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1313
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- गोविदु गोविदु गोविदु जपि मुखु ऊजला परधानु ॥
- तूं आपे ही सिध साधिको तू आपे ही जुग जोगीआ ॥
- हरि हरि हरि हरि नामु है गुरमुखि पावै कोइ ॥
- हरि आपे आपि दइआलु हरि आपे करे सु होइ ॥
- सभ जोति तेरी जगजीवना तू घटि घटि हरि रंग रंगना ॥
- हरि हरि नामु धिआइ मन हरि दरगह पावहि मानु ॥
- हरि हरि नामु पवितु है नामु जपत दुखु जाइ ॥
- पउड़ी ॥
गोविदु गोविदु गोविदु जपि मुखु ऊजला परधानु ॥
गोविदु गोविदु गोविदु जपि मुखु ऊजला परधानु ॥
नानक गुरु गोविंदु हरि जितु मिलि हरि पाइआ नामु ॥2॥
नानक गुरु गोविंदु हरि जितु मिलि हरि पाइआ नामु ॥2॥
हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) सदा प्रभू का नाम जप-जप के (लोक-परलोक में) सुर्खरू हुआ जाता है और प्रधानता मिलती है। हे नानक ! (कहें- हे भाई !) गुरू परमात्मा (का रूप) है; उस (गुरू) में मिल के (गुरू के बताए हुए राह पर चल के) परमात्मा का नाम प्राप्त होता है। 2।
तूं आपे ही सिध साधिको तू आपे ही जुग जोगीआ ॥
पउड़ी ॥
तूं आपे ही सिध साधिको तू आपे ही जुग जोगीआ ॥
तू आपे ही रस रसीअड़ा तू आपे ही भोग भोगीआ ॥
तू आपे आपि वरतदा तू आपे करहि सु होगीआ ॥
सतसंगति सतिगुर धंनु धनोु धंन धंन धनो जितु मिलि हरि बुलग बुलोगीआ ॥
सभि कहहु मुखहु हरि हरि हरे हरि हरि हरे हरि बोलत सभि पाप लहोगीआ ॥1॥
तूं आपे ही सिध साधिको तू आपे ही जुग जोगीआ ॥
तू आपे ही रस रसीअड़ा तू आपे ही भोग भोगीआ ॥
तू आपे आपि वरतदा तू आपे करहि सु होगीआ ॥
सतसंगति सतिगुर धंनु धनोु धंन धंन धनो जितु मिलि हरि बुलग बुलोगीआ ॥
सभि कहहु मुखहु हरि हरि हरे हरि हरि हरे हरि बोलत सभि पाप लहोगीआ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! आप स्वयं ही (जोग साधना में) सिद्धस्थ योगी हैं। आप स्वयं ही साधना करने वाले साधक हैं। आप स्वयं ही जोग में जुड़ने वाले हैं। आप स्वयं ही (मायावी पदार्थों के) रस चखने वाले हैं। आप स्वयं ही (मायावी पदार्थों के) भोग-भोगने वाले हैं। (क्योंकि जोगियों में भी और गृहस्थियों में भी हर जगह) आप स्वयं ही स्वयं मौजूद हैं। जो कुछ आप करते हैं। वही होता है। हे भाई ! गुरू की साध-संगति धन्य है धन्य है जिसमें मिल के परमात्मा की सिफतसालाह के बोल बोले जा सकते हैं। (हे भाई ! साध-संगति में बैठ के) सारे (अपने मुँह से सदा हर वक्त परमात्मा का नाम जपने से सारे पिछले किए) पाप दूर हो जाते हैं। 1।
हरि हरि हरि हरि नामु है गुरमुखि पावै कोइ ॥
सलोक मः 4 ॥
हरि हरि हरि हरि नामु है गुरमुखि पावै कोइ ॥
हउमै ममता नासु होइ दुरमति कढै धोइ ॥
नानक अनदिनु गुण उचरै जिन कउ धुरि लिखिआ होइ ॥1॥
हरि हरि हरि हरि नामु है गुरमुखि पावै कोइ ॥
हउमै ममता नासु होइ दुरमति कढै धोइ ॥
नानक अनदिनु गुण उचरै जिन कउ धुरि लिखिआ होइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ (हे भाई !) सदा ही परमात्मा का नाम (सिमरन की दाति) कोई विरला मनुष्य गुरू के बताए हुए रास्ते पर चल कर हासिल करता है। (जो मनुष्य यह दाति प्राप्त करता है। उसके अंदर से) अहंकार और ममता का नाश हो जाता है (वह मनुष्य अपने अंदर से नाम की बरकति से) दुर्मति (की मैल) धो के निकाल देता है; हे नानक ! (वह मनुष्य) हर वक्त (परमात्मा के) गुण उचारता है (पर। हे भाई ! वही मनुष्य परमात्मा के गुण उचारते हैं) जिनके भाग्यों में धुर-दरगाह से (किए कर्मों के अनुसार नाम-सिमरन के संस्कारों का लेख) लिखा होता है। 1।
हरि आपे आपि दइआलु हरि आपे करे सु होइ ॥
मः 4 ॥
हरि आपे आपि दइआलु हरि आपे करे सु होइ ॥
हरि आपे आपि वरतदा हरि जेवडु अवरु न कोइ ॥
जो हरि प्रभु भावै सो थीऐ जो हरि प्रभ करे सु होइ ॥
कीमति किनै न पाईआ बेअंतु प्रभू हरि सोइ ॥
नानक गुरमुखि हरि सालाहिआ तनु मनु सीतलु होइ ॥2॥
हरि आपे आपि दइआलु हरि आपे करे सु होइ ॥
हरि आपे आपि वरतदा हरि जेवडु अवरु न कोइ ॥
जो हरि प्रभु भावै सो थीऐ जो हरि प्रभ करे सु होइ ॥
कीमति किनै न पाईआ बेअंतु प्रभू हरि सोइ ॥
नानक गुरमुखि हरि सालाहिआ तनु मनु सीतलु होइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ (हे भाई !) परमात्मा स्वयं ही दया का श्रोत है (जगत में) वही कुछ होता है जो वह परमात्मा स्वयं ही करता है। (हे भाई !) परमात्मा स्वयं ही (हर जगह) मौजूद है। कोई और उसके बराबर का नहीं। जो कुछ प्रभू को अच्छा लगता है वही होता है। जो कुछ वह प्रभू करता है वही होता है। हे भाई ! उस परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। किसी (मनुष्य) ने उसका मूल्य नहीं पाया। हे नानक ! जिस मनुष्य ने गुरू के बताए हुए रास्ते पर चल के परमात्मा की सिफतसालाह की है। उसका तन उसका मन (विकारों से पलट के गुणों की शीतलता से) ठंडा-ठार हो जाता है। 2।
सभ जोति तेरी जगजीवना तू घटि घटि हरि रंग रंगना ॥
पउड़ी ॥
सभ जोति तेरी जगजीवना तू घटि घटि हरि रंग रंगना ॥
सभि धिआवहि तुधु मेरे प्रीतमा तू सति सति पुरख निरंजना ॥
इकु दाता सभु जगतु भिखारीआ हरि जाचहि सभ मंग मंगना ॥
सेवकु ठाकुरु सभु तूहै तूहै गुरमती हरि चंग चंगना ॥
सभि कहहु मुखहु रिखीकेसु हरे रिखीकेसु हरे जितु पावहि सभ फल फलना ॥2॥
सभ जोति तेरी जगजीवना तू घटि घटि हरि रंग रंगना ॥
सभि धिआवहि तुधु मेरे प्रीतमा तू सति सति पुरख निरंजना ॥
इकु दाता सभु जगतु भिखारीआ हरि जाचहि सभ मंग मंगना ॥
सेवकु ठाकुरु सभु तूहै तूहै गुरमती हरि चंग चंगना ॥
सभि कहहु मुखहु रिखीकेसु हरे रिखीकेसु हरे जितु पावहि सभ फल फलना ॥2॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। ॥ हे जगत के जीवन प्रभू ! सारी सृष्टि में आपका ही नूर (प्रकाश है)। आप हरेक शरीर में (मौजूद हैं। और अपने नाम की) रंगत चढ़ाने वाले हैं। हे मेरे प्रीतम ! सारे जीव आपको (ही) सिमरते हैं। हे सर्व-व्यापक (और फिर भी) निर्लिप प्रभू ! आप सदा कायम रहने वाले हैं। आप सदा कायम रहने वाले हैं। हे प्रभू ! आप ही दातें देने वाले हैं। सारा जगत (आपके दर का) मंगता है। हे हरी ! हरेक माँग (जीव आपसे ही) माँगते हैं। आप स्वयं ही मालिक हैं। हे हरी ! गुरू की मति पर चलने से आप बहुत प्यारे लगते हैं। हे भाई ! परमात्मा (सारी) इन्द्रियों का मालिक है। आप सभी अपने मुँह से उसकी सिफतसालाह करें। उसका नाम जपें। उसके नाम की बरकति से ही (जीव) सारे फल प्राप्त करते हैं। 2।
हरि हरि नामु धिआइ मन हरि दरगह पावहि मानु ॥
सलोक मः 4 ॥
हरि हरि नामु धिआइ मन हरि दरगह पावहि मानु ॥
जो इछहि सो फलु पाइसी गुर सबदी लगै धिआनु ॥
किलविख पाप सभि कटीअहि हउमै चुकै गुमानु ॥
गुरमुखि कमलु विगसिआ सभु आतम ब्रहमु पछानु ॥
हरि हरि किरपा धारि प्रभ जन नानक जपि हरि नामु ॥1॥
हरि हरि नामु धिआइ मन हरि दरगह पावहि मानु ॥
जो इछहि सो फलु पाइसी गुर सबदी लगै धिआनु ॥
किलविख पाप सभि कटीअहि हउमै चुकै गुमानु ॥
गुरमुखि कमलु विगसिआ सभु आतम ब्रहमु पछानु ॥
हरि हरि किरपा धारि प्रभ जन नानक जपि हरि नामु ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ हे (मेरे) मन ! सदा परमात्मा का नाम सिमरा करें। परमात्मा की हजूरी में आदर हासिल करेंगे। (परमात्मा से) जो आप माँगेंगे वही फल (वह) देगा। (पर) गुरू के शबद से (प्रभू में) सुरति जुड़ सकती है। (जिस मनुष्य की जुड़ती है। उसके) सारे पाप-विकार काटे जाते हैं; (उसके अंदर से) अहंकार समाप्त हो जाता है। अहम् दूर हो जाता है। हे मेरे मन ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य का हृदय-कमल-फूल खिल उठता है। वह हर जगह परमात्मा को बसता पहचानने-योग्य हो जाता है। हे नानक ! (अरदास करें और कहें-) हे प्रभू दास (नानक) पर मेहर करें। (मैं आपका दास भी) नाम जपता रहूँ। 1।
हरि हरि नामु पवितु है नामु जपत दुखु जाइ ॥
मः 4 ॥
हरि हरि नामु पवितु है नामु जपत दुखु जाइ ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन मनि वसिआ आइ ॥
सतिगुर कै भाणै जो चलै तिन दालदु दुखु लहि जाइ ॥
आपणै भाणै किनै न पाइओ जन वेखहु मनि पतीआइ ॥
जनु नानकु दासन दासु है जो सतिगुर लागे पाइ ॥2॥
हरि हरि नामु पवितु है नामु जपत दुखु जाइ ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन मनि वसिआ आइ ॥
सतिगुर कै भाणै जो चलै तिन दालदु दुखु लहि जाइ ॥
आपणै भाणै किनै न पाइओ जन वेखहु मनि पतीआइ ॥
जनु नानकु दासन दासु है जो सतिगुर लागे पाइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ (हे भाई !) परमात्मा का नाम (आत्मिक जीवन को) पवित्र बनाने योग्य है। नाम जपने से (हरेक) दुख दूर हो जाता है। (पर यह नाम) उन (मनुष्यों) के मन में आ के बसता है जिनके भाग्यों में शुरू से (पिछले किए कर्मों के अनुसार नाम जपने के संस्कारों का लेखा) लिखा होता है। (हे भाई !) जो जो मनुष्य गुरू की रजा में चलता है उनका दुख-दरिद्र दूर हो जाता है। पर। हे भाई ! अपने मन में तसल्ली कर के देख लें। अपने मन की मर्जी में चल के किसी ने भी हरी-नाम प्राप्त नहीं किया। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के चरणों में पड़े रहते हैं। दास नानक उनके दासों का दास है। 2।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1313 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।