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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1333 · प्रभाती

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अंग
1333
प्रभाती
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  1. हरि हरि नामु जपहु जन भाई ॥
  2. निरगुणीआरे कउ बखसि लै सुआमी आपे लैहु मिलाई ॥
  3. गुरमुखि हरि सालाहिआ जिंना तिन सलाहि हरि जाता ॥
  4. जो तेरी सरणाई हरि जीउ तिन तू राखन जोगु ॥

गुरु अमर दास जी · शबद · राग प्रभाती

हरि हरि नामु जपहु जन भाई ॥

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हरि हरि नामु जपहु जन भाई ॥
गुर प्रसादि मनु असथिरु होवै अनदिनु हरि रसि रहिआ अघाई ॥1॥ रहाउ ॥
अनदिनु भगति करहु दिनु राती इसु जुग का लाहा भाई ॥
सदा जन निरमल मैलु न लागै सचि नामि चितु लाई ॥2॥
सुखु सीगारु सतिगुरू दिखाइआ नामि वडी वडिआई ॥
अखुट भंडार भरे कदे तोटि न आवै सदा हरि सेवहु भाई ॥3॥
आपे करता जिस नो देवै तिसु वसै मनि आई ॥
नानक नामु धिआइ सदा तू सतिगुरि दीआ दिखाई ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई जनो! सदा परमात्मा का नाम जपें। गुरु की कृपा से मन माया के आक्रमणों के सामने अडोल रहता है। हरि नाम का रस उसे सदा तृप्त रखता है। 1। रहाउ। हे भाई! दिन-रात परमात्मा की भक्ति करें; यही मनुष्य जीवन का लाभ है। भक्ति करने वाले जन पवित्र जीवन जीते हैं। जो सदा स्थिर हरि नाम में चित्त लगाता है, उसके मन को विकारों की मैल नहीं लगती। 2। आत्मिक आनंद जीवन का आभूषण है। जिसे गुरु ने यह आभूषण दिखा दिया, उसने नाम से जुड़कर सम्मान पाया। हे भाई! सदा प्रभु की सेवा-भक्ति करें। इससे भीतर ऐसे भंडार भरते हैं जो कभी समाप्त नहीं होते और जिनमें कभी कमी नहीं आती। 3। पर यह नाम का खजाना उसी के मन में बसता है जिसे करतार स्वयं देता है। हे नानक! सदा हरि नाम का स्मरण करें; यह मार्ग गुरु ने दिखाया है। 4। 1।

गुरु अमर दास जी · शबद · राग प्रभाती

निरगुणीआरे कउ बखसि लै सुआमी आपे लैहु मिलाई ॥

प्रभाती महला 3 ॥
निरगुणीआरे कउ बखसि लै सुआमी आपे लैहु मिलाई ॥
तू बिअंतु तेरा अंतु न पाइआ सबदे देहु बुझाई ॥1॥
हरि जीउ तुधु विटहु बलि जाई ॥
तनु मनु अरपी तुधु आगै राखउ सदा रहां सरणाई ॥1॥ रहाउ ॥
आपणे भाणे विचि सदा रखु सुआमी हरि नामो देहि वडिआई ॥
पूरे गुर ते भाणा जापै अनदिनु सहजि समाई ॥2॥
तेरै भाणै भगति जे तुधु भावै आपे बखसि मिलाई ॥
तेरै भाणै सदा सुखु पाइआ गुरि त्रिसना अगनि बुझाई ॥3॥
जो तू करहि सु होवै करते अवरु न करणा जाई ॥
नानक नावै जेवडु अवरु न दाता पूरे गुर ते पाई ॥4॥2॥

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 3 ॥ हे मेरे स्वामी! मुझ गुणहीन को क्षमा करें और अपने चरणों से जोड़े रखें। आप अनंत हैं; किसी ने आपके गुणों का अंत नहीं पाया। गुरु के शब्द में जोड़कर मुझे आत्मिक जीवन की समझ दें। 1। हे प्रभु! मैं आप पर न्योछावर जाता हूँ। अपना तन और मन अर्पित करके आपके सामने रखता हूँ। कृपा करें कि सदा आपकी शरण में रहूँ। 1। रहाउ। हे मेरे स्वामी! मुझे सदा अपनी रज़ा में रखें और अपना नाम दें; यही मेरा सम्मान है। हे भाई! पूर्ण गुरु से परमात्मा की रज़ा की समझ आती है और हर समय आत्मिक स्थिरता में रहा जा सकता है। 2। हे मेरे स्वामी! आपको भाए तो आपकी रज़ा में ही आपकी भक्ति हो सकती है। आप स्वयं कृपा करके अपने चरणों से जोड़ते हैं। जिसके भीतर गुरु ने तृष्णा की आग बुझा दी, उसने आपकी रज़ा में रहकर सदा आत्मिक आनंद पाया। 3। हे करतार! जगत में वही होता है जो आप करते हैं; आपकी इच्छा के विरुद्ध कुछ नहीं किया जा सकता। हे नानक! परमात्मा के नाम के समान कोई दाता नहीं। यह नाम पूर्ण गुरु से मिलता है। 4। 2।

गुरु अमर दास जी · शबद · राग प्रभाती

गुरमुखि हरि सालाहिआ जिंना तिन सलाहि हरि जाता ॥

प्रभाती महला 3 ॥
गुरमुखि हरि सालाहिआ जिंना तिन सलाहि हरि जाता ॥
विचहु भरमु गइआ है दूजा गुर कै सबदि पछाता ॥1॥
हरि जीउ तू मेरा इकु सोई ॥
तुधु जपी तुधै सालाही गति मति तुझ ते होई ॥1॥ रहाउ ॥
गुरमुखि सालाहनि से सादु पाइनि मीठा अंम्रितु सारु ॥
सदा मीठा कदे न फीका गुर सबदी वीचारु ॥2॥
जिनि मीठा लाइआ सोई जाणै तिसु विटहु बलि जाई ॥
सबदि सलाही सदा सुखदाता विचहु आपु गवाई ॥3॥
सतिगुरु मेरा सदा है दाता जो इछै सो फलु पाए ॥
नानक नामु मिलै वडिआई गुर सबदी सचु पाए ॥4॥3॥

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 3 ॥ हे भाई! जिन्होंने गुरु की शरण लेकर परमात्मा की स्तुति की, उन्हीं ने स्तुति करने की रीति सीखी। उनके भीतर से माया की भटकन दूर होती है और गुरु के शब्द द्वारा वे परमात्मा से संबंध जोड़ लेते हैं। 1। हे प्रभु! मेरी सुध लेने वाले केवल आप हैं। मैं सदा आपका नाम जपता हूँ और आपकी स्तुति करता हूँ। ऊँची आत्मिक अवस्था और विवेक आपसे ही मिलते हैं। 1। रहाउ। हे भाई! गुरु की शरण में परमात्मा की स्तुति करने वाले उसका आनंद पाते हैं। आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल उन्हें मीठा और सभी पदार्थों से श्रेष्ठ लगता है। गुरु के शब्द द्वारा नाम पर विचार करते हुए उसका रस सदा मीठा लगता है, कभी फीका नहीं पड़ता। 2। हे भाई! जिस परमात्मा ने अपने नाम की मिठास अनुभव कराई, वे स्वयं ही इसका भेद जानते हैं। मैं उन पर सदा न्योछावर जाता हूँ। गुरु के शब्द द्वारा अपना अहंभाव मिटाकर मैं सुख देने वाले परमात्मा की सदा स्तुति करता हूँ। 3। हे भाई! मेरे सतगुरु सदा दाता हैं। जो उनसे माँगता है, वह फल पाता है। हे नानक! गुरु से परमात्मा का नाम मिलता है; यही सच्चा सम्मान है। गुरु के शब्द द्वारा मनुष्य सदा स्थिर प्रभु से मिल जाता है। 4। 3।

गुरु अमर दास जी · शबद · राग प्रभाती

जो तेरी सरणाई हरि जीउ तिन तू राखन जोगु ॥

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प्रभाती महला 3 ॥
जो तेरी सरणाई हरि जीउ तिन तू राखन जोगु ॥
तुधु जेवडु मै अवरु न सूझै ना को होआ न होगु ॥1॥
हरि जीउ सदा तेरी सरणाई ॥
जिउ भावै तिउ राखहु मेरे सुआमी एह तेरी वडिआई ॥1॥ रहाउ ॥
जो तेरी सरणाई हरि जीउ तिन की करहि प्रतिपाल ॥

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 3 ॥ हे प्रभु! जो आपकी शरण में आते हैं, आप उनकी रक्षा करने में समर्थ हैं। आपके समान मुझे कोई और नहीं सूझता; न कोई पहले हुआ है, न आगे होगा। 1। हे प्रभु! कृपा करें कि मैं सदा आपकी शरण में रहूँ। हे मेरे स्वामी! जैसे आपको भाए, मेरी रक्षा करें। हमारी रक्षा करने की सामर्थ्य आपमें ही है। 1। रहाउ। हे प्रभु! जो आपकी शरण में आते हैं, आप स्वयं उनका पालन करते हैं।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1333 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।