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अंग
1303
कानड़ा
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कहु नानक एकै भारोसउ बंधन काटनहारु गुरु मेरो ॥2॥6॥25॥
कहु नानक एकै भारोसउ बंधन काटनहारु गुरु मेरो ॥2॥6॥25॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कहें- हे भाई ! सिर्फ एक (गुरू परमेश्वर का) भरोसा (रखें)। प्यारा गुरू (माया के सारे) बँधन काटने की समर्थता रखने वाला है (उसी की शरण पड़े रहें)। 2। 6। 25।
बिखै दलु संतनि तुम॑रै गाहिओ ॥
कानड़ा महला 5 ॥
बिखै दलु संतनि तुम॑रै गाहिओ ॥
तुमरी टेक भरोसा ठाकुर सरनि तुम॑ारी आहिओ ॥1॥ रहाउ ॥
जनम जनम के महा पराछत दरसनु भेटि मिटाहिओ ॥
भइओ प्रगासु अनद उजीआरा सहजि समाधि समाहिओ ॥1॥
कउनु कहै तुम ते कछु नाही तुम समरथ अथाहिओ ॥
क्रिपा निधान रंग रूप रस नामु नानक लै लाहिओ ॥2॥7॥26॥
बिखै दलु संतनि तुम॑रै गाहिओ ॥
तुमरी टेक भरोसा ठाकुर सरनि तुम॑ारी आहिओ ॥1॥ रहाउ ॥
जनम जनम के महा पराछत दरसनु भेटि मिटाहिओ ॥
भइओ प्रगासु अनद उजीआरा सहजि समाधि समाहिओ ॥1॥
कउनु कहै तुम ते कछु नाही तुम समरथ अथाहिओ ॥
क्रिपा निधान रंग रूप रस नामु नानक लै लाहिओ ॥2॥7॥26॥
हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 ॥ आपके संत जनों की संगति से मैंने (सारे) विषौ (-विकारों) के दल को वश में कर लिया है। हे (मेरे) ठाकुर ! मुझे आपकी टेक है। मुझे आपका (ही) भरोसा है। मैं (सदा) आपकी ही शरण चाहता हूँ। 1। रहाउ। हे (मेरे) ठाकुर ! (जो भी भाग्यशाली आपकी शरण पड़ते हैं। वे) आपके दर्शन करके जन्म-जन्मांतरों के पाप मिटा लेते हैं। (उनके अंदर आत्मिक जीवन की सूझ की) रोशनी हो जाती है। आत्मिक आनंद का प्रकाश हो जाता है। वे सदा आत्मिक अडोलता की समाधि में लीन रहते हैं। 1। हे मेरे ठाकुर ! कौन कहता है कि आपसे कुछ भी हासिल नहीं होता। आप सारी ताकतों के मालिक प्रभू (सुखों का) अथाह (समुंद्र) हैं। हे नानक ! (कहें-) हे कृपा के खजाने ! (जो मनुष्य आपकी शरण पड़ता है। वह आपके दर से आपका) नाम-लाभ हासिल करता है (यह नाम ही उसके वास्ते दुनिया के) रंग-रूप-रस हैं। 2। 7। 26।
बूडत प्रानी हरि जपि धीरै ॥
कानड़ा महला 5 ॥
बूडत प्रानी हरि जपि धीरै ॥
बिनसै मोहु भरमु दुखु पीरै ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरउ दिनु रैनि गुर के चरना ॥
जत कत पेखउ तुमरी सरना ॥1॥
संत प्रसादि हरि के गुन गाइआ ॥
गुर भेटत नानक सुखु पाइआ ॥2॥8॥27॥
बूडत प्रानी हरि जपि धीरै ॥
बिनसै मोहु भरमु दुखु पीरै ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरउ दिनु रैनि गुर के चरना ॥
जत कत पेखउ तुमरी सरना ॥1॥
संत प्रसादि हरि के गुन गाइआ ॥
गुर भेटत नानक सुखु पाइआ ॥2॥8॥27॥
हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! (संसार-समुंद्र में) डूब रहा मनुष्य (गुरू के माध्यम से) परमात्मा का नाम जप के (पार लांघ सकने के लिए) हौसला प्राप्त कर लेता है। (उसके अंदर से) माया का मोह मिट जाता है। भटकना दूर हो जाती है। दुख-दर्द नाश हो जाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! मैं (भी) दिन-रात गुरू के चरणों का ध्यान धरता हूँ। हे प्रभू ! मैं जिधर-किधर देखता हूँ (गुरू की कृपा से) मुझे आपका ही सहारा दिख रहा है। 1। हे नानक ! गुरू की कृपा से (जो मनुष्य) परमात्मा के गुण गाने लग पड़ा। गुरू को मिल के उसने आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया। 2। 8। 27।
सिमरत नामु मनहि सुखु पाईऐ ॥
कानड़ा महला 5 ॥
सिमरत नामु मनहि सुखु पाईऐ ॥
साध जना मिलि हरि जसु गाईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
करि किरपा प्रभ रिदै बसेरो ॥
चरन संतन कै माथा मेरो ॥1॥
पारब्रहम कउ सिमरहु मनां ॥
गुरमुखि नानक हरि जसु सुनां ॥2॥9॥28॥
सिमरत नामु मनहि सुखु पाईऐ ॥
साध जना मिलि हरि जसु गाईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
करि किरपा प्रभ रिदै बसेरो ॥
चरन संतन कै माथा मेरो ॥1॥
पारब्रहम कउ सिमरहु मनां ॥
गुरमुखि नानक हरि जसु सुनां ॥2॥9॥28॥
हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरते हुए मन में आनंद प्राप्त किया जा सकता है। संत-जनों की संगति में मिल के परमात्मा की सिफतसालाह के गीत गाते रहना चाहिए 1। रहाउ। हे प्रभू ! मेहर करके (मेरे) हृदय में (अपना) ठिकाना बनाए रखें। हे प्रभू ! मेरा माथा (आपके) संतजनों के चरणों पर टिका रहे। 1। हे नानक ! (कहें-) हे (मेरे) मन ! परमात्मा का नाम सिमरते रहें। गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा की सिफतसालाह के गीत सुना करें। 2। 9। 28।
मेरे मन प्रीति चरन प्रभ परसन ॥
कानड़ा महला 5 ॥
मेरे मन प्रीति चरन प्रभ परसन ॥
रसना हरि हरि भोजनि त्रिपतानी अखीअन कउ संतोखु प्रभ दरसन ॥1॥ रहाउ ॥
करननि पूरि रहिओ जसु प्रीतम कलमल दोख सगल मल हरसन ॥
पावन धावन सुआमी सुख पंथा अंग संग काइआ संत सरसन ॥1॥
सरनि गही पूरन अबिनासी आन उपाव थकित नही करसन ॥
करु गहि लीए नानक जन अपने अंध घोर सागर नही मरसन ॥2॥10॥29॥
मेरे मन प्रीति चरन प्रभ परसन ॥
रसना हरि हरि भोजनि त्रिपतानी अखीअन कउ संतोखु प्रभ दरसन ॥1॥ रहाउ ॥
करननि पूरि रहिओ जसु प्रीतम कलमल दोख सगल मल हरसन ॥
पावन धावन सुआमी सुख पंथा अंग संग काइआ संत सरसन ॥1॥
सरनि गही पूरन अबिनासी आन उपाव थकित नही करसन ॥
करु गहि लीए नानक जन अपने अंध घोर सागर नही मरसन ॥2॥10॥29॥
हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 ॥ हे मेरे मन ! (जिन मनुष्यों के अंदर) ! प्रभू के चरण-छूने के लिए तड़प होती है। उनकी जीभ परमात्मा के नाम की (आत्मिक) खुराक से तृप्त रहती है। उनकी आँखों को प्रभू-दीदार की ठंड मिली रहती है। 1। रहाउ। हे मेरे मन ! (जिन मनुष्यों के अंदर प्रभू के चरण छूने की चाहत होती है। उनके) कानों में प्रीतम-प्रभू की सिफतसालाह टिकी रहती है जो सारे पाप सारे ऐबों की मैल दूर करने के समर्थ है। उनके पैरों की दौड़-भाग मालिक-प्रभू (के मिलाप) के सुखद रास्तेपर बनी रहती है। उनके शारीरिकअंग संत जनों (के चरणों) के साथ (छू के) उल्लास में बने रहते हैं। 1। हे मेरे मन जिन मनुष्यों ने सर्व-व्यापक नाश-रहित परमात्मा की शरण पकड़ ली। वे (इस शरण को छोड़ के उसके मिलाप के लिए) और-और उपाय करके थकते नहीं फिरते। हे नानक ! (कहें-) प्रभू ने जिन अपने सेवकों का हाथ पकड़ लिया होता है। वे सेवक (माया के मोह के) घोर-अंधकार भरे संसार-समुंद्र में आत्मिक मौत नहीं सहते। 2। 10। 29।
कुहकत कपट खपट खल गरजत मरजत मीचु अनिक बरीआ ॥1॥ रहाउ ॥
कानड़ा महला 5 ॥
कुहकत कपट खपट खल गरजत मरजत मीचु अनिक बरीआ ॥1॥ रहाउ ॥
अहं मत अन रत कुमित हित प्रीतम पेखत भ्रमत लाख गरीआ ॥1॥
अनित बिउहार अचार बिधि हीनत मम मद मात कोप जरीआ ॥
करुण क्रिपाल गोुपाल दीन बंधु नानक उधरु सरनि परीआ ॥2॥11॥30॥
कुहकत कपट खपट खल गरजत मरजत मीचु अनिक बरीआ ॥1॥ रहाउ ॥
अहं मत अन रत कुमित हित प्रीतम पेखत भ्रमत लाख गरीआ ॥1॥
अनित बिउहार अचार बिधि हीनत मम मद मात कोप जरीआ ॥
करुण क्रिपाल गोुपाल दीन बंधु नानक उधरु सरनि परीआ ॥2॥11॥30॥
हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! (जिन मनुष्यों के अंदर आत्मिक जीवन का) नाश करने वाले खोट भड़के रहते हैं। (जिनके अंदर कामादिक) दुष्ट गरजते रहते हैं। (उनको) मौत अनेकों बार मारती रहती है। 1। रहाउ। हे भाई ! (ऐसे मनुष्य) अहंकार में मस्त हुए (प्रभू को भुला के) अन्य (रसों) में रति (रंगे) रहते हैं। (ऐसे मनुष्य) खोटे मित्रों से प्यार डालते हैं। खोटों को अपना मित्र बनाते हैं। (ऐसे मनुष्य कामादिक विकारों की) लाखों गलियों को झाकते भटकते फिरते हैं। 1। हे भाई ! (ऐसे मनुष्य) नाशवंत पदार्थों के कार्य-व्यवहार में ही व्यस्त रहते हैं। उनका आचरण अच्छी मर्यादा से वंचित रहता है। वे (माया की) ममता के नशे में मस्त रहते हैं। और क्रोध की आग में जलते रहते हैं। हे नानक ! (कहें-) हे तरस-रूप प्रभू ! हे दया के घर प्रभू ! हे सृष्टि के मालिक ! आप गरीबों के प्यारे हैं। (मैं आपकी) श्रण आ पड़ा हूँ। (मुझे इन कामादिक दुष्टों से) बचाए रखें। 2। 11। 30।
जीअ प्रान मान दाता ॥
कानड़ा महला 5 ॥
जीअ प्रान मान दाता ॥
हरि बिसरते ही हानि ॥1॥ रहाउ ॥
गोबिंद तिआगि आन लागहि अंम्रितो डारि भूमि पागहि ॥
बिखै रस सिउ आसकत मूड़े काहे सुख मानि ॥1॥
जीअ प्रान मान दाता ॥
हरि बिसरते ही हानि ॥1॥ रहाउ ॥
गोबिंद तिआगि आन लागहि अंम्रितो डारि भूमि पागहि ॥
बिखै रस सिउ आसकत मूड़े काहे सुख मानि ॥1॥
हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा (आपको) जिंद देने वाला है। प्राण देने वाला है। इज्जत देने वाला है। (ऐसे) परमात्मा को विसारते ही (आत्मिक जीवन) में घाटा ही घाटा पड़ता है। 1। रहाउ। हे मूर्ख ! परमात्मा (की याद) छोड़ के आप और-और (पदार्थों) में लगे रहते हैं। आप आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल उड़ेल के धरती पर फेंक रहे हैं। विषय-विकारों के स्वाद से चिपके हुए आप कैसे सुख हासिल कर सकते हैं। 1।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1303 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।