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1332
प्रभाती
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· शबद · राग प्रभाती
पसरी किरणि रसि कमल बिगासे ससि घरि सूरु समाइआ ॥
पसरी किरणि रसि कमल बिगासे ससि घरि सूरु समाइआ ॥
कालु बिधुंसि मनसा मनि मारी गुर प्रसादि प्रभु पाइआ ॥3॥
अति रसि रंगि चलूलै राती दूजा रंगु न कोई ॥
नानक रसनि रसाए राते रवि रहिआ प्रभु सोई ॥4॥15॥
कालु बिधुंसि मनसा मनि मारी गुर प्रसादि प्रभु पाइआ ॥3॥
अति रसि रंगि चलूलै राती दूजा रंगु न कोई ॥
नानक रसनि रसाए राते रवि रहिआ प्रभु सोई ॥4॥15॥
हिन्दी अर्थ: जैसे सूरज की किरणों के बिखरने पर कमल के फूल खिल उठते है वैसे ही जोति-किरन का प्रकाश होने पर मनुष्य का मन नाम-अमृत के रस के साथ खिल उठता है (मन शांति-अवस्था हासिल कर लेता है। और उस) शांति अवस्था में मनुष्य का तामसी स्वभाव समा जाता है। मनुष्य। मौत के डर को समाप्त कर के मायावी फुरने अपने मन में ही मार देता है। और गुरू की मेहर से परमात्मा को (अपने अंदर ही) पा लेता है। 3। जिन मनुष्यों की जीभ प्रेम के श्रोत प्रभू में प्रभू के गाढ़े प्यार-रंग में रंगी जाती है। उनको माया के मोह का रंग छू नहीं सकता। हे नानक! जिन्होंने जीभ को नाम-रस से रसाया है। वे प्रभू-प्रेम में रंगे गए हैं। उनको परमात्मा हर जगह व्यापक दिखाई देता है। 4। 15।
· शबद · राग प्रभाती
बारह महि रावल खपि जावहि चहु छिअ महि संनिआसी ॥
प्रभाती महला 1 ॥
बारह महि रावल खपि जावहि चहु छिअ महि संनिआसी ॥
जोगी कापड़ीआ सिरखूथे बिनु सबदै गलि फासी ॥1॥
सबदि रते पूरे बैरागी ॥
अउहठि हसत महि भीखिआ जाची एक भाइ लिव लागी ॥1॥ रहाउ ॥
ब्रहमण वादु पड़हि करि किरिआ करणी करम कराए ॥
बिनु बूझे किछु सूझै नाही मनमुखु विछुड़ि दुखु पाए ॥2॥
सबदि मिले से सूचाचारी साची दरगह माने ॥
अनदिनु नामि रतनि लिव लागे जुगि जुगि साचि समाने ॥3॥
सगले करम धरम सुचि संजम जप तप तीरथ सबदि वसे ॥
नानक सतिगुर मिलै मिलाइआ दूख पराछत काल नसे ॥4॥16॥
बारह महि रावल खपि जावहि चहु छिअ महि संनिआसी ॥
जोगी कापड़ीआ सिरखूथे बिनु सबदै गलि फासी ॥1॥
सबदि रते पूरे बैरागी ॥
अउहठि हसत महि भीखिआ जाची एक भाइ लिव लागी ॥1॥ रहाउ ॥
ब्रहमण वादु पड़हि करि किरिआ करणी करम कराए ॥
बिनु बूझे किछु सूझै नाही मनमुखु विछुड़ि दुखु पाए ॥2॥
सबदि मिले से सूचाचारी साची दरगह माने ॥
अनदिनु नामि रतनि लिव लागे जुगि जुगि साचि समाने ॥3॥
सगले करम धरम सुचि संजम जप तप तीरथ सबदि वसे ॥
नानक सतिगुर मिलै मिलाइआ दूख पराछत काल नसे ॥4॥16॥
हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 1 ॥ परमात्मा की सिफतसालाह से टूट के बारह फिरकों के जोगी और दसों फिरकों के सन्यासी खपते फिरते हैं। टाकी लगे चोले पहनने वाले जोगी और सिर के बालों को जड़ों से उखड़वाने वाले ढूँढिए जैनी भी (ख्वार ही होते रहते हैं)। गुरू के शबद के बिना इन सभी के गले में (माया के मोह का) फंदा पड़ा रहता है। 1। जो मनुष्य परमात्मा की सिफत-सालाह की बाणी में रंगे रहते हैं। वे (माया के मोह से) पूरी तरह से उपराम रहते हैं। उन्होंने अपने दिल में टिके परमात्मा (के चरणों) में (जुड़ के सदा उसके नाम की) भिक्षा माँगी है। उनकी सुरति सिर्फ परमात्मा के प्यार में टिकी रहती है। 1। ब्राहमण ऊँचे आचरण (पर बल देने की जगह) कर्म-काण्ड कराता है। यह कर्म-काण्ड करके (इसी के आधार पर शास्त्रों में से) चर्चा पढ़ते हैं। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य परमात्मा की याद से टूट के आत्मिक दुख सहता है। क्योंकि (गुरू के शबद को) ना समझने के कारण इसको जीवन का सही रास्ता सूझता नहीं। 2। पवित्र कर्तव्य वाले सिर्फ वही लोग हैं जो (मन से) गुरू के शबद में जुड़े हुए हैं। परमात्मा की सदा कायम रहने वाली दरगाह में उनको आदर मिलता है। उनकी लिव हर रोज प्रभू के श्रेष्ठ नाम में लगी रहती है। वे सदा ही सदा-स्थिर (की याद) में लीन रहते हैं। 3। (सिरे की बात) कर्म-काण्ड के सारे धर्म। (बाहरी) स्वच्छता। (बाहरी) संयम, जप तप और तीर्थ-स्नान, यह सारे ही गुरू के शबद में बसते हैं (भाव, प्रभू की सिफत सालाह की बाणी में जुड़ने वाले को इन कर्मों-धर्मों की आवश्यक्ता नहीं रह जाती)। हे नानक! जो मनुष्य प्रभू की मेहर से गुरू को मिल जाता है। (गुरू की शरण आ जाता है) उस के सारे दुख-कलेश। पाप और मौत आदि के डर दूर हो जाते हैं। 4। 16।
· शबद · राग प्रभाती
संता की रेणु साध जन संगति हरि कीरति तरु तारी ॥
प्रभाती महला 1 ॥
संता की रेणु साध जन संगति हरि कीरति तरु तारी ॥
कहा करै बपुरा जमु डरपै गुरमुखि रिदै मुरारी ॥1॥
जलि जाउ जीवनु नाम बिना ॥
हरि जपि जापु जपउ जपमाली गुरमुखि आवै सादु मना ॥1॥ रहाउ ॥
गुर उपदेस साचु सुखु जा कउ किआ तिसु उपमा कहीऐ ॥
लाल जवेहर रतन पदारथ खोजत गुरमुखि लहीऐ ॥2॥
चीनै गिआनु धिआनु धनु साचौ एक सबदि लिव लावै ॥
निरालंबु निरहारु निहकेवलु निरभउ ताड़ी लावै ॥3॥
साइर सपत भरे जल निरमलि उलटी नाव तरावै ॥
बाहरि जातौ ठाकि रहावै गुरमुखि सहजि समावै ॥4॥
सो गिरही सो दासु उदासी जिनि गुरमुखि आपु पछानिआ ॥
नानकु कहै अवरु नही दूजा साच सबदि मनु मानिआ ॥5॥17॥
संता की रेणु साध जन संगति हरि कीरति तरु तारी ॥
कहा करै बपुरा जमु डरपै गुरमुखि रिदै मुरारी ॥1॥
जलि जाउ जीवनु नाम बिना ॥
हरि जपि जापु जपउ जपमाली गुरमुखि आवै सादु मना ॥1॥ रहाउ ॥
गुर उपदेस साचु सुखु जा कउ किआ तिसु उपमा कहीऐ ॥
लाल जवेहर रतन पदारथ खोजत गुरमुखि लहीऐ ॥2॥
चीनै गिआनु धिआनु धनु साचौ एक सबदि लिव लावै ॥
निरालंबु निरहारु निहकेवलु निरभउ ताड़ी लावै ॥3॥
साइर सपत भरे जल निरमलि उलटी नाव तरावै ॥
बाहरि जातौ ठाकि रहावै गुरमुखि सहजि समावै ॥4॥
सो गिरही सो दासु उदासी जिनि गुरमुखि आपु पछानिआ ॥
नानकु कहै अवरु नही दूजा साच सबदि मनु मानिआ ॥5॥17॥
हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 1 ॥ (हे मेरे मन!) संत जनों की चरण-धूल (अपने माथे पर लगाएँ)। साध-जनों की संगति करें। (सत्संग में) परमात्मा की सिफत-सालाह करें (संसार-समुंद्र की लहरों में से पार लांघने के लिए इस तरह) तैरें। गुरू की शरण पड़ कर (जिस मनुष्य के) हृदय में परमात्मा (आ बसता) है। बेचारा जमराज (भी) उसका कुछ नहीं बिगाड़ नहीं सकता। बल्कि जमराज (उससे) डरता है। 1। प्रभू के नाम सिमरन के बिना (मनुष्य का) जीवन (विकारों की आग में जलता है तो) जलता रहे (सिमरन के बिना कोई और उद्यम इसको जलने से नहीं बचा सकता)। (इसलिए) हे (मेरे) मन! मैं परमात्मा का नाम जप के जपता हूँ (भाव, बार-बार परमात्मा का नाम ही जपता हूं)। मैंने परमात्मा के जाप को ही माला (बना लिया है)। गुरू की शरण पड़ के (जपने से इस जाप का) आनंद आता है। 1। रहाउ। जिस मनुष्य को सतिगुरू के उपदेश का सदा कायम रहने वाला आत्मिक आनंद आ जाता है। उसकी वडिआई बयान नहीं की जा सकती। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है वह (गुरू के उपदेश में से) खोजता-खोजता लाल हीरे रतन (आदि पदार्थों जैसे कीमती आत्मिक गुण) हासिल कर लेता है। 2। जो मनुष्य एक (प्रभू की सिफत) के शबद में सुरति जोड़ता है वह परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालनी समझ जाता है। परमात्मा में जुड़ी सुरति उसका सदा-स्थिर धन बन जाता है। वह मनुष्य अपनी सुरति में उस परमात्मा को टिका लेता है जिसको किसी अन्य आसरे की जरूरत नहीं जिसको किसी खुराक की जरूरत नहीं जिसको कोई वासना छू नहीं सकती। 3। (पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ, मन और बुद्धि, ये सातों ही जैसे। चश्मे हैं जिनसे हरेक इन्सान को आत्मिक जीवन की प्रफुल्लता वास्ते अच्छी-बुरी प्रेरणा का पानी मिलता रहता है) जिस मनुष्य के यह सातों ही सरोवर नाम-सिमरन के पवित्र जल से भरे रहते हैं (उसको इन से पवित्र प्रेरणा का जल मिलता है और) वह विकारों से उलट अपनी जिंदगी की बेड़ी नाम-जल में तैराता है। (नाम की बरकति से) वह बाहर भटकते मन को रोके रखता है। और गुरू की शरण पडत्र के अडोल अवस्था में लीन रहता है। 4। (यदि मन विकारों की तरफ़ भटकता ही रहे तो गृहस्थ अथवा विरक्त कहलवाने में कोई फर्क नहीं पड़ता) जिस मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर अपने आप को पहचान लिया है वही (असल) गृहस्थी है और वही (प्रभू का) सेवक विरक्त है। नानक कहता है जिस मनुष्य का मन सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा (की सिफत-सालाह) के शबद में गिझ जाता है। उसको प्रभू के बिना (कहीं भी) कोई और दूसरा नहीं दिखता। 5। 17।
· शबद · राग प्रभाती
गुरमुखि विरला कोई बूझै सबदे रहिआ समाई ॥
रागु प्रभाती महला 3 चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरमुखि विरला कोई बूझै सबदे रहिआ समाई ॥
नामि रते सदा सुखु पावै साचि रहै लिव लाई ॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरमुखि विरला कोई बूझै सबदे रहिआ समाई ॥
नामि रते सदा सुखु पावै साचि रहै लिव लाई ॥1॥
हिन्दी अर्थ: रागु प्रभाती महला 3 चउपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई! कोई विरला मनुष्य गुरू के सन्मुख रह के गुरू के शबद से (यह) समझ लेता है कि परमात्मा सब जगह व्यापक है। परमात्मा के नाम में रति रह के (मनुष्य) सदा आत्मिक आनंद माणता है। सदा कायम रहने वाले प्रभू में सुरति जोड़े रखता है। 1।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 3: गुरु अमर दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1332 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।