Lulla Family

अंग 134

अंग
134
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नानक की प्रभ बेनती प्रभ मिलहु परापति होइ ॥
वैसाखु सुहावा तां लगै जा संतु भेटै हरि सोइ ॥3॥
हरि जेठि जुड़ंदा लोड़ीऐ जिसु अगै सभि निवंनि ॥
हरि सजण दावणि लगिआ किसै न देई बंनि ॥
माणक मोती नामु प्रभ उन लगै नाही संनि ॥
रंग सभे नाराइणै जेते मनि भावंनि ॥
जो हरि लोड़े सो करे सोई जीअ करंनि ॥
जो प्रभि कीते आपणे सेई कहीअहि धंनि ॥
आपण लीआ जे मिलै विछुड़ि किउ रोवंनि ॥
साधू संगु परापते नानक रंग माणंनि ॥
हरि जेठु रंगीला तिसु धणी जिस कै भागु मथंनि ॥4॥
आसाड़ु तपंदा तिसु लगै हरि नाहु न जिंना पासि ॥
जगजीवन पुरखु तिआगि कै माणस संदी आस ॥
दुयै भाइ विगुचीऐ गलि पईसु जम की फास ॥
जेहा बीजै सो लुणै मथै जो लिखिआसु ॥
रैणि विहाणी पछुताणी उठि चली गई निरास ॥
जिन कौ साधू भेटीऐ सो दरगह होइ खलासु ॥
करि किरपा प्रभ आपणी तेरे दरसन होइ पिआस ॥
प्रभ तुधु बिनु दूजा को नही नानक की अरदासि ॥
आसाड़ु सुहंदा तिसु लगै जिसु मनि हरि चरण निवास ॥5॥
सावणि सरसी कामणी चरन कमल सिउ पिआरु ॥
मनु तनु रता सच रंगि इको नामु अधारु ॥
बिखिआ रंग कूड़ाविआ दिसनि सभे छारु ॥
हरि अंम्रित बूंद सुहावणी मिलि साधू पीवणहारु ॥
वणु तिणु प्रभ संगि मउलिआ संम्रथ पुरख अपारु ॥
हरि मिलणै नो मनु लोचदा करमि मिलावणहारु ॥
जिनी सखीए प्रभु पाइआ हंउ तिन कै सद बलिहार ॥
नानक हरि जी मइआ करि सबदि सवारणहारु ॥
सावणु तिना सुहागणी जिन राम नामु उरि हारु ॥6॥
भादुइ भरमि भुलाणीआ दूजै लगा हेतु ॥
लख सीगार बणाइआ कारजि नाही केतु ॥
जितु दिनि देह बिनससी तितु वेलै कहसनि प्रेतु ॥
पकड़ि चलाइनि दूत जम किसै न देनी भेतु ॥
छडि खड़ोते खिनै माहि जिन सिउ लगा हेतु ॥
हथ मरोड़ै तनु कपे सिआहहु होआ सेतु ॥
जेहा बीजै सो लुणै करमा संदड़ा खेतु ॥
नानक प्रभ सरणागती चरण बोहिथ प्रभ देतु ॥
से भादुइ नरकि न पाईअहि गुरु रखण वाला हेतु ॥7॥
असुनि प्रेम उमाहड़ा किउ मिलीऐ हरि जाइ ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! (आपके दर पे) मेरी विनती है कि मुझे आपका जी-भर के मिलाप नसीब हैं। (ऋतु फिरने से चारों तरफ वनस्पति भले ही सुहावनी हैं जाए, पर) जिंद को वैसाख का महीना तभी सुहावना लग सकता है जब हरी संत प्रभू मिल जाए। 3। जिसहरी के आगे सारे ही जीव सिर झुकाते हैं, जेठ के महीने में उस के चरणों में जुड़ना चाहिए। अगर हरी सज्जन से जुड़े रहें तो वह किसी (यम आदि) को आज्ञा नही देता कि बांध के आगे लगा ले (भाव, प्रभू से जुड़ने से जमों का डर नहीं रह जाता)। (लोग हीरे मोती आदि कीमती धन एकत्र करने के लिए दौड़भाग करते हैं, पर उस धन के चोरी हो जाने का भी डर बना रहता है) परमात्मा का नाम हीरे मोती आदि ऐसा कीमती धन है जो चुराया नहीं जा सकता। परमात्मा के जितने भी चमत्कार हो रहे हैं, (नाम धन की बरकति से) वह सारे मन को प्यारे लगते हैं। (ये भी समझ आ जाती है कि) प्रभू स्वयं, और उसके पैदा किए जीव वही कुछ करते हैं जो उस प्रभू को ठीक लगता है। जिन लोगों को प्रभू ने (अपनी सिफत सालाह की दाति दे के) अपना बना लिया है, उनको ही (जगत में) वाह वाही मिलती है। (पर, परमात्मा जीवों को अपने उद्यम से नहीं मिल सकता) अगर जीवों के अपने उद्यम से मिल सकता होता, तो जीव उससे बिछुड़ के दुखी क्यूँ होते? हे नानक ! (प्रभू के मिलाप का) आनंद (वही लोग) लेते हैं, जिन्हें गुरू मिल जाए। जिस मनुष्य के माथे पर भाग्य जागें, उसे जेठ महीना सुहावना लगता है। उसी को प्रभू मालिक मिलता है। 4। आसाड़ का महीना उस जीव को तपता प्रतीत होता है (वे लोग आसाढ़ के महीने की तरह तपते कलपते रहते हैं) जिनके हृदय में प्रभू पति नहीं बसता। जो जगत के सहारे परमात्मा (का आसरा) छोड़ के लोगों से आस बनाए रखते हैं। (प्रभू के बिना) किसी और के आसरे रहने से खुआर ही होते हैं (जो भी कोई और सहारे ताकता है) उसके गले में जम की फाही पड़ती है (उसका जीवन सदा सहम में व्यतीत होता है)। (कुदरति का नियम ही ऐसा है कि) मनुष्य जैसा बीज बीजता है। (किए कर्मों अनुसार) जो लेख उसके माथे पर लिखा जाता है, वैसा ही फल वह प्राप्त करता है। (जगजीवन पुरख को विसारने वाली जीव स्त्री की) सारी जिंदगी पछतावों में गुजरती है, वह जगत से टूटे हुए दिल के साथ ही चल पड़ती है। जिन लोगों को गुरू मिल जाता है, वह परमात्मा की हजूरी में सुर्खरू होते हैं (आदर मान पाते हैं)। अपनी मेहर कर, (मेरे मन में) आपके दर्शन की तमन्ना बनी रहे, (क्योंकि) हे प्रभू ! (आपके आगे) नानक की विनती है, आपके बिना मेरा और कोई आसरा उम्मीद नहीं। जिस मनुष्य के मन में प्रभू के चरणों का निवास बना रहे, उसे (तपता) आसाढ़ (भी) सुहावना प्रतीत होता है (उसको दुनिया के दुख कलेश भी दुखी नहीं कर सकते)। 5। जैसे सावन में (वर्षा से बनस्पति हरियावली हो जाती है, वैसे ही वह) जीव स्त्री हरियावली हो जाती है (भाव, उस जीव का हृदय खिल जाता है) जिसका प्यार प्रभू के सुहाने चरणों से बन जाता है। उसका मन उसका तन परमात्मा के प्यार में रंगा जाता है। परमात्मा का नाम ही (उसकी जिंदगी का) आसरा बन जाता है। माया के नाश्वंत चमत्कार उसको सारे राख (बेअर्थ) दिखाई देते हैं। (सावन में जैसे बरखा की बूँद सुंदर दिखती है, वैसे ही प्रभू चरणों में प्यार वाले बंदे को) हरी के नाम की आत्मिक जीवन देने वाली बूँद प्यारी लगती है। गुरू को मिल के वह मनुष्य उस बूँद को पीने के काबिल हो जाता है। (प्रभू की वडिआई की छोटी छोटी बातें उसे मीठीं लगने लगती हैं, जिसे वह गुरू को मिल के बड़े शौक से सुनता है)। जिस प्रभू के मेल से सारा जगत (वनस्पति आदि) हरा भरा हुआ है, जो सब कुछ करने योग्य है, व्यापक है और बेअंत है, उसे मिलने की मेरे मन में भी तमन्ना है। पर, वह प्रभू स्वयं ही अपनी मेहर से मिलाने में स्मर्थ है। मैं उन गुरमुख सहेलियों से सदके हूँ। सदा कुर्बान हूँ, जिन्होंने प्रभू का मिलाप हासिल कर लिया है। हे नानक ! (विनती कर और कह) हे प्रभू ! मेरे ऊपर मेहर कर, आप स्वयं ही गुरू के शबद के द्वारा (मेरी जिंद को) सँवारने के योग्य है। सावन का महीना उन भाग्यशाली (जीव सि्त्रयों) के लिए (खुशियां और ठण्डक लाने वाला) है जिन्होंने अपने हृदय (रूपी कण्ठ) में परमात्मा का नाम (रूपी) माला पहनी हुई है। 6। (जैसे) भादों (के सीलन भरी तपश) में (मनुष्य बहुत घबराता है, वैसे ही) जिस जीव स्त्री का प्यार प्रभू पति के बिना किसी और के साथ लगता है वह भटकन के कारण जीवन के सही रास्ते से टूट जाती है। वह चाहे लाखों हार श्रृंगार करे, (उसके) किसी काम नहीं आते। जिस दिन मनुष्य का शरीर नाश होंगे (जब मनुष्य मर जाएगा), उस वक्त (सारे साक संगी) कहेंगे कि ये गुजर गया है। (लाश अपवित्र पड़ी है, इसे जल्दी बाहर ले चलो)। जमदूत (जिंद को) पकड़ के आगे लगा लेते हैं। किसी को (ये) भेद नहीं बताते (कि कहां ले चले हैं)। (जिन) संबंधियों के साथ (सारी उम्र बड़ा) प्यार बना रहता है वह पल में साथ छोड़ बैठते हैं। (मौत आई देख के मनुष्य) बड़ा पछताता है, उसका शरीर तंग होता है, वह काले से सफेद होता है। (घबराहट से एक रंग आता है एक जाता है)। ये शरीर मनुष्य के कर्मों का खेत है। जो कुछ मनुष्य इसमें बीजता है वही फसल काटता है (जैसे कर्म करता है वैसे ही फल पाता है)। हे नानक ! जिन का रक्षक व हितेशी गुरू बनता है, गुरू उन्हें प्रभु के चरण रूपी जहाज (में चढ़ा) देता है वह नर्क में नहीं डाले जाते। (क्योंकि गुरू की कृपा से) वे प्रभू की शरण में आ जाते हैं। 7। हे मां ! (भाद्रों की तपश भरी घुटन गुजरने के बाद) असू (की मीठी मीठी ऋतु) में (मेरे अंदर प्रभू पति के) प्यार का उछाला । (मन तड़फता है कि) किसी ना किसी तरह चल के प्रभू पति को मिलूँ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “हे प्रभू ! (आपके दर पे) मेरी विनती है कि मुझे आपका जी-भर के मिलाप नसीब हैं।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।