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अंग 1306

अंग
1306
राग कान्हड़ा
राग: कान्हड़ा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तटन खटन जटन होमन नाही डंडधार सुआउ ॥1॥
जतन भांतन तपन भ्रमन अनिक कथन कथते नही थाह पाई ठाउ ॥
सोधि सगर सोधना सुखु नानका भजु नाउ ॥2॥2॥39॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! गुरू को मिल के (ही। विकारों की) मैल को जलाने की समर्था वाली प्रभू की सिफत-सालाह प्राप्त होती है। और कोई तरीका (इसकी प्राप्ति का) नहीं। 1। रहाउ। हे भाई ! तीर्थों के स्नान। ब्राहमणों वाले छह कर्मों का रोजाना अभ्यास। जटाएं धारण करनी। हवन-यज्ञ करने। डंडा-धारी जोगी बनना – (मेरा इन कामों से कोई) वास्ता नहीं। 1। हे भाई ! (धूणियां आदि तपा के) तप करने। धरती का भ्रमण करते रहना- इस तरह के अनेकों किस्मों के यतन करने से। अनेकों व्याख्यान करने से (परमात्मा के गुणों की) गहराई को नहीं पाया जा सकता। (सुख-शांति की अथाह सीमा को) नहीं आँका जा सकता।
कानड़ा महला 5 घरु 9
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पतित पावनु भगति बछलु भै हरन तारन तरन ॥1॥ रहाउ ॥
नैन तिपते दरसु पेखि जसु तोखि सुनत करन ॥1॥
प्रान नाथ अनाथ दाते दीन गोबिद सरन ॥
आस पूरन दुख बिनासन गही ओट नानक हरि चरन ॥2॥1॥40॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! सारी विचारें विचार के (यही बात स्पष्ट हुई है कि) परमात्मा का नाम सिमरा करो (इसी में ही) आनंद है। 2। 2। 39। कानड़ा महला 5 घरु 9 सतिगुर प्रसादि॥ हे प्रभू ! आप विकारियों को पवित्र करने वाला है। आप भगती-भाव से प्यार करने वाला है। आप (जीवों के सारे) डर दूर करने वाला है। आप (जीवन को संसार-समुंद्र से) पार लंघाने के लिए जहाज है। 1। हे प्रभू ! आपके दर्शन करके (मेरी) आँखें तृप्त हैं जाती हैं। मेरे कान आपका यश सुन के ठंडक हासिल करते हैं। 1। हे (जीवों के) प्राणों के नाथ ! हे अनाथों के दाते ! हे दीनों के दाते ! हे गोबिंद ! मैं आपकी शरण आया हूँ।
कानड़ा महला 5 ॥
चरन सरन दइआल ठाकुर आन नाही जाइ ॥
पतित पावन बिरदु सुआमी उधरते हरि धिआइ ॥1॥ रहाउ ॥
सैसार गार बिकार सागर पतित मोह मान अंध ॥
बिकल माइआ संगि धंध ॥
करु गहे प्रभ आपि काढहु राखि लेहु गोबिंद राइ ॥1॥
अनाथ नाथ सनाथ संतन कोटि पाप बिनास ॥
मनि दरसनै की पिआस ॥
प्रभ पूरन गुनतास ॥
क्रिपाल दइआल गुपाल नानक हरि रसना गुन गाइ ॥2॥2॥41॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह-) हे हरी ! हे (सब जीवों की) आशाएं पूरी करने वाले ! हे (सबके) दुख नाश करने वाले ! मैंने आपके चरणों की ओट ली है। 2। 1। 40। कानड़ा महला 5॥ हे दया-के-घर ठाकुर प्रभू ! (मैं आपके) चरणों की शरण (आया हूँ। दुनिया के विकारों से बचने के लिए आपके बिना) और कोई जगह नहीं। हे स्वामी ! विकारियों को पवित्र करना आपका आदि-कदीमी स्वभाव है। हे हरी ! आपका नाम सिमर-सिमर के (अनेकों जीव संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। 1। रहाउ। हे प्रभू पातशाह ! जगत विकारों की गार है। विकारों का समुंद्र है। माया के मोह और गुमान से अंधे हुए जीव (इसमें) गिरे रहते हैं। माया के झमेलों से व्याकुल हुए रहते हैं। हे प्रभू ! (इनका) हाथ पकड़ के आप खुद (इनको इस कीचड़ में से) निकाल। आप स्वयं (इनकी) रक्षा कर। 1। हे अनाथों के नाथ ! हे संतों के सहारे ! हे (जीवों के) करोड़ों पाप नाश करने वाले ! (मेरे) मन में (आपके) दर्शनों की तमन्ना है। हे पूरन प्रभू ! हे गुणों के खजाने
कानड़ा महला 5 ॥
वारि वारउ अनिक डारउ ॥
सुखु प्रिअ सुहाग पलक रात ॥1॥ रहाउ ॥
कनिक मंदर पाट सेज सखी मोहि नाहि इन सिउ तात ॥1॥
मुकत लाल अनिक भोग बिनु नाम नानक हात ॥
रूखो भोजनु भूमि सैन सखी प्रिअ संगि सूखि बिहात ॥2॥3॥42॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: ! हे कृपालु ! हे दयालु ! हे गोपाल ! हे हरी ! (मेहर कर) नानक की जीभ (आपके) गुण गाती रहे। 2। 2। 41। कानड़ा महला 5॥ हे सखी ! अनेकों (सुख) वारती हूँ। सदके रहती हूँ (पतिव्रता स्त्री की तरह) मैं प्यारे प्रभू-पति के सोहाग की रात के सुख से । 1। रहाउ। हे सहेलिए ! सोने के महल और रेशमी कपड़ों की सेज- इनके साथ मुझे कोई लगन नहीं। 1। हे नानक ! मोती। हीरे (मायावी पदार्थों के) अनेकों भोग परमात्मा के नाम के बिना (आत्मिक) मौत (का कारण) हैं।
कानड़ा महला 5 ॥
अहं तोरो मुखु जोरो ॥
गुरु गुरु करत मनु लोरो ॥
प्रिअ प्रीति पिआरो मोरो ॥1॥ रहाउ ॥
ग्रिहि सेज सुहावी आगनि चैना तोरो री तोरो पंच दूतन सिउ संगु तोरो ॥1॥
आइ न जाइ बसे निज आसनि ऊंध कमल बिगसोरो ॥
छुटकी हउमै सोरो ॥
गाइओ री गाइओ प्रभ नानक गुनी गहेरो ॥2॥4॥43॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: (इसलिए) हे सहेलिए ! रूखी रोटी (खानी और) जमीन पर सोना (अच्छा है क्योंकि) प्यारे। प्रभू की संगति में जिंदगी सुख में बीतती है। 2। 3। 42। कानड़ा महला 5॥ हे सखी ! (साध-संगति में) मिल के बैठा कर (साध-संगति की बरकत से अपने अंदर से) अहंकार को दूर कर। हे सहेली ! गुरू को हर वक्त अपने अंदर बसाते हुए (अपने) मन को खोजा कर। (इस तरह अपने मन को) प्यारे प्रभू की प्रीति की ओर पल्टाया कर। 1। रहाउ। हे सहेली ! (साध-संगति में मन की खोज और प्रभू की प्रीति की सहायता से अपने अंदर से) (कामादिक) पाँच-वैरियों से (अपना) साथ तोड़ने का सदा यतन किया कर। (इस तरह आपके) हृदय-घर में (प्रभू-मिलाप की) सुंदर सेज बन जाएगी। आपके (हृदय के) आँगन में शांति आ टिकेगी। 1। उसका (प्रभू से) पल्टा हुआ हृदय-कमल-फूल (सीधा हो के। प्रभू की ओर मुख कर के) खिल उठता है। वह सदा अपने आसन पर बैठी रहती है (अडोल-चित्त रहती है)। उसकी भटकना समाप्त हो जाती है (उसके अंदर से) अहंकार का शोर खत्म हो गया।
कानड़ा मः 5 घरु 9 ॥
तां ते जापि मना हरि जापि ॥
जो संत बेद कहत पंथु गाखरो मोह मगन अहं ताप ॥ रहाउ ॥
जो राते माते संगि बपुरी माइआ मोह संताप ॥1॥
नामु जपत सोऊ जनु उधरै जिसहि उधारहु आप ॥
बिनसि जाइ मोह भै भरमा नानक संत प्रताप ॥2॥5॥44॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह-) हे सखी ! जिस जीव-स्त्री ने गुणों के खजाने प्रभू की सिफतसालाह के गीत गाने शुरू कर दिए। 2। 4। 43। कानड़ा मः 5 घरु 9॥ हे (मेरे) मन ! (अगर अहंकार के ताप से बचना है) तो परमात्मा का नाम जपा कर। सदा जपा कर। यही उपदेश गुरू के बचन करते हैं। (नाम जपे बिना जिंदगी का) रास्ता बहुत मुश्किल है (इसके बिना) मोह में डूबे रहा जाता है। अहंकार का ताप चढ़ा रहता है। रहाउ। हे मन ! जो मनुष्य बुरी माया के साथ रति-मस्त रहते हैं। उनको (माया के) मोह के कारण (अनेकों) दुख-कलेश व्यापते हैं। 1। हे प्रभू ! जिस (मनुष्य) को आप स्वयं (संसार-समुंद्र से) पार लंघाता है। वह मनुष्य (आपका) नाम जपते हुए पार लांघाता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।