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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1314 · कानड़ा

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अंग
1314
कानड़ा
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  1. तूं थान थनंतरि भरपूरु हहि करते सभ तेरी बणत बणावणी ॥
  2. हरि हरि अंम्रितु नाम रसु हरि अंम्रितु हरि उर धारि ॥
  3. हरि कीरति उतमु नामु है विचि कलिजुग करणी सारु ॥
  4. राम नामु वखरु है ऊतमु हरि नाइकु पुरखु हमारा ॥
  5. हमरी जिहबा एक प्रभ हरि के गुण अगम अथाह ॥
  6. हरि करहु क्रिपा जगजीवना गुरु सतिगुरु मेलि दइआलु ॥

तूं थान थनंतरि भरपूरु हहि करते सभ तेरी बणत बणावणी ॥

अंग 1313 से चला आ रहा अंश

तूं थान थनंतरि भरपूरु हहि करते सभ तेरी बणत बणावणी ॥
रंग परंग सिसटि सभ साजी बहु बहु बिधि भांति उपावणी ॥
सभ तेरी जोति जोती विचि वरतहि गुरमती तुधै लावणी ॥
जिन होहि दइआलु तिन सतिगुरु मेलहि मुखि गुरमुखि हरि समझावणी ॥
सभि बोलहु राम रमो स्री राम रमो जितु दालदु दुख भुख सभ लहि जावणी ॥3॥

हिन्दी अर्थ: हे करतार ! आप हरेक जगह में व्यापक हैं। संसार की सारी रचना आपका ही रची हुई है। सारी सृष्टि आपने कई रंगों में बनाई है। कई किस्मों की पैदा की है। हे करतार ! सारी सृष्टि में आपका ही नूर है। और नूर में आप खुद ही मौजूद हैं। आप स्वयं ही (जगत के जीवों को) गुरू की शिक्षा में जोड़ते हैं। जिन पर आप दयावान होते हैं। उनको आप गुरू मिलाते हैं। और। गुरू के मुँह से आप उन्हें अपना ज्ञान देते हैं। हे भाई ! आप सब सुंदर राम का नाम जपो। सुंदर राम का नाम जपो। जिसकी बरकति से सारे दुख-भूख-दरिद्रता दूर हो जाती है। 3।

हरि हरि अंम्रितु नाम रसु हरि अंम्रितु हरि उर धारि ॥

सलोक मः 4 ॥
हरि हरि अंम्रितु नाम रसु हरि अंम्रितु हरि उर धारि ॥
विचि संगति हरि प्रभु वरतदा बुझहु सबद वीचारि ॥
मनि हरि हरि नामु धिआइआ बिखु हउमै कढी मारि ॥
जिन हरि हरि नामु न चेतिओ तिन जूऐ जनमु सभु हारि ॥
गुरि तुठै हरि चेताइआ हरि नामा हरि उर धारि ॥
जन नानक ते मुख उजले तितु सचै दरबारि ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ (हे भाई !) परमात्मा का नाम आत्मिक जीवन देने वाला जल है; इस नाम-जल को इसके स्वाद को अपने हृदय में संभाले रख। (पर) गुरू के शबद के विचार से (ये बात) समझ लो (कि) परमात्मा साध-संगति में बसता है। (जिस मनुष्य ने अपने) मन में परमात्मा का नाम सिमरना शुरू कर दिया। (उसने अपने अंदर से आत्मिक मौत लाने वाले) अहंकार-जहर को मार के निकाल दिया। (हे भाई !) जिन लोगों ने परमात्मा का नाम याद नहीं किया। उन्होंने (अपना) सारा (मनुष्य-) जीवन (मानो) जूए (की खेल) में हार दिया। जिन पर गुरू ने मेहर करके हरी-नाम का सिमरन सिखाया, जिन्होंने परमात्मा का नाम अपने दिल में बसाया। हे दास नानक ! उस सदा कायम रहने वाले दरबार में वे मनुष्य सुर्ख-रू होते हैं 1।

हरि कीरति उतमु नामु है विचि कलिजुग करणी सारु ॥

मः 4 ॥
हरि कीरति उतमु नामु है विचि कलिजुग करणी सारु ॥
मति गुरमति कीरति पाईऐ हरि नामा हरि उरि हारु ॥
वडभागी जिन हरि धिआइआ तिन सउपिआ हरि भंडारु ॥
बिनु नावै जि करम कमावणे नित हउमै होइ खुआरु ॥
जलि हसती मलि नावालीऐ सिरि भी फिरि पावै छारु ॥
हरि मेलहु सतिगुरु दइआ करि मनि वसै एकंकारु ॥
जिन गुरमुखि सुणि हरि मंनिआ जन नानक तिन जैकारु ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ हे भाई ! इस विकार-ग्रसित जगत में परमात्मा का नाम जपना। परमात्मा की सिफत सालाह करनी ही सबसे श्रेष्ठ करने-योग्य काम है। पर गुरू की मति पर चलने से ही यह सिफत सालाह मिलती है यह हरी-नाम हृदय में (परोए रखने के लिए) हार मिलता है। हे भाई ! बड़े भाग्यशाली हैं वे मनुष्य जिन्होंने परमात्मा का नाम सिमरा है। (गुरू ने) उनको हरी-नाम खजाना सौंप दिया है। हे भाई ! परमात्मा का नाम छोड़ के जो और-और (निहित धार्मिक) कर्म किए जाते हैं (उनके कारण पैदा हुए) अहंकार में (फस के मनुष्य) सदा दुखी होता रहता है। (देखो) हाथी को पानी में मल-मल के नहलाया जाता है। फिर भी वह (अपने) सिर पर राख (ही) डाल लेता है। हे प्रभू ! मेहर करके (जीवों को) गुरू से मिला। (हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू मिल जाता है। उसके) मन में परमात्मा आ बसता है। हे दास नानक ! (कह- हे भाई !) जिन मनुष्यों ने गुरू की शरण पड़ कर प्रभू का नाम सुन कर (उसके साथ) गहरी सांझ डाली है उनको हर वक्त (लोक-परलोक में) शोभा मिलती है। 2।

राम नामु वखरु है ऊतमु हरि नाइकु पुरखु हमारा ॥

पउड़ी ॥
राम नामु वखरु है ऊतमु हरि नाइकु पुरखु हमारा ॥
हरि खेलु कीआ हरि आपे वरतै सभु जगतु कीआ वणजारा ॥
सभ जोति तेरी जोती विचि करते सभु सचु तेरा पासारा ॥
सभि धिआवहि तुधु सफल से गावहि गुरमती हरि निरंकारा ॥
सभि चवहु मुखहु जगंनाथु जगंनाथु जगजीवनो जितु भवजल पारि उतारा ॥4॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (यह जगत-खेल में) परमात्मा का नाम (खरीदने के लिए सबसे) बढ़िया सौदा है। परमात्मा स्वयं हम बणजारों का सरदार है। हे भाई ! (जगत का यह) खेल परमात्मा ने खुद बनाया है। (और इसमें) परमात्मा स्वयं ही (हर जगह) मौजूद है। सारा जगत (हरेक जीव इस सौदे का) व्यापार करने वाला है। हे करतार ! यह सारा आपका (बनाया हुआ जगत-) पसारा सचमुच अस्तित्व वाला है। इसमें हर जगह आपका ही नूर है। और उस नूर में आप स्वयं ही हैं। हे निरंकार ! सारे जीव आपका ही ध्यान धरते हैं। जो गुरू की शिक्षा पर चल के (आपकी सिफत-सालाह के गीत) गाते हैं वे मानस-जीवन का मनोरथ हासिल कर लेते हैं। हे भाई ! वह परमात्मा ही जगत का खसम है जगत का नाथ है जगत की जिंदगी (का सहारा) है सारे (अपने) मुँह से (उसका नाम) बोलो। उस (का नाम उचारने) से संसार-समुंद्र से पार लांघा जाया जाता है। 4।

हमरी जिहबा एक प्रभ हरि के गुण अगम अथाह ॥

सलोक मः 4 ॥
हमरी जिहबा एक प्रभ हरि के गुण अगम अथाह ॥
हम किउ करि जपह इआणिआ हरि तुम वड अगम अगाह ॥
हरि देहु प्रभू मति ऊतमा गुर सतिगुर कै पगि पाह ॥
सतसंगति हरि मेलि प्रभ हम पापी संगि तराह ॥
जन नानक कउ हरि बखसि लैहु हरि तुठै मेलि मिलाह ॥
हरि किरपा करि सुणि बेनती हम पापी किरम तराह ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ हे प्रभू ! हे हरी ! हम जीवों की (सिर्फ) एक जीभ है। पर आपके गुण बेअंत हैं (एक ऐसा समुंद्र है) जिसकी थाह नहीं पाई जा सकती। हे प्रभू ! आप बहुत अपहुँच हैं और गहरे हैं हम अंजान जीव आपको कैसे जप सकते हैं। हे हरी ! हमें कोई श्रेष्ठ बुद्धि बख्शें जिसके सदका हम गुरू के चरणों पर गिर जाएं। हे प्रभू ! हे हरी ! हमें साध-संगति मिलाएँ कि (सत्संगियों की) संगति में हम पापी (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाएं। हे हरी ! (अपने) दास नानक पर मेहर करें। अगर आप मेहर करें तो ही हम आपके चरणों में मिल सकते हैं। हे हरी ! कृपा करें। (हमारी) विनती सुनें। हम पापी हम कीड़े (इस संसार-समुंद्र से) पार लांघ सकें। 1।

हरि करहु क्रिपा जगजीवना गुरु सतिगुरु मेलि दइआलु ॥

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मः 4 ॥
हरि करहु क्रिपा जगजीवना गुरु सतिगुरु मेलि दइआलु ॥
गुर सेवा हरि हम भाईआ हरि होआ हरि किरपालु ॥

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ हे जगत के जिंदगी के आसरे हरी ! मेहर कर (हमें) दया का श्रोत गुरू मिला। हे भाई ! जब हरी स्वयं (हम पर) दयावान हुआ। तब गुरू की (बताई हुई) सेवा हमें अच्छी लगने लगी।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1314 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।