ऐसी कउन बिधे दरसन परसना ॥1॥ रहाउ ॥
आस पिआस सफल मूरति उमगि हीउ तरसना ॥1॥
दीन लीन पिआस मीन संतना हरि संतना ॥
हरि संतना की रेन ॥
हीउ अरपि देन ॥
प्रभ भए है किरपेन ॥
मानु मोहु तिआगि छोडिओ तउ नानक हरि जीउ भेटना ॥2॥2॥35॥
रंगा रंग रंगन के रंगा ॥
कीट हसत पूरन सभ संगा ॥1॥ रहाउ ॥
बरत नेम तीरथ सहित गंगा ॥
जलु हेवत भूख अरु नंगा ॥
पूजाचार करत मेलंगा ॥
चक्र करम तिलक खाटंगा ॥
दरसनु भेटे बिनु सतसंगा ॥1॥
हठि निग्रहि अति रहत बिटंगा ॥
हउ रोगु बिआपै चुकै न भंगा ॥
काम क्रोध अति त्रिसन जरंगा ॥
सो मुकतु नानक जिसु सतिगुरु चंगा ॥2॥3॥36॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तिख बूझि गई गई मिलि साध जना ॥
पंच भागे चोर सहजे सुखैनो हरे गुन गावती गावती गावती दरस पिआरि ॥1॥ रहाउ ॥
जैसी करी प्रभ मो सिउ मो सिउ ऐसी हउ कैसे करउ ॥
हीउ तुम॑ारे बलि बले बलि बले बलि गई ॥1॥
पहिले पै संत पाइ धिआइ धिआइ प्रीति लाइ ॥
प्रभ थानु तेरो केहरो जितु जंतन करि बीचारु ॥
अनिक दास कीरति करहि तुहारी ॥
सोई मिलिओ जो भावतो जन नानक ठाकुर रहिओ समाइ ॥
एक तूही तूही तूही ॥2॥1॥37॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तिआगीऐ गुमानु मानु पेखता दइआल लाल हां हां मन चरन रेन ॥1॥ रहाउ ॥
हरि संत मंत गुपाल गिआन धिआन ॥1॥
हिरदै गोबिंद गाइ चरन कमल प्रीति लाइ दीन दइआल मोहना ॥
क्रिपाल दइआ मइआ धारि ॥
नानकु मागै नामु दानु ॥
तजि मोहु भरमु सगल अभिमानु ॥2॥1॥38॥
प्रभ कहन मलन दहन लहन गुर मिले आन नही उपाउ ॥1॥ रहाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे जगत के गुरदेव ! (मुझे) नानक को मिल।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।