए ये सारे काम फोके हैं। हे नानक ! कह- (मनुष्य) श्रद्धा धार के परमात्मा को सिमरे (केवल यही रास्ता लाभदायक है। पर) ये रास्ता सतिगुरू के बिना नहीं मिलता। 1। जब तक मनुष्य परमात्मा के साथ सांझ नहीं डालता। तब तक उसका (मनुष्य) जनम व्यर्थ है। (जो मनुष्य) गुरू की कृपा से (परमात्मा के साथ सांझ डालते हैं। वे) अनेकों ही संसार-समुंद्र से पार लांघ जाते हैं। हे नानक ! (परमात्मा का नाम बार-बार) कह। (परमात्मा के नाम की) विचार कर। (वह) जगत का मूल (परमात्मा) सब ताकतों का मालिक है। जिस प्रभू ने (जगत में अपनी) सक्ता टिका रखी है। उस करतार के इख्तियार में ही (हरेक) सबब है। 2। (वर्ण-भेद का भेदभाव डालने वाले कहते हैं कि) जोग का धर्म ज्ञान प्राप्त करना है (ब्रहम की विचार करना है;) ब्राहमण का धर्म वेदों की विचार है; क्षत्रियों का धर्म शूरवीरों वाले काम करना है और शूद्रों का धर्म दूसरों की सेवा करनी है। पर सबसे श्रेष्ठ धर्म यह है कि परमात्मा का सिमरन किया जाए। अगर कोई मनुष्य इस भेद को समझ ले। नानक उस मनुष्य का दास है। वह मनुष्य परमात्मा का रूप हो जाता है। एक परमात्मा ही सारे देवताओं की आत्मा है। देवताओं के देवों की भी आत्मा है। जो मनुष्य प्रभू की आत्मा का भेद जान लेता है। नानक उस मनुष्य का दास है। वह मनुष्य परमात्मा का रूप है। 4।
सलोक सहसक्रिती महला 5
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
कतंच माता कतंच पिता कतंच बनिता बिनोद सुतह ॥
कतंच भ्रात मीत हित बंधव कतंच मोह कुटंब्यते ॥
कतंच चपल मोहनी रूपं पेखंते तिआगं करोति ॥
रहंत संग भगवान सिमरण नानक लबध्यं अचुत तनह ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: सलोक सहसक्रिती महला 5 वह अद्वैत परमेश्वर केवल (ऑकार स्वरूप) एक ही है, उसका नाम सत्य है।वह सृष्टि का रचनहार है, सर्वशक्तिमान है। वह भय से रहित है, वह निर्वेर है। वह भूत, भविष्य, वर्तमान से परे, कालातीत ब्रह्म मूर्ति अटल है।वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त है। वह स्वतः प्रकाशमान हुआ है, गुरु की कृपा से प्राप्त होता है। कहाँ रह जाती है माँ। और कहाँ रह जाता है पिता। और कहाँ रह जाते हैं स्त्री-पुत्रों के लाड-प्यार। कहाँ रह जाते हैं भाई मित्र और सन्बंधी। और कहाँ रह जाता है परिवार का मोह। कहाँ जाती है मन को मोहने वाली ये चंचल माया देखते-देखते ही छोड़ जाती है। हे नानक ! (मनुष्य के) साथ (सदा) रहता है भगवान का भजन (ही)। और यह भजन मिलता है संत जनों से। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिस (अपने) शरीर को आप सदा कायम रहने वाला समझे बैठा है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।