आठ पहर पारब्रहमु धिआई सदा सदा गुन गाइआ ॥ कहु नानक मेरे पूरे मनोरथ पारब्रहमु गुरु पाइआ ॥4॥4॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: अब मैं आठों पहर उसका नाम सिमरता हूँ। सदा ही उसके गुण गाता रहता हूँ। हे नानक ! कह- (हे भाई !) मुझे गुरू मिल गया है (गुरू की कृपा से) मुझे परमात्मा मिल गया है। मेरी सारी मनोकानाएं पूरी हो गई हैं।4। 4।
प्रभाती महला 5 ॥ सिमरत नामु किलबिख सभि नासे ॥ सचु नामु गुरि दीनी रासे ॥ प्रभ की दरगह सोभावंते ॥ सेवक सेवि सदा सोहंते ॥1॥ हरि हरि नामु जपहु मेरे भाई ॥ सगले रोग दोख सभि बिनसहि अगिआनु अंधेरा मन ते जाई ॥1॥ रहाउ ॥ जनम मरन गुरि राखे मीत ॥ हरि के नाम सिउ लागी प्रीति ॥ कोटि जनम के गए कलेस ॥ जो तिसु भावै सो भल होस ॥2॥ तिसु गुर कउ हउ सद बलि जाई ॥ जिसु प्रसादि हरि नामु धिआई ॥ ऐसा गुरु पाईऐ वडभागी ॥ जिसु मिलते राम लिव लागी ॥3॥ करि किरपा पारब्रहम सुआमी ॥ सगल घटा के अंतरजामी ॥ आठ पहर अपुनी लिव लाइ ॥ जनु नानकु प्रभ की सरनाइ ॥4॥5॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरते हुए सारे पाप नाश हो जाते हैं। (जिन को) गुरू ने सदा-स्थिर हरी-नाम की राशि-पूँजी बख्शी। परमात्मा की दरगाह में वे इज्जत वाले बने। हे भाई ! परमात्मा के भगत (परमात्मा की) भगती कर के सदा (लोक-परलोक में) सुंदर लगते हैं। 1। हे मेरे भाई ! सदा परमात्मा का नाम जपा करो। (सिमरन की बरकति से साथ मन के) सारे रोग दूर हो जाते हैं। सारे पाप नाश हो जाते हैं। आत्मिक जीवन से बेसमझी का अंधेरा मन से दूर हो जाता है। 1। रहाउ। हे मित्र ! गुरू ने (उनके) जनम-मरण (के चक्कर) समाप्त कर दिए (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा के नाम में (जिन मनुष्यों का) प्यार बना। (हरी-नाम जल प्रीति की बरकति से उनके) करोड़ों जन्मों के दुख-कलेश दूर हो गए। (उनको) वह कुछ भला प्रतीत होता है जो परमात्मा को अच्छा लगता है। 2। हे भाई ! मैं उस गुरू से सदा सदके जाता हूँ। जिसकी मेहर से मैं परमात्मा का नाम सिमरता रहता हूँ। हे भाई ! ऐसा गुरू बड़ी किस्मत से ही मिलता है। जिसके मिलने से परमात्मा के संग प्यार बनता है। 3। हे पारब्रहम ! हे स्वामी ! मेहर कर। हे सब जीवों के दिल की जानने वाले ! (मेरे अंदर) आठों पहर अपनी लगन लगाए रख। (आपका) दास नानक आपकी शरण पड़ा रहे। 4। 5।
प्रभाती महला 5 ॥ करि किरपा अपुने प्रभि कीए ॥ हरि का नामु जपन कउ दीए ॥ आठ पहर गुन गाइ गुबिंद ॥ भै बिनसे उतरी सभ चिंद ॥1॥ उबरे सतिगुर चरनी लागि ॥ जो गुरु कहै सोई भल मीठा मन की मति तिआगि ॥1॥ रहाउ ॥ मनि तनि वसिआ हरि प्रभु सोई ॥ कलि कलेस किछु बिघनु न होई ॥ सदा सदा प्रभु जीअ कै संगि ॥ उतरी मैलु नाम कै रंगि ॥2॥ चरन कमल सिउ लागो पिआरु ॥ बिनसे काम क्रोध अहंकार ॥ प्रभ मिलन का मारगु जानां ॥ भाइ भगति हरि सिउ मनु मानां ॥3॥ सुणि सजण संत मीत सुहेले ॥ नामु रतनु हरि अगह अतोले ॥ सदा सदा प्रभु गुण निधि गाईऐ ॥ कहु नानक वडभागी पाईऐ ॥4॥6॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 5 ॥ हे भाई ! (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़े) प्रभू ने (उनको) मेहर करके अपना बना लिया (क्योंकि गुरू ने) परमात्मा का नाम जपने के लिए उनको दे दिया। हे भाई ! (गुरू की शरण पड़ कर) आठों पहर परमात्मा के गुण गाया कर (इस तरह) सारे डर नाश हो जाते हैं। सारी चिंता दूर हो जाती है। 1। हे भाई ! सतिगुरू के चरणों में लग के (अनेकों प्राणी डूबने से) बच जाते हैं। अपने मन की चतुराई छोड़ के (गुरू की शरण पड़ने) जो कुछ गुरू बताता है। वह अच्छा और प्यारा लगता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (गुरू की शरण पड़ने से) मन में तन में वह परमात्मा ही बसा रहता है। कोई दुख-कलेश (आदि जिंदगी के रास्ते में) रुकावट नहीं बनते। परमात्मा हर समय ही जिंद के साथ (बसता प्रतीत होता है)। परमात्मा के नाम के प्यार-रंग में टिके रहने से (विकारों की) सारी मैल (मन से) उतर जाती है। 2। हे भाई ! (गुरू की शरण पड़ने से) परमात्मा के सुंदर चरणों के साथ प्यार बन जाता है। काम क्रोध अहंकार (आदि विकार अंदर से) समाप्त हो जाते हैं। हे भाई ! (जिस मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा के मिलाप का रास्ता समझ लिया। प्यार की बरकति से भक्ति की बरकति से उसका मन प्रभू की याद में गिझ जाता है। 3। हे सज्जन ! हे संत ! हे मित्र ! सुन वे सदा सुखी जीवन वाले हो गए। (गुरू की शरण में पड़ कर जिन्होंने) अपहुँच और अतोल हरी का कीमती नाम हासिल कर लिया। हे भाई ! सदा ही गुणों के खजाने प्रभू की सिफत-सालाह करनी चाहिए। पर। हे नानक ! कह- ये दाति बहुत बड़ी किस्मत से मिलती है। 4। 6।
प्रभाती महला 5 ॥ से धनवंत सेई सचु साहा ॥ हरि की दरगह नामु विसाहा ॥1॥ हरि हरि नामु जपहु मन मीत ॥ गुरु पूरा पाईऐ वडभागी निरमल पूरन रीति ॥1॥ रहाउ ॥ पाइआ लाभु वजी वाधाई ॥ संत प्रसादि हरि के गुन गाई ॥2॥ सफल जनमु जीवन परवाणु ॥ गुर परसादी हरि रंगु माणु ॥3॥ बिनसे काम क्रोध अहंकार ॥ नानक गुरमुखि उतरहि पारि ॥4॥7॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 5 ॥ परमात्मा की हजूरी में (वे) मनुष्य धनी (गिने जाते हैं)। वही मनुष्य यकीनी तौर पर शाहूकार (समझे जाते हैं) हे भाई ! (गुरू की शरण पड़ कर जिन्होंने यहाँ) परमात्मा के नाम का सौदा खरीदा। 1। हे मित्र ! हे मन ! (गुरू की शरण पड़ के) सदा परमात्मा का नाम जपा कर। (पर नाम जपने वाली) पवित्र और संपूर्ण मर्यादा (चलाने वाला) पूरा गुरू बड़ी किस्मत से (ही) मिलता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (जो मनुष्य) गुरू की कृपा से परमात्मा के गुण गाता है (वह यहाँ असल) लाभ कमाता है। (उसके अंदर) आत्मिक उत्साह वाली अवस्था प्रबल बनी रहती है। 2। हे भाई ! (नाम जपने वाले का) मानस जनम सफल है। जीवन (प्रभू की हजूरी में) कबूल है गुरू की कृपा से परमात्मा के नाम का आनंद लेता रह । 3। (उनके अंदर से) काम क्रोध अहंकार (आदि विकार) नाश हो जाते हैं। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ कर (नाम जपने वाले मनुष्य संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। 4। 7
प्रभाती महला 5 ॥ गुरु पूरा पूरी ता की कला ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 5 ॥ हे भाई ! गुरू (सारे गुणों से) पूर्ण है। गुरू की (आत्मिक) शक्ति हरेक तरह की समर्थता वाली है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अब मैं आठों पहर उसका नाम सिमरता हूँ।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।