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अंग 1312

अंग
1312
राग कान्हड़ा
राग: कान्हड़ा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
कानड़ा छंत महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
से उधरे जिन राम धिआए ॥
जतन माइआ के कामि न आए ॥
राम धिआए सभि फल पाए धनि धंनि ते बडभागीआ ॥
सतसंगि जागे नामि लागे एक सिउ लिव लागीआ ॥
तजि मान मोह बिकार साधू लगि तरउ तिन कै पाए ॥
बिनवंति नानक सरणि सुआमी बडभागि दरसनु पाए ॥1॥
मिलि साधू नित भजह नाराइण ॥
रसकि रसकि सुआमी गुण गाइण ॥
गुण गाइ जीवह हरि अमिउ पीवह जनम मरणा भागए ॥
सतसंगि पाईऐ हरि धिआईऐ बहुड़ि दूखु न लागए ॥
करि दइआ दाते पुरख बिधाते संत सेव कमाइण ॥
बिनवंति नानक जन धूरि बांछहि हरि दरसि सहजि समाइण ॥2॥
सगले जंत भजहु गोपालै ॥
जप तप संजम पूरन घालै ॥
नित भजहु सुआमी अंतरजामी सफल जनमु सबाइआ ॥
गोबिदु गाईऐ नित धिआईऐ परवाणु सोई आइआ ॥
जप ताप संजम हरि हरि निरंजन गोबिंद धनु संगि चालै ॥
बिनवंति नानक करि दइआ दीजै हरि रतनु बाधउ पालै ॥3॥
मंगलचार चोज आनंदा ॥
करि किरपा मिले परमानंदा ॥
प्रभ मिले सुआमी सुखहगामी इछ मन की पुंनीआ ॥
बजी बधाई सहजे समाई बहुड़ि दूखि न रुंनीआ ॥
ले कंठि लाए सुख दिखाए बिकार बिनसे मंदा ॥
बिनवंति नानक मिले सुआमी पुरख परमानंदा ॥4॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: कानड़ा छंत महला 5 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! जिन मनुष्यों ने परमात्मा का नाम सिमरा। वे (विकारों की मार से) बच गए (आखिरी वक्त भी हरी-नाम ही उनका साथी बना)। माया (इकट्ठी करने) के यतन (तो) किसी के काम नहीं आते (माया यहीं ही धरी रह जाती है)। हे भाई ! जिन्होंने प्रभू का नाम सिमरा। उन्होंने (मनुष्य जीवन के) सारे फल प्राप्त कर लिए। वे मनुष्य भाग्यशाली होते हैं। वे मनुष्य शोभा कमा के जाते हैं। वे मनुष्य साध-संगति में टिक के (माया के हमलों से) सचेत रहे। वह हरी नाम में जुड़े रहे। उनकी (सदा) एक परमात्मा के साथ सुरति जुड़ी रही। हे मेरे मालिक प्रभू ! (जो मनुष्य अपने अंदर से) माण मोह विकार त्याग के ऊँचे आचरण वाले बन जाते हैं। उनके चरणों में लग के मैं (भी संसार-समुंद्र से) पार लांघ सकूँ। नानक विनती करता है- (मुझे उनकी) शरण में (रख)। बड़ी किस्मत से (ऐसे साधु जनों के) दर्शन प्राप्त होते हैं। 1। हे भाई ! आएँ। संत जनों को मिल के सदा परमात्मा का भजन किया करें। और पूरे आनंद से मालिक-प्रभू के गुण गाया करें। हे भाई ! प्रभू के गुण गा-गा के आत्मिक-जीवन देने वाला नाम-जल हम पीते रहें और आत्मिक जीवन हासिल करें। (हरी-नाम-जल की बरकति से) जनम-मरण के चक्कर समाप्त हो जाते हैं। हे भाई ! (संत-जनों की संगति में) परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए। सत्संग में (ही) परमात्मा मिलता है। और पुनः कोई दुख छू नहीं सकता। हे दातार ! हे सर्व-व्यापक सृजनहार ! (मेरे पर) मेहर कर। संत जनों की सेवा करने का अवसर दे। नानक विनती करता है (जो मनुष्य) संत जनों के चरणों की धूड़ माँगते हैं वे परमात्मा के दर्शन में आत्मिक अडोलता में लीनता हासिल कर लेते हैं। 2। हे सारे प्राणियो ! सृष्टि के पालनहार प्रभू का भजन किया करो। (यह भजन ही) जप-तप-संजम आदि सारी मेहनत है। हे प्राणियो ! सदा अंतरजामी मालिक प्रभू का भजन किया करो (भजन की बरकति से) सारा ही जीवन कामयाब हो जाता है। हे प्राणियो ! गोबिंद की सिफतसालाह करनी चाहिए। सदा सिमरन करना चाहिए। (जो सिमरन-भजन करता है) वही जगत में पैदा हुआ कबूल समझो। हे प्राणियो। माया-रहत हरी का सिमरन ही जप-तप-संजम (आदि उद्यम) है। परमात्मा का (नाम-) धन ही (मनुष्य के) साथ जाता है। नानक विनती करता है (हे प्रभू।) मेहर करके (मुझे अपना) नाम-रतन दे, मैं (अपने) पल्ले बाँध लूँ। 3। (उसके हृदय में) आत्मिक आनंद खुशियाँ पैदा हो जाती हैं। हे भाई ! सबसे ऊँचे आनंद के मालिक प्रभू जी मेहर करके (जिस जीव-स्त्री को) मिल जाते हैं। हे भाई ! सुख देने वाले मालिक-प्रभू जी (जिस जीव-स्त्री को) मिल जाते हैं। (उसके) मन की (हरेक) इच्छा पूरी हो जाती है। उसके चित्त में उल्लास सा बना रहता है। वह आत्मिक अडोलता में टिकी रहती है। वह फिर कभी किसी दुख के कारण घबराती नहीं। जिसको गले से लगा लेते हैं। उसको (सारे) सुख दिखाते हैं। उसके अंदर से सारे विकार सारी बुराईयाँ नाश हो जाती हैं। नानक विनती करता है- हे भाई ! सबसे ऊँचे आनंद के मालिक प्रभू जी (जिस जीव-स्त्री को) मिल जाते हैं। 4। 1।
कानड़े की वार महला 4 मूसे की वार की धुनी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक मः 4 ॥
राम नामु निधानु हरि गुरमति रखु उर धारि ॥
दासन दासा होइ रहु हउमै बिखिआ मारि ॥
जनमु पदारथु जीतिआ कदे न आवै हारि ॥
धनु धनु वडभागी नानका जिन गुरमति हरि रसु सारि ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: कानड़े की वार महला 4 मूसे की वार की धुनी सतिगुर प्रसादि श्लोक महला 4॥ (हे भाई !) परमात्मा का नाम (असल) खजाना (है) सतिगुरू की शिक्षा पर चल कर (इसको अपने) हृदय में परोए रख। (इस नाम की बरकति से) अहंकार (-रूप) माया (के प्रभाव) को (अपने अंदर से) खत्म कर के (परमात्मा के) सेवकों का सेवक बना रह। (जो मनुष्य यह उद्यम करता है। वह) मानस-जनम का कीमती मनोरथ हासिल करके (जगत से मनुष्य-जीवन की बाज़ी) हार के कभी नहीं आता। हे नानक ! धन्य है वे भाग्यशाली मनुष्य। जिन्होंने सतिगुरू की शिक्षा पर चल कर परमात्मा के नाम का स्वाद चखा है। 1।
मः 4 ॥
गोविंदु गोविदु गोविदु हरि गोविदु गुणी निधानु ॥
गोविदु गोविदु गुरमति धिआईऐ तां दरगह पाईऐ मानु ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ (हे भाई !) सिर्फ परमात्मा ही सारे गुणों का खजाना है। जब गुरू की शिक्षा पर चल कर परमात्मा को सिमरा जाए तो परमात्मा की हजूरी में आदर मिलता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “कानड़ा छंत महला 5 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! जिन मनुष्यों ने परमात्मा का नाम सिमरा।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।