रागु जैजावंती महला 9 ॥
रामु सिमरि रामु सिमरि इहै तेरै काजि है ॥
माइआ को संगु तिआगु प्रभ जू की सरनि लागु ॥
जगत सुख मानु मिथिआ झूठो सभ साजु है ॥1॥ रहाउ ॥
सुपने जिउ धनु पछानु काहे परि करत मानु ॥
बारू की भीति जैसे बसुधा को राजु है ॥1॥
नानकु जनु कहतु बात बिनसि जैहै तेरो गातु ॥
छिनु छिनु करि गइओ कालु तैसे जातु आजु है ॥2॥1॥
रामु भजु रामु भजु जनमु सिरातु है ॥
कहउ कहा बार बार समझत नह किउ गवार ॥
बिनसत नह लगै बार ओरे सम गातु है ॥1॥ रहाउ ॥
सगल भरम डारि देहि गोबिंद को नामु लेहि ॥
अंति बार संगि तेरै इहै एकु जातु है ॥1॥
बिखिआ बिखु जिउ बिसारि प्रभ कौ जसु हीए धारि ॥
नानक जन कहि पुकारि अउसरु बिहातु है ॥2॥2॥
रे मन कउन गति होइ है तेरी ॥
इह जग महि राम नामु सो तउ नही सुनिओ कानि ॥
बिखिअन सिउ अति लुभानि मति नाहिन फेरी ॥1॥ रहाउ ॥
मानस को जनमु लीनु सिमरनु नह निमख कीनु ॥
दारा सुख भइओ दीनु पगहु परी बेरी ॥1॥
नानक जन कहि पुकारि सुपनै जिउ जग पसारु ॥
सिमरत नह किउ मुरारि माइआ जा की चेरी ॥2॥3॥
बीत जैहै बीत जैहै जनमु अकाजु रे ॥
निसि दिनु सुनि कै पुरान समझत नह रे अजान ॥
कालु तउ पहूचिओ आनि कहा जैहै भाजि रे ॥1॥ रहाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
तेग बहादुर जी की रचनाएँ ग्रंथ के अंतिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं। वैराग्य, क्षणिकता, और मरण-चेतना उनकी वाणी के केन्द्रीय धागे हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह अनंतशक्ति परमपिता केवल एक है, उसका नाम सत्य है, वही सृष्टि की रचना करने वाला है, सर्वशक्तिमान है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।