राग: कान्हड़ा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
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कहु नानक एकै भारोसउ बंधन काटनहारु गुरु मेरो ॥2॥6॥25॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! आप पुत्र-स्त्री और माया के मोह में (आत्मिक जीवन के पथ पर से) रुका हुआ है। सब कुछ दे सकने वाले दातार-प्रभू को भुला रहा है।
कानड़ा महला 5 ॥ बिखै दलु संतनि तुम॑रै गाहिओ ॥ तुमरी टेक भरोसा ठाकुर सरनि तुम॑ारी आहिओ ॥1॥ रहाउ ॥ जनम जनम के महा पराछत दरसनु भेटि मिटाहिओ ॥ भइओ प्रगासु अनद उजीआरा सहजि समाधि समाहिओ ॥1॥ कउनु कहै तुम ते कछु नाही तुम समरथ अथाहिओ ॥ क्रिपा निधान रंग रूप रस नामु नानक लै लाहिओ ॥2॥7॥26॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- हे भाई ! सिर्फ एक (गुरू परमेश्वर का) भरोसा (रख)। प्यारा गुरू (माया के सारे) बँधन काटने की समर्थता रखने वाला है (उसी की शरण पड़ा रह)। 2। 6। 25। कानड़ा महला 5 ॥ आपके संत जनों की संगति से मैंने (सारे) विषौ (-विकारों) के दल को वश में कर लिया है। हे (मेरे) ठाकुर ! मुझे आपकी टेक है। मुझे आपका (ही) भरोसा है। मैं (सदा) आपकी ही शरण चाहता हूँ। 1। रहाउ। हे (मेरे) ठाकुर ! (जो भी भाग्यशाली आपकी शरण पड़ते हैं। वे) आपके दर्शन करके जन्म-जन्मांतरों के पाप मिटा लेते हैं। (उनके अंदर आत्मिक जीवन की सूझ की) रोशनी हो जाती है। आत्मिक आनंद का प्रकाश हो जाता है। वह सदा आत्मिक अडोलता की समाधि में लीन रहते हैं। 1। हे मेरे ठाकुर ! कौन कहता है कि आपसे कुछ भी हासिल नहीं होता। आप सारी ताकतों का मालिक प्रभू (सुखों का) अथाह (समुंद्र) है।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह-) हे कृपा के खजाने ! (जो मनुष्य आपकी शरण पड़ता है। वह आपके दर से आपका) नाम-लाभ हासिल करता है (यह नाम ही उसके वास्ते दुनिया के) रंग-रूप-रस हैं। 2। 7। 26। कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! (संसार-समुंद्र में) डूब रहा मनुष्य (गुरू के माध्यम से) परमात्मा का नाम जप के (पार लांघ सकने के लिए) हौसला प्राप्त कर लेता है। (उसके अंदर से) माया का मोह मिट जाता है। भटकना दूर हो जाती है। दुख-दर्द नाश हो जाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! मैं (भी) दिन-रात गुरू के चरणों का ध्यान धरता हूँ। हे प्रभू ! मैं जिधर-किधर देखता हूँ (गुरू की कृपा से) मुझे आपका ही सहारा दिख रहा है। 1। हे नानक ! गुरू की कृपा से (जो मनुष्य) परमात्मा के गुण गाने लग पड़ा।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: गुरू को मिल के उसने आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया। 2। 8। 27। कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरते हुए मन में आनंद प्राप्त किया जा सकता है। संत-जनों की संगति में मिल के परमात्मा की सिफतसालाह के गीत गाते रहना चाहिए 1। रहाउ। हे प्रभू ! मेहर करके (मेरे) हृदय में (अपना) ठिकाना बनाए रख। हे प्रभू ! मेरा माथा (आपके) संतजनों के चरणों पर टिका रहे। 1। हे नानक ! (कह-) हे (मेरे) मन ! परमात्मा का नाम सिमरता रह।
कानड़ा महला 5 ॥ मेरे मन प्रीति चरन प्रभ परसन ॥ रसना हरि हरि भोजनि त्रिपतानी अखीअन कउ संतोखु प्रभ दरसन ॥1॥ रहाउ ॥ करननि पूरि रहिओ जसु प्रीतम कलमल दोख सगल मल हरसन ॥ पावन धावन सुआमी सुख पंथा अंग संग काइआ संत सरसन ॥1॥ सरनि गही पूरन अबिनासी आन उपाव थकित नही करसन ॥ करु गहि लीए नानक जन अपने अंध घोर सागर नही मरसन ॥2॥10॥29॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा की सिफतसालाह के गीत सुना कर। 2। 9। 28। कानड़ा महला 5 ॥ हे मेरे मन ! (जिन मनुष्यों के अंदर) ! प्रभू के चरण-छूने के लिए तड़प होती है। उनकी जीभ परमात्मा के नाम की (आत्मिक) खुराक से तृप्त रहती है। उनकी आँखों को प्रभू-दीदार की ठंड मिली रहती है। 1। रहाउ। हे मेरे मन ! (जिन मनुष्यों के अंदर प्रभू के चरण छूने की चाहत होती है। उनके) कानों में प्रीतम-प्रभू की सिफतसालाह टिकी रहती है जो सारे पाप सारे ऐबों की मैल दूर करने के समर्थ है। उनके पैरों की दौड़-भाग मालिक-प्रभू (के मिलाप) के सुखद रास्तेपर बनी रहती है। उनके शारीरिकअंग संत जनों (के चरणों) के साथ (छू के) उल्लास में बने रहते हैं। 1। हे मेरे मन जिन मनुष्यों ने सर्व-व्यापक नाश-रहित परमात्मा की शरण पकड़ ली। वह (इस शरण को छोड़ के उसके मिलाप के लिए) और-और उपाय करके थकते नहीं फिरते।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह-) प्रभू ने जिन अपने सेवकों का हाथ पकड़ लिया होता है। वह सेवक (माया के मोह के) घोर-अंधकार भरे संसार-समुंद्र में आत्मिक मौत नहीं सहते। 2। 10। 29। कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! (जिन मनुष्यों के अंदर आत्मिक जीवन का) नाश करने वाले खोट भड़के रहते हैं। (जिनके अंदर कामादिक) दुष्ट गरजते रहते हैं। (उनको) मौत अनेकों बार मारती रहती है। 1। रहाउ। हे भाई ! (ऐसे मनुष्य) अहंकार में मस्त हुए (प्रभू को भुला के) अन्य (रसों) में रति (रंगे) रहते हैं। (ऐसे मनुष्य) खोटे मित्रों से प्यार डालते हैं। खोटों को अपना मित्र बनाते हैं। (ऐसे मनुष्य कामादिक विकारों की) लाखों गलियों को झाकते भटकते फिरते हैं। 1। हे भाई ! (ऐसे मनुष्य) नाशवंत पदार्थों के कार्य-व्यवहार में ही व्यस्त रहते हैं। उनका आचरण अच्छी मर्यादा से वंचित रहता है। वे (माया की) ममता के नशे में मस्त रहते हैं। और क्रोध की आग में जलते रहते हैं।
कानड़ा महला 5 ॥ जीअ प्रान मान दाता ॥ हरि बिसरते ही हानि ॥1॥ रहाउ ॥ गोबिंद तिआगि आन लागहि अंम्रितो डारि भूमि पागहि ॥ बिखै रस सिउ आसकत मूड़े काहे सुख मानि ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह-) हे तरस-रूप प्रभू ! हे दया के घर प्रभू ! हे सृष्टि के मालिक ! आप गरीबों का प्यारा है। (मैं आपकी) श्रण आ पड़ा हूँ। (मुझे इन कामादिक दुष्टों से) बचाए रख। 2। 11। 30। कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा (आपको) जिंद देने वाला है। प्राण देने वाला है। इज्जत देने वाला है। (ऐसे) परमात्मा को विसारते ही (आत्मिक जीवन) में घाटा ही घाटा पड़ता है। 1। रहाउ। हे मूर्ख ! परमात्मा (की याद) छोड़ के आप और-और (पदार्थों) में लगा रहता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! आप पुत्र-स्त्री और माया के मोह में (आत्मिक जीवन के पथ पर से) रुका हुआ है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।