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अंग 1301

अंग
1301
राग कान्हड़ा
राग: कान्हड़ा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुण रमंत दूख नासहि रिद भइअंत सांति ॥3॥
अंम्रिता रसु पीउ रसना नानक हरि रंगि रात ॥4॥4॥15॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! उस हरी प्रभू का नाम सदा सिमरने से करोड़ों पाप मिट जाते हैं। 2। हे भाई ! वह सज्जन-प्रभू के गुण गाते हुए (सारे) दुख नाश हो जाते हैं। हृदय में ठंड पड़ जाती है। 3।
कानड़ा महला 5 ॥
साजना संत आउ मेरै ॥1॥ रहाउ ॥
आनदा गुन गाइ मंगल कसमला मिटि जाहि परेरै ॥1॥
संत चरन धरउ माथै चांदना ग्रिहि होइ अंधेरै ॥2॥
संत प्रसादि कमलु बिगसै गोबिंद भजउ पेखि नेरै ॥3॥
प्रभ क्रिपा ते संत पाए वारि वारि नानक उह बेरै ॥4॥5॥16॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (उस सज्जन प्रभू का) आत्मिक-जीवन देने वाला नाम-जल (अपनी) जीभ से पीता रह। और हरी के प्रेम-रंग में रंगा रह। 4। 4। 15। कानड़ा महला 5 ॥ हे संत जनो ! हे सज्जनो ! आप मेरे घर आएँ। 1। रहाउ। हे सज्जनो ! (आपकी संगति में परमात्मा के) गुण गा के (मेरे दिल में) आनंद पैदा हैं जाता है। खुशियां बन जाती हैं। (मेरे अंदर से) सारे पाप मिट जाते हैं। दूर हो जाते हैं। 1। हे भाई ! जब मैं संत जनों के चरण (अपने) माथे पर रखता हूँ। मेरे अंधकार भरे (हृदय-) घर में (आत्मिक-) रौशनी होती है। 2। हे भाई ! संत जनों की कृपा से (मेरा हृदय-) कमल खिल उठता है। गोबिंद को (अपने) नजदीक देख के मैं उसका भजन करता हूँ। 3।
कानड़ा महला 5 ॥
चरन सरन गोपाल तेरी ॥
मोह मान धोह भरम राखि लीजै काटि बेरी ॥1॥ रहाउ ॥
बूडत संसार सागर ॥
उधरे हरि सिमरि रतनागर ॥1॥
सीतला हरि नामु तेरा ॥
पूरनो ठाकुर प्रभु मेरा ॥2॥
दीन दरद निवारि तारन ॥
हरि क्रिपा निधि पतित उधारन ॥3॥
कोटि जनम दूख करि पाइओ ॥
सुखी नानक गुरि नामु द्रिड़ाइओ ॥4॥6॥17॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- हे भाई !) परमात्मा की मेहर से मैं संत जनों को मिला। मैं उस वक्त से ही सदा कुर्बान जाता हूँ (जब से संतों की संगति प्राप्त हुई)। 4। 5। 16। कानड़ा महला 5 ॥ हे सृष्टि के पालनहार ! मैं आपके चरणों की शरण आया हूँ। (मेरे अंदर से) मोह। अहंकार। ठॅगी। भटकना (आदि के) फंदे काट के (मेरी) रक्षा कर। 1। रहाउ। संसार-समुंद्र में डूब रहे जीव – हे रत्नों की खान हरी ! (आपका नाम) सिमर के बच निकलते हैं। 1। हे हरी ! आपका नाम (जीवों के हृदय को) ठंढक देने वाला है। हे ठाकुर ! आप सर्व-व्यापक है। आप मेरा प्रभू है। 2। हे भाई ! परमात्मा गरीबों का दुख दूर करके (उनको दुखों के समुंद्र में से) पार लंघाने वाला है। हे भाई ! हरी दया का खजाना है। विकारियों को (विकारों से) बचाने वाला है। 3। हे नानक ! (मनुष्य) करोड़ों जन्मों के दुख सह के (मनुष्य-जन्म) हासिल करता है।
कानड़ा महला 5 ॥
धनि उह प्रीति चरन संगि लागी ॥
कोटि जाप ताप सुख पाए आइ मिले पूरन बडभागी ॥1॥ रहाउ ॥
मोहि अनाथु दासु जनु तेरा अवर ओट सगली मोहि तिआगी ॥
भोर भरम काटे प्रभ सिमरत गिआन अंजन मिलि सोवत जागी ॥1॥
तू अथाहु अति बडो सुआमी क्रिपा सिंधु पूरन रतनागी ॥
नानकु जाचकु हरि हरि नामु मांगै मसतकु आनि धरिओ प्रभ पागी ॥2॥7॥18॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: (पर) सुखी (वही) है (जिसके हृदय में) गुरू ने (परमात्मा का) नाम पक्का कर दिया है। 4। 6। 17। कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! वह प्रीत धन्य है जो (परमात्मा के) चरणों में लगती है। (उस प्रीति की बरकति से। मानो) करोड़ों जपों-तपों के सुख प्राप्त हो जाते हैं। और पूरन प्रभू जी बहुत बड़े भाग्यों से आ मिलते हैं। 1। रहाउ। हे प्रभू ! मैं आपका दास हूँ आपका सेवक हूँ। मुझे और कोई आसरा नहीं (आपके बिना) मैं और सारी ओट छोड़ चुका हूँ। हे प्रभू ! आपका नाम सिमरते हुए आपके साथ गहरी सांझ का सुरमा डाल के मेरे छोटे से छोटे भ्रम भी काटे गए हैं। (आपके चरणों में) मिल के मैं (माया के मोह की नींद में) सोई जाग उठी हॅूँ। 1। हे स्वामी ! आप एक बहुत बड़ा अथाह दया-का-सागर है। आप सर्व-व्यापक है। आप रत्नों की खान है।
कानड़ा महला 5 ॥
कुचिल कठोर कपट कामी ॥
जिउ जानहि तिउ तारि सुआमी ॥1॥ रहाउ ॥
तू समरथु सरनि जोगु तू राखहि अपनी कल धारि ॥1॥
जाप ताप नेम सुचि संजम नाही इन बिधे छुटकार ॥
गरत घोर अंध ते काढहु प्रभ नानक नदरि निहारि ॥2॥8॥19॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (आपके दर का) मंगता नानक। हे हरी ! आपका नाम माँगता है। (नानक ने अपना) माथा। हे प्रभू ! आपके चरणों पर ला के रख दिया है। 2। 7। 18। कानड़ा महला 5 ॥ हे स्वामी ! हम जीव गंदे आचरण वाले और दयाहीन हैं। ठॅगी करने वाले हैं। विषई हैं। जिस भी तरीके से आप (जीवों को पार लंघाना ठीक) समझता है। उसी तरह (इन विकारों से) पार लंघा। 1। रहाउ। हे स्वामी ! आप सारी ताकतों का मालिक है। आप शरण पड़े की रक्षा करने योग्य है। आप (जीवों को) अपनी ताकत बरत के बचाता (आ रहा) है। 1। हे नानक ! (कह-) जप। तप। व्रत-नेम। शारीरिक पवित्रता। संजम – इन तरीकों से (विकारों से जीवों की) खलासी नहीं हो सकती।
कानड़ा महला 5 घरु 4
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नाराइन नरपति नमसकारै ॥
ऐसे गुर कउ बलि बलि जाईऐ आपि मुकतु मोहि तारै ॥1॥ रहाउ ॥
कवन कवन कवन गुन कहीऐ अंतु नही कछु पारै ॥
लाख लाख लाख कई कोरै को है ऐसो बीचारै ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! आप (स्वयं ही) मेहर की निगाह से देख के (विकारों के) घोर अंधकार भरे गड्ढे में से बाहर निकाल। 2। 8। 19। कानड़ा महला 5 घरु 4 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! (प्रभू के बेअंत रंग देख-देख के जो गुरू) प्रभू-पातशाह को सदा सिर निवाता रहता है। जो (नाम की बरकति से) (दुनिया के बँधनों से) स्वयं निर्लिप है। और मुझे पार लंघाने की समर्थता रखता है। उस गुरू से सदा ही बलिहार जाना चाहिए। 1। रहाउ। हे भाई ! लाखों लोगों में करोड़ों लोगों में से कोई विरला (ऐसा मनुष्य) होता है। जो ऐसा सोचता है कि परमात्मा के सारे गुण बयान नहीं किए जा सकते।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! उस हरी प्रभू का नाम सदा सिमरने से करोड़ों पाप मिट जाते हैं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।