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1297
कानड़ा
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· शबद · राग कानड़ा
हरि तुम वड वडे वडे वड ऊचे सो करहि जि तुधु भावीस ॥
हरि तुम वड वडे वडे वड ऊचे सो करहि जि तुधु भावीस ॥
जन नानक अंम्रितु पीआ गुरमती धनु धंनु धनु धंनु धंनु गुरू साबीस ॥2॥2॥8॥
जन नानक अंम्रितु पीआ गुरमती धनु धंनु धनु धंनु धंनु गुरू साबीस ॥2॥2॥8॥
हिन्दी अर्थ: हे हरी! आप सबसे बड़े हैं। आप बहुत बड़े हैं। आप वह करते हैं जो आपको अच्छा लगता है। हे दास नानक! (कहें:) वह गुरू धन्य है। सराहनीय है। जिसकी मति ले के प्रभू का आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पी लिया जाता है। 2। 2। 8।
· शबद · राग कानड़ा
भजु रामो मनि राम ॥
कानड़ा महला 4 ॥
भजु रामो मनि राम ॥
जिसु रूप न रेख वडाम ॥
सतसंगति मिलु भजु राम ॥
बड हो हो भाग मथाम ॥1॥ रहाउ ॥
जितु ग्रिहि मंदरि हरि होतु जासु तितु घरि आनदो आनंदु भजु राम राम राम ॥
राम नाम गुन गावहु हरि प्रीतम उपदेसि गुरू गुर सतिगुरा सुखु होतु हरि हरे हरि हरे हरे भजु राम राम राम ॥1॥
सभ सिसटि धार हरि तुम किरपाल करता सभु तू तू तू राम राम राम ॥
जन नानको सरणागती देहु गुरमती भजु राम राम राम ॥2॥3॥9॥
भजु रामो मनि राम ॥
जिसु रूप न रेख वडाम ॥
सतसंगति मिलु भजु राम ॥
बड हो हो भाग मथाम ॥1॥ रहाउ ॥
जितु ग्रिहि मंदरि हरि होतु जासु तितु घरि आनदो आनंदु भजु राम राम राम ॥
राम नाम गुन गावहु हरि प्रीतम उपदेसि गुरू गुर सतिगुरा सुखु होतु हरि हरे हरि हरे हरे भजु राम राम राम ॥1॥
सभ सिसटि धार हरि तुम किरपाल करता सभु तू तू तू राम राम राम ॥
जन नानको सरणागती देहु गुरमती भजु राम राम राम ॥2॥3॥9॥
हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 4 ॥ राम नाम का भजन अपने मन में किया करें। हे भाई! जिस राम की शकल जिसके चक्र-चिन्ह नहीं बताए जा सकते। जो राम सबसे बड़ा है। हे भाई! साध-संगति में मिलें और राम का भजन करें। आपके माथे के बड़े भाग्य हो जाएंगे। 1। रहाउ। हे भाई! जिस हृदय-घर में जिस हृदय-मंदिर में परमात्मा की सिफत-सालाह होती है। उस हृदय-धर में आनंद ही आनंद बना रहता है। हे भाई! सदा राम का भजन करते रहें। हे भाई! हरी प्रीतम के नाम का गुण गाते रहें। गुरू सतिगुरू के उपदेश से गुण गाते रहें। राम-नाम का भजन करते रहें। हरी-नाम को जपने से आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। 1। हे हरी! आप सारी सृष्टि का आसरा हैं। आप दया का घर हैं। आप सबको पैदा करने वाले हैं। हर जगह आप ही आप हैं। दास नानक आपकी शरण आया है। (दास को) गुरू की शिक्षा बख्शें। हे भाई! सदा राम के नाम का भजन करते रहें। 2। 3। 9।
· शबद · राग कानड़ा
सतिगुर चाटउ पग चाट ॥
कानड़ा महला 4 ॥
सतिगुर चाटउ पग चाट ॥
जितु मिलि हरि पाधर बाट ॥
भजु हरि रसु रस हरि गाट ॥
हरि हो हो लिखे लिलाट ॥1॥ रहाउ ॥
खट करम किरिआ करि बहु बहु बिसथार सिध साधिक जोगीआ करि जट जटा जट जाट ॥
करि भेख न पाईऐ हरि ब्रहम जोगु हरि पाईऐ सतसंगती उपदेसि गुरू गुर संत जना खोलि खोलि कपाट ॥1॥
तू अपरंपरु सुआमी अति अगाहु तू भरपुरि रहिआ जल थले हरि इकु इको इक एकै हरि थाट ॥
तू जाणहि सभ बिधि बूझहि आपे जन नानक के प्रभ घटि घटे घटि घटे घटि हरि घाट ॥2॥4॥10॥
सतिगुर चाटउ पग चाट ॥
जितु मिलि हरि पाधर बाट ॥
भजु हरि रसु रस हरि गाट ॥
हरि हो हो लिखे लिलाट ॥1॥ रहाउ ॥
खट करम किरिआ करि बहु बहु बिसथार सिध साधिक जोगीआ करि जट जटा जट जाट ॥
करि भेख न पाईऐ हरि ब्रहम जोगु हरि पाईऐ सतसंगती उपदेसि गुरू गुर संत जना खोलि खोलि कपाट ॥1॥
तू अपरंपरु सुआमी अति अगाहु तू भरपुरि रहिआ जल थले हरि इकु इको इक एकै हरि थाट ॥
तू जाणहि सभ बिधि बूझहि आपे जन नानक के प्रभ घटि घटे घटि घटे घटि हरि घाट ॥2॥4॥10॥
हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 4 ॥ मैं उस गुरू के चरण चूमता हूँ। हे भाई! जिस गुरू को मिल के परमात्मा के मिलाप का सीधा रारस्ता मिल जाता है। हे भाई! (आप भी गुरू की शरण पड़ के) परमात्मा का भजन किया करें। परमात्मा का नाम-जल गट-गट कर के पिया करें। आपके माथे के लेख उघड़ पड़ेंगे। 1। रहाउ। हे भाई! (पंडितों की तरह शास्त्रों द्वारा बताए गए) छह कर्मों की क्रिया करके (इस तरह के) और भी बहुत सारे पसारे करके, सिध जोगी साधिकों की तरह जटाएं धार के, धार्मिक पहरावे पहनने से परमात्मा का मिलाप हासिल नहीं किया जा सकता। परमात्मा मिलता है साध-संगति में। (इस वास्ते, हे भाई!) संत जनों की संगति में रह के गुरू के उपदेश से आप अपने मन के किवाड़ खोलें। 1। हे प्रभू! हे मालिक! आप परे से परे हैं। आप बहुत अथाह हैं। आप पानी में धरती पर हर जगह व्यापक हैं। हे हरी! ये सारी जगत-उत्पक्ति सिर्फ आपकी ही है। (इस सृष्टि के बारे) आप सारे ढंग जानते हैं। आप खुद ही समझते हैं। हे दास नानक के प्रभू! आप हरेक शरीर में हरेक देही में मौजूद हैं। 2। 4। 10।
· शबद · राग कानड़ा
जपि मन गोबिद माधो ॥
कानड़ा महला 4 ॥
जपि मन गोबिद माधो ॥
हरि हरि अगम अगाधो ॥
मति गुरमति हरि प्रभु लाधो ॥
धुरि हो हो लिखे लिलाधो ॥1॥ रहाउ ॥
बिखु माइआ संचि बहु चितै बिकार सुखु पाईऐ हरि भजु संत संत संगती मिलि सतिगुरू गुरु साधो ॥
जिउ छुहि पारस मनूर भए कंचन तिउ पतित जन मिलि संगती सुध होवत गुरमती सुध हाधो ॥1॥
जिउ कासट संगि लोहा बहु तरता तिउ पापी संगि तरे साध साध संगती गुर सतिगुरू गुर साधो ॥
चारि बरन चारि आस्रम है कोई मिलै गुरू गुर नानक सो आपि तरै कुल सगल तराधो ॥2॥5॥11॥
जपि मन गोबिद माधो ॥
हरि हरि अगम अगाधो ॥
मति गुरमति हरि प्रभु लाधो ॥
धुरि हो हो लिखे लिलाधो ॥1॥ रहाउ ॥
बिखु माइआ संचि बहु चितै बिकार सुखु पाईऐ हरि भजु संत संत संगती मिलि सतिगुरू गुरु साधो ॥
जिउ छुहि पारस मनूर भए कंचन तिउ पतित जन मिलि संगती सुध होवत गुरमती सुध हाधो ॥1॥
जिउ कासट संगि लोहा बहु तरता तिउ पापी संगि तरे साध साध संगती गुर सतिगुरू गुर साधो ॥
चारि बरन चारि आस्रम है कोई मिलै गुरू गुर नानक सो आपि तरै कुल सगल तराधो ॥2॥5॥11॥
हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 4 ॥ हे मन! माया के पति गोबिंद का नाम जपा करें। जो अपहुँच है और अथाह है। उसको गुरू की मति द्वारा परमात्मा मिल जाता है। हे भाई! जिस मनुष्य के माथे पर धुर दरगाह से (प्रभू मिलाप का लेख) लिखा होता है। 1। रहाउ। हे भाई! आत्मिक मौत लाने वाली माया को संचित करके मनुष्य अनेकों विकार चितवने लग जाता है। हे भाई! साध-संगति में मिल के, गुरू सतिगुरू को मिल के हरी-नाम का भजन किया करें (इस तरह ही) सुख मिलता है। हे भाई! जैसे पारस को छू के जला हुआ लोहा सोना बन जाता है; वैसे ही विकारी मनुष्य साध-संगति में मिल के, गुरू की मति ले के, सुच्चे जीवन वाले बन जाते हैं। 1। हे भाई! जैसे काठ (बेड़ी, नाव) की संगति में बहुत सारा लोहा (नदी से) पार लांघ जाता है, वैसे ही विकारी मनुष्य भी साध-संगति में गुरू की संगति में रह के (संसार-समुंद्र से) तैर जाते हैं। हे नानक! (ब्राहमण, खत्री आदि) चार वर्ण (प्रसिद्ध) हैं। (ब्रहमचर्य आदि) चार आश्रम (प्रसिद्ध) हैं। (इनमें से) जो भी कोई गुरू को मिलता है। वह खुद (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाता है। और अपनी सारी कुलों को भी पार लंघा लेता है। 2। 5। 11।
· शबद · राग कानड़ा
हरि जसु गावहु भगवान ॥
कानड़ा महला 4 ॥
हरि जसु गावहु भगवान ॥
जसु गावत पाप लहान ॥
मति गुरमति सुनि जसु कान ॥
हरि हो हो किरपान ॥1॥ रहाउ ॥
हरि जसु गावहु भगवान ॥
जसु गावत पाप लहान ॥
मति गुरमति सुनि जसु कान ॥
हरि हो हो किरपान ॥1॥ रहाउ ॥
हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 4 ॥ हे भाई! हरी के भगवान के गुण गाया करें। (हरी के) गुण गाते हुए पाप दूर हो जाते हैं। हे भाई! गुरू की मति ले के (अपने) कानो से हरी की सिफत-सालाह सुना करें। हरी दयावान हो जाता है। 1। रहाउ।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1297 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।