साधसंगति महि बसे गुपाल ॥
गुर मिलि आए तुमरै दुआर ॥
जन नानक दरसनु देहु मुरारि ॥4॥1॥
प्रभ की सेवा जन की सोभा ॥
काम क्रोध मिटे तिसु लोभा ॥
नामु तेरा जन कै भंडारि ॥
गुन गावहि प्रभ दरस पिआरि ॥1॥
तुमरी भगति प्रभ तुमहि जनाई ॥
काटि जेवरी जन लीए छडाई ॥1॥ रहाउ ॥
जो जनु राता प्रभ कै रंगि ॥
तिनि सुखु पाइआ प्रभ कै संगि ॥
जिसु रसु आइआ सोई जानै ॥
पेखि पेखि मन महि हैरानै ॥2॥
सो सुखीआ सभ ते ऊतमु सोइ ॥
जा कै ह्रिदै वसिआ प्रभु सोइ ॥
सोई निहचलु आवै न जाइ ॥
अनदिनु प्रभ के हरि गुण गाइ ॥3॥
ता कउ करहु सगल नमसकारु ॥
जा कै मनि पूरनु निरंकारु ॥
करि किरपा मोहि ठाकुर देवा ॥
नानकु उधरै जन की सेवा ॥4॥2॥
गुन गावत मनि होइ अनंद ॥
आठ पहर सिमरउ भगवंत ॥
जा कै सिमरनि कलमल जाहि ॥
तिसु गुर की हम चरनी पाहि ॥1॥
सुमति देवहु संत पिआरे ॥
सिमरउ नामु मोहि निसतारे ॥1॥ रहाउ ॥
जिनि गुरि कहिआ मारगु सीधा ॥
सगल तिआगि नामि हरि गीधा ॥
तिसु गुर कै सदा बलि जाईऐ ॥
हरि सिमरनु जिसु गुर ते पाईऐ ॥2॥
बूडत प्रानी जिनि गुरहि तराइआ ॥
जिसु प्रसादि मोहै नही माइआ ॥
हलतु पलतु जिनि गुरहि सवारिआ ॥
तिसु गुर ऊपरि सदा हउ वारिआ ॥3॥
महा मुगध ते कीआ गिआनी ॥
गुर पूरे की अकथ कहानी ॥
पारब्रहम नानक गुरदेव ॥
वडै भागि पाईऐ हरि सेव ॥4॥3॥
सगले दूख मिटे सुख दीए अपना नामु जपाइआ ॥
करि किरपा अपनी सेवा लाए सगला दुरतु मिटाइआ ॥1॥
हम बारिक सरनि प्रभ दइआल ॥
अवगण काटि कीए प्रभि अपुने राखि लीए मेरै गुर गोपालि ॥1॥ रहाउ ॥
ताप पाप बिनसे खिन भीतरि भए क्रिपाल गुसाई ॥
सासि सासि पारब्रहमु अराधी अपुने सतिगुर कै बलि जाई ॥2॥
अगम अगोचरु बिअंतु सुआमी ता का अंतु न पाईऐ ॥
लाहा खाटि होईऐ धनवंता अपुना प्रभू धिआईऐ ॥3॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! सृष्टि का रक्षक प्रभू साध-संगति में बसता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।