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1322
कल्याण
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· शबद · राग कल्याण
मेरे लालन की सोभा ॥
कलिआन महला 5 ॥
मेरे लालन की सोभा ॥
सद नवतन मन रंगी सोभा ॥1॥ रहाउ ॥
ब्रहम महेस सिध मुनि इंद्रा भगति दानु जसु मंगी ॥1॥
जोग गिआन धिआन सेखनागै सगल जपहि तरंगी ॥
कहु नानक संतन बलिहारै जो प्रभ के सद संगी ॥2॥3॥
मेरे लालन की सोभा ॥
सद नवतन मन रंगी सोभा ॥1॥ रहाउ ॥
ब्रहम महेस सिध मुनि इंद्रा भगति दानु जसु मंगी ॥1॥
जोग गिआन धिआन सेखनागै सगल जपहि तरंगी ॥
कहु नानक संतन बलिहारै जो प्रभ के सद संगी ॥2॥3॥
हिन्दी अर्थ: कलिआन महला 5 ॥ हे भाई! मेरे सुंदर प्रभू की शोभा-वडिआई सदा ही नई (रहती है। आकर्षित करती रहती है। और) सदा ही मन को (प्यार का) रंग चढ़ाती रहती है। 1। रहाउ। हे भाई! ब्रहमा, शिव, सिद्ध, मुनि, इंद्र (आदि देवते), यह सारे (प्रभू के दर से उसकी) भगती का दान माँगते हें। उसकी सिफतसालाह की दाति माँगते रहते हैं। 1। हे भाई! जोगी, ज्ञानी, ध्यानी, शेशनाग (आदि ये) सारे उस अनेकों करिश्मों के मालिक-प्रभू का नाम जपते रहते हैं। हे नानक! कहें: मैं उन संत जनों पर से कुर्बान जाता हूँ। जो परमात्मा के सदा साथी बने रहते हैं। 2। 3।
· शबद · राग कल्याण
तेरै मानि हरि हरि मानि ॥
कलिआन महला 5 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तेरै मानि हरि हरि मानि ॥
नैन बैन स्रवन सुनीऐ अंग अंगे सुख प्रानि ॥1॥ रहाउ ॥
इत उत दह दिसि रविओ मेर तिनहि समानि ॥1॥
जत कता तत पेखीऐ हरि पुरख पति परधान ॥
साधसंगि भ्रम भै मिटे कथे नानक ब्रहम गिआन ॥2॥1॥4॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तेरै मानि हरि हरि मानि ॥
नैन बैन स्रवन सुनीऐ अंग अंगे सुख प्रानि ॥1॥ रहाउ ॥
इत उत दह दिसि रविओ मेर तिनहि समानि ॥1॥
जत कता तत पेखीऐ हरि पुरख पति परधान ॥
साधसंगि भ्रम भै मिटे कथे नानक ब्रहम गिआन ॥2॥1॥4॥
हिन्दी अर्थ: कलिआन महला 5 घरु 2 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे हरी! आपके (बख्शे हुए) प्यार की बरकति से। हे हरी! आपके दिए प्रेम से; आँखों से (आपके दर्शन हर जगह कर लेते हैं) वचनों से (आपकी सिफत-सालाह कर ली जाती है) कानों से (आपकी सिफत-सालाह) सुन ली जाती है। हरेक अंग में हरेक साँस के साथ आनंद (प्राप्त होता है)। 1। रहाउ। हे भाई! (प्रभू से मिले प्यार की बरकति से वह प्रभू) हर जगह दसों दिशाओं में व्यापक दिख दे जाता है। सुमेर पर्वत और तीले में एक समान। 1। हे नानक! साध-संगति में परमात्मा की सिफत-सालाह करने से सारे भ्रम सारे डर मिट जाते हैं। वे प्रधान-पुरख वह सारे जीवों का मालिक हरी हर जगह बसता दिखाई देने लग जाता है। 2। 1। 4।
· शबद · राग कल्याण
गुन नाद धुनि अनंद बेद ॥
कलिआन महला 5 ॥
गुन नाद धुनि अनंद बेद ॥
कथत सुनत मुनि जना मिलि संत मंडली ॥1॥ रहाउ ॥
गिआन धिआन मान दान मन रसिक रसन नामु जपत तह पाप खंडली ॥1॥
जोग जुगति गिआन भुगति सुरति सबद तत बेते जपु तपु अखंडली ॥
ओति पोति मिलि जोति नानक कछू दुखु न डंडली ॥2॥2॥5॥
गुन नाद धुनि अनंद बेद ॥
कथत सुनत मुनि जना मिलि संत मंडली ॥1॥ रहाउ ॥
गिआन धिआन मान दान मन रसिक रसन नामु जपत तह पाप खंडली ॥1॥
जोग जुगति गिआन भुगति सुरति सबद तत बेते जपु तपु अखंडली ॥
ओति पोति मिलि जोति नानक कछू दुखु न डंडली ॥2॥2॥5॥
हिन्दी अर्थ: कलिआन महला 5 ॥ हे भाई! (परमात्मा के) गुण (गाने, जोगियों के) नाद (बजाने हैं)। (प्रभू के गुण गाने से पैदा हुई) आनंद की धुनि (ही) वेद हैं। हे भाई! वे सेवक जिन्होंने अपने मन को विकारों से चुप करा लिया होता है साध-संगति में मिल के यही गुण गाते हैं और सुनते हैं। 1। रहाउ। हे भाई! (साध-संगति में जहाँ) आत्मिक जीवन की सूझ प्राप्त होती है। जहाँ प्रभू-चरणों में सुरति जुड़ती है। जहाँ हरी-नाम के साथ प्यार बनता है। जहाँ हरी-नाम औरों को बाँटा जाता है। वहाँ रसिए मन (अपनी) जीभ से नाम जपते हैं। वहाँ सारे पाप नाश हो जाते हैं। 1। हे नानक! प्रभू से मिलाप की जुगति के भेद को जानने वाले। आत्मिक जीवन की सूझ-रूप आत्मिक खुराक के भेद को जानने वाले। गुरू के शबद की लगन के भेद को जानने वाले मनुष्य (साध-संगति में टिक के यही नाम-सिमरन का) जप और तप सदा करते हैं। वह मनुष्य ईश्वरीय ज्योति से मिल के ताने-पेटे की तरह (उसके साथ) एक-रूप हो जाते हैं। (उनको) कोई भी दुख दुखी नहीं कर सकता। 2। 2। 5।
· शबद · राग कल्याण
कउनु बिधि ता की कहा करउ ॥
कलिआनु महला 5 ॥
कउनु बिधि ता की कहा करउ ॥
धरत धिआनु गिआनु ससत्रगिआ अजर पदु कैसे जरउ ॥1॥ रहाउ ॥
बिसन महेस सिध मुनि इंद्रा कै दरि सरनि परउ ॥1॥
काहू पहि राजु काहू पहि सुरगा कोटि मधे मुकति कहउ ॥
कहु नानक नाम रसु पाईऐ साधू चरन गहउ ॥2॥3॥6॥
कउनु बिधि ता की कहा करउ ॥
धरत धिआनु गिआनु ससत्रगिआ अजर पदु कैसे जरउ ॥1॥ रहाउ ॥
बिसन महेस सिध मुनि इंद्रा कै दरि सरनि परउ ॥1॥
काहू पहि राजु काहू पहि सुरगा कोटि मधे मुकति कहउ ॥
कहु नानक नाम रसु पाईऐ साधू चरन गहउ ॥2॥3॥6॥
हिन्दी अर्थ: कलिआन महला 5 ॥ हे भाई! (विकारों से मुक्ति परमात्मा के नाम-रस की बरकति से ही हो सकती है। सो।) उस (परमात्मा के मिलाप) का मैं कौन सा तरीका इस्तेमाल करूँ। मैं कौन सा उद्यम करूँ (अनेकों ऐसे हैं जो) समाधियाँ लगाते हैं। (अनेकों ऐसे हैं जो) शास्त्र-वेक्ता शास्त्रार्थ करते रहते हैं (पर, इन तरीकों से विकारों से मुक्ति नहीं मिलती। विकारों का दबाव पड़ा ही रहता है। और, यह) एक ऐसी (ढली हुई। क्षीण) आत्मिक अवस्था है जो (अब) सही नहीं जा सकती। मैं इसको सह नहीं सकता (मैं इसको अपने अंदर बने नहीं रहने दे सकता)। 1। रहाउ। हे भाई! विष्णु, शिव, सिद्ध, मुनि, इन्द्र देवता (अनेकों ही सुने हैं वर देने वाले। पर विकारों से मुक्ति हासिल करने के लिए इनमें से) मैं किस के दर पर जाऊँ। मैं किस की शरण पड़ूँ। 1। हे भाई! किसी के पास राज (देने की ताकत सुनी जाती) है। किसी के पास स्वर्ग (देने की समर्था सुनी जा रही) है। पर, करोड़ों में से कोई विरला ही (ऐसा हो सकता है। जिसके पास जा के) मैं (यह) कहूँ (कि) विकारों से मुक्ति (मिल जाए)। हे नानक! कहें: (मुक्ति हरी-नाम से ही मिलती है। और) नाम का स्वाद (तब ही) मिल सकता है (जब) मैं गुरू के चरण (जा) पकड़ूँ। 2। 3। 6।
· शबद · राग कल्याण
प्रानपति दइआल पुरख प्रभ सखे ॥
कलिआन महला 5 ॥
प्रानपति दइआल पुरख प्रभ सखे ॥
गरभ जोनि कलि काल जाल दुख बिनासनु हरि रखे ॥1॥ रहाउ ॥
नाम धारी सरनि तेरी ॥
प्रभ दइआल टेक मेरी ॥1॥
अनाथ दीन आसवंत ॥
नामु सुआमी मनहि मंत ॥2॥
तुझ बिना प्रभ किछू न जानू ॥
सरब जुग महि तुम पछानू ॥3॥
हरि मनि बसे निसि बासरो ॥
गोबिंद नानक आसरो ॥4॥4॥7॥
प्रानपति दइआल पुरख प्रभ सखे ॥
गरभ जोनि कलि काल जाल दुख बिनासनु हरि रखे ॥1॥ रहाउ ॥
नाम धारी सरनि तेरी ॥
प्रभ दइआल टेक मेरी ॥1॥
अनाथ दीन आसवंत ॥
नामु सुआमी मनहि मंत ॥2॥
तुझ बिना प्रभ किछू न जानू ॥
सरब जुग महि तुम पछानू ॥3॥
हरि मनि बसे निसि बासरो ॥
गोबिंद नानक आसरो ॥4॥4॥7॥
हिन्दी अर्थ: कलिआन महला 5 ॥ हे (जीवों की) जिंद के मालिक! हे दया के घर पुरख प्रभू! हे मित्र! हे हरी! आप ही गर्भ-जोनि का नाश करने वाले हैं (जूनियों के चक्करों में से निकालने वाले हैं)। आप ही झगड़े-कलेशों का नाश करने वाले हैं। आप ही आत्मिक मौत लाने वाले मोह के फंदे काटने वाले हैं। आप ही दुखों को नाश करने वाले हैं। आप ही रखवाले हैं। 1। रहाउ। मैं आपकी शरण आया हूँ। (मेहर करें। मैं आपका) नाम (अपने अंदर) बसाए रखूँ। हे दयालु प्रभू! मुझे एक आपका ही सहारा है। 1। हे स्वामी! निमाणे और गरीब (एक आपकी ही सहायता की) आस रखते हैं। (मेहर करें। आपका) नाम-मंत्र (मेरे) मन में (टिका रहे)। 2। हे प्रभू! आपकी शरण पड़े रहने के बिना मैं और कुछ भी नहीं जानता। सारे जुगों में आप ही (हम जीवों के) मित्र हैं। 3। हे हरी! दिन-रात (मेरे) मन में टिके रहें। हे गोबिंद! आप ही नानक का आसरा हैं। 4। 4। 7।
· शबद · राग कल्याण
मनि तनि जापीऐ भगवान ॥
कलिआन महला 5 ॥
मनि तनि जापीऐ भगवान ॥
गुर पूरे सुप्रसंन भए सदा सूख कलिआन ॥1॥ रहाउ ॥
सरब कारज सिधि भए गाइ गुन गुपाल ॥
मिलि साधसंगति प्रभू सिमरे नाठिआ दुख काल ॥1॥
करि किरपा प्रभ मेरिआ करउ दिनु रैनि सेव ॥
मनि तनि जापीऐ भगवान ॥
गुर पूरे सुप्रसंन भए सदा सूख कलिआन ॥1॥ रहाउ ॥
सरब कारज सिधि भए गाइ गुन गुपाल ॥
मिलि साधसंगति प्रभू सिमरे नाठिआ दुख काल ॥1॥
करि किरपा प्रभ मेरिआ करउ दिनु रैनि सेव ॥
हिन्दी अर्थ: कलिआन महला 5 ॥ हे भाई! मन में हृदय में (सदा) भगवान (का नाम) जपते रहना चाहिए। हे भाई! (जिस मनुष्य पर) पूरे सतिगुरू जी दयालु होते हैं (वह मनुष्य भगवान का नाम जपता है। जिसकी बरकति से उसके अंदर) सदा सुख-आनंद (बना रहता है)। 1। रहाउ। हे भाई! सृष्टि के पालनहार प्रभू के गुण गा के (मनुष्य को अपने) सारे कामों में सफलता हासिल हो जाती है। जिस मनुष्य ने साध-संगति में मिल के प्रभू जी का नाम सिमरा उसकी आत्मिक मौत से पैदा होने वाले सारे दुख नाश हो जाते हैं। 1। हे दास नानक! (कहें:) हे मेरे प्रभू! हे हरी! हे पुरख! हे सर्व-गुण-संपन्न देव! मैं आपकी शरण आया हूँ;
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1322 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।