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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1349 · प्रभाती

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अंग
1349
प्रभाती
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  1. जह सेवक गोपाल गुसाई ॥
  2. बिभास प्रभाती बाणी भगत कबीर जी की
  3. प्रभाती ॥
  4. प्रभाती ॥

जह सेवक गोपाल गुसाई ॥

अंग 1348 से चला आ रहा अंश

जह सेवक गोपाल गुसाई ॥
प्रभ सुप्रसंन भए गोपाल ॥
जनम जनम के मिटे बिताल ॥5॥
होम जग उरध तप पूजा ॥
कोटि तीरथ इसनानु करीजा ॥
चरन कमल निमख रिदै धारे ॥
गोबिंद जपत सभि कारज सारे ॥6॥
ऊचे ते ऊचा प्रभ थानु ॥
हरि जन लावहि सहजि धिआनु ॥
दास दासन की बांछउ धूरि ॥
सरब कला प्रीतम भरपूरि ॥7॥
मात पिता हरि प्रीतमु नेरा ॥
मीत साजन भरवासा तेरा ॥
करु गहि लीने अपुने दास ॥
जपि जीवै नानकु गुणतास ॥8॥3॥2॥7॥12॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई! जहाँ सृष्टि के पालनहार प्रभु के भक्त रहते हैं, उस साध-संगति में सुख, आनंद और मंगल होते हैं। वहाँ रहने वालों पर प्रभु प्रसन्न होते हैं और अनेक जन्मों से उनके जीवन की बिगड़ी लय सँवर जाती है। 5। जो मनुष्य साध-संगति में रहकर हर क्षण प्रभु के सुंदर चरण हृदय में बसाता है, वह गोबिंद का नाम जपते हुए अपने काम सँवार लेता है। मानो उसने करोड़ों तीर्थों में स्नान, हवन-यज्ञ, उल्टे लटककर तप और देव-पूजा कर ली हो। 6। प्रभु का स्थान सर्वोच्च है; ऊँचा आत्मिक जीवन ही उनसे मिला सकता है। उनके भक्त आत्मिक स्थिरता में ध्यान जोड़ते हैं। जो प्रियतम प्रभु सभी शक्तियों के स्वामी और सर्वत्र विद्यमान हैं, उनके दासों के दासों की चरण-धूल मैं चाहता हूँ। 7। हे प्रभु! आप मेरी माता, पिता और प्रियतम हैं; सदा मेरे निकट हैं। आप मेरे मित्र और सखा हैं; मुझे आपका ही सहारा है। आप अपने सेवकों का हाथ पकड़कर उन्हें अपना बना लेते हैं। हे गुणों के भंडार! नानक आपका नाम जपकर आत्मिक जीवन पाता है। 8। 3।

बिभास प्रभाती बाणी भगत कबीर जी की

बिभास प्रभाती बाणी भगत कबीर जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मरन जीवन की संका नासी ॥
आपन रंगि सहज परगासी ॥1॥
प्रगटी जोति मिटिआ अंधिआरा ॥
राम रतनु पाइआ करत बीचारा ॥1॥ रहाउ ॥
जह अनंदु दुखु दूरि पइआना ॥
मनु मानकु लिव ततु लुकाना ॥2॥
जो किछु होआ सु तेरा भाणा ॥
जो इव बूझै सु सहजि समाणा ॥3॥
कहतु कबीरु किलबिख गए खीणा ॥
मनु भइआ जगजीवन लीणा ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: बिभास प्रभाती बाणी भगत कबीर जी की ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। नाम में ध्यान जोड़ने वाले मनुष्य की जन्म-मरण के चक्कर की आशंका मिट जाती है, क्योंकि प्रभु अपनी कृपा से उसके भीतर आत्मिक स्थिरता का प्रकाश करते हैं। 1। नाम का विचार करते हुए जिसे नाम-रत्न मिलता है, उसके भीतर प्रभु की ज्योति जाग उठती है और विकारों का अंधकार मिट जाता है। 1। रहाउ। जिस मन में प्रभु से मिलन का आनंद बसता है और दुख-क्लेश दूर होते हैं, वह मन उनसे जुड़कर मोती जैसा मूल्यवान बन जाता है और प्रभु को भीतर बसा लेता है। 2। हे प्रभु! जो समझ लेता है कि जगत में जो कुछ होता है, वह आपकी रज़ा है, वह आत्मिक स्थिरता में रहता है; उसकी आशंकाएँ मिट जाती हैं। 3। कबीर कहते हैं कि उसके पाप मिट जाते हैं और उसका मन जगत को जीवन देने वाले प्रभु में लीन रहता है। 4। 1।

प्रभाती ॥

प्रभाती ॥
अलहु एकु मसीति बसतु है अवरु मुलखु किसु केरा ॥
हिंदू मूरति नाम निवासी दुह महि ततु न हेरा ॥1॥
अलह राम जीवउ तेरे नाई ॥
तू करि मिहरामति साई ॥1॥ रहाउ ॥
दखन देसि हरी का बासा पछिमि अलह मुकामा ॥
दिल महि खोजि दिलै दिलि खोजहु एही ठउर मुकामा ॥2॥
ब्रहमन गिआस करहि चउबीसा काजी मह रमजाना ॥
गिआरह मास पास कै राखे एकै माहि निधाना ॥3॥
कहा उडीसे मजनु कीआ किआ मसीति सिरु नांएं ॥
दिल महि कपटु निवाज गुजारै किआ हज काबै जांएं ॥4॥
एते अउरत मरदा साजे ए सभ रूप तुम॑ारे ॥
कबीरु पूंगरा राम अलह का सभ गुर पीर हमारे ॥5॥
कहतु कबीरु सुनहु नर नरवै परहु एक की सरना ॥
केवल नामु जपहु रे प्रानी तब ही निहचै तरना ॥6॥2॥

हिन्दी अर्थ: प्रभाती ॥ यदि ख़ुदा केवल मस्जिद में रहते हों, तो बाकी संसार किसका है? परमात्मा को केवल मूर्ति में सीमित मानने वाला भी उनका तत्त्व नहीं पहचानता। इन दोनों मान्यताओं में उनका सर्वव्यापक रूप नहीं दिखता। 1। हे अल्लाह! हे राम! मैं आपको एक ही जानकर आपके नाम से आत्मिक जीवन पाऊँ। हे स्वामी! मुझ पर कृपा करें। 1। रहाउ। कोई हरि का निवास दक्षिण के जगन्नाथपुरी में मानता है, कोई अल्लाह का मुकाम पश्चिम के काबे में। अपने हृदय में खोजें, भीतर ही खोजें; यही उनका निवास है। 2। ब्राह्मण चौबीस एकादशियों के व्रत का विधान बताते हैं और काज़ी रमज़ान के रोज़ों का। बाकी ग्यारह महीने अलग रखकर एक ही महीने में खजाना खोजा जाता है। 3। यदि हृदय में छल-कपट है, तो जगन्नाथपुरी में स्नान, मस्जिद में सजदा, नमाज़ और काबे के हज से क्या लाभ? 4। हे प्रभु! आपने जितने स्त्री-पुरुष बनाए हैं, सभी आपके रूप हैं; आप सबमें बसते हैं। आप ही अल्लाह और राम हैं। मैं कबीर आपका नादान बच्चा हूँ। सभी गुरु और पीर मुझे अपने लगते हैं। 5। कबीर कहते हैं, हे नर-नारियो! सुनें, एक परमात्मा की शरण लें। उनका नाम जपें; निश्चय ही संसार-समुद्र से पार हो सकेंगे। 6। 2।

प्रभाती ॥

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प्रभाती ॥
अवलि अलह नूरु उपाइआ कुदरति के सभ बंदे ॥
एक नूर ते सभु जगु उपजिआ कउन भले को मंदे ॥1॥

हिन्दी अर्थ: प्रभाती ॥ सबके मूल में ख़ुदा का नूर है, जिससे जगत उत्पन्न हुआ। सभी जीव उनकी कुदरत से बने हैं। जब पूरा संसार एक ही प्रभु की ज्योति से जन्मा है, तो जाति या मज़हब के भ्रम में किसी को ऊँचा और किसी को नीचा क्यों मानें? 1।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी; भगत कबीर जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1349 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।