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अंग 1301 · कानड़ा

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अंग
1301
कानड़ा
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  1. गुण रमंत दूख नासहि रिद भइअंत सांति ॥3॥
  2. साजना संत आउ मेरै ॥1॥ रहाउ ॥
  3. चरन सरन गोपाल तेरी ॥
  4. धनि उह प्रीति चरन संगि लागी ॥
  5. कुचिल कठोर कपट कामी ॥
  6. नाराइन नरपति नमसकारै ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग कानड़ा

गुण रमंत दूख नासहि रिद भइअंत सांति ॥3॥

अंग 1300 से चला आ रहा अंश

गुण रमंत दूख नासहि रिद भइअंत सांति ॥3॥
अंम्रिता रसु पीउ रसना नानक हरि रंगि रात ॥4॥4॥15॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई! उस सज्जन-प्रभू के गुण गाते हुए (सारे) दुख नाश हो जाते हैं। हृदय में ठंड पड़ जाती है। 3। हे नानक! (उस सज्जन प्रभू का) आत्मिक-जीवन देने वाला नाम-जल (अपनी) जीभ से पीते रहें। और हरी के प्रेम-रंग में रँगे रहें। 4। 4। 15।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग कानड़ा

साजना संत आउ मेरै ॥1॥ रहाउ ॥

कानड़ा महला 5 ॥
साजना संत आउ मेरै ॥1॥ रहाउ ॥
आनदा गुन गाइ मंगल कसमला मिटि जाहि परेरै ॥1॥
संत चरन धरउ माथै चांदना ग्रिहि होइ अंधेरै ॥2॥
संत प्रसादि कमलु बिगसै गोबिंद भजउ पेखि नेरै ॥3॥
प्रभ क्रिपा ते संत पाए वारि वारि नानक उह बेरै ॥4॥5॥16॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 ॥ हे संत जनो! हे सज्जनो! आप मेरे घर आएँ। 1। रहाउ। हे सज्जनो! (आपकी संगति में परमात्मा के) गुण गा के (मेरे दिल में) आनंद पैदा हो जाता है। खुशियां बन जाती हैं। (मेरे अंदर से) सारे पाप मिट जाते हैं। दूर हो जाते हैं। 1। हे भाई! जब मैं संत जनों के चरण (अपने) माथे पर रखता हूँ। मेरे अंधकार भरे (हृदय-) घर में (आत्मिक-) रौशनी होती है। 2। हे भाई! संत जनों की कृपा से (मेरा हृदय-) कमल खिल उठता है। गोबिंद को (अपने) नजदीक देख के मैं उसका भजन करता हूँ। 3। हे नानक! (कहें: हे भाई!) परमात्मा की मेहर से मैं संत जनों को मिला। मैं उस वक्त से ही सदा कुर्बान जाता हूँ (जब से संतों की संगति प्राप्त हुई)। 4। 5। 16।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग कानड़ा

चरन सरन गोपाल तेरी ॥

कानड़ा महला 5 ॥
चरन सरन गोपाल तेरी ॥
मोह मान धोह भरम राखि लीजै काटि बेरी ॥1॥ रहाउ ॥
बूडत संसार सागर ॥
उधरे हरि सिमरि रतनागर ॥1॥
सीतला हरि नामु तेरा ॥
पूरनो ठाकुर प्रभु मेरा ॥2॥
दीन दरद निवारि तारन ॥
हरि क्रिपा निधि पतित उधारन ॥3॥
कोटि जनम दूख करि पाइओ ॥
सुखी नानक गुरि नामु द्रिड़ाइओ ॥4॥6॥17॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 ॥ हे सृष्टि के पालनहार! मैं आपके चरणों की शरण आया हूँ। (मेरे अंदर से) मोह, अहंकार, ठॅगी। भटकना (आदि के) फंदे काट के (मेरी) रक्षा करें। 1। रहाउ। संसार-समुंद्र में डूब रहे जीव, हे रत्नों की खान हरी! (आपका नाम) सिमर के बच निकलते हैं। 1। हे हरी! आपका नाम (जीवों के हृदय को) ठंढक देने वाला है। हे ठाकुर! आप सर्व-व्यापक हैं। आप मेरे प्रभू हैं। 2। हे भाई! परमात्मा गरीबों का दुख दूर करके (उनको दुखों के समुंद्र में से) पार लंघाने वाला है। हे भाई! हरी दया का खजाना है। विकारियों को (विकारों से) बचाने वाला है। 3। हे नानक! (मनुष्य) करोड़ों जन्मों के दुख सह के (मनुष्य-जन्म) हासिल करता है। (पर) सुखी (वही) है (जिसके हृदय में) गुरू ने (परमात्मा का) नाम पक्का कर दिया है। 4। 6। 17।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग कानड़ा

धनि उह प्रीति चरन संगि लागी ॥

कानड़ा महला 5 ॥
धनि उह प्रीति चरन संगि लागी ॥
कोटि जाप ताप सुख पाए आइ मिले पूरन बडभागी ॥1॥ रहाउ ॥
मोहि अनाथु दासु जनु तेरा अवर ओट सगली मोहि तिआगी ॥
भोर भरम काटे प्रभ सिमरत गिआन अंजन मिलि सोवत जागी ॥1॥
तू अथाहु अति बडो सुआमी क्रिपा सिंधु पूरन रतनागी ॥
नानकु जाचकु हरि हरि नामु मांगै मसतकु आनि धरिओ प्रभ पागी ॥2॥7॥18॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई! वह प्रीत धन्य है जो (परमात्मा के) चरणों में लगती है। (उस प्रीति की बरकति से। मानो) करोड़ों जपों-तपों के सुख प्राप्त हो जाते हैं। और पूरन प्रभू जी बहुत बड़े भाग्यों से आ मिलते हैं। 1। रहाउ। हे प्रभू! मैं आपका दास हूँ आपका सेवक हूँ। मुझे और कोई आसरा नहीं (आपके बिना) मैं और सारी ओट छोड़ चुका हूँ। हे प्रभू! आपका नाम सिमरते हुए आपके साथ गहरी सांझ का सुरमा डाल के मेरे छोटे से छोटे भ्रम भी काटे गए हैं। (आपके चरणों में) मिल के मैं (माया के मोह की नींद में) सोई जाग उठी हूँ। 1। हे स्वामी! आप एक बहुत बड़ा अथाह दया-का-सागर हैं। आप सर्व-व्यापक हैं। आप रत्नों की खान हैं। (आपके दर का) मंगता नानक। हे हरी! आपका नाम माँगता है। (नानक ने अपना) माथा। हे प्रभू! आपके चरणों पर ला के रख दिया है। 2। 7। 18।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग कानड़ा

कुचिल कठोर कपट कामी ॥

कानड़ा महला 5 ॥
कुचिल कठोर कपट कामी ॥
जिउ जानहि तिउ तारि सुआमी ॥1॥ रहाउ ॥
तू समरथु सरनि जोगु तू राखहि अपनी कल धारि ॥1॥
जाप ताप नेम सुचि संजम नाही इन बिधे छुटकार ॥
गरत घोर अंध ते काढहु प्रभ नानक नदरि निहारि ॥2॥8॥19॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 ॥ हे स्वामी! हम जीव गंदे आचरण वाले और दयाहीन हैं। ठॅगी करने वाले हैं। विषई हैं। जिस भी तरीके से आप (जीवों को पार लंघाना ठीक) समझते हैं। उसी तरह (इन विकारों से) पार लंघाएँ। 1। रहाउ। हे स्वामी! आप सारी ताकतों के मालिक हैं। आप शरण पड़े की रक्षा करने योग्य हैं। आप (जीवों को) अपनी ताकत बरत के बचाते (आ रहे) हैं। 1। हे नानक! (कहें:) जप, तप, व्रत-नेम, शारीरिक पवित्रता। संजम, इन तरीकों से (विकारों से जीवों की) खलासी नहीं हो सकती। हे प्रभू! आप (स्वयं ही) मेहर की निगाह से देख के (विकारों के) घोर अंधकार भरे गड्ढे में से बाहर निकालें। 2। 8। 19।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग कानड़ा

नाराइन नरपति नमसकारै ॥

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कानड़ा महला 5 घरु 4
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नाराइन नरपति नमसकारै ॥
ऐसे गुर कउ बलि बलि जाईऐ आपि मुकतु मोहि तारै ॥1॥ रहाउ ॥
कवन कवन कवन गुन कहीऐ अंतु नही कछु पारै ॥
लाख लाख लाख कई कोरै को है ऐसो बीचारै ॥1॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 घरु 4 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई! (प्रभू के बेअंत रंग देख-देख के जो गुरू) प्रभू-पातशाह को सदा सिर निवाता रहता है। जो (नाम की बरकति से) (दुनिया के बँधनों से) स्वयं निर्लिप है। और मुझे पार लंघाने की समर्थता रखता है। उस गुरू से सदा ही बलिहार जाना चाहिए। 1। रहाउ। हे भाई! लाखों लोगों में करोड़ों लोगों में से कोई विरला (ऐसा मनुष्य) होता है। जो ऐसा सोचता है कि परमात्मा के सारे गुण बयान नहीं किए जा सकते। परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। परमात्मा के गुणों का परला छोर नहीं मिल सकता। 1।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1301 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।