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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1307 · कानड़ा

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अंग
1307
कानड़ा
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  1. ऐसो दानु देहु जी संतहु जात जीउ बलिहारि ॥
  2. सहज सुभाए आपन आए ॥
  3. गोबिंद ठाकुर मिलन दुराइंी ॥
  4. माई सिमरत राम राम राम ॥
  5. जन को प्रभु संगे असनेहु ॥

ऐसो दानु देहु जी संतहु जात जीउ बलिहारि ॥

कानड़ा महला 5 घरु 10
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ऐसो दानु देहु जी संतहु जात जीउ बलिहारि ॥
मान मोही पंच दोही उरझि निकटि बसिओ ताकी सरनि साधूआ दूत संगु निवारि ॥1॥ रहाउ ॥
कोटि जनम जोनि भ्रमिओ हारि परिओ दुआरि ॥1॥
किरपा गोबिंद भई मिलिओ नामु अधारु ॥
दुलभ जनमु सफलु नानक भव उतारि पारि ॥2॥1॥45॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 घरु 10 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे संत जनों ! मुझे इस तरह का दान दो (जो पाँचों कामादिक वैरियों से बचा के रखे। मेरी) जिंद (नाम की दाति से) सदके जाती है। (ये जिंद) अहंकार में मस्त रहती है। (कामादिक) पाँच (चोरों के हाथों) ठॅगी जाती है। (उन कामादिकों में ही) फंस के (उनके ही) नजदीक टिकी रहती है। मैंने (इनसे बचने के लिए) संत जनों की शरण ताकी है। (हे संत जनो ! मेरा इन कामादिक) वैरियों वाला साथ दूर करो। 1। रहाउ। हे संत जनों ! (कामादिक पाँचों वैरियों के प्रभाव तले रह के मनुष्य की जिंद) करोड़ों जन्मों-जूनियों में भटकती रहती है। (हे संत जनो !) मैं और आसरे छोड़ के आपके द्वारे आया हूँ। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य पर परमात्मा की मेहर होती है। उसको (कामादिक वैरियों का मुकाबला करने के लिए परमात्मा का) नाम-आसरा मिल जाता है। उसका ये दुर्लभ (मानस) जनम सफल हो जाता है। हे नानक ! (प्रभू चरणों में अरदास करके कह- हे प्रभू ! मुझे अपने नाम का आसरा दे के) संसार-समुंद्र से पार लंघा ले। 2। 1। 45।

सहज सुभाए आपन आए ॥

कानड़ा महला 5 घरु 11
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सहज सुभाए आपन आए ॥
कछू न जानौ कछू दिखाए ॥
प्रभु मिलिओ सुख बाले भोले ॥1॥ रहाउ ॥
संजोगि मिलाए साध संगाए ॥
कतहू न जाए घरहि बसाए ॥
गुन निधानु प्रगटिओ इह चोलै ॥1॥
चरन लुभाए आन तजाए ॥
थान थनाए सरब समाए ॥
रसकि रसकि नानकु गुन बोलै ॥2॥1॥46॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 घरु 11 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! (किसी) आत्मिक अडोलता वाले प्यार की प्रेरणा से (प्रभू जी) अपने आप ही (मुझे) आ मिले हैं। मैं तो ना-कुछ जानता-बूझता हूँ। ना मैं कोई अच्छी करणी दिखा सका हूँ। मुझे भोले बालक को। सुखों का मालिक प्रभू (स्वयं ही) आ मिला है। 1। रहाउ। हे भाई ! (किसी बीते हुए वक्त के) संजोग ने (मुझे) साध-संगति में मिला दिया। (अब मेरा मन) किसी भी और तरफ नहीं जाता। (हृदय-) घर में ही टिका रहता है। (मेरे इस शरीर में गुणों का खजाना प्रभू प्रकट हो गया है)। 1। हे भाई ! (प्रभू के) चरणों ने (मुझे अपनी ओर) आकर्षित कर लिया है। मुझसे अन्य सारे मोह-प्यार छुड़वा लिए हैं। (अब मुझे ऐसा दिखाई देता है कि वह प्रभू) हरेक जगह में सब में बस रहा है। (अब उसका दास) नानक बड़े आनंद से उसके गुण उचारता रहता है। 2। 1। 46।

गोबिंद ठाकुर मिलन दुराइंी ॥

कानड़ा महला 5 ॥
गोबिंद ठाकुर मिलन दुराइंी ॥
परमिति रूपु अगंम अगोचर रहिओ सरब समाई ॥1॥ रहाउ ॥
कहनि भवनि नाही पाइओ पाइओ अनिक उकति चतुराई ॥1॥
जतन जतन अनिक उपाव रे तउ मिलिओ जउ किरपाई ॥
प्रभू दइआर क्रिपार क्रिपा निधि जन नानक संत रेनाई ॥2॥2॥47॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5॥ हे भाई ! गोबिंद को ठाकुर को मिलना बहुत मुश्किल है। वह परमात्मा (वैसे तो) सबमें समाया हुआ है (पर) उसका स्वरूप अंदाजे से परे है। वह अपहुँच है। उस तक ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच नहीं हो सकती। 1। रहाउ। हे भाई ! (निरी ज्ञान की) बातें करने से। (तीर्थ आदि पर) भ्रमण से परमात्मा नहीं मिलता। अनेकों युक्तियों और चतुराईयों से भी नहीं मिलता। 1। हे भाई ! अनेकों यतन और अनेकों तरीकों से भी परमात्मा नहीं मिलता। वह तब ही मिलता है जब उसकी अपनी कृपा होती है। हे दास नानक ! दयाल, कृपाल। कृपा के खजाना प्रभू संत जनों की चरण-धूल में रहने से मिलता है। 2। 2। 47।

माई सिमरत राम राम राम ॥

कानड़ा महला 5 ॥
माई सिमरत राम राम राम ॥
प्रभ बिना नाही होरु ॥
चितवउ चरनारबिंद सासन निसि भोर ॥1॥ रहाउ ॥
लाइ प्रीति कीन आपन तूटत नही जोरु ॥
प्रान मनु धनु सरबसोु हरि गुन निधे सुख मोर ॥1॥
ईत ऊत राम पूरनु निरखत रिद खोरि ॥
संत सरन तरन नानक बिनसिओ दुखु घोर ॥2॥3॥48॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5॥ हे माँ ! उसका नाम हर वक्त सिमरता प्रभू के बिना (मेरा) और कोई (आसरा) नहीं। मैं दिन-रात हरेक सांस के साथ उसके सुंदर चरणों का ध्यान धरता रहता हूँ। 1। रहाउ। हे माँ ! (उस परमात्मा के साथ) प्यार डाल के (मैंने उसको) अपना बना लिया है (अब यह) प्रीति की गाँठ टूटेगी नहीं। मेरे लिए गुणों का खजाना हरी ही सुख है। जिंद है। मन है। धन है। मेरा सब कुछ वही है। 1। हे नानक ! यहाँ-वहाँ हर जगह परमात्मा ही व्यापक है। मैं उसको अपने हृदय के गुप्त स्थान में (बैठा) देख रहा हूँ। (जीवों को पार लंघाने के लिए वह) जहाज़ है। संतों की शरण में (जिन्हें मिल जाती है। उनका) सारा बड़े से बड़ा दुख भी नाश हो जाता है। 2। 3। 48।

जन को प्रभु संगे असनेहु ॥

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कानड़ा महला 5 ॥
जन को प्रभु संगे असनेहु ॥
साजनो तू मीतु मेरा ग्रिहि तेरै सभु केहु ॥1॥ रहाउ ॥
मानु मांगउ तानु मांगउ धनु लखमी सुत देह ॥1॥
मुकति जुगति भुगति पूरन परमानंद परम निधान ॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5॥ हे प्रभू ! आप अपने सेवक के सिर पर रखवाले हैं। (आपके सेवक का आपके) साथ प्यार (बना रहता है)। हे प्रभू ! आप (ही) मेरे सज्जन हैं। आप (ही) मेरे मित्र हैं। आपके घर में हरेक पदार्थ है। 1। रहाउ। हे प्रभू ! मैं (आपके दर से) इज्जत माँगता हूँ। (आपका) आसरा माँगता हूँ। धन-पदार्थ माँगता हूं। पुत्र माँगता हूं। शारीरिक आरोग्यता माँगता हूँ। 1। हे प्रभू ! आप ही विकारों से खलासी देने वाले हैं। आप ही जीवन-युक्ति सिखाते हैं। आप ही भोजन देने वाले हैं। आप ही सबसे ऊँचे आनंद और सुखों का खजाना हैं।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1307 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।