लुल्ला परिवारLulla Family
English
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1308 · कानड़ा

इस पृष्ठ पर
अंग
1308
कानड़ा
अंग बदलें या अंश चुनें · 4 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. भै भाइ भगति निहाल नानक सदा सदा कुरबान ॥2॥4॥49॥
  2. करत करत चरच चरच चरचरी ॥
  3. जपि मन राम नामु सुखु पावैगो ॥
  4. जपि मन हरि हरि नामु तरावैगो ॥

भै भाइ भगति निहाल नानक सदा सदा कुरबान ॥2॥4॥49॥

अंग 1307 से चला आ रहा अंश

भै भाइ भगति निहाल नानक सदा सदा कुरबान ॥2॥4॥49॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- हे प्रभू ! मैं आप पर से) सदा ही सदके जाता हूँ। (जो मनुष्य आपके) डर में प्यार में (टिक के आपकी) भगती (करते हैं। वे) निहाल (हो जाते हैं)। 2। 4। 49।

करत करत चरच चरच चरचरी ॥

कानड़ा महला 5 ॥
करत करत चरच चरच चरचरी ॥
जोग धिआन भेख गिआन फिरत फिरत धरत धरत धरचरी ॥1॥ रहाउ ॥
अहं अहं अहै अवर मूड़ मूड़ मूड़ बवरई ॥
जति जात जात जात सदा सदा सदा सदा काल हई ॥1॥
मानु मानु मानु तिआगि मिरतु मिरतु निकटि निकटि सदा हई ॥
हरि हरे हरे भाजु कहतु नानकु सुनहु रे मूड़ बिनु भजन भजन भजन अहिला जनमु गई ॥2॥5॥50॥12॥62॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5॥ (जहाँ जाते हैं) चर्चा ही चर्चा करते फिरते हैं। हे भाई ! अनेकों योग-समाधियाँ लगाने वाले (छह) भेषों के साधू (शास्त्रों के) ज्ञाता सदा धरती पर घूमते फिरते हैं। (पर प्रभू के भजन के बिना यह सब कुछ वयर्थ है)। 1। हे भाई ! (ऐसे अनेकों ही) और हैं। (उनके अंदर) अहंकार ही अहंकार। (नाम से वंचित वे) मूर्ख हैं। मूर्ख हैं। बावरे हैं। (वे धरती पर घूमते-फिरते हैं। इसको धर्म का कर्म समझते हैं। पर वे) जहाँ भी जाते हैं। जहाँ भी जाते हैं। सदा ही सदा ही आत्मिक मौत (उन पर सवार रहती) है। हे मूर्ख ! (इन समाधियों का) माण। (भेष का) माण (शास्त्रों के ज्ञान का) अहंकार छोड़ दे। (इस तरह आत्मिक) मौत सदा (आपके) नजदीक है। सदा (आपके) पास है। (आपको) नानक कहता है- हे मूर्ख ! परमात्मा का भजन कर। हरी का भजन कर। भजन के बिना कीमती मनुष्या-जन्म (व्यर्थ) जा रहा है। 2। 5। 50। 12। 62।

जपि मन राम नामु सुखु पावैगो ॥

कानड़ा असटपदीआ महला 4 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जपि मन राम नामु सुखु पावैगो ॥
जिउ जिउ जपै तिवै सुखु पावै सतिगुरु सेवि समावैगो ॥1॥ रहाउ ॥
भगत जनां की खिनु खिनु लोचा नामु जपत सुखु पावैगो ॥
अन रस साद गए सभ नीकरि बिनु नावै किछु न सुखावैगो ॥1॥
गुरमति हरि हरि मीठा लागा गुरु मीठे बचन कढावैगो ॥
सतिगुर बाणी पुरखु पुरखोतम बाणी सिउ चितु लावैगो ॥2॥
गुरबाणी सुनत मेरा मनु द्रविआ मनु भीना निज घरि आवैगो ॥
तह अनहत धुनी बाजहि नित बाजे नीझर धार चुआवैगो ॥3॥
राम नामु इकु तिल तिल गावै मनु गुरमति नामि समावैगो ॥
नामु सुणै नामो मनि भावै नामे ही त्रिपतावैगो ॥4॥
कनिक कनिक पहिरे बहु कंगना कापरु भांति बनावैगो ॥
नाम बिना सभि फीक फिकाने जनमि मरै फिरि आवैगो ॥5॥
माइआ पटल पटल है भारी घरु घूमनि घेरि घुलावैगो ॥
पाप बिकार मनूर सभि भारे बिखु दुतरु तरिओ न जावैगो ॥6॥
भउ बैरागु भइआ है बोहिथु गुरु खेवटु सबदि तरावैगो ॥
राम नामु हरि भेटीऐ हरि रामै नामि समावैगो ॥7॥
अगिआनि लाइ सवालिआ गुर गिआनै लाइ जगावैगो ॥
नानक भाणै आपणै जिउ भावै तिवै चलावैगो ॥8॥1॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा असटपदीआ महला 4 घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे (मेरे) मन ! (परमात्मा का) नाम (सदा) जपा कर (जो मनुष्य जपता है। वह) सुख पाता है। ज्यों-ज्यों (मनुष्य हरी-नाम) जपता है। त्यों-त्यों आनंद पाता है। और गुरू की शरण पड़ कर (हरी-नाम में) लीन रहता है। 1। रहाउ। हे मन ! भगत जनों की हर वक्त (नाम जपने की) चाहत बनी रहती है। (परमात्मा का भगत) हरी-नाम जपते हुए आनंद प्राप्त करता है। (उसके अंदर से) और सारे रसों के स्वाद निकल जाते हैं। हरी-नाम के बिना (भक्त को) और कुछ अच्छा नहीं लगता। 1। हे मन ! गुरू की मति की बरकति से (भगत को) परमात्मा का नाम प्यारा लगने लग जाता है। गुरू (उसके मुँह से सिफत-सालाह के) मीठे वचन (ही) निकलवाता है। गुरू की बाणी के द्वारा श्रेष्ठ पुरख परमात्मा को (मिल जाता है। इसलिए भगत सदा) गुरू की बाणी के साथ (अपना) चित्त लगाता है। 2। मेरा मन (नाम-रस में) भीग जाता है। (बाहर भटकने की जगह) अपने असल स्वरूप में टिका रहता है। हृदय में इस तरह आनंद बना रहता है। (मानो) उसके दिल में एक-रस सुर में बाजे बजते रहते हैं। (मानो) चश्मे (के पानी) की धार चलती रहती है। 3। हे मन ! (परमात्मा का भगत) हर वक्त हरेक सांस के साथ परमात्मा का नाम जपता रहता है। गुरू की मति ले के (भगत का) मन (सदा) नाम में लीन रहता है। भगत (हर वक्त परमात्मा का) नाम सुनता है। नाम ही (उसके) मन में प्यारा लगता है। नाम के द्वारा ही (भगत माया की तृष्णा से) तृप्त रहता है। 4। (हे मेरे मन ! माया-ग्रसित मनुष्य) सोने (आदि कीमती धातुओं) के अनेकों कँगन (आदि गहने) पहनता है (अपने शरीर को सजाने के लिए) कई किस्म का कपड़ा बनाता है। (परमात्मा के) नाम के बिना (ये) सारे (उद्यम) बिल्कुल बे-स्वादे हैं। (ऐसा मनुष्य सदा) पैदा होने-मरने के चक्करों में पड़ा रहता है। 5। हे मेरे मन ! माया (के मोह) का पर्दा बड़ा कड़ा परदा है। (इस मोह के पर्दे के कारण मनुष्य के लिए उसका) घर (समुंद्री) चक्रवात बन जाता है। (इसमें डूबने से बचने के लिए मनुष्य सारी उम्र) मुशक्कत करता है। (मोह में फंस के किए हुए) पाप विकार जले हुए लोहे जैसे भारे (बोझ) बन जाते हैं। (इनके कारण) आत्मिक मौत लाने वाले जहर-रूप (संसार-समुंद्र से) पार लांघना मुश्किल हो जाता है। (माया-ग्रसित मनुष्य द्वारा उसमें से) पार नहीं लांघा जा सकता। 6। हे मेरे मन ! (हृदय में परमात्मा का) अदब और प्यार (संसार-समुंद्र में से पार लांघने के लिए) जहाज़ बन जाता है (जिस मनुष्य के अंदर प्यार है डर है। उसको) गुरू मल्लाह (अपने) शबद के द्वारा पार लंघा लेता है। हे भाई ! परमात्मा का नाम (जप के) परमात्मा को मिला जा सकता है; (जिस मनुष्य के अंदर अदब और प्यार है। वह) सदा प्रभू के नाम में लीन रहता है। 7। पर। हे नानक ! जैसे परमात्मा की रज़ा होती है वैसे ही (जीव को जीवन राह पर) चलाता है। (कभी जीव को) अज्ञानता में फसा के (माया के मोह की नींद में) सुलाए रखता है। कभी गुरू की बख्शी हुई आत्मिक सूझ में टिका के (उस नींद में से) जगा देता है। 8। 1।

जपि मन हरि हरि नामु तरावैगो ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

कानड़ा महला 4 ॥
जपि मन हरि हरि नामु तरावैगो ॥
जो जो जपै सोई गति पावै जिउ ध्रू प्रहिलादु समावैगो ॥1॥ रहाउ ॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 4॥ हे (मेरे) मन ! परमात्मा का नाम जपा कर। हरी-नाम (मनुष्य को संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। जो जो मनुष्य हरी-नाम जपता है। वह ही ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है (और। परमात्मा में लीन हो जाता है) जैसे ध्रूव और प्रहलाद (अपने-अपने समय में प्रभू में) लीन होते रहे हैं। 1। रहाउ।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी; महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1308 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।