आपि क्रिपा करि राखहु हरि जीउ पोहि न सकै जमकालु ॥2॥ तेरी सरणाई सची हरि जीउ ना ओह घटै न जाइ ॥ जो हरि छोडि दूजै भाइ लागै ओहु जंमै तै मरि जाइ ॥3॥ जो तेरी सरणाई हरि जीउ तिना दूख भूख किछु नाहि ॥ नानक नामु सलाहि सदा तू सचै सबदि समाहि ॥4॥4॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: मेहर करके आप स्वयं उनकी रक्षा करता है। उनको (फिर) मौत का डर छू नहीं सकता। 1। हे प्रभू जी ! आपकी ओट सदा कायम रहने वाली है। ना वह घटती है ना वह खत्म होती है। पर। हे भाई ! जो मनुष्य प्रभू (की ओट) छोड़ के माया के प्यार में लग जाता है। वह जनम-मरण के चक्करों में पड़ जाता है। 3। हे प्रभू जी ! जो मनुष्य आपकी शरण पड़ते हैं उनको कोई दुख नहीं दबा सकता। उनको (माया की) भूख नहीं व्यापती। हे नानक ! परमात्मा का नाम सदा सलाहते रहा कर। इस तरह आप सदा स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह में लीन रहेगा। 4। 4।
प्रभाती महला 3 ॥ गुरमुखि हरि जीउ सदा धिआवहु जब लगु जीअ परान ॥ गुर सबदी मनु निरमलु होआ चूका मनि अभिमानु ॥ सफलु जनमु तिसु प्रानी केरा हरि कै नामि समान ॥1॥ मेरे मन गुर की सिख सुणीजै ॥ हरि का नामु सदा सुखदाता सहजे हरि रसु पीजै ॥1॥ रहाउ ॥ मूलु पछाणनि तिन निज घरि वासा सहजे ही सुखु होई ॥ गुर कै सबदि कमलु परगासिआ हउमै दुरमति खोई ॥ सभना महि एको सचु वरतै विरला बूझै कोई ॥2॥ गुरमती मनु निरमलु होआ अंम्रितु ततु वखानै ॥ हरि का नामु सदा मनि वसिआ विचि मन ही मनु मानै ॥ सद बलिहारी गुर अपुने विटहु जितु आतम रामु पछानै ॥3॥ मानस जनमि सतिगुरू न सेविआ बिरथा जनमु गवाइआ ॥ नदरि करे तां सतिगुरु मेले सहजे सहजि समाइआ ॥ नानक नामु मिलै वडिआई पूरै भागि धिआइआ ॥4॥5॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 3 ॥ हे भाई ! जब तक प्राण कायम हैं। और साँसें आ रही हैं गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम सिमरते रहो। (जो मनुष्य नाम सिमरता है। उसका) मन गुरू के शबद की बरकति से पवित्र हो जाता है। उसके मन में (बसता) अहंकार समाप्त हो जाता है। उस मनुष्य का सारा जीवन कामयाब हो जाता है। वह मनुष्य (सदा) परमात्मा के नाम में लीन हो रहता है। 1। हे मेरे मन ! गुरू का (यह) उपदेश (सदा) सुनते रहना चाहिए (कि) परमात्मा का नाम सदा सुख देने वाला है (इस वास्ते) आत्मिक अडोलता में (टिक के) परमात्मा का नाम-जल पीते रहना चाहिए। 1। रहाउ। हे भाई ! जो मनुष्य जगत के रचनहार के साथ सांझ डालते हैं। उनका निवास प्रभू-चरणों में हुआ रहता है सदा आत्मिक अडोलता में टिके रहने के कारण उनको आत्मिक आनंद मिला रहता है। गुरू के शबद की बरकति से उनका हृदय खिला रहता है। (उनके अंदर से) अहंकार वाली खोटी मति नाश हो जाती है। हे भाई ! (वैसे तो) सभ जीवों में सदा कायम रहने वाला परमात्मा ही मौजूद है। पर कोई विरला मनुष्य (गुरू के शबद के द्वारा ये बात) समझता है। 2। हे भाई ! गुरू की मति पर चल के (जिस मनुष्य का) मन पवित्र हो जाता है। वह मनुष्य जगत के अस्लियत परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम जपता रहता है। परमात्मा का नाम सदा उसके मन में टिका रहता है। उसका मन अपने अंदर से ही पतीजा रहता है। वह मनुष्य सदा अपने गुरू से सदके जाता है जिससे वह परमात्मा के साथ सांझ पा लेता है। 3। हे भाई ! जिस मनुष्य ने इस मानस-जीवन में गुरू की शरण नहीं ली। उसने अपनी जिंदगी व्यर्थ गवा ली। (पर जीव के भी क्या वश।) जिस मनुष्य पर परमात्मा मेहर की निगाह करता है। उसको गुरू मिलाता है। वह मनुष्य फिर हर वक्त आत्मिक अडोलता में लीन रहता है। हे नानक ! जिस मनुष्य को नाम (जपने की) वडिआई मिल जाती है। वह बड़ी किस्मत से नाम सिमरता रहता है। 4। 5।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 3 ॥ हे भाई ! प्रभू स्वयं ही कई किस्मों की कई रंगों की श्रृष्टि रचता है। सृष्टि रच के प्रभू ने स्वयं ही यह जगत-तमाशा बनाया है। (यह जगत-तमाशा) रच-रच के (स्वयं ही इसकी) संभाल करता है। (सब कुछ आप ही) कर रहा है (जीवों से) करवा रहा है। सभ जीवों को स्वयं ही रिज़क देता । 1। हे भाई ! जिस मनुष्य ने इस बखेड़ों भरे जीवन काल में गुरू की शरण पड़ कर उस राम को सिमरा है। उसके अंदर उसका नाम प्रकट हो जाता है (और झगड़े-बखेड़े उस पर प्रभाव नहीं डाल सकते)। सिर्फ परमात्मा ही हरेक घट में व्यापक है। 1। रहाउ। हे भाई ! (हरेक शरीर में) परमात्मा का नाम गुप्त (रूप में) मौजूद है। बखेड़ों-झमेलों भरे जीवन काल में (वह स्वयं ही सबके अंदर छुपा हुआ है)। प्रभू हरेक शरीर में व्यापक है। (फिर भी उसका) श्रेष्ठ नाम उन मनुष्यों के हृदय में (ही) प्रकट होता है। जो गुरू की शरण पड़ते हैं। 2। वह मनुष्य बड़ा है गुणों में पूरन है (यह जो बलवान) पाँच इन्द्रियाँ हैं इन पाँचों को अपने वश में ले आता है। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की मति से क्षमा संतोष (आदि गुण) हासिल कर लेता है। वह मनुष्य भाग्यशाली है। जो मनुष्य डर-अदब में रह के वैराग से परमात्मा के गुण गाता है। 3। हे भाई ! अगर कोई मनुष्य गुरू से मुँह फेर के रखता है। गुरू के वचन अपने मन में नहीं बसाता। (वैसे तीर्थ-यात्रा आदि मिथे हुए) धार्मिक कर्म कर के बहुत धन भी इकट्ठा कर लेता है। (फिर भी) वह जो कुछ करता है (वह करते हुए) नर्क में ही पड़ा रहता है (सदा दुखी ही रहता है)। 4। हे भाई ! (जीवों के भी कया वश।) एक परमात्मा ही (सारे जगत में) मौजूद है। (परमात्मा का ही) हुकम चल रहा है। एक परमात्मा से ही सारी सृष्टि की कार चल रही है। हे नानक ! गुरू की शरण में ला के प्रभू स्वयं ही जिस जीव को अपने साथ मिलाता है। वह जीव गुरू के माध्यम से परमात्मा में जा मिलता है। 5। 6।
प्रभाती महला 3 ॥ मेरे मन गुरु अपणा सालाहि ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 3 ॥ हे मेरे मन ! (सदा) अपने गुरू की शोभा किया कर।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मेहर करके आप स्वयं उनकी रक्षा करता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।