इस पृष्ठ पर
अंग
1293
मलार
अंग बदलें या अंश चुनें · 3 अंश
· शबद · राग मलार
मलार बाणी भगत रविदास जी की
मलार बाणी भगत रविदास जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नागर जनां मेरी जाति बिखिआत चंमारं ॥
रिदै राम गोबिंद गुन सारं ॥1॥ रहाउ ॥
सुरसरी सलल क्रित बारुनी रे संत जन करत नही पानं ॥
सुरा अपवित्र नत अवर जल रे सुरसरी मिलत नहि होइ आनं ॥1॥
तर तारि अपवित्र करि मानीऐ रे जैसे कागरा करत बीचारं ॥
भगति भागउतु लिखीऐ तिह ऊपरे पूजीऐ करि नमसकारं ॥2॥
मेरी जाति कुट बांढला ढोर ढोवंता नितहि बानारसी आस पासा ॥
अब बिप्र परधान तिहि करहि डंडउति तेरे नाम सरणाइ रविदासु दासा ॥3॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नागर जनां मेरी जाति बिखिआत चंमारं ॥
रिदै राम गोबिंद गुन सारं ॥1॥ रहाउ ॥
सुरसरी सलल क्रित बारुनी रे संत जन करत नही पानं ॥
सुरा अपवित्र नत अवर जल रे सुरसरी मिलत नहि होइ आनं ॥1॥
तर तारि अपवित्र करि मानीऐ रे जैसे कागरा करत बीचारं ॥
भगति भागउतु लिखीऐ तिह ऊपरे पूजीऐ करि नमसकारं ॥2॥
मेरी जाति कुट बांढला ढोर ढोवंता नितहि बानारसी आस पासा ॥
अब बिप्र परधान तिहि करहि डंडउति तेरे नाम सरणाइ रविदासु दासा ॥3॥1॥
हिन्दी अर्थ: मलार बाणी भगत रविदास जी की ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे नगर के लोगो ! यह बात तो जानी-मानी है कि मेरी जाति है चमार (जिसको आप लोग बहुत नीची समझते हैं। पर) मैं अपने हृदय में प्रभू के गुण याद करता रहता हूँ (इसलिए मैं नीच नहीं रह गया)। 1। रहाउ। हे भाई ! गंगा के (भी) पानी से बनाया हुआ शराब गुरमुखि लोग नहीं पीते (भाव। वह शराब ग्रहण करने योग्य नहीं। इसी तरह अहंकार भी अवगुण ही है। चाहे वह ऊँची और पवित्र जाति का किया जाए)। पर। हे भाई ! अपवित्र शराब और चाहे और (गंदा) पानी भी हो। वह गंगा (के पानी) में मिल के (उससे) अलग नहीं रह जाते (इसी तरह नीच कुल का व्यक्ति भी परम-पवित्र-प्रभू में जुड़ के उससे अलग नहीं रह जाता)। 1। हे भाई ! ताड़ी के वृक्ष अपवित्र माने जाते हैं। उसी तरह उन पेड़ों से बने हुए कागज़ों के बारे में भी लोग विचार करते हैं (भाव। उन कागज़ों को भी अपवित्र समझते हैं)। पर। जब भगवान की सिफत-सालाह उन पर लिखी जाती है तो उनकी पूजा की जाती है। 2। मेरी जाति के लोग (चंमड़ा) कूटने और काटने वाले बनारस के इर्द-गिर्द (रहते हैं। और) नित्य मरे पशू ढोते हैं; पर। (हे प्रभू !) उसी कुल में पैदा होया हुआ आपका सेवक रविदास आपके नाम की शरण आया है। उसको अब बड़े-बड़े ब्राहमण नमस्कार करते हैं। 3। 1।
· शबद · राग मलार
मलार ॥
मलार ॥
हरि जपत तेऊ जना पदम कवलास पति तास सम तुलि नही आन कोऊ ॥
एक ही एक अनेक होइ बिसथरिओ आन रे आन भरपूरि सोऊ ॥ रहाउ ॥
जा कै भागवतु लेखीऐ अवरु नही पेखीऐ तास की जाति आछोप छीपा ॥
बिआस महि लेखीऐ सनक महि पेखीऐ नाम की नामना सपत दीपा ॥1॥
जा कै ईदि बकरीदि कुल गऊ रे बधु करहि मानीअहि सेख सहीद पीरा ॥
जा कै बाप वैसी करी पूत ऐसी सरी तिहू रे लोक परसिध कबीरा ॥2॥
जा के कुटंब के ढेढ सभ ढोर ढोवंत फिरहि अजहु बंनारसी आस पासा ॥
आचार सहित बिप्र करहि डंडउति तिन तनै रविदास दासान दासा ॥3॥2॥
हरि जपत तेऊ जना पदम कवलास पति तास सम तुलि नही आन कोऊ ॥
एक ही एक अनेक होइ बिसथरिओ आन रे आन भरपूरि सोऊ ॥ रहाउ ॥
जा कै भागवतु लेखीऐ अवरु नही पेखीऐ तास की जाति आछोप छीपा ॥
बिआस महि लेखीऐ सनक महि पेखीऐ नाम की नामना सपत दीपा ॥1॥
जा कै ईदि बकरीदि कुल गऊ रे बधु करहि मानीअहि सेख सहीद पीरा ॥
जा कै बाप वैसी करी पूत ऐसी सरी तिहू रे लोक परसिध कबीरा ॥2॥
जा के कुटंब के ढेढ सभ ढोर ढोवंत फिरहि अजहु बंनारसी आस पासा ॥
आचार सहित बिप्र करहि डंडउति तिन तनै रविदास दासान दासा ॥3॥2॥
हिन्दी अर्थ: मलार ॥ जो मनुष्य माया के पति परमात्मा को सिमरते हैं। वे प्रभू के (अनन्य) सेवक बन जाते हैं। उनको उस प्रभू जैसा। उस प्रभू के बराबर का। कोई और नहीं दिखता (इस वास्ते वे किसी का दबाव नहीं मानते)। हे भाई ! उनको एक परमात्मा ही अनेक रूपों में व्यापक। घट घट में भरपूर दिखता है। रहाउ। जिस (नामदेव) के घर में प्रभू की सिफत-सालाह लिखी जा रही है। (प्रभू-नाम के बिना) कुछ और देखने में नहीं आता (ऊँची जाति वालों के लिए तो) उसकी जाति छींबा है और वह अछूत है (पर उसकी उपमा तीनों लोकों में हो रही है); (ऋषि) ब्यास (के धर्म-पुस्तक) में लिखा मिलता है। सनक (आदि के पुस्तक) में भी देखने में आता है कि हरी-नाम की वडिआई सारे संसार में होती है। 1। हे भाई ! जिस (कबीर) की जाति के लोग (मुसलमान बन कर) ईद-बकरीद के समय (अब) गऊएं हलाल करते हैं और जिनके घरों में अब शेखों शहीदों और पीरों की मान्यता होती है। जिस (कबीर) की जाति के बड़े-बुर्जुगों ने यह कर दिखाया। उनकी ही जाति में पैदा हुए पुत्र से ऐसा हो गया (कि इस्लामी हकूमत के दबाव से निडर रह के हरी-नाम सिमर के) सारे संसार में मशहूर हो गया। 2। जिसके खानदान के नीच लोग बनारस के आसपास (बसते हैं और) अभी तक मरे हुए पशू ढोते हैं। उनकी ही कुल में पैदा हुए पुत्र रविदास को। जो प्रभू के दासों का दास बन गया है। शास्त्रों की मर्यादा अनुसार चलने वाले ब्राहमण नमस्कार करते हैं। 3। 2।
· शबद · राग मलार
मलार
मलार
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मिलत पिआरो प्रान नाथु कवन भगति ते ॥
साधसंगति पाई परम गते ॥ रहाउ ॥
मैले कपरे कहा लउ धोवउ ॥
आवैगी नीद कहा लगु सोवउ ॥1॥
जोई जोई जोरिओ सोई सोई फाटिओ ॥
झूठै बनजि उठि ही गई हाटिओ ॥2॥
कहु रविदास भइओ जब लेखो ॥
जोई जोई कीनो सोई सोई देखिओ ॥3॥1॥3॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मिलत पिआरो प्रान नाथु कवन भगति ते ॥
साधसंगति पाई परम गते ॥ रहाउ ॥
मैले कपरे कहा लउ धोवउ ॥
आवैगी नीद कहा लगु सोवउ ॥1॥
जोई जोई जोरिओ सोई सोई फाटिओ ॥
झूठै बनजि उठि ही गई हाटिओ ॥2॥
कहु रविदास भइओ जब लेखो ॥
जोई जोई कीनो सोई सोई देखिओ ॥3॥1॥3॥
हिन्दी अर्थ: मलार ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। जिंद का सांई प्यारा प्रभू किसी और तरह की भगती से नहीं था मिल सकता। (पर) साध-संगति में पहुँच के मैंने सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर ली है। रहाउ। (साध-संगति की बरकति से) अब मैंने पराई निंदा करनी छोड़ दी है। (सत्संग में रहने के कारण) ना मुझे अज्ञानता की नींद आएगी और ना ही मैं गाफिल होऊँगा। 1। (साध-संगति में आने से पहले) मैंने जितनी भी बुरे-कर्मों की कमाई की हुई थी (सत्संग में आ के) उस सारी की सारी का लेखा समाप्त हो गया है। झूठे वणज में (लग के मैंने जो दुकान खोली हुई थी। साध-संगति की कृपा से) वह दुकान ही उठ गई है। 2। (ये तब्दीली कैसे आई।) हे रविदास ! कह- (साध-संगति में आ कर) जब मैंने अपने अंदर झाँका। तब जो-जो कर्म मैंने किए हुए थे वे सब कुछ प्रत्यक्ष दिखाई दे गए (और मैं बुरे-कर्मों से शर्मा के इनसे दूर हट गया)। 3।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत रविदास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1293 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।