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अंग 1337

अंग
1337
राग प्रभाती
राग: प्रभाती · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
प्रभाती महला 4 ॥
गुर सतिगुरि नामु द्रिड़ाइओ हरि हरि हम मुए जीवे हरि जपिभा ॥
धनु धंनु गुरू गुरु सतिगुरु पूरा बिखु डुबदे बाह देइ कढिभा ॥1॥
जपि मन राम नामु अरधांभा ॥
उपजंपि उपाइ न पाईऐ कतहू गुरि पूरै हरि प्रभु लाभा ॥1॥ रहाउ ॥
राम नामु रसु राम रसाइणु रसु पीआ गुरमति रसभा ॥
लोह मनूर कंचनु मिलि संगति हरि उर धारिओ गुरि हरिभा ॥2॥
हउमै बिखिआ नित लोभि लुभाने पुत कलत मोहि लुभिभा ॥
तिन पग संत न सेवे कबहू ते मनमुख भूंभर भरभा ॥3॥
तुमरे गुन तुम ही प्रभ जानहु हम परे हारि तुम सरनभा ॥
जिउ जानहु तिउ राखहु सुआमी जन नानकु दासु तुमनभा ॥4॥6॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 4 ॥ हे भाई ! हम जीव आत्मिक मौत मरे रहते हैं। सतिगुरू ने जब हमारे दिल में परमात्मा का नाम दृढ़ कर दिया तब हरी-नाम जप के हम आत्मिक जीवन हासिल कर लेते हैं। हे भाई ! पूरा गुरू धन्य है। गुरू सराहनीय है। (आत्मिक मौत लाने वाली माया के मोह के) विषौले समुंद्र में डूबते हुए को गुरू (अपनी) बाँह पकड़ा के निकाल लेता है। 1। हे (मेरे) मन ! परमात्मा का नाम जपा कर; (यह नाम) जपने योग्य है। कानों में कोई गुप्त मंत्र देने आदि के ढंग से कभी भी परमात्मा नहीं मिलता। पूरे गुरू से (नाम ज पके ही) परमात्मा मिलता है। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा का नाम-रस (दुनिया के अन्य सभी) रसों का घर है (सब रसों से श्रेष्ठ है। पर) यह नाम-रस गुरमति के रस से ही पीया जा सकता है। जला हुआ लोहा (पारस को मिल के) सोना (हो जाता है। वैसे) संगति में मिल के (मनुष्य) परमात्मा का नाम-रस (अपने) हृदय में बसा लेता है। गुरू से ही ईश्वरीय जोति उसके अंदर प्रकट हो जाती है। 2। हे भाई ! जो मनुष्य अहंकार में ग्रसे रहते हैं। माया के लोभ में सदा फसे रहते हैं। पुत्र स्त्री के मोह में घिरे रहते हैं। उन्होंने कभी संत-जनों के चरण नहीं छूए होते। अपने मन के पीछे चलने वाले उन मनुष्यों के अंदर (तृष्णा की) आग धुखती रहती है। 3। हे प्रभू ! अपने गुण आप स्वयं ही जानता है। हम जीव (और सब तरफ से) हार के आपकी ही शरण आ पड़ते हैं। हे स्वामी ! जैसे भी हो सके। मेरी रक्षा कर (मैं) नानक आपका ही दास हूँ। 4। 6। छका1।
छका 1 ॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

प्रभाती बिभास पड़ताल महला 4
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जपि मन हरि हरि नामु निधान ॥
हरि दरगह पावहि मान ॥
जिनि जपिआ ते पारि परान ॥1॥ रहाउ ॥
सुनि मन हरि हरि नामु करि धिआनु ॥
सुनि मन हरि कीरति अठसठि मजानु ॥
सुनि मन गुरमुखि पावहि मानु ॥1॥
जपि मन परमेसुरु परधानु ॥
खिन खोवै पाप कोटान ॥
मिलु नानक हरि भगवान ॥2॥1॥7॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती बिभास पड़ताल महला 4 सतिगुर प्रसादि ॥ हे (मेरे) राम ! हर वक्त परमात्मा का नाम जपा कर (यही है असली) खजाना। (नाम की बरकति से) आप परमात्मा की हजूरी में आदर हासिल करेगा। जिस जिस ने नाम जपा है वह सब (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। 1। रहाउ। हे (मेरे) मन ! ध्यान जोड़ के सदा परमात्मा का नाम सुना कर। हे मन ! परमात्मा की सिफतसालाह सुना कर (यही है) अढ़सठ तीर्थों का स्नान। हे मन ! गुरू की शरण पड़ कर (परमात्मा का नाम) सुना कर (लोक-परलोक में) इज्जत कमाएगा। 1। हे मन ! परमेश्वर (का नाम) जपा कर (वही सबसे) बड़ा (है)। (नाम जपने की बरकति से) करोड़ों पापों का नाश (एक) छिन में हो जाता है। हे नानक ! सदा हरी भगवान (के चरणों में) जुड़ा रह। 2। 1। 7।
प्रभाती महला 5 बिभास
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मनु हरि कीआ तनु सभु साजिआ ॥
पंच तत रचि जोति निवाजिआ ॥
सिहजा धरति बरतन कउ पानी ॥
निमख न विसारहु सेवहु सारिगपानी ॥1॥
मन सतिगुरु सेवि होइ परम गते ॥
हरख सोग ते रहहि निरारा तां तू पावहि प्रानपते ॥1॥ रहाउ ॥
कापड़ भोग रस अनिक भुंचाए ॥
मात पिता कुटंब सगल बनाए ॥
रिजकु समाहे जलि थलि मीत ॥
सो हरि सेवहु नीता नीत ॥2॥
तहा सखाई जह कोइ न होवै ॥
कोटि अप्राध इक खिन महि धोवै ॥
दाति करै नही पछोुतावै ॥
एका बखस फिरि बहुरि न बुलावै ॥3॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 5 बिभास सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! जिस परमात्मा ने (आपका) मन बनाया। (आपका) शरीर बनाया। (मिट्टी हवा आदि) पाँच तत्वों का पुतला बना के (उसको अपनी) जोति से सुंदर बना दिया। (जिसने आपको) लेटने के लिए धरती दी। (जिसने आपको) उपयोग के लिए पानी दिया। उस परमात्मा को कभी ना भुलाओ। उसको (हर समय) सिमरते रहो। 1। हे (मेरे) मन ! गुरू की शरण पड़ा रह (इस तरह) सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त हो जाती है। अगर आप (गुरू के दर पर रह के) खुशी-ग़मी से निर्लिप टिका रहे। तो आप प्राणों के मालिक प्रभू को मिल सकता है। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस परमात्मा ने आपको अनेकों (किस्मों के) कपड़े बरतने को दिए। जिसने आपको अनेकों अच्छे-अच्छे पदार्थ खाने-पीने को दिए। जिसने आपके वास्ते माता-पिता-परिवार (आदि) सारे संबंधी बना दिए। हे मित्र ! जो परमात्मा पानी में धरती में (हर जगह जीवों को) रिज़क पहुँचाता है। उस परमात्मा को सदा ही सदा ही याद करते रहो। 2। हे भाई ! जहाँ कोई भी मदद नहीं कर सकता। परमात्मा वहाँ (भी) साथी बनता है। (जीवों के) करोड़ों पाप एक छिन में धो देता है। हे भाई ! वह प्रभू (सब जीवों को) दातें देता रहता है। कभी (इस बात से) पछताता नहीं। (जिस प्राणी पर) एक बार बख्शिश कर देता है। उसको (उसके लेखा माँगने के लिए) फिर नहीं बुलाता। 3।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “प्रभाती महला 4 ॥ हे भाई ! हम जीव आत्मिक मौत मरे रहते हैं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।