राग: कान्हड़ा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
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कामि क्रोधि लोभि बिआपिओ जनम ही की खानि ॥ पतित पावन सरनि आइओ उधरु नानक जानि ॥2॥12॥31॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: आप आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल उड़ेल के धरती पर फेंक रहा है। विषौ-विकारों के स्वाद से चिपका हुआ आप कैसे सुख हासिल कर सकता है। 1। हे मूर्ख ! आप (सदा) काम में। क्रोध में। लोभ में फंसा रहता है। (ये काम। क्रोध। लोभ आदि तो) जन्मों के चक्करों का ही वसीला हैं।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह-) हे विकारियों को पवित्र करने वाले प्रभू ! (मैं आपकी) शरण आया हूँ। (मुझे अपने दर पर गिरा) समझ के (इन विकारें से बचाए रख)। 2। 12। 31। कानड़ा महला 5 ॥ (अब मेरी यही तमन्ना रहती है कि) मैं प्रभू का सुंदर मुखड़ा (सदा) देखता रहूँ। हे भाई ! (गुरू के द्वारा) तलाश करते-करते (मैंने परमात्मा का नाम-) रतन पा लिया है (जिसकी बरकति से मेरे अंदर से) सारी चिंता दूर हो गई है। 1। रहाउ। हे भाई ! प्रभू के सुंदर चरण हृदय में बसा के (मेरे अंदर से) बुरा (सारा) दुख दूर हो गया है। 1। हे भाई ! (अब) मेरे वास्ते परमात्मा (का नाम ही) सब कुछ है। (नाम ही मेरे वास्ते) राज (है। नाम ही मेरे वास्ते) धन (है। नाम ही मेरा) परिवार है।
कानड़ा महला 5 घरु 5 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ प्रभ पूजहो नामु अराधि ॥ गुर सतिगुर चरनी लागि ॥ हरि पावहु मनु अगाधि ॥ जगु जीतो हो हो गुर किरपाधि ॥1॥ रहाउ ॥ अनिक पूजा मै बहु बिधि खोजी सा पूजा जि हरि भावासि ॥ माटी की इह पुतरी जोरी किआ एह करम कमासि ॥ प्रभ बाह पकरि जिसु मारगि पावहु सो तुधु जंत मिलासि ॥1॥ अवर ओट मै कोइ न सूझै इक हरि की ओट मै आस ॥ किआ दीनु करे अरदासि ॥ जउ सभ घटि प्रभू निवास ॥ प्रभ चरनन की मनि पिआस ॥ जन नानक दासु कहीअतु है तुम॑रा हउ बलि बलि सद बलि जास ॥2॥1॥33॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (जिन मनुष्यों ने) गुरू की संगति में (टिक के परमात्मा के नाम का) लाभ कमा लिया। उनको फिर आत्मिक मौत नहीं आती। 2। 13। 32। कानड़ा महला 5 घरु 5 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! प्रभू का नाम सिमर-सिमर के प्रभू की पूजा-भगती किया करो- गुरू सतिगुरू की चरणी लग के (इस तरह उस) अथाह मन (के मालिक) प्रभू का मिलाप हासिल कर लेंगे। हे भाई ! गुरू की कृपा से (प्रभू का सिमरन करने से) जगत (का मोह) जीता जाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (जगत में) अनेकों पूजाएं (हो रही हैं) मैंने (इनकी) कई तरह से खोज-तलाश की है। (पर) वही पूजा (श्रेष्ठ) है जो परमात्मा को अच्छी लगती है (जिससे परमात्मा प्रसन्न होता है)। (पर। ऐसी पूजा भी प्रभू स्वयं ही करवाता है)। हे भाई ! (परमात्मा ने मनुष्य की यह) मिट्टी की पुतली बना दी (पुतलियों का मालिक पुतलियों को खुद ही नचाता है)। ये जीव-पुतली (पुतलियां घड़ने वाले प्रभू की प्रेरणा के बिना) कोई काम नहीं कर सकती। हे प्रभू ! जिस जीव को (उसकी) बाँह पकड़ के आप (जीवन के सही) रास्ते पर चलाता है। वह जीव आपको मिल जाता है। 1। हे भाई ! (प्रभू के बिना) मुझे कोई और आसरा नहीं सूझता। मुझे सिर्फ प्रभू की ओट है प्रभू की (सहायता की) आस है। (उसकी प्रेरणा के बिना) बेचारा जीव कोई अरदास भी नहीं कर सकता। हे भाई ! जब हरेक शरीर में प्रभू का ही निवास है हे भाई ! (उसकी मेहर से ही मेरे) मन में प्रभू के चरणों (के मिलाप) की तमन्ना है।
कानड़ा महला 5 घरु 6 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ जगत उधारन नाम प्रिअ तेरै ॥ नव निधि नामु निधानु हरि केरै ॥ हरि रंग रंग रंग अनूपेरै ॥ काहे रे मन मोहि मगनेरै ॥ नैनहु देखु साध दरसेरै ॥ सो पावै जिसु लिखतु लिलेरै ॥1॥ रहाउ ॥ सेवउ साध संत चरनेरै ॥ बांछउ धूरि पवित्र करेरै ॥ अठसठि मजनु मैलु कटेरै ॥ सासि सासि धिआवहु मुखु नही मोरै ॥ किछु संगि न चालै लाख करोरै ॥ प्रभ जी को नामु अंति पुकरोरै ॥1॥ मनसा मानि एक निरंकेरै ॥ सगल तिआगहु भाउ दूजेरै ॥ कवन कहां हउ गुन प्रिअ तेरै ॥ बरनि न साकउ एक टुलेरै ॥ दरसन पिआस बहुतु मनि मेरै ॥ मिलु नानक देव जगत गुर केरै ॥2॥1॥34॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! दास नानक आपका दास कहलवाता है (इसकी लाज रख। इसको अपने चरणों में जोड़े रख)। हे प्रभू ! मैं आपसे सदा सदके जाता हूँ कुर्बान जाता हूँ। 2। 1। 33। कानड़ा महला 5 घरु 6 सतिगुर प्रसादि ॥ हे प्यारे प्रभू ! जगत (के जीवों को विकारों से) बचाने वाला आपका नाम आपके (ही हाथ) में है। हे भाई ! परमात्मा का नाम-खजाना (मानो। धरती के) नौ खजाने हैं। हे मन ! सुंदर हरी के (इस जगत में) अनेकों ही रंग-तमाशे हैं। आप (इन रंगों के) मोह में क्यों मस्त हैं रहा है। हे भाई ! (अपनी) आँखों से गुरू के दर्शन किया कर। (पर जीव के भी क्या वश। गुरू का दर्शन) वही मनुष्य प्राप्त करता है जिसके माथे पर (इस दर्शन का) लेख लिखा होता है। 1। रहाउ। हे भाई ! मैं (तो) संत जनों के चरणों की ओट लेता हूँ। मैं (संतजनों के चरणों की) धूड़ माँगता हूँ (ये चरन-धूड़ मनुष्य का जीवन) पवित्र कर देती है। (ये चरण-धूड़ ही) अढ़सठ तीर्थों का स्नान है (संत जनों की चरण-धूर का स्नान जीवों के मन की) मैल दूर करता है। हे भाई ! (अपने) हरेक सांस के साथ परमात्मा का नाम सिमरा कर। (जो मनुष्य नाम सिमरता है। उसकी ओर से परतात्मा अपना) मुँह नहीं मोड़ता। हे भाई ! (जमा किए हुए) लाखों-करोड़ों रुपयो में से कुछ भी (आखिरी वक्त मनुष्य के) साथ नहीं जाता। आखिरी समय में (जब हरेक पदार्थ का साथ खत्म हो जाता है) परमात्मा का नाम ही साथ निभाता है। 1। हे भाई ! (अपने) मन के फुरने को सिर्फ निरंकार (की याद) में शांत कर ले। (प्रभू के बिना) और-और पदार्थ में (डाला हुआ) प्यार सारा ही छोड़ दे। हे प्यारे प्रभू ! आपके अंदर (अनेकों ही) गुण (हैं)। मैं (आपके) कौन-कौन से गुण बता सकता हूँ। मैं तो आपके एक उपकार को भी बयान नहीं कर सकता। मेरे मन में आपके दर्शनों की बहुत तमन्ना है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “आप आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल उड़ेल के धरती पर फेंक रहा है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।