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अंग 1329

अंग
1329
राग प्रभाती
राग: प्रभाती · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुरु दरीआउ सदा जलु निरमलु मिलिआ दुरमति मैलु हरै ॥
सतिगुरि पाइऐ पूरा नावणु पसू परेतहु देव करै ॥2॥
रता सचि नामि तल हीअलु सो गुरु परमलु कहीऐ ॥
जा की वासु बनासपति सउरै तासु चरण लिव रहीऐ ॥3॥
गुरमुखि जीअ प्रान उपजहि गुरमुखि सिव घरि जाईऐ ॥
गुरमुखि नानक सचि समाईऐ गुरमुखि निज पदु पाईऐ ॥4॥6॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: गुरू एक (ऐसा) दरिया है जिससे मिलता नाम-अमृत उस दरिया में (ऐसा) जल है जो सदा ही साफ रहता है। जिस मनुष्य को वह जल मिलता है उसकी खोटी मति की मैल दूर कर देता है। यदि गुरू मिल जाए तो (तो उस गुरू-दरिया में किया स्नान) सफल स्नान होता है। गुरू पशुओं से प्रेतों से देवता बना देता है। 2। जिस गुरू की ज्ञान-इन्द्रियां जिस गुरू का हृदय (सदा) परमात्मा के नाम-रंग में रंगा रहता है। उस गुरू को चँदन कहना चाहिए। चँदन की सुगंधि (पास उगी हुई) बनस्पति को (भी) सुगन्धित कर देती है (गुरू का उपदेश शरण आए लोगों का जीवन सँवार देता है)। उस गुरू के चरणों में सुरति जोड़ के रखनी चाहिए। 3। गुरू की शरण पड़ने से जीवों के अंदर आत्मिक जीवन पैदा हो जाते हैं। गुरू के माध्यम से उस प्रभू के दर पर पहुँच जाया जाता है जो सदा आनंद-स्वरूप है। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ने से सदा-स्थिर प्रभू में लीन हुआ जाता है। गुरू के द्वारा ऊँचा आत्मिक दर्जा मिल जाता है जो सदा ही अपना बना रहता है (अटल उच्च आत्मिक अवस्था मिल जाती है)। 4। 6।
प्रभाती महला 1 ॥
गुर परसादी विदिआ वीचारै पड़ि पड़ि पावै मानु ॥
आपा मधे आपु परगासिआ पाइआ अंम्रितु नामु ॥1॥
करता तू मेरा जजमानु ॥
इक दखिणा हउ तै पहि मागउ देहि आपणा नामु ॥1॥ रहाउ ॥
पंच तसकर धावत राखे चूका मनि अभिमानु ॥
दिसटि बिकारी दुरमति भागी ऐसा ब्रहम गिआनु ॥2॥
जतु सतु चावल दइआ कणक करि प्रापति पाती धानु ॥
दूधु करमु संतोखु घीउ करि ऐसा मांगउ दानु ॥3॥
खिमा धीरजु करि गऊ लवेरी सहजे बछरा खीरु पीऐ ॥
सिफति सरम का कपड़ा मांगउ हरि गुण नानक रवतु रहै ॥4॥7॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 1 ॥ जो मनुष्य गुरू की कृपा से (परमात्मा का नाम सिमरने की) विद्या विचारता है (सीखता है) वह उस विद्या को पढ़-पढ़ के (जगत में) आदर हासिल करता है। उसके अंदर ही उसका अपना आप चमक उठता है (उसका आत्मिक जीवन रौशन हैं जाता है। उसके मन में से अज्ञानता का अंधेरा दूर हो जाता है)। उस मनुष्य को आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल मिल जाता है। 1। हे करतार ! आप मेरा दाता है। मैं आपके पास से एक दान माँगता हूँ। मुझे अपना नाम बख्श। 1। रहाउ। (सिमरन से) परमात्मा के साथ डाली हुई गहरी सांझ ऐसी (बरकति वाली) है कि (इसकी मदद से विकारों की तरफ) दौड़ती पाँचों ज्ञान-इन्द्रियां रोक ली जाती हैं। मन में (टिका हुआ) अहंकार दूर हो जाता है। विकारों वाली निगाह और दुर्मति समाप्त हो जाती है। 2। (ब्राहमण अपने जजमान से चावल। गेहूँ। धन। दूध। घी आदि सारे पदार्थ माँगता है और लेता है। हे प्रभू ! आप मेरा जजमान है। मैंने आपके नाम का यज्ञ रचाया हुआ है।) मैं आपसे ऐसा दान माँगता हूँ कि मुझे चावलों की जगह जत-सत दे (मुझे सच्चा आचरण दे कि मैं ज्ञानेन्द्रियों को बुराई की ओर बढ़ने से रोक सकूँ)। गेहॅूँ की जगह आप मेरे हृदय में दया पैदा कर। मुझे ये धन दे कि मैं आपके चरणों में जुड़ने के योग्य हैं जाऊँ। मुझे शुभ कर्म (करने की समर्थता) दे। संतोख दे। ये है मेरे लिए दूध और घी। 3। हे नानक ! (कह- हे प्रभू ! मेरे अंदर) दूसरों की ज्यादती सहने का स्वभाव और जिगरा पैदा कर। यह है मेरी लिए लवेरी गाय। ताकि मेरा मन बहुत शांत अवस्था में टिक के (ये शांति का) दूध पी सके। मैं आपसे आपकी सिफत-सालाह करने के उद्यम का कपड़ा माँगता हूँ। ताकि मेरा मन सदा आपके गुण गाता रहे। 4। 7।
प्रभाती महला 1 ॥
आवतु किनै न राखिआ जावतु किउ राखिआ जाइ ॥
जिस ते होआ सोई परु जाणै जां उस ही माहि समाइ ॥1॥
तूहै है वाहु तेरी रजाइ ॥
जो किछु करहि सोई परु होइबा अवरु न करणा जाइ ॥1॥ रहाउ ॥
जैसे हरहट की माला टिंड लगत है इक सखनी होर फेर भरीअत है ॥
तैसो ही इहु खेलु खसम का जिउ उस की वडिआई ॥2॥
सुरती कै मारगि चलि कै उलटी नदरि प्रगासी ॥
मनि वीचारि देखु ब्रहम गिआनी कउनु गिरही कउनु उदासी ॥3॥
जिस की आसा तिस ही सउपि कै एहु रहिआ निरबाणु ॥
जिस ते होआ सोई करि मानिआ नानक गिरही उदासी सो परवाणु ॥4॥8॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 1 ॥ प्रभू की रज़ा के अनुसार जो जीव जगत में पैदा होता है उसको पैदा होने से कोई रोक नहीं सकता। जो (मर के यहाँ से) जाने लगता है उसको कोई यहाँ रोक नहीं सकता। जिस परमात्मा से जगत पैदा होता है। उसी में ही लीन हो जाता है (इस जगत-रचना के भेद को) वह परमात्मा ही ठीक तरह से जानता है (जीव को ये बात नहीं शोभा देती कि जगत को बुरा कह के इससे नफरत कर के परे हटे)। 1। हे प्रभू ! (इस जगत का रचनहार) आप स्वयं ही है (तूने खुद ही इसको अपनी रज़ा के अनुसार पैदा किया है) आपकी रज़ा भी आश्चर्यजनक है (भाव। जीवों की समझ से परे है)। हे प्रभू ! जो कुछ आप करता है। अवश्य ही वही कुछ घटित होता है। आपकी मर्जी के उलट (किसी जीव से) कुछ नहीं किया जा सकता (जीव का यह अंजानपना है कि आपके रचे जगत से नफरत करे। और गृहस्थ छोड़ के फकीर जा बने)। 1। रहाउ। जैसे बहते कूएँ (रहट लगे कूएँ) की माहल के साथ टिंडें (रहट में लगने वाले लोहे की बाल्टी समान डिब्बे) बँधी होती हैं (ज्यों-ज्यों रहट चलता है। त्यों-त्यों) कुछ टिंडें खाली होती जाती हैं और कुछ (टिंडें कूएँ के पानी से) फिर भरती जाती हैं। इसी तरह ही सारा जगत एक तमाशा है जो पति-प्रभू ने रचा हुआ है (कुछ यहाँ से कूच कर के जगह खाली कर जाते हैं। और कुछ शरीर धारण करके जगह आ घेरते हैं)। जैसे परमात्मा की मर्जी है वैसे ही यह तमाशा हो रहा है (इससे नाक मरोड़ना फबता नहीं)। 2। (पर हाँ) उस मनुष्य की निगाह में रोशनी हुई है (भाव। उस मनुष्य को जीवन-जुगति की सही समझ पड़ी है) जिसने (जगत के रचनहार) करतार के चरणों में सुरति जोड़ने के रास्ते पर चल के अपनी सुरति माया के मोह से हटाई है। हे परमात्मा के साथ सांझ डालने का यतन करने वाले ! अपने मन में सोच के (आँखें खोल के) देख (यदि सुरति ठिकाने पर नहीं है; तो) ना ही गृहस्ती जीवन-यात्रा में ठीक राह पर चल रहा है और ना ही (वह मनुष्य जो अपने आप को) विरक्त (समझता है)। 3। हे नानक ! जिस परमात्मा ने दुनिया वाली मोह-माया की आशा चिपका दी है। जो मनुष्य उसी परमात्मा के (यह आशा तृष्णा) हवाले करता है। और वासना-रहित हो के जीवन गुजारता है। और इस परमात्मा की रज़ा में यह जगत-रचना हुई है उसको रजा का मालिक जान के उसमें अपना मन जोड़ता है। वह चाहे गृहस्ती है चाहे विरक्त। वह परमात्मा की दरगाह में कबूल है। 4। 8।
प्रभाती महला 1 ॥
दिसटि बिकारी बंधनि बांधै हउ तिस कै बलि जाई ॥
पाप पुंन की सार न जाणै भूला फिरै अजाई ॥1॥
बोलहु सचु नामु करतार ॥
फुनि बहुड़ि न आवण वार ॥1॥ रहाउ ॥
ऊचा ते फुनि नीचु करतु है नीच करै सुलतानु ॥
जिनी जाणु सुजाणिआ जगि ते पूरे परवाणु ॥2॥
ता कउ समझावण जाईऐ जे को भूला होई ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 1 ॥ मैं उस बंदे से कुर्बान जाता हूँ जो (अपनी) विकारों की ओर जाती सुरति को (हरी-नाम सिमरन की) डोरी से बाँध के रखता है। (पर जो मनुष्य सिमरन से टूट के) भले-बुरे काम के भेद को नहीं समझता। वह (जीवन के सही रास्ते से टूट के) भटकता फिरता है और (जीवन) व्यर्थ गवाता है। 1। (हे भाई !) करतार का सदा कायम रहने वाला नाम (सदा) सिमरो। (नाम सिमरन की बरकति से जगत में) बार-बार जनम लेने की बारी नहीं आएगी। 1। रहाउ। (हे भाई ! उस करतार का नाम सदा सिमरो) जो ऊँचों से नीच कर देता है और निम्न श्रेणियों (गरीबों) को बादशाह बना देता है। जिन लोगों ने उस (घट-घट की) जानने वाले परमात्मा को अच्छी तरह जान लिया है (भाव। उससे गहरी सांझ डाल ली है) जगत में आए वही लोग सफल हैं और कबूल हें। 2। (पर। जीवों के भी क्या वश।) उसी जीव को मति देने का यतन किया जा सकता है जो (खुद) गलत रास्ते पर पड़ा हो।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू एक (ऐसा) दरिया है जिससे मिलता नाम-अमृत उस दरिया में (ऐसा) जल है जो सदा ही साफ रहता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।