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अंग 1352

अंग
1352
राग Jaijaavantee
राग: Jaijaavantee · रचयिता: Guru Tegh Bahaadur Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
रागु जैजावंती महला 9 ॥
रामु सिमरि रामु सिमरि इहै तेरै काजि है ॥
माइआ को संगु तिआगु प्रभ जू की सरनि लागु ॥
जगत सुख मानु मिथिआ झूठो सभ साजु है ॥1॥ रहाउ ॥
सुपने जिउ धनु पछानु काहे परि करत मानु ॥
बारू की भीति जैसे बसुधा को राजु है ॥1॥
नानकु जनु कहतु बात बिनसि जैहै तेरो गातु ॥
छिनु छिनु करि गइओ कालु तैसे जातु आजु है ॥2॥1॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: वह अनंतशक्ति परमपिता केवल एक है, उसका नाम सत्य है, वही सृष्टि की रचना करने वाला है, सर्वशक्तिमान है।वह भय से रहित है, उसका किसी से वैर नहीं वस्तुतः सब जीवों पर उसकी समान दृष्टि है। वह (भूत, वर्तमान, भविष्य से रहित) कालातीत, अनंत है। वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त है, वह स्वतः प्रकाशमान हुआ, गुरु-कृपा से प्राप्त होता है। रागु जैजावंती महला 9 ॥ हे भाई ! परमात्मा (का नाम) सिमरा कर। परमात्मा का नाम सिमरा कर। यह (सिमरन) ही आपके काम में (आने वाला) है। हे भाई ! माया के मोह छोड़ दे। परमात्मा की शरण पड़ा रह। हे भाई ! दुनिया के सुखों को नाशवंत समझ। जगत का यह सारा पसारा (ही) साथ छोड़ जाने वाला है। 1। रहाउ। हे भाई ! इस धन को सपने (में मिले पदार्थों) की तरह समझ (जाग खुलते ही वह पदार्थ अलोप हो जाते हैं। बता।) आप किस पर अहंकार करता है। (सारी) धरती का राज (भी) रेत की दीवार जैसा ही है। 1। हे भाई ! दास नानक (आपको यह) बात बताता है कि आपका (तो अपना यह मिथा हुआ) शरीर (भी) नाश हैं जाएगा। (देख। जैसे आपकी उम्र का) कल (का दिन) छिन-छिन करके बीत गया है। वैसे ही आज (का दिन भी) गुजरता जा रहा है। 2। 1।
जैजावंती महला 9 ॥
रामु भजु रामु भजु जनमु सिरातु है ॥
कहउ कहा बार बार समझत नह किउ गवार ॥
बिनसत नह लगै बार ओरे सम गातु है ॥1॥ रहाउ ॥
सगल भरम डारि देहि गोबिंद को नामु लेहि ॥
अंति बार संगि तेरै इहै एकु जातु है ॥1॥
बिखिआ बिखु जिउ बिसारि प्रभ कौ जसु हीए धारि ॥
नानक जन कहि पुकारि अउसरु बिहातु है ॥2॥2॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: जैजावंती महला 9 ॥ हे भाई ! परमात्मा का भजन किया कर। परमात्मा का भजन करा कर। मनुष्य जनम गुजरता जा रहा है। हे मूर्ख ! मैं (आपको) बार-बार क्या कहूँ। आप क्यों नहीं समझता। (आपका यह) शरीर (होने में) ओले जैसा ही है (इसके) नाश होने (पिघलने) में देर नहीं लगती। 1। रहाउ। हे भाई ! सारी भटकनें छोड़ दे। परमात्मा का नाम जपा कर। आखिरी समय में आपके साथ सिर्फ यह नाम ही जाने वाला है। 1। हे भाई ! माया (का मोह अपने अंदर से) जहर की तरह भुला दे। परमात्मा की सिफत सालाह (अपने) हृदय में बसाए रख। दास नानक (आपको) पुकार-पुकार के कह रहा है। (मनुष्य-जिंदगी का समय) बीतता जा रहा है। 2। 2
जैजावंती महला 9 ॥
रे मन कउन गति होइ है तेरी ॥
इह जग महि राम नामु सो तउ नही सुनिओ कानि ॥
बिखिअन सिउ अति लुभानि मति नाहिन फेरी ॥1॥ रहाउ ॥
मानस को जनमु लीनु सिमरनु नह निमख कीनु ॥
दारा सुख भइओ दीनु पगहु परी बेरी ॥1॥
नानक जन कहि पुकारि सुपनै जिउ जग पसारु ॥
सिमरत नह किउ मुरारि माइआ जा की चेरी ॥2॥3॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: जैजावंती महला 9 ॥ हे मन ! (आप कभी सोचता नहीं कि) आपकी क्या दशा होगी। इस जगत में (आपका असल साथी) परमात्मा का नाम (ही) है। वह (नाम) तूने कभी ध्यान से नहीं सुना। आप विषौ- (विकारों) में बहुत (ज्यादा) फसा रहता है। आप (अपनी) सुरति (इनकी ओर से कभी) पलटता नही। 1। रहाउ। हे भाई ! तूने मनुष्य का जन्म (तो) हासिल कर लिया। पर कभी रक्ती भर समय के लिए भी परमात्मा का सिमरन नहीं किया। आप सदा स्त्री के सुखों के अधीन ही हुआ रहता है। आपके पैरों में (स्त्री के मोह की) बेड़ी पड़ी रहती है। 1। हे भाई ! दास नानक (आपको) पुकार के कहता है कि यह जगत का पसारा सपने जैसा ही है। यह माया जिसकी दासी है आप उस परमात्मा का सिमरन क्यों नहीं करता। 2। 3।
जैजावंती महला 9 ॥
बीत जैहै बीत जैहै जनमु अकाजु रे ॥
निसि दिनु सुनि कै पुरान समझत नह रे अजान ॥
कालु तउ पहूचिओ आनि कहा जैहै भाजि रे ॥1॥ रहाउ ॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: जैजावंती महला 9 ॥ हे भाई ! (परमात्मा की भगती के बिना) मानस जीवन (का समय) जनम-उद्देश्य हासिल किए बिना ही गुजरता जा रहा है। लांघता जा रहा है। हे मूर्ख ! रात-दिन पुराण (आदिक पुस्तकों की कहानियाँ) सुन के (भी) आप नहीं समझता (कि यहाँ सदा बैठे नहीं रहना)। मौत (का समय) तो (नज़दीक) आ पहुँचा है (बता। आप इस ओर से) भाग के कहाँ चला जाएगा। 1। रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

तेग बहादुर जी की रचनाएँ ग्रंथ के अंतिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं। वैराग्य, क्षणिकता, और मरण-चेतना उनकी वाणी के केन्द्रीय धागे हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह अनंतशक्ति परमपिता केवल एक है, उसका नाम सत्य है, वही सृष्टि की रचना करने वाला है, सर्वशक्तिमान है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।