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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1306 · कानड़ा

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अंग
1306
कानड़ा
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  1. तटन खटन जटन होमन नाही डंडधार सुआउ ॥1॥
  2. पतित पावनु भगति बछलु भै हरन तारन तरन ॥1॥ रहाउ ॥
  3. चरन सरन दइआल ठाकुर आन नाही जाइ ॥
  4. वारि वारउ अनिक डारउ ॥
  5. अहं तोरो मुखु जोरो ॥
  6. तां ते जापि मना हरि जापि ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग कानड़ा

तटन खटन जटन होमन नाही डंडधार सुआउ ॥1॥

अंग 1305 से चला आ रहा अंश

तटन खटन जटन होमन नाही डंडधार सुआउ ॥1॥
जतन भांतन तपन भ्रमन अनिक कथन कथते नही थाह पाई ठाउ ॥
सोधि सगर सोधना सुखु नानका भजु नाउ ॥2॥2॥39॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! तीर्थों के स्नान। ब्राहमणों वाले छह कर्मों का रोजाना अभ्यास। जटाएं धारण करनी। हवन-यज्ञ करने। डंडा-धारी जोगी बनना - (मेरा इन कामों से कोई) वास्ता नहीं। 1। हे भाई ! (धूणियां आदि तपा के) तप करने। धरती का भ्रमण करते रहना- इस तरह के अनेकों किस्मों के यतन करने से। अनेकों व्याख्यान करने से (परमात्मा के गुणों की) गहराई को नहीं पाया जा सकता। (सुख-शांति की अथाह सीमा को) नहीं आँका जा सकता। हे नानक ! सारे विचार विचार के (यही बात स्पष्ट हुई है कि) परमात्मा का नाम सिमरा करें (इसी में ही) आनंद है। 2। 2। 39।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग कानड़ा

पतित पावनु भगति बछलु भै हरन तारन तरन ॥1॥ रहाउ ॥

कानड़ा महला 5 घरु 9
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पतित पावनु भगति बछलु भै हरन तारन तरन ॥1॥ रहाउ ॥
नैन तिपते दरसु पेखि जसु तोखि सुनत करन ॥1॥
प्रान नाथ अनाथ दाते दीन गोबिद सरन ॥
आस पूरन दुख बिनासन गही ओट नानक हरि चरन ॥2॥1॥40॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 घरु 9 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे प्रभू ! आप विकारियों को पवित्र करने वाले हैं। आप भगती-भाव से प्यार करने वाले हैं। आप (जीवों के सारे) डर दूर करने वाले हैं। आप (जीवन को संसार-समुंद्र से) पार लंघाने के लिए जहाज हैं। 1। रहाउ। हे प्रभू ! आपके दर्शन करके (मेरी) आँखें तृप्त हो जाती हैं। मेरे कान आपका यश सुन के ठंडक हासिल करते हैं। 1। हे (जीवों के) प्राणों के नाथ ! हे अनाथों के दाते ! हे दीनों के दाते ! हे गोबिंद ! मैं आपकी शरण आया हूँ। हे नानक ! (कहें-) हे हरी ! हे (सब जीवों की) आशाएं पूरी करने वाले ! हे (सबके) दुख नाश करने वाले ! मैंने आपके चरणों की ओट ली है। 2। 1। 40।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग कानड़ा

चरन सरन दइआल ठाकुर आन नाही जाइ ॥

कानड़ा महला 5 ॥
चरन सरन दइआल ठाकुर आन नाही जाइ ॥
पतित पावन बिरदु सुआमी उधरते हरि धिआइ ॥1॥ रहाउ ॥
सैसार गार बिकार सागर पतित मोह मान अंध ॥
बिकल माइआ संगि धंध ॥
करु गहे प्रभ आपि काढहु राखि लेहु गोबिंद राइ ॥1॥
अनाथ नाथ सनाथ संतन कोटि पाप बिनास ॥
मनि दरसनै की पिआस ॥
प्रभ पूरन गुनतास ॥
क्रिपाल दइआल गुपाल नानक हरि रसना गुन गाइ ॥2॥2॥41॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5॥ हे दया-के-घर ठाकुर प्रभू ! मैं आपके चरणों की शरण आया हूँ। (दुनिया के विकारों से बचने के लिए) आपके बिना और कोई जगह नहीं। हे स्वामी ! विकारियों को पवित्र करना आपका आदिकाल से चला आता हुआ स्वभाव है। हे हरी ! आपका नाम सिमर-सिमर के (अनेकों जीव संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। 1। रहाउ। हे प्रभू पातशाह ! जगत विकारों की दलदल है, विकारों का समुंद्र है। माया के मोह और गुमान से अंधे हुए जीव (इसमें) गिरे रहते हैं। माया के झमेलों से व्याकुल हुए रहते हैं। हे प्रभू ! (इनका) हाथ पकड़ के आप खुद (इनको इस कीचड़ में से) निकालें। आप स्वयं (इनकी) रक्षा करें। 1। हे अनाथों के नाथ ! हे संतों के सहारे ! हे (जीवों के) करोड़ों पाप नाश करने वाले ! (मेरे) मन में (आपके) दर्शनों की तमन्ना है। हे पूरन प्रभू ! हे गुणों के खजाने ! हे कृपालु ! हे दयालु ! हे गोपाल ! हे हरी ! (मेहर करें) नानक की जीभ (आपके) गुण गाती रहे। 2। 2। 41।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग कानड़ा

वारि वारउ अनिक डारउ ॥

कानड़ा महला 5 ॥
वारि वारउ अनिक डारउ ॥
सुखु प्रिअ सुहाग पलक रात ॥1॥ रहाउ ॥
कनिक मंदर पाट सेज सखी मोहि नाहि इन सिउ तात ॥1॥
मुकत लाल अनिक भोग बिनु नाम नानक हात ॥
रूखो भोजनु भूमि सैन सखी प्रिअ संगि सूखि बिहात ॥2॥3॥42॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5॥ हे सखी ! (पतिव्रता स्त्री की तरह) मैं प्यारे प्रभू-पति के सुहाग की रात के पल भर के सुख पर अन्य अनेकों सुख वारती हूँ, सदके रहती हूँ। 1। रहाउ। हे सहेलिए ! सोने के महल और रेशमी कपड़ों की सेज- इनके साथ मुझे कोई लगन नहीं। 1। हे नानक ! मोती, हीरे (मायावी पदार्थों के) अनेकों भोग परमात्मा के नाम के बिना (आत्मिक) मौत (का कारण) हैं। (इसलिए) हे सहेलिए ! रूखी रोटी (खानी और) जमीन पर सोना (अच्छा है क्योंकि) प्यारे प्रभू की संगति में जिंदगी सुख में बीतती है। 2। 3। 42।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग कानड़ा

अहं तोरो मुखु जोरो ॥

कानड़ा महला 5 ॥
अहं तोरो मुखु जोरो ॥
गुरु गुरु करत मनु लोरो ॥
प्रिअ प्रीति पिआरो मोरो ॥1॥ रहाउ ॥
ग्रिहि सेज सुहावी आगनि चैना तोरो री तोरो पंच दूतन सिउ संगु तोरो ॥1॥
आइ न जाइ बसे निज आसनि ऊंध कमल बिगसोरो ॥
छुटकी हउमै सोरो ॥
गाइओ री गाइओ प्रभ नानक गुनी गहेरो ॥2॥4॥43॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5॥ हे सखी ! (साध-संगति में) मिल के बैठा करें (साध-संगति की बरकत से अपने अंदर से) अहंकार को दूर करें। हे सहेली ! गुरू को हर वक्त अपने अंदर बसाते हुए (अपने) मन को खोजा करें, (इस तरह अपने मन को) प्यारे प्रभू की प्रीति की ओर मोड़ा करें। 1। रहाउ। हे सहेली ! (साध-संगति में मन की खोज और प्रभू की प्रीति की सहायता से अपने अंदर से) (कामादिक) पाँच-वैरियों से (अपना) साथ तोड़ने का सदा यतन किया करें, (इस तरह आपके) हृदय-घर में (प्रभू-मिलाप की) सुंदर सेज बन जाएगी। आपके (हृदय के) आँगन में शांति आ टिकेगी। 1। हे नानक ! (कहें-) हे सखी ! जिस जीव-स्त्री ने गुणों के खजाने प्रभू की सिफत-सालाह के गीत गाने शुरू कर दिए, उसके अंदर से अहंकार का शोर खत्म हो गया। उसका प्रभू से विमुख हृदय-कमल (प्रभू की ओर मुख करके) खिल उठता है। वह सदा अपने आसन पर बैठी रहती है (अडोल-चित्त रहती है)। उसकी भटकना समाप्त हो जाती है। 2। 4। 43।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग कानड़ा

तां ते जापि मना हरि जापि ॥

कानड़ा मः 5 घरु 9 ॥
तां ते जापि मना हरि जापि ॥
जो संत बेद कहत पंथु गाखरो मोह मगन अहं ताप ॥ रहाउ ॥
जो राते माते संगि बपुरी माइआ मोह संताप ॥1॥
नामु जपत सोऊ जनु उधरै जिसहि उधारहु आप ॥
बिनसि जाइ मोह भै भरमा नानक संत प्रताप ॥2॥5॥44॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा मः 5 घरु 9॥ हे (मेरे) मन ! (अगर अहंकार के ताप से बचना है) तो परमात्मा का नाम जपा करें। सदा जपा करें। गुरू के वचनों का यही उपदेश है। (नाम जपे बिना जिंदगी का) रास्ता बहुत मुश्किल है (इसके बिना) मोह में डूबे रहा जाता है। अहंकार का ताप चढ़ा रहता है। रहाउ। हे मन ! जो मनुष्य बुरी माया के रंग में रँगे और मस्त रहते हैं, उनको (माया के) मोह के कारण (अनेकों) दुख-कलेश व्यापते हैं। 1। हे प्रभू ! जिस (मनुष्य) को आप स्वयं (संसार-समुंद्र से) पार लंघाते हैं, वह मनुष्य (आपका) नाम जपते हुए पार लाँघ जाता है। हे नानक ! गुरू के प्रताप से (मनुष्य के अंदर से माया का) मोह दूर हो जाता है। सारे डर मिट जाते हैं। भटकना समाप्त हो जाती है। 2। 5। 44।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1306 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।