राग: कान्हड़ा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
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बिसम बिसम बिसम ही भई है लाल गुलाल रंगारै ॥ कहु नानक संतन रसु आई है जिउ चाखि गूंगा मुसकारै ॥2॥1॥20॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। परमात्मा के गुणों का परला छोर नहीं मिल सकता। 1। हे भाई ! सोहाने प्रभू और सुंदर प्रभू के (आश्चर्यजनक) करिश्मों (को देख के) हैरान हो जाया जाता है।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- संत जनों को (आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल का) स्वाद आता है (पर। इस स्वाद को वे बयान नहीं कर सकते) जैसे (कोई) गूँगा मनुष्य (कोई स्वादिष्ट पदार्थ) चख के (सिर्फ) मुस्करा ही देता है (पर स्वाद को बयान नहीं कर सकता)। 2। 1। 20। कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! संतजनों ने प्रभू के बिना किसी और को (कहीं बसता) नहीं जाना। संतजन ऊँचे-नीचे सब जीवों में (सिर्फ परमात्मा को) एक समान (बसता) देख के मुँह से (परमात्मा का नाम) उचारते हैं और (अपने) मन में उसका ध्यान धरते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! मेरे प्राणों से प्यारे प्रभू जी। सारे डर दूर करने वाले प्रभू जी। सारे सुखों के समुंद्र प्रभू जी हरेक शरीर में मौजूद हैं। जिसके अंदर परमात्मा गुरू का शबद पक्का कर देता है। उनके मन में (आत्मिक जीवन की सूझ का) प्रकाश पैदा हो जाता है (उनके अंदर से) भटकना दूर हो जाती है। 1। हे भाई ! परमात्मा के किए को जानने वाले (संत जन) अंतरजामी करुणामय परमात्मा के गुणों की बातें करते रहते हैं।
कानड़ा महला 5 ॥ कहन कहावन कउ कई केतै ॥ ऐसो जनु बिरलो है सेवकु जो तत जोग कउ बेतै ॥1॥ रहाउ ॥ दुखु नाही सभु सुखु ही है रे एकै एकी नेतै ॥ बुरा नही सभु भला ही है रे हार नही सभ जेतै ॥1॥ सोगु नाही सदा हरखी है रे छोडि नाही किछु लेतै ॥ कहु नानक जनु हरि हरि हरि है कत आवै कत रमतै ॥2॥3॥22॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: नानक (भी) परमात्मा (के नाम) का दान माँगने के लिए आठों पहर उसकी सिफत-सालाह का गीत गाता रहता है। 2। 2। कानड़ा महला 5 ॥ ज़बानी कहने कहलवाने को तो अनेकों ही हैं। हे भाई ! ऐसा कोई विरला संत जन है। कोई विरला सेवक है। जो जगत-के-मूल-परमात्मा के मिलाप का आनंद लेता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (जो कोई विरला संत जन प्रभू-मिलाप का आनंद पाता है। उसे) कोई दुख छू नहीं सकता। (उसके अंदर सदा) आनंद ही आनंद है। वह एक परमात्मा को ही (हर जगह) आँखों से देखता है। हे भाई ! उसे कोई मनुष्य बुरा नहीं लगता। हरेक भला ही दिखता है। (दुनिया के विकारों के मुकाबले उसको) कभी हार नहीं होती। सदा जीत ही होती है। 1। हे भाई ! कोई विरला मनुष्य ही प्रभू-मिलाप का सुख पाता है। (उसको कभी) चिंता नहीं व्यापती। (उसके अंदर सदा) खुशी ही रहती है। (इस आत्मिक आनंद को) छोड़ के वह कुछ और ग्रहण नहीं करता।
कानड़ा महला 5 ॥ हीए को प्रीतमु बिसरि न जाइ ॥ तन मन गलत भए तिह संगे मोहनी मोहि रही मोरी माइ ॥1॥ रहाउ ॥ जै जै पहि कहउ ब्रिथा हउ अपुनी तेऊ तेऊ गहे रहे अटकाइ ॥ अनिक भांति की एकै जाली ता की गंठि नही छोराइ ॥1॥ फिरत फिरत नानक दासु आइओ संतन ही सरनाइ ॥ काटे अगिआन भरम मोह माइआ लीओ कंठि लगाइ ॥2॥4॥23॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- परमात्मा जो इस प्रकार का सेवक बनता है वह बार-बार जन्म मरण के चक्करों में नहीं पड़ता। 2। 3। 22। कानड़ा महला 5 ॥ हे मेरी माँ ! (मैं तो सदा यही अरदास करता हूँ कि मेरे) दिल का जानी प्रभू (मुझे कभी भी) ना भूले। (उसको भुलाने से) मन को मोहने वाली माया अपने मोह में फसाने लग जाती है। शरीर और मन (दोनों ही) उस (मोहनी) के साथ ही मस्त रहते हैं। 1। रहाउ। हे माँ ! जिन-जिन के पास मैं अपनी ये मुश्किल बताता हूँ। वे भी सभी (इस मोहनी के पँजे में) फंसे हुए हैं और (जीवन-राह में) रुके हुए हैं। (ये मोहनी) अनेकों ही रूपों का एक ही फंदा है। इसके द्वारा (डाली हुई) गाँठ को कोई नहीं खोल सकता। 1। हे नानक ! (कह- हे भाई ! अनेकों जूनियों में) भटकता-भटकता जो (मनुष्य संत जनों का) दास (बन के) संत जनों की शरण आता है।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: (उसके अंदर से) आत्मिक जीवन से बेसमझी। भटकना। और माया के मोह (की गाँठें) काटी जाती हैं। (प्रभू जी) उसको अपने गले से लगा लेते हैं। 2। 4। 23। कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! (गुरू के चरणों के साथ) मेरे हृदय में सदा आत्मिक आनंद का चाव बना रहता है (क्योंकि परमात्मा का) नाम मेरी जिंदगी का सहारा बन गया है। हरी-नाम ही (मेरा हर-वक्त) का गीत है। हरी-नाम ही मेरी सुरति का निशाना (बन चुका) है। 1। रहाउ। हे भाई ! (गुरू के चरणों का सदका अब परमात्मा का) नाम ही (मेरे वास्ते शास्त्रों का) ज्ञान है। नाम (मेरे वास्ते) तीर्थों का सनान है हरी-नाम मेरे सारे काम सिरे चढ़ाता है। हे भाई ! परमात्मा का नाम (मेरे) लिए (दुनिया की) शोभा-वडिआई है। हे भाई ! परमात्मा का नाम (ही) इस मुश्किल से तैरे जाने वाले संसार-समुंद्र से पार लंघाता है। 1। हे भाई ! यह हरी-नाम एक ऐसा कीमती पदार्थ है जिस तक (अपने उद्यम से) पहुँच नहीं हो सकती। यह एक ऐसा लाल है जो किसी भी मोल में नहीं मिलता (अनमोल है)। पर यह गुरू के चरणों में टिके रह के मिल जाता है।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- (गुरू के चरणों की बरकति से जिस मनुष्य पर) प्रभू जी दयावान होते हैं। वह अपने हृदय में ही प्रभू के दर्शन में मस्त रहता है। 2। 5। 24। कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! (सबका) सज्जन-मित्र मालिक प्रभू (हर वक्त आपके) नजदीक (बस रहा है)। वह सब जीवों के साथ बसता है (सबके कर्म) देखता है (सबकी) सुनता है थोड़ी से जिंदगी के मनोरथों की खातिर बुरे काम क्यों किए जाएं। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा के नाम के बिना और जितने भी पदार्थों के साथ आप चिपक रहा है उनमें से आपका (आखिर) कुछ भी नहीं बनना। यहाँ आप माया के मोह में फस रहा है। भ्रमों के अंधकार में (ठोकरें खा रहा है) पर परलोक में (यहाँ का किया हुआ) सब कुछ प्रत्यक्ष तौर पर दिखाई दे जाता है। 1।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।