मेरै मनि हरि हरि राम नामु रसु टीक ॥
गुरमुखि नामु सीतल जलु पाइआ हरि हरि नामु पीआ रसु झीक ॥1॥ रहाउ ॥
जिन हरि हिरदै प्रीति लगानी तिना मसतकि ऊजल टीक ॥
हरि जन सोभा सभ जग ऊपरि जिउ विचि उडवा ससि कीक ॥2॥
जिन हरि हिरदै नामु न वसिओ तिन सभि कारज फीक ॥
जैसे सीगारु करै देह मानुख नाम बिना नकटे नक कीक ॥3॥
घटि घटि रमईआ रमत राम राइ सभ वरतै सभ महि ईक ॥
जन नानक कउ हरि किरपा धारी गुर बचन धिआइओ घरी मीक ॥4॥3॥
अगम दइआल क्रिपा प्रभि धारी मुखि हरि हरि नामु हम कहे ॥
पतित पावन हरि नामु धिआइओ सभि किलबिख पाप लहे ॥1॥
जपि मन राम नामु रवि रहे ॥
दीन दइआलु दुख भंजनु गाइओ गुरमति नामु पदारथु लहे ॥1॥ रहाउ ॥
काइआ नगरि नगरि हरि बसिओ मति गुरमति हरि हरि सहे ॥
सरीरि सरोवरि नामु हरि प्रगटिओ घरि मंदरि हरि प्रभु लहे ॥2॥
जो नर भरमि भरमि उदिआने ते साकत मूड़ मुहे ॥
जिउ म्रिग नाभि बसै बासु बसना भ्रमि भ्रमिओ झार गहे ॥3॥
तुम वड अगम अगाधि बोधि प्रभ मति देवहु हरि प्रभ लहे ॥
जन नानक कउ गुरि हाथु सिरि धरिओ हरि राम नामि रवि रहे ॥4॥4॥
मनि लागी प्रीति राम नाम हरि हरि जपिओ हरि प्रभु वडफा ॥
सतिगुर बचन सुखाने हीअरै हरि धारी हरि प्रभ क्रिपफा ॥1॥
मेरे मन भजु राम नाम हरि निमखफा ॥
हरि हरि दानु दीओ गुरि पूरै हरि नामा मनि तनि बसफा ॥1॥ रहाउ ॥
काइआ नगरि वसिओ घरि मंदरि जपि सोभा गुरमुखि करपफा ॥
हलति पलति जन भए सुहेले मुख ऊजल गुरमुखि तरफा ॥2॥
अनभउ हरि हरि हरि लिव लागी हरि उर धारिओ गुरि निमखफा ॥
कोटि कोटि के दोख सभ जन के हरि दूरि कीए इक पलफा ॥3॥
तुमरे जन तुम ही ते जाने प्रभ जानिओ जन ते मुखफा ॥
हरि हरि आपु धरिओ हरि जन महि जन नानकु हरि प्रभु इकफा ॥4॥5॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जिन मनुष्यों ने गुरू की शरण पडत्र कर छिन-छिन हरी-नाम-रस पीना शुरू कर दिया।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।