ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ऐसो दानु देहु जी संतहु जात जीउ बलिहारि ॥
मान मोही पंच दोही उरझि निकटि बसिओ ताकी सरनि साधूआ दूत संगु निवारि ॥1॥ रहाउ ॥
कोटि जनम जोनि भ्रमिओ हारि परिओ दुआरि ॥1॥
किरपा गोबिंद भई मिलिओ नामु अधारु ॥
दुलभ जनमु सफलु नानक भव उतारि पारि ॥2॥1॥45॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सहज सुभाए आपन आए ॥
कछू न जानौ कछू दिखाए ॥
प्रभु मिलिओ सुख बाले भोले ॥1॥ रहाउ ॥
संजोगि मिलाए साध संगाए ॥
कतहू न जाए घरहि बसाए ॥
गुन निधानु प्रगटिओ इह चोलै ॥1॥
चरन लुभाए आन तजाए ॥
थान थनाए सरब समाए ॥
रसकि रसकि नानकु गुन बोलै ॥2॥1॥46॥
गोबिंद ठाकुर मिलन दुराइंी ॥
परमिति रूपु अगंम अगोचर रहिओ सरब समाई ॥1॥ रहाउ ॥
कहनि भवनि नाही पाइओ पाइओ अनिक उकति चतुराई ॥1॥
जतन जतन अनिक उपाव रे तउ मिलिओ जउ किरपाई ॥
प्रभू दइआर क्रिपार क्रिपा निधि जन नानक संत रेनाई ॥2॥2॥47॥
माई सिमरत राम राम राम ॥
प्रभ बिना नाही होरु ॥
चितवउ चरनारबिंद सासन निसि भोर ॥1॥ रहाउ ॥
लाइ प्रीति कीन आपन तूटत नही जोरु ॥
प्रान मनु धनु सरबसोु हरि गुन निधे सुख मोर ॥1॥
ईत ऊत राम पूरनु निरखत रिद खोरि ॥
संत सरन तरन नानक बिनसिओ दुखु घोर ॥2॥3॥48॥
जन को प्रभु संगे असनेहु ॥
साजनो तू मीतु मेरा ग्रिहि तेरै सभु केहु ॥1॥ रहाउ ॥
मानु मांगउ तानु मांगउ धनु लखमी सुत देह ॥1॥
मुकति जुगति भुगति पूरन परमानंद परम निधान ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! गुरू के प्रताप से (मनुष्य के अंदर से माया का) मोह दूर हो जाता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।