नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: आत्मिक जीवन से वंचित है। गिरावट की ओर जा रहा है। बुरे से बुरा है। परमात्मा का नाम परमात्मा के चरणों का प्यार (आत्मिक जीवन की ओर से) कंगालों के लिए धन है। यही धन श्रेष्ठ धन है। इसके बिना दुनिया की माया राख के समान है। 4। (पर जीवों के भी क्या वश। सिफतसालाह अथवा इससे नफरत। गुरू के शबद का प्यार। प्रभू के गुणों की विचार- ये जो कुछ भी देता है प्रभू स्वयं ही देता है)। जो जो प्रभू जीवों को यह देता है सदा उसी को नमस्कार करनी चाहिए (और कहना चाहिए कि) हे प्रभू ! जिसको आप अपनी सिफत-सालाह बख्शता है। उसकी। मानो। ऊँची जाति हैं जाती है। उसको इज्जत मिलती है। (प्रभू का दास) नानक (प्रभू की सिफत-सालाह के बोल तभी) कह सकता है यदि प्रभू स्वयं ही कहलवाए। 5। 12।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 1 ॥ प्रभू के सिमरन को छोड़ के ज्यों-ज्यों मनुष्य स्वादिष्ट खाने के चस्के की मैल अपने मन में बढ़ाता है। (सुंदर वस्त्र) पहनने के रसों में फंसने से भी मनुष्य के आत्मिक जीवन में ही कमी आती है। (अपनी प्रशंसा के) बोल बोल के भी (दूसरों से) झगड़ा खड़ा कर लेता है। (सो। हे भाई ! सिमरन से टूट के यही) समझ कि मनुष्य जहर (ही विहाजता है)। 1। हे भाई ! (खाने पहनने और अपनी शोभा करवाने आदि पर) मुश्किल जाल में मन ऐसा फसता है (कि इसमें से निकलना मुश्किल हो जाता है। संसार-समुंद्र में माया के रसों की ठिलें पड़ रही हैं। इस) झागदार पानी को बड़ी मुश्किल से लांघ के ही जब ठहाराव वाली अवस्था में पहुँचा जाता है तब मनुष्य के अंदर ज्ञान का प्रकाश होता है। 1। रहाउ। (मोह के जाल में फस के) मनुष्य जो कुछ खाता है वह भी (आत्मिक जीवन के लिए) जहर। जो कुछ बोलता है वह भी जहर। जो कुछ करता कमाता है वह भी जहर ही है। (ऐसे लोग आखिर) जम राज के दरवाजे पर बँधे हुए (मानसिक दुखों की) मार खाते हैं। (इन मानसिक दुखों से) वही निजात हासिल करता है जो सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के नाम में जुड़ता है। 2। जगत में जैसे जीव नंगा आता है वैसे नंगा ही यहाँ से चला जाता है (पर मोह के करड़े जाल में फसा रह के यहाँ से) किए हुए बुरे कर्मों के संस्कार अपने मन में उकर के अपने साथ ले चलता है। (सारी उम्र) अपने मन के पीछे चल के (भले गुणों की) राशि-पूँजी (जो थोड़ी बहुत पल्ले थी यहीं) गवा जाता है। और परमात्मा की दरगाह में इसको सज़ा मिलती है। 3। जगत (का मोह) (भाव। मनुष्य के मन को खोटा-मैला बना देता है)। परमात्मा का सदा-स्थिर नाम पवित्र है (मन को भी पवित्र करता है)। (यह सच्चा नाम) गुरू के शबद में सुरति जोड़ के प्राप्त होता है। (पर) ऐसे लोग कोई विरले-विरले ही मिलते हैं जिन्होंने अपने हृदय में परमात्मा के साथ जान-पहचान डाली है। 4। (माया के मोह की चोट सहनी बहुत मुश्किल खेल है। यह चोट आत्मा को मार के रख देती है। पर जो कोई) इस ना सही जाने वाली चोट को सह लेता है (उसके अंदर) सदा अटल और आनंद स्वरूप परमात्मा (के प्यार) का चश्मा फूट पड़ता है। हे प्रभू ! जैसे मछली (ज्यादा से ज्यादा) जल की तमन्ना रखती है। वैसे (आपका दास) नानक (आपकी प्रीति तलाशता है) आपकी मेहर हैं। तो आप अपना प्यार (मेरे हृदय में) टिकाए रख (ता कि नानक माया के मोह-जाल में फसने से बचा रहे।)। 5। 13।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 1 ॥ दुनियावी गीत गाने। दुनियावी खुशियाँ और चतुराईयाँ। दुनिया वाले चाव उल्लास और हकूमतें। अनेकों पदार्थ खाने और सुंदर वस्त्र पहनने- (इनमें से) कुछ भी मेरे चित्त को नहीं भाता। (जब तक) सिमरन से मैं (परमात्मा को अपने दिल में) बसाता हूँ। मेरे अंदर अटल अडोलता बनी रहती है। मेरे अंदर सुख बना रहता है। 1। मुझे ये समझ नहीं कि (मेरा सृजनहार मेरे लिए) क्या कुछ कर रहा है और (मुझसे) क्या करवा रहा है। (पर। मैं यह समझता हूँ कि) परमात्मा के नाम के बिना और कुछ भी मेरे हृदय को अच्छा नहीं लगता। 1। रहाउ। (प्रभू चरणों के) सच्चे प्रेम की बरकति से मेरी मति में गोबिंद की भक्ति टिकी हुई है। प्रभू की सिफतसालाह करनी ही मेरी अपनी नित्य की कार बन गई है। इसी में से मुझे जोग के करिश्मों के स्वाद और आनंद आ रहे हैं। (सारे जगत में) प्रकाश करने वाला प्रभू मेरे हृदय में हर वक्त हिल्लोरे दे रहा है। 2। प्रभू के प्रेम में (जुड़ के) मैं उस प्यारे को नित्य पुकारता हूँ। उसकी प्रीति मैं अपने हृदय में टिकाता हूँ। (मुझे यकीन बन गया है कि) वह दीनों का नाथ है। वह सबका पति है। वह जगत का मालिक है। हर रोज (हर वक्त) उसका नाम सिमरना और औरों को सिमरने के लिए प्रेरित करना – यह नियम मैं सदा निभा रहा हूँ। ज्यों-ज्यों मैं जगत के मूल प्रभू (के गुणों) को विचारता हूं; माया के मोह की लहरों की ओर से मैं तृप्त होता जा रहा हूँ। 3। हे प्रभू ! आपके गुण बयान नहीं किए जा सकते। मेरी क्या ताकत है कि मैं आपके गुणों का बयान करूँ। जब आप मुझसे अपनी भक्ति कराता है तब ही मैं कर सकता हूँ। जब आपका नाम मेरे अंदर आ बसता है तब (मेरे अंदर से) ‘मैं मेरी’ समाप्त हो जाती है (अहंकार और ममता दोनों नाश हो जाती हैं) आपके बिना मैं किसी और की भक्ति नहीं कर सकता। मुझे आपके जैसा और कोई दिखता ही नहीं। 4। गुरू का शबद (जिसके द्वारा आपका नाम-अमृत मिलता है) मुझे मीठा लग रहा है मुझे और सारे रसों से शिरोमणी रस (सर्वोक्तम) लग रहा है। (हे प्रभू ! आपकी मेहर से) आपका नाम-अमृत मेरे अंदर ऐसा प्रकट हैं गया है हे नानक ! जिस मनुष्य ने प्रभू का नाम-रस चखा है उसको पूर्ण आत्मिक अवस्था का दर्जा मिल जाता है। वह दुनिया के पदार्थों की ओर से तृप्त हो जाता है। उसके हृदय में आत्मिक सुख बना रहता है। 5। 14।
प्रभाती महला 1 ॥ अंतरि देखि सबदि मनु मानिआ अवरु न रांगनहारा ॥ अहिनिसि जीआ देखि समाले तिस ही की सरकारा ॥1॥ मेरा प्रभु रांगि घणौ अति रूड़ौ ॥ दीन दइआलु प्रीतम मनमोहनु अति रस लाल सगूड़ौ ॥1॥ रहाउ ॥ ऊपरि कूपु गगन पनिहारी अंम्रितु पीवणहारा ॥ जिस की रचना सो बिधि जाणै गुरमुखि गिआनु वीचारा ॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 1 ॥ (जीवों के मनों पर प्रेम का) रंग चढ़ाने वाला (प्रेम के श्रोत परमात्मा के बिना) कोई और नहीं। (उसी की मेहर से) गुरू के शबद में जुड़ के प्रभू को अपने हृदय में (बसता) देख के जीव का मन उसके प्रेम-रंग को कबूल कर लेता है। (प्रेम का श्रोत) प्रभू दिन-रात ध्यान से जीवों की संभाल करता है। उसी की ही सारी सृष्टि में बादशाहियत है (प्रेम की दाति उसके अपने ही हाथ में है)। 1। मेरा प्रभू बड़े गाढ़े प्रेम-रंग वाला है बहुत सुंदर है दीनों पर दया करने वाला है। सबका प्यारा है। सबके मन को मोहने वाला है। प्रेम का श्रोत है। प्रेम के गाढ़े लाल रंग में रंगा हुआ है। 1। रहाउ। नाम-अमृत का श्रोत परमात्मा सबसे ऊँचा है। ऊँची बिरती वाला जीव ही (उसकी मेहर से) नाम-अमृत पी सकता है। नाम-अमृत पिलाने का ढंग (भी) वह परमात्मा स्वयं ही जानता है जिसकी रची हुई सारी सृष्टि है। (उस तरीके से प्रभू की मेहर से) जीव गुरू की शरण पड़ के प्रभू के साथ गहरी सांझ बनाता है और उसके गुणों की विचार करता है। 2।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।