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अंग 1305

अंग
1305
राग कान्हड़ा
राग: कान्हड़ा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
कानड़ा महला 5 ॥
ऐसी कउन बिधे दरसन परसना ॥1॥ रहाउ ॥
आस पिआस सफल मूरति उमगि हीउ तरसना ॥1॥
दीन लीन पिआस मीन संतना हरि संतना ॥
हरि संतना की रेन ॥
हीउ अरपि देन ॥
प्रभ भए है किरपेन ॥
मानु मोहु तिआगि छोडिओ तउ नानक हरि जीउ भेटना ॥2॥2॥35॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे जगत के गुरदेव ! (मुझे) नानक को मिल। 2। 1। 34। कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! (मुझे बता) ऐसा कौन सा तरीका है जिससे प्रभू के दर्शन (हो जाएं। प्रभू के चरणों की) छूह मिल जाए। 1। रहाउ। हे भाई ! सब जीवों को मन-माँगी मुरादें देने वाले प्रभू के दर्शनों की मेरी तमन्ना है इन्तजार है। उमंग में मेरा दिल (दर्शनों के लिए) तरस रहा है। 1। (उक्तर।) अगर निमाणे हो के संत जनों के चरणों पर गिर जाएं (यदि प्रभू के दर्शनों की इतनी चाहत हो। जैसे) मछली को (पानी की) प्यास होती है। यदि संत-जनों के चरणों की धूड़ की खातिर अपना हृदय (भी) भेट कर दें। तो। हे भाई ! प्रभू दयावान होता है। हे नानक ! (जब किसी ने अपने अंदर से) अहंकार और मोह त्याग दिया।
कानड़ा महला 5 ॥
रंगा रंग रंगन के रंगा ॥
कीट हसत पूरन सभ संगा ॥1॥ रहाउ ॥
बरत नेम तीरथ सहित गंगा ॥
जलु हेवत भूख अरु नंगा ॥
पूजाचार करत मेलंगा ॥
चक्र करम तिलक खाटंगा ॥
दरसनु भेटे बिनु सतसंगा ॥1॥
हठि निग्रहि अति रहत बिटंगा ॥
हउ रोगु बिआपै चुकै न भंगा ॥
काम क्रोध अति त्रिसन जरंगा ॥
सो मुकतु नानक जिसु सतिगुरु चंगा ॥2॥3॥36॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: तब (उस को) प्रभू जी मिल जाते हैं। 2। 2। 35। कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा (इस जगत-तमाशे में) अनेकों ही रंगों में (बस रहा है) कीड़ी से लेकर हाथी तक सबके साथ बसता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (उस परमात्मा के दर्शन करने के लिए) कोई व्रत नेम रख रहा है। कोई गंगा समेत सारे तीर्थों का स्नान करता है; कोई (ठंडे) पानी और बर्फ (की ठंढ सह रहा है)। कोई भूख काटता है कोई नंगा रहता है; कोई आसन जमा के पूजा आदि कर्म करता है; कोई अपने शरीर के छह अंगों पर चक्र-तिलक आदि लगाने के कर्म करता है। पर। साध-संगति के दर्शन किए बिना (ये सारे कर्म व्यर्थ हैं)। हे भाई ! (अनेकों रंगों में व्यापक उस प्रभू के दर्शन करने के लिए) कोई मनुष्य हठ से इन्द्रियों को रोकने के यतन से सिर के बल होया हुआ है। (पर इस तरह बल्कि) अहंकार का रोग (मनुष्य पर अपना) जोर डाल लेता है। (उसके अंदर से आत्मिक जीवन की) कमी खत्म नहीं होती। काम-क्रोध-तृष्णा (की आग) में जलता रहता है।
कानड़ा महला 5 घरु 7
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तिख बूझि गई गई मिलि साध जना ॥
पंच भागे चोर सहजे सुखैनो हरे गुन गावती गावती गावती दरस पिआरि ॥1॥ रहाउ ॥
जैसी करी प्रभ मो सिउ मो सिउ ऐसी हउ कैसे करउ ॥
हीउ तुम॑ारे बलि बले बलि बले बलि गई ॥1॥
पहिले पै संत पाइ धिआइ धिआइ प्रीति लाइ ॥
प्रभ थानु तेरो केहरो जितु जंतन करि बीचारु ॥
अनिक दास कीरति करहि तुहारी ॥
सोई मिलिओ जो भावतो जन नानक ठाकुर रहिओ समाइ ॥
एक तूही तूही तूही ॥2॥1॥37॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (काम-क्रोध-तृष्णा से) वह मनुष्य बचा रहता है जिसको सोहाना गुरू मिल जाता है। 2। 36। कानड़ा महला 5 घरु 7 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! संत जनों को मिल के (मेरे अंदर से माया की) तृष्णा बिल्कुल ही समाप्त हो गई है। प्रभू के दर्शनों की तमन्ना में प्रभू के गुण गाते-गाते बड़ी ही आसानी से (कामादिक) पाँचों चोर (मेरे अंदर से) भाग गए हैं। 1। रहाउ। हे प्रभू ! जिस तरह की मेहर तूने मेरे ऊपर की है (उसके बदले में मैं) वैसी ही (आपकी सेवा) मैं कैसे कर सकता हूँ। हे प्रभू ! मेरा दिल आपसे सदके जाता है। कुर्बान जाता है। 1। हे प्रभू ! पहले (आपके) संत-जनों के पैरों में पड़ कर (और। आपका नाम) सिमर-सिमर के मैंने (आपके संग) प्रीति बनाई है। हे प्रभू ! आपकी वह जगह बहुत ही आश्चर्यजनक होगी जहाँ (बैठ के) आप (सारे) जीवों की संभाल करता है। आपके अनेकों ही दास आपकी सिफत-सालाह करते रहते हैं। हे दास नानक ! (कह-) हे ठाकुर ! आपको वही (दास) मिल सका है जो आपको प्यारा लगा। हे ठाकुर ! आप हर जगह व्यापक है।
कानड़ा महला 5 घरु 8
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तिआगीऐ गुमानु मानु पेखता दइआल लाल हां हां मन चरन रेन ॥1॥ रहाउ ॥
हरि संत मंत गुपाल गिआन धिआन ॥1॥
हिरदै गोबिंद गाइ चरन कमल प्रीति लाइ दीन दइआल मोहना ॥
क्रिपाल दइआ मइआ धारि ॥
नानकु मागै नामु दानु ॥
तजि मोहु भरमु सगल अभिमानु ॥2॥1॥38॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हर जगह सिर्फ आप ही है। 2। 1। 37 कानड़ा महला 5 घरु 8 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! (अपने अंदर से) गुमान-अहंकार दूर कर लेना चाहिए। दया-का-घर सुंदर प्रभू (हमारे हरेक काम को) देख रहा है। हे मन ! (सबके) चरणों की धूड़ (बना रह)। 1। रहाउ। हे भाई ! हरी-गोपाल के संत जनों के उपदेश की गहरी विचार में सुरति जोड़े रख। 1। हे भाई ! गोबिंद के गुण (अपने) दिल में (सदा) गाया कर। दीनों पर दया करने वाले मोहन प्रभू के सुंदर चरणों से प्रीति बनाए रख। हे कृपा के श्रोत प्रभू ! (मेरे पर सदा) मेहर कर (आपका दास) नानक (आपके दर से आपका) नाम-दान माँगता है –
कानड़ा महला 5 ॥
प्रभ कहन मलन दहन लहन गुर मिले आन नही उपाउ ॥1॥ रहाउ ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: (अपने अंदर से) मोह-भ्रम और गुमान दूर कर के । 2। 1। 38। कानड़ा महला 5॥

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे जगत के गुरदेव ! (मुझे) नानक को मिल।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।