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अंग 1335

अंग
1335
राग प्रभाती
राग: प्रभाती · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
पूरा भागु होवै मुखि मसतकि सदा हरि के गुण गाहि ॥1॥ रहाउ ॥
अंम्रित नामु भोजनु हरि देइ ॥
कोटि मधे कोई विरला लेइ ॥
जिस नो अपणी नदरि करेइ ॥1॥
गुर के चरण मन माहि वसाइ ॥
दुखु अन॑ेरा अंदरहु जाइ ॥
आपे साचा लए मिलाइ ॥2॥
गुर की बाणी सिउ लाइ पिआरु ॥
ऐथै ओथै एहु अधारु ॥
आपे देवै सिरजनहारु ॥3॥
सचा मनाए अपणा भाणा ॥
सोई भगतु सुघड़ु सोुजाणा ॥
नानकु तिस कै सद कुरबाणा ॥4॥7॥17॥7॥24॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा के गुणों में डुबकी लगाया कर। आपके माथे पर पूरी किस्मत जाग उठेगी। 1। रहाउ। (उस मनुष्य को उसकी जिंद के लिए) खुराक (अपना) आत्मिक जीवन देने वाला नाम बख्शता है। (पर) करोड़ों में से कोई विरला मनुष्य ही (यह दाति) हासिल करता है। हे भाई ! जिस मनुष्य पर परमात्मा अपनी मेहर की निगाह करता है। 1। हे भाई ! गुरू के (सुंदर) चरण (अपने) मन में टिकाए रख (इस तरह) मन में से (हरेक) दुख दूर हो जाता है। (आत्मिक जीवन का) बेसमझी का (अज्ञानता भरा) अंधेरा हट जाता है (और) सदा कायम रहने वाला (प्रभू) स्वयं ही (जीव को अपने साथ) मिला लेता है। 2। हे भाई ! सतिगुरू की बाणी से प्यार जोड़। (यह बाणी ही) इस लोक और परलोक में (जिंदगी का) आसरा है (पर यह दाति) जगत को पैदा करने वाला प्रभू स्वयं ही देता है। 3। हे भाई ! सदा-स्थिर रहने वाला परमात्मा (गुरू की शरण में डाल के) अपनी रज़ा मीठी कर के मानने के लिए (मनुष्य की) सहायता करता है। (जो मनुष्य रज़ा को मान लेता है) वही है सुंदर-सदाचारी-समझदार भगत। (ऐसे मनुष्य से) नानक सदा सदके जाता है। 4। 7। 17। 7। 24।
प्रभाती महला 4 बिभास
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रसकि रसकि गुन गावह गुरमति लिव उनमनि नामि लगान ॥
अंम्रितु रसु पीआ गुर सबदी हम नाम विटहु कुरबान ॥1॥
हमरे जगजीवन हरि प्रान ॥
हरि ऊतमु रिद अंतरि भाइओ गुरि मंतु दीओ हरि कान ॥1॥ रहाउ ॥
आवहु संत मिलहु मेरे भाई मिलि हरि हरि नामु वखान ॥
कितु बिधि किउ पाईऐ प्रभु अपुना मो कउ करहु उपदेसु हरि दान ॥2॥
सतसंगति महि हरि हरि वसिआ मिलि संगति हरि गुन जान ॥
वडै भागि सतसंगति पाई गुरु सतिगुरु परसि भगवान ॥3॥
गुन गावह प्रभ अगम ठाकुर के गुन गाइ रहे हैरान ॥
जन नानक कउ गुरि किरपा धारी हरि नामु दीओ खिन दान ॥4॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 4 बिभास सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! गुरू की मति पर चल के। आएँ हम बार-बार स्वाद से परमात्मा के गुण गाया करें। (इस तरह) परमात्मा के नाम में लगन लग जाती है (प्रभू मिलाप की) तमन्ना में सुरति टिकी रहती है। हे भाई ! गुरू के शबद की बरकति से आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पीया जा सकता है। हे भाई ! मैं तो परमात्मा के नाम से सदके जाता हूँ। 1। हे भाई ! जगत के जीवन प्रभू जी ही हम जीवों की जिंद-जान हैं (फिर भी हम जीवों को यह समझ नहीं आती)। (जिस मनुष्य के) कानों में गुरू ने हरी-नाम का उपदेश दे दिया। उस मनुष्य को उक्तम हरी (अपने) हृदय में प्यारा लगने लग जाता है। 1। रहाउ। हे संत जनो ! हे मेरे भाईयो ! आएँ। मिल बैठो। मिल के परमात्मा का नाम जपें। हे संत जनो ! प्रभू-मिलाप का उपदेश मुझे बतौर दान देवो (और मुझे बताओ कि) प्यारा प्रभू कैसे किस ढंग से मिल सकता है। 2। हे भाई ! परमात्मा साध-संगति में सदा बसता है। साध-संगति में मिल के परमात्मा के गुणों की सांझ पड़ सकती है। जिसको बड़ी किस्मत से साध-संगति प्राप्त हो गई। उसने गुरू सतिगुरू (के चरण) छूह के भगवान (का मिलाप हासिल कर लिया)। 3। हे भाई ! आएँ। अपहुँच ठाकुर प्रभू के गुण गाया करें। उसके गुण गा-गा के (उसकी वडिआई आँखों के सामने ला-ला के) हैरत में गुंम हुआ जाता है। हे नानक ! जिस दास पर गुरू ने मेहर की। उसको (गुरू ने) एक छिन में परमात्मा का नाम दान दे दिया। 4। 1।
प्रभाती महला 4 ॥
उगवै सूरु गुरमुखि हरि बोलहि सभ रैनि सम॑ालहि हरि गाल ॥
हमरै प्रभि हम लोच लगाई हम करह प्रभू हरि भाल ॥1॥
मेरा मनु साधू धूरि रवाल ॥
हरि हरि नामु द्रिड़ाइओ गुरि मीठा गुर पग झारह हम बाल ॥1॥ रहाउ ॥
साकत कउ दिनु रैनि अंधारी मोहि फाथे माइआ जाल ॥
खिनु पलु हरि प्रभु रिदै न वसिओ रिनि बाधे बहु बिधि बाल ॥2॥
सतसंगति मिलि मति बुधि पाई हउ छूटे ममता जाल ॥
हरि नामा हरि मीठ लगाना गुरि कीए सबदि निहाल ॥3॥
हम बारिक गुर अगम गुसाई गुर करि किरपा प्रतिपाल ॥
बिखु भउजल डुबदे काढि लेहु प्रभ गुर नानक बाल गुपाल ॥4॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 4 ॥ हे भाई ! (जब) सूर्य उदय होता है गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य परमात्मा का नाम जपने लग जाते हैं। सारी रात भी वे परमात्मा की सिफतसालाह की बातें ही करते हैं। मेरे प्रभू ने भी मेरे अंदर ये लगन पैदा कर दी है। (इसलिए) मैं भी प्रभू की तलाश करता रहता हूँ। 1। मेरा मन गुरू के चरणों की धूड़ हुआ रहता है। हे भाई ! गुरू ने परमात्मा का मीठा नाम मेरे हृदय में पक्का कर दिया है। मैं (अपने) केसों से गुरू के चरण झाड़ता हूं। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा से टूटे हुए मनुष्यों के लिए (सारा) दिन (सारी) रात घोर अंधेरा होता है। (क्योंकि वह) माया के मोह में। माया (के मोह) के फंदों में फसे रहते हैं। उनके हृदय में परमात्मा एक छिन भर भी एक पल भर भी नहीं बसता। वह कई तरीकों से (विकारों के) करज़े में बाल-बाल बँधे रहते हैं। 2। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने साध-संगति में मिल के (ऊँची) मति (ऊँची) बुद्धि प्राप्त कर ली। (उनके अंदर से) अहंकार समाप्त हो जाता है। माया के मोह के फंदे टूट जाते हैं। उनको प्रभू का नाम प्यारा लगने लग जाता है। गुरू ने (उनको अपने) शबद की बरकति से निहाल कर दिया होता है। 3। हे गुरू ! हे अपहुँच मालिक ! हम जीव आपके (अंजान) बच्चे हैं। हे गुरू ! मेहर कर। हमारी रक्षा कर। हे नानक ! (कह-) हे गुरू ! हे प्रभू ! हे धरती के रखवाले ! ळम आपके (अंजान) बच्चे हैं। आत्मिक मौत लाने वाली माया के मोह के समुंद्र में हम डूबते हुओं को बचा ले। 4। 2।
प्रभाती महला 4 ॥
इकु खिनु हरि प्रभि किरपा धारी गुन गाए रसक रसीक ॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 4 ॥ हे भाई ! (जिन मनुष्यों पर) प्रभू ने एक छिन भर भी मेहर की। उन्होंने नाम-रस के रसिए बन के परमात्मा के गुण गाने शुरू कर दिए।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा के गुणों में डुबकी लगाया कर।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।