हरि हरि नामु जपहु जन भाई ॥ गुर प्रसादि मनु असथिरु होवै अनदिनु हरि रसि रहिआ अघाई ॥1॥ रहाउ ॥ अनदिनु भगति करहु दिनु राती इसु जुग का लाहा भाई ॥ सदा जन निरमल मैलु न लागै सचि नामि चितु लाई ॥2॥ सुखु सीगारु सतिगुरू दिखाइआ नामि वडी वडिआई ॥ अखुट भंडार भरे कदे तोटि न आवै सदा हरि सेवहु भाई ॥3॥ आपे करता जिस नो देवै तिसु वसै मनि आई ॥ नानक नामु धिआइ सदा तू सतिगुरि दीआ दिखाई ॥4॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: हे भाई जनो ! सदा परमात्मा का नाम जपा करो। (नाम जपने से) गुरू की कृपा से (मनुष्य का) मन (माया के हमलों के मुकाबले के वक्त) अडोल रहता है। हरी-नाम के स्वाद की बरकति से (मनुष्य) हर वक्त (माया की लालच से) तृप्त रहता है। 1। रहाउ। हे भाई ! दिन-रात हर वक्त परमात्मा की भक्ति करते रहो। यही है इस मानस जीवन का लाभ। (भगती करने वाले) मनुष्य सदा पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। जो मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम में चित्त जोड़ता है (उसके मन को विकारों की) मैल नहीं लगती। 2। हे भाई ! आत्मिक आनंद (मनुष्य जीवन के लिए एक) गहना है। (जिस मनुष्य को) गुरू ने (यह गहना) दिखा दिया। उसने हरी-नाम में जुड़ के (लोक-परलोक की) इज्जत कमा ली। हे भाई ! सदा प्रभू की सेवा-भगती करते रहो (सदा भगती करते रहने से यह) कभी ना खत्म होने वाले खजाने (मनुष्य के अंदर) भरे रहते हैं। (इन खजानों में) कभी कमी नहीं आती। पर। हे भाई ! यह नाम-खजाना जिस मनुष्य को करतार स्वयं ही देता है। उसके मन में आ बसता है। हे नानक ! आप सदा हरी-नाम सिमरता रह। (भगती-सिमरन का ये रास्ता) गुरू ने (ही) दिखाया है (ये रास्ता गुरू के माध्यम से ही मिलता है)। 4। 1।
प्रभाती महला 3 ॥ निरगुणीआरे कउ बखसि लै सुआमी आपे लैहु मिलाई ॥ तू बिअंतु तेरा अंतु न पाइआ सबदे देहु बुझाई ॥1॥ हरि जीउ तुधु विटहु बलि जाई ॥ तनु मनु अरपी तुधु आगै राखउ सदा रहां सरणाई ॥1॥ रहाउ ॥ आपणे भाणे विचि सदा रखु सुआमी हरि नामो देहि वडिआई ॥ पूरे गुर ते भाणा जापै अनदिनु सहजि समाई ॥2॥ तेरै भाणै भगति जे तुधु भावै आपे बखसि मिलाई ॥ तेरै भाणै सदा सुखु पाइआ गुरि त्रिसना अगनि बुझाई ॥3॥ जो तू करहि सु होवै करते अवरु न करणा जाई ॥ नानक नावै जेवडु अवरु न दाता पूरे गुर ते पाई ॥4॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 3 ॥ हे मेरे स्वामी ! (मुझ) गुण-हीन को बख्श ले। आप स्वयं ही (मुझे अपने चरणों से जोड़े रख। आप बेअंत है। आपके गुणों का किसी ने अंत नहीं पाया। (हे स्वामी ! गुरू के) शबद में (जोड़ के) मुझे (आत्मिक जीवन की) सूझ बख्श। 1। हे प्रभू जी ! मैं आपसे सदके जाता हूँ। मैं (अपना) तन (अपना) मन भेटा करता हूँ। आपके आगे रखता हूँ (मेहर कर।) मैं सदा आपकी शरण पड़ा रहूँ। 1। रहाउ। हे मेरे स्वामी ! मुझे सदा अपनी रज़ा में रख। मुझे अपना नाम ही दे (यह ही मेरे वास्ते) इज्जत (है)। हे भाई ! पूरे गुरू से (परमात्मा की) रज़ा की समझ आती है। और हर वक्त आत्मिक अडोलता में लीनता हैं सकती है। 2। हे मेरे स्वामी ! अगर आपको अच्छा लगे तो आपकी रज़ा में ही आपकी भगती हैं सकती है। आप स्वयं ही मेहर करके अपने चरणों में जोड़ता है। (जिस मनुष्य के अंदर से) गुरू ने तृष्णा की आग बुझा दी। उसने (हे प्रभू !) आपकी रज़ा में रह के सदा आत्मिक आनंद पाया। 3। हे करतार ! (जगत में) वही कुछ होता है जो कुछ आप (स्वयं) करता है (आपकी मर्जी के उलट) और कुछ नहीं किया जा सकता। हे नानक ! परमात्मा के नाम के बराबर का और कोई दातें देने वाला नहीं। यह नाम गुरू से (ही) मिलता है। 4। 2।
प्रभाती महला 3 ॥ गुरमुखि हरि सालाहिआ जिंना तिन सलाहि हरि जाता ॥ विचहु भरमु गइआ है दूजा गुर कै सबदि पछाता ॥1॥ हरि जीउ तू मेरा इकु सोई ॥ तुधु जपी तुधै सालाही गति मति तुझ ते होई ॥1॥ रहाउ ॥ गुरमुखि सालाहनि से सादु पाइनि मीठा अंम्रितु सारु ॥ सदा मीठा कदे न फीका गुर सबदी वीचारु ॥2॥ जिनि मीठा लाइआ सोई जाणै तिसु विटहु बलि जाई ॥ सबदि सलाही सदा सुखदाता विचहु आपु गवाई ॥3॥ सतिगुरु मेरा सदा है दाता जो इछै सो फलु पाए ॥ नानक नामु मिलै वडिआई गुर सबदी सचु पाए ॥4॥3॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 3 ॥ हे भाई ! जिन मनुष्यों ने गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा की सिफत सालाह की। उन्होंने ही सिफतसालाह करनी सीखी। उनके अंदर से माया वाली भटकना दूर हो जाती है। गुरू के शबद से वे परमात्मा के साथ सांझ डाल लेते हैं। 1। हे प्रभू जी ! मेरी सार लेने वाला सिर्फ एक आप ही है। मैं (सदा) आपको (ही) जपता हूँ। मैं (सदा) आपको ही सलाहता हूँ। ऊँची आत्मिक अवस्था और ऊँची अक्ल आपसे ही मिलती है। 1। रहाउ। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा की सिफत-सालाह करते हैं। वे (उसका) आनंद पाते हैं। आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल उनको मीठा लगता है (और सब पदार्थों से) श्रेष्ठ लगता है। वे मनुष्य गुरू के शबद से (परमात्मा के नाम का) विचार (करते हैं। उसका स्वाद उनको) सदा मीठा लगता है। कभी बेस्वादा नहीं लगता। 2। पर। हे भाई ! जिस (परमात्मा) ने (अपना नाम) मीठा महसूस करवाया है। वह स्वयं ही (इस भेद को) जानता है। मैं उससे सदा सदके जाता हूँ। मैं (गुरू के) शबद से (अपने अंदर से) स्वै-भाव दूर करके उस सुख-दाते परमात्मा की सदा सिफत-सालाह करता हूँ। 3। हे भाई ! प्यारा गुरू सदा (हरेक) दाति देने वाला है जो मनुष्य (गुरू से) माँगता है। वह फल हासिल कर लेता है। हे नानक ! (गुरू से परमात्मा का) नाम मिलता है (यही है असल) इज्जत। गुरू के शबद से (मनुष्य) सदा-स्थिर प्रभू को मिल जाता है। 4। 3।
प्रभाती महला 3 ॥ जो तेरी सरणाई हरि जीउ तिन तू राखन जोगु ॥ तुधु जेवडु मै अवरु न सूझै ना को होआ न होगु ॥1॥ हरि जीउ सदा तेरी सरणाई ॥ जिउ भावै तिउ राखहु मेरे सुआमी एह तेरी वडिआई ॥1॥ रहाउ ॥ जो तेरी सरणाई हरि जीउ तिन की करहि प्रतिपाल ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 3 ॥ हे प्रभू जी ! जो मनुष्य आपकी शरण आ पड़ते हैं। आप उनकी रक्षा करने के समर्थ है। हे प्रभू जी ! आपके बराबर का मुझे और कोई नहीं सूझता। (अभी तक आपके बराबर का) ना कोई हुआ है (और भविष्य में) ना कोई होंगे। 1। हे प्रभू जी ! (मेहर कर। मैं) सदा आपकी शरण पड़ा रहूँ। हे मेरे स्वामी ! जैसे आपको अच्छा लगे (मेरी) रक्षा कर (हम जीवों की रक्षा कर सकना) यह आपकी ही समर्थता है। 1। रहाउ। हे प्रभू जी ! जो मनुष्य आपकी शरण आ पड़ते हैं। आप (स्वयं) उनकी पालना करता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई जनो ! सदा परमात्मा का नाम जपा करो।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।