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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1338 · प्रभाती

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अंग
1338
प्रभाती
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  1. किरत संजोगी पाइआ भालि ॥
  2. प्रभ की सेवा जन की सोभा ॥
  3. गुन गावत मनि होइ अनंद ॥
  4. सगले दूख मिटे सुख दीए अपना नामु जपाइआ ॥

किरत संजोगी पाइआ भालि ॥

अंग 1337 से चला आ रहा अंश

किरत संजोगी पाइआ भालि ॥
साधसंगति महि बसे गुपाल ॥
गुर मिलि आए तुमरै दुआर ॥
जन नानक दरसनु देहु मुरारि ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! सृष्टि का रक्षक प्रभू साध-संगति में बसता है। पिछले किए कर्मों के संजोगों से (उसको साध-संगति में) ढूँढ के तलाश लिया जाता है। हे मुरारी ! गुरू की शरण पड़ कर मैं आपके दर पर आया हूँ (अपने) दास नानक को (अपने) दीदार बख्श। 4। 1।

प्रभ की सेवा जन की सोभा ॥

प्रभाती महला 5 ॥
प्रभ की सेवा जन की सोभा ॥
काम क्रोध मिटे तिसु लोभा ॥
नामु तेरा जन कै भंडारि ॥
गुन गावहि प्रभ दरस पिआरि ॥1॥
तुमरी भगति प्रभ तुमहि जनाई ॥
काटि जेवरी जन लीए छडाई ॥1॥ रहाउ ॥
जो जनु राता प्रभ कै रंगि ॥
तिनि सुखु पाइआ प्रभ कै संगि ॥
जिसु रसु आइआ सोई जानै ॥
पेखि पेखि मन महि हैरानै ॥2॥
सो सुखीआ सभ ते ऊतमु सोइ ॥
जा कै ह्रिदै वसिआ प्रभु सोइ ॥
सोई निहचलु आवै न जाइ ॥
अनदिनु प्रभ के हरि गुण गाइ ॥3॥
ता कउ करहु सगल नमसकारु ॥
जा कै मनि पूरनु निरंकारु ॥
करि किरपा मोहि ठाकुर देवा ॥
नानकु उधरै जन की सेवा ॥4॥2॥

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा की भगती से परमात्मा के भगत की वडिआई (लोक-परलोक में) होती है। उसके अंदर से काम क्रोध लोभ (आदि विकार) मिट जाते हैं। हे प्रभू ! आपका नाम-धन आपके भगतों के खजाने में (भरपूर रहता है)। हे प्रभू ! आपके भगत आपके दीदार की तमन्ना में आपके गुण गाते रहते हैं। 1। हे प्रभू ! अपनी भगती (अपने सेवकों को) आपने स्वयं ही समझाई है। (उनके मोह का) फंदा काट के आपने सेवकों को आपने स्वयं ही (माया के मोह से) बचाया है। 1। रहाउ। हे भाई ! जो जो मनुष्य परमात्मा के प्रेम रंग में रंगा गया। उन्होंने परमात्मा के (चरणों) से (लग के) आत्मिक आनंद प्राप्त किया। (पर उस आनंद को बयान नहीं किया जा सकता) जिस मनुष्य को वह आनंद आता है। वही उसको जानता है। वह मनुष्य (परमात्मा का) दर्शन कर-कर के (अपने) मन में वाह-वाह कर उठता है। 2। वह सुखी हो जाता है। वह और सभी से श्रेष्ठ जीवन वाला हो जाता है। हे भाई ! जिस (मनुष्य) के हृदय में वह परमात्मा आ बसता है। वह सदा अडोल चित्त रहता है। वह कभी भटकता नहीं फिरता। वह मनुष्य हर समय परमात्मा के गुण गाता रहता है। 3। हे भाई ! उसके आगे सारे अपना सिर झुकाया करो। जिस (मनुष्य) के मन में परमात्मा आ बसता है। हे ठाकुर प्रभू ! हे प्रकाश-रूप प्रभू ! मेरे ऊपर मेहर कर। (आपका सेवक) नानक आपके भगत की शरण में रह के (विकारों से) बचा रहे। 4। 2।

गुन गावत मनि होइ अनंद ॥

प्रभाती महला 5 ॥
गुन गावत मनि होइ अनंद ॥
आठ पहर सिमरउ भगवंत ॥
जा कै सिमरनि कलमल जाहि ॥
तिसु गुर की हम चरनी पाहि ॥1॥
सुमति देवहु संत पिआरे ॥
सिमरउ नामु मोहि निसतारे ॥1॥ रहाउ ॥
जिनि गुरि कहिआ मारगु सीधा ॥
सगल तिआगि नामि हरि गीधा ॥
तिसु गुर कै सदा बलि जाईऐ ॥
हरि सिमरनु जिसु गुर ते पाईऐ ॥2॥
बूडत प्रानी जिनि गुरहि तराइआ ॥
जिसु प्रसादि मोहै नही माइआ ॥
हलतु पलतु जिनि गुरहि सवारिआ ॥
तिसु गुर ऊपरि सदा हउ वारिआ ॥3॥
महा मुगध ते कीआ गिआनी ॥
गुर पूरे की अकथ कहानी ॥
पारब्रहम नानक गुरदेव ॥
वडै भागि पाईऐ हरि सेव ॥4॥3॥

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा के गुण गाते हुए मन में आनंद पैदा होता है। (तभी तो) मैं आठों पहर भगवान (का नाम) सिमरता हूं। जिस गुरू की कृपा से परमातमा का नाम सिमरने से (सारे) पाप दूर हो जाते हैं। मैं उस गुरू के (सदा) चरणों में लगा रहता हूँ। 1। हे प्यारे सतिगुरू ! (मुझे) सद्-बुद्धि बख्श (जिससे) मैं परमात्मा का नाम सिमरता रहूँ (जो नाम) मुझे (संसार-समुंद्र से) पार लंघा ले। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस गुरू ने (आत्मिक जीवन का) सीधा रास्ता बताया है (जिसकी बरकति से मनुष्य) और सारे (मोह) छोड़ के परमात्मा के नाम में रति रहता है। उस गुरू से सदा कुर्बान जाना चाहिए। जिस गुरू से परमात्मा के नाम सिमरन (की दाति) मिलती है।2। हे भाई ! जिस गुरू ने (संसार-समुंद्र में) डूब रहे प्राणियों को पार लंघाया। जिस (गुरू) की मेहर से माया ठॅग नहीं सकती। जिस गुरू ने (शरण पड़े मनुष्य का) यह लोक और परलोक सुंदर बना दिए। मैं उस गुरू से सदा सदके जाता हूँ। 3। (गुरू ने) महा मूर्ख मनुष्य से आत्मिक जीवन की सूझ वाला बना दिया। हे भाई ! पूरे गुरू की सिफत-सालाह पूरी तरह से बयान नहीं की जा सकती (बयान से परे है)। हे नानक ! (कह- गुरू की शरण पड़ के) पारब्रहमि गुरदेव बहुत किस्मत से हरी की सेवा-भगती प्राप्त होती है। 4। 3।

सगले दूख मिटे सुख दीए अपना नामु जपाइआ ॥

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प्रभाती महला 5 ॥
सगले दूख मिटे सुख दीए अपना नामु जपाइआ ॥
करि किरपा अपनी सेवा लाए सगला दुरतु मिटाइआ ॥1॥
हम बारिक सरनि प्रभ दइआल ॥
अवगण काटि कीए प्रभि अपुने राखि लीए मेरै गुर गोपालि ॥1॥ रहाउ ॥
ताप पाप बिनसे खिन भीतरि भए क्रिपाल गुसाई ॥
सासि सासि पारब्रहमु अराधी अपुने सतिगुर कै बलि जाई ॥2॥
अगम अगोचरु बिअंतु सुआमी ता का अंतु न पाईऐ ॥
लाहा खाटि होईऐ धनवंता अपुना प्रभू धिआईऐ ॥3॥

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 5 ॥ जिनको उसने अपना नाम जपने की प्रेरणा की। उनको उसने सारे सुख बख्श दिए। (उनके अंदर से) सारे दुख दूर हो गए। हे भाई ! (प्रभू ने) मेहर कर के (जिनको) अपनी भगती में जोड़ा। (उनके अंदर से उसने) सारा पाप दूर कर दिया। 1। हे दया के श्रोत प्रभू ! हम (जीव आपके) बच्चे (आपकी) शरण में हैं। हे भाई ! धरती के रक्षक प्रभू ने (जिनकी) रक्षा की। (उनके अंदर से) अवगुण दूर कर के (उनको उस) प्रभू ने अपना बना लिया। 1। रहाउ। हे भाई ! धरती के पति प्रभू जी (जिन पर) दयावान हुए। (उनके) सारे दुख-कलेश सारे पाप एक छिन में नाश हो गए। हे भाई ! मैं अपने गुरू से सदके जाता हूँ। (उसकी मेहर से) मैं अपनी हरेक साँस से परमात्मा का नाम सिमरता हूँ। 2। हे भाई ! मालिक-प्रभू अपहुँच है। उस तक (जीवों की) इन्द्रियों की पहुँच नहीं हो सकती। वह बेअंत है। उसके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। हे भाई ! अपने उस प्रभू का सिमरन करना चाहिए। (उसका नाम ही असल धन है। यह) लाभ कमा के धनवान बना जाता है। 3।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1338 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।