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अंग 1307

अंग
1307
राग कान्हड़ा
राग: कान्हड़ा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
कानड़ा महला 5 घरु 10
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ऐसो दानु देहु जी संतहु जात जीउ बलिहारि ॥
मान मोही पंच दोही उरझि निकटि बसिओ ताकी सरनि साधूआ दूत संगु निवारि ॥1॥ रहाउ ॥
कोटि जनम जोनि भ्रमिओ हारि परिओ दुआरि ॥1॥
किरपा गोबिंद भई मिलिओ नामु अधारु ॥
दुलभ जनमु सफलु नानक भव उतारि पारि ॥2॥1॥45॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! गुरू के प्रताप से (मनुष्य के अंदर से माया का) मोह दूर हो जाता है। सारे डर मिट जाते हैं। भटकना समाप्त हो जाती है। 2। 5। 44। कानड़ा महला 5 घरु 10 सतिगुर प्रसादि॥ हे संत जनों ! मुझे इस तरह का दान दो (जो पाँचों कामादिक वैरियों से बचा के रखे। मेरी) जिंद (नाम की दाति से) सदके जाती है। (ये जिंद) अहंकार में मस्त रहती है। (कामादिक) पाँच (चोरों के हाथों) ठॅगी जाती है। (उन कामादिकों में ही) फंस के (उनके ही) नजदीक टिकी रहती है। मैंने (इनसे बचने के लिए) संत जनों की शरण ताकी है। (हे संत जनो ! मेरा इन कामादिक) वैरियों वाला साथ दूर करो। 1। रहाउ। हे संत जनों ! (कामादिक पाँचों वैरियों के प्रभाव तले रह के मनुष्य की जिंद) करोड़ों जन्मों-जूनियों में भटकती रहती है। (हे संत जनो !) मैं और आसरे छोड़ के आपके द्वारे आया हूँ। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य पर परमात्मा की मेहर होती है। उसको (कामादिक वैरियों का मुकाबला करने के लिए परमात्मा का) नाम-आसरा मिल जाता है।
कानड़ा महला 5 घरु 11
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सहज सुभाए आपन आए ॥
कछू न जानौ कछू दिखाए ॥
प्रभु मिलिओ सुख बाले भोले ॥1॥ रहाउ ॥
संजोगि मिलाए साध संगाए ॥
कतहू न जाए घरहि बसाए ॥
गुन निधानु प्रगटिओ इह चोलै ॥1॥
चरन लुभाए आन तजाए ॥
थान थनाए सरब समाए ॥
रसकि रसकि नानकु गुन बोलै ॥2॥1॥46॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: उसका ये दुर्लभ (मानस) जनम सफल हो जाता है। हे नानक ! (प्रभू चरणों में अरदास करके कह- हे प्रभू ! मुझे अपने नाम का आसरा दे के) संसार-समुंद्र से पार लंघा ले। 2। 1। 45। कानड़ा महला 5 घरु 11 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! (किसी) आत्मिक अडोलता वाले प्यार की प्रेरणा से (प्रभू जी) अपने आप ही (मुझे) आ मिले हैं। मैं तो ना-कुछ जानता-बूझता हूँ। ना मैं कोई अच्छी करणी दिखा सका हूँ। मुझे भोले बालक को। सुखों का मालिक प्रभू (स्वयं ही) आ मिला है। 1। रहाउ। हे भाई ! (किसी बीते हुए वक्त के) संजोग ने (मुझे) साध-संगति में मिला दिया। (अब मेरा मन) किसी भी और तरफ नहीं जाता। (हृदय-) घर में ही टिका रहता है। (मेरे इस शरीर में गुणों का खजाना प्रभू प्रकट हो गया है)। 1। हे भाई ! (प्रभू के) चरणों ने (मुझे अपनी ओर) आकर्षित कर लिया है। मुझसे अन्य सारे मोह-प्यार छुड़वा लिए हैं। (अब मुझे ऐसा दिखाई देता है कि वह प्रभू) हरेक जगह में सब में बस रहा है।
कानड़ा महला 5 ॥
गोबिंद ठाकुर मिलन दुराइंी ॥
परमिति रूपु अगंम अगोचर रहिओ सरब समाई ॥1॥ रहाउ ॥
कहनि भवनि नाही पाइओ पाइओ अनिक उकति चतुराई ॥1॥
जतन जतन अनिक उपाव रे तउ मिलिओ जउ किरपाई ॥
प्रभू दइआर क्रिपार क्रिपा निधि जन नानक संत रेनाई ॥2॥2॥47॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: (अब उसका दास) नानक बड़े आनंद से उसके गुण उचारता रहता है। 2। 1। 46। कानड़ा महला 5॥ हे भाई ! गोबिंद को ठाकुर को मिलना बहुत मुश्किल है। वह परमात्मा (वैसे तो) सबमें समाया हुआ है (पर) उसका स्वरूप अंदाजे से परे है। वह अपहुँच है। उस तक ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच नहीं हो सकती। 1। रहाउ। हे भाई ! (निरी ज्ञान की) बातें करने से। (तीर्थ आदि पर) भ्रमण से परमात्मा नहीं मिलता। अनेकों युक्तियों और चतुराईयों से भी नहीं मिलता। 1। हे भाई ! अनेकों यतन और अनेकों तरीकों से भी परमात्मा नहीं मिलता। वह तब ही मिलता है जब उसकी अपनी कृपा होती है।
कानड़ा महला 5 ॥
माई सिमरत राम राम राम ॥
प्रभ बिना नाही होरु ॥
चितवउ चरनारबिंद सासन निसि भोर ॥1॥ रहाउ ॥
लाइ प्रीति कीन आपन तूटत नही जोरु ॥
प्रान मनु धनु सरबसोु हरि गुन निधे सुख मोर ॥1॥
ईत ऊत राम पूरनु निरखत रिद खोरि ॥
संत सरन तरन नानक बिनसिओ दुखु घोर ॥2॥3॥48॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे दास नानक ! दयाल। कृपाल। कृपा के खजाना प्रभू संत जनों की चरण-धूल में रहने से मिलता है। 2। 2। 47। कानड़ा महला 5॥ हे माँ ! उसका नाम हर वक्त सिमरता प्रभू के बिना (मेरा) और कोई (आसरा) नहीं। मैं दिन-रात हरेक सांस के साथ उसके सुंदर चरणों का ध्यान धरता रहता हूँ। 1। रहाउ। हे माँ ! (उस परमात्मा के साथ) प्यार डाल के (मैंने उसको) अपना बना लिया है (अब यह) प्रीति की गाँठ टूटेगी नहीं। मेरे लिए गुणों का खजाना हरी ही सुख है। जिंद है। मन है। धन है। मेरा सब कुछ वही है। 1। हे नानक ! यहाँ-वहाँ हर जगह परमात्मा ही व्यापक है। मैं उसको अपने हृदय के गुप्त स्थान में (बैठा) देख रहा हूँ।
कानड़ा महला 5 ॥
जन को प्रभु संगे असनेहु ॥
साजनो तू मीतु मेरा ग्रिहि तेरै सभु केहु ॥1॥ रहाउ ॥
मानु मांगउ तानु मांगउ धनु लखमी सुत देह ॥1॥
मुकति जुगति भुगति पूरन परमानंद परम निधान ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (जीवों को पार लंघाने के लिए वह) जहाज़ है। संतों की शरण में (जिन्हें मिल जाती है। उनका) सारा बड़े से बड़ा दुख भी नाश हो जाता है। 2। 3। 48। कानड़ा महला 5॥ हे प्रभू ! आप अपने सेवक के सिर पर रखवाला है। (आपके सेवक का आपके) साथ प्यार (बना रहता है)। हे प्रभू ! आप (ही) मेरा सज्जन है। आप (ही) मेरा मित्र है। आपके घर में हरेक पदार्थ है। 1। रहाउ। हे प्रभू ! मैं (आपके दर से) इज्जत माँगता हूँ। (आपका) आसरा माँगता हूँ। धन-पदार्थ माँगता हूं। पुत्र माँगता हूं। शारीरिक आरोग्यता माँगता हूँ। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! गुरू के प्रताप से (मनुष्य के अंदर से माया का) मोह दूर हो जाता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।