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अंग 1349

अंग
1349
राग प्रभाती
राग: प्रभाती · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जह सेवक गोपाल गुसाई ॥
प्रभ सुप्रसंन भए गोपाल ॥
जनम जनम के मिटे बिताल ॥5॥
होम जग उरध तप पूजा ॥
कोटि तीरथ इसनानु करीजा ॥
चरन कमल निमख रिदै धारे ॥
गोबिंद जपत सभि कारज सारे ॥6॥
ऊचे ते ऊचा प्रभ थानु ॥
हरि जन लावहि सहजि धिआनु ॥
दास दासन की बांछउ धूरि ॥
सरब कला प्रीतम भरपूरि ॥7॥
मात पिता हरि प्रीतमु नेरा ॥
मीत साजन भरवासा तेरा ॥
करु गहि लीने अपुने दास ॥
जपि जीवै नानकु गुणतास ॥8॥3॥2॥7॥12॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जहाँ (साध-संगति में) सृष्टि के रक्षक पति-प्रभू के भगत-जन (रहते हैं)। (वहाँ साध-संगति में जो मनुष्य टिकते हैं। उन पर) जगत-रक्षक प्रभू जी बहुत प्रसन्न होते हैं। (उनके) अनेकों जन्मों के बेताले-पन समाप्त हो जाते हैं। 5। (उसने। मानो। अनेकों) हवन-यज्ञ (कर लिए। उसने जैसे।) उल्टे लटक के तप (कर लिए। उसने। मानो। देव-) पूजा (कर ली)। (उसने मानो।) करोड़ों तीर्थों का स्नान कर लिया। हे भाई ! (साध-संगति की बरकति से जो मनुष्य) परमात्मा के सुंदर चरण निमख-निमख (हर वक्त) अपने हृदय में बसाए रखता है। वह मनुष्य गोबिंद का नाम जपते हुए (अपने) सारे काम सँवार लेता है। 6। हे भाई ! (साध-संगति की बरकति से ये समझ आ जाती है कि) परमात्मा का ठिकाना बहुत ही ऊँचा है (बहुत ही ऊँचा आत्मिक जीवन ही उसके चरणों के साथ मिला सकता है)। प्रभू के भगत आत्मिक अडोलता में (उस प्रभू में) सुरति जोड़ी रखते हैं। उसके दासों के दासों की चरण-धूल मैं (भी) लोचता रहता हूँ। हे भाई ! जो प्रभू-प्रीतम सारी ताकतों का मालिक है जो सब जगह मौजूद है। 7। हे प्रभू ! आप ही मेरी माँ है मेरा पिता है प्रीतम है मेरे हर वक्त नज़दीक रहता है। हे प्रभू ! आप ही मेरा मित्र है। मेरा सज्जन है। मुझे आपका ही सहारा है। हे प्रभू ! अपने दासों को (उनका) हाथ पकड़ कर के आप अपने बना लेता है। हे गुणों के खजाने प्रभू ! (आपका दास) नानक (आपका नाम) जप के (ही) आत्मिक जीवन हासिल कर रहा है। 8। 3।
बिभास प्रभाती बाणी भगत कबीर जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मरन जीवन की संका नासी ॥
आपन रंगि सहज परगासी ॥1॥
प्रगटी जोति मिटिआ अंधिआरा ॥
राम रतनु पाइआ करत बीचारा ॥1॥ रहाउ ॥
जह अनंदु दुखु दूरि पइआना ॥
मनु मानकु लिव ततु लुकाना ॥2॥
जो किछु होआ सु तेरा भाणा ॥
जो इव बूझै सु सहजि समाणा ॥3॥
कहतु कबीरु किलबिख गए खीणा ॥
मनु भइआ जगजीवन लीणा ॥4॥1॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: बिभास प्रभाती बाणी भगत कबीर जी की सतिगुर प्रसादि ॥ (उस मनुष्य का) की यह शंका समाप्त हो जाती है कि जनम-मरण के चक्कर में पड़ना पड़ेगा। क्योंकि परमात्मा अपनी मेहर से (उसके अंदर) आत्मिक अडोलता का प्रकाश कर देता है। 1। और (उसके अंदर से विकारों आदि का) अंधेरा मिट जाता है। (प्रभू के नाम में) सुरति जोड़ते-जोड़ते जिस मनुष्य को नाम-रत्न मिल जाता है (उसके अंदर) प्रभू की जोति जाग उठती है। 1। रहाउ। जिस मन में (प्रभू के मेल का) आनंद बन जाए और (दुनिया वाला) दुख-कलेश नाश हो जाए। वह मन (प्रभू-चरणों में) जुड़ने की बरकति से मोती (जैसा कीमती) बन के प्रभू को अपने अंदर बसा लेता है। 2। (हे प्रभू ! आपके नाम में सुरति जोड़ते-जोड़ते) जिस मनुष्य को यह सूझ पड़ जाती है कि जगत में जो कुछ हो रहा है आपकी रज़ा हैं रही है। वह मनुष्य सदा अडोल अवस्था में टिका रहता है (उसे कभी कोई शंका व संशय नहीं रहता)। 3। कबीर कहता है- उस मनुष्य के पाप नाश हो जाते हैं। उसका मन जगत-के-जीवन प्रभू में मगन रहता है। 4। 1।
प्रभाती ॥
अलहु एकु मसीति बसतु है अवरु मुलखु किसु केरा ॥
हिंदू मूरति नाम निवासी दुह महि ततु न हेरा ॥1॥
अलह राम जीवउ तेरे नाई ॥
तू करि मिहरामति साई ॥1॥ रहाउ ॥
दखन देसि हरी का बासा पछिमि अलह मुकामा ॥
दिल महि खोजि दिलै दिलि खोजहु एही ठउर मुकामा ॥2॥
ब्रहमन गिआस करहि चउबीसा काजी मह रमजाना ॥
गिआरह मास पास कै राखे एकै माहि निधाना ॥3॥
कहा उडीसे मजनु कीआ किआ मसीति सिरु नांएं ॥
दिल महि कपटु निवाज गुजारै किआ हज काबै जांएं ॥4॥
एते अउरत मरदा साजे ए सभ रूप तुम॑ारे ॥
कबीरु पूंगरा राम अलह का सभ गुर पीर हमारे ॥5॥
कहतु कबीरु सुनहु नर नरवै परहु एक की सरना ॥
केवल नामु जपहु रे प्रानी तब ही निहचै तरना ॥6॥2॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती ॥ अगर (वह) ख़ुदा (सिर्फ) काबे में बसता है तो बाकी का मुल्क किस का (कहा जाए) । (सो। मुसलमानों का यह अकीदा ठीक नहीं है)। हिन्दू परमात्मा का निवास मूर्ति में समझता है; (इस तरह हिन्दू-मुसलमान) दोनों में से किसी ने परमात्मा को नहीं देखा। 1। हे अल्लाह ! हे राम ! (मैं आपको एक ही जान के) आपका नाम सिमर के जीऊँ (आत्मिक जीवन हासिल करूँ)। हे साई ! आप मेरे पर मेहर कर। 1। रहाउ। (हिन्दू कहता है कि) हरी का निवास दक्षिण देश में (जगन्नाथपुरी में) है। मुसलमान कहता है कि ख़ुदा का घर पश्चिम की ओर (काबे में) है। (पर। हे सज्जन !) अपने दिल में (ईश्वर को) तलाश। सिर्फ दिल में ही ढूँढ। यह दिल ही उसका निवास स्थान है। उसका मुकाम है। 2। ब्राहमण चौबीस एकादशियों (के व्रत रखने की आज्ञा) करते हैं। काज़ी रमज़ान के महीने (रोज़े रखने की हिदायत) करते हैं। ये लोग (बाकी के) ग्यारह महीने एक तरफ़ ही रख देते हैं। और (कोई) खजाना एक ही महीने में से ढूँढते हैं। 3। ना तो उड़ीसा जगन्नाथपुरी में स्नान करने का कोई लाभ है। ना ही मस्जिद में जा के सजदा करने का कोई फायदा है। (दरअसल बात यह है कि) अगर दिल में ठॅगी-फरेब बसता है तो ना नमाज़ पढ़ने का लाभ है। ना ही काबे का हज करने का कोई गुण है। 4। हे प्रभू ! ये सारे स्त्री-मर्द जो तूने पैदा किए हैं। ये सब आपका ही रूप हैं (आप ही स्वयं इनमें बसता है)। आप ही। हे प्रभू ! अल्लाह है और राम है। मैं कबीर आपका अंजान बच्चा हूँ। (आपके भेजे हुए) अवतार पैग़ंबर मुझे सब अपने दिखते हैं। 5। कबीर कहता है- हे नर-नारियो ! सुनो। एक परमात्मा की ही शरण पड़ो (वही अल्लाह है। वही राम है)। हे लोगो ! सिर्फ नाम जपो। यकीन से जानो। तब ही (संसार-जगत से) तैर सकोगे। 6। 2।
प्रभाती ॥
अवलि अलह नूरु उपाइआ कुदरति के सभ बंदे ॥
एक नूर ते सभु जगु उपजिआ कउन भले को मंदे ॥1॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती ॥ सबसे पहले ख़ुदा का नूर ही है जिसने (जगत) पैदा किया है। यह सारे जीव-जंतु रॅब के ही बनाए हुए हैं। एक प्रभू की ही जोति से सारा जगत पैदा होया हुआ है। (तो फिर किसी जाति-मज़हब के भुलेखे में पड़ कर) किसी को अच्छा और किसी को बुरा ना समझो। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

कबीर पन्द्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, मगर रामानन्द-शिष्य परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, ज़बान सीधी है, कई बार चुभने वाली। उनकी कुछ रचनाएँ बीजक में हैं, कुछ आदि ग्रंथ में, कुछ अनेक संप्रदायों में बिखरी हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जहाँ (साध-संगति में) सृष्टि के रक्षक पति-प्रभू के भगत-जन (रहते हैं)।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।