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अंग 1294

अंग
1294
राग कान्हड़ा
राग: कान्हड़ा · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रागु कानड़ा चउपदे महला 4 घरु 1
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
मेरा मनु साध जनां मिलि हरिआ ॥
हउ बलि बलि बलि बलि साध जनां कउ मिलि संगति पारि उतरिआ ॥1॥ रहाउ ॥
हरि हरि क्रिपा करहु प्रभ अपनी हम साध जनां पग परिआ ॥
धनु धनु साध जिन हरि प्रभु जानिआ मिलि साधू पतित उधरिआ ॥1॥
मनूआ चलै चलै बहु बहु बिधि मिलि साधू वसगति करिआ ॥
जिउं जल तंतु पसारिओ बधकि ग्रसि मीना वसगति खरिआ ॥2॥
हरि के संत संत भल नीके मिलि संत जना मलु लहीआ ॥
हउमै दुरतु गइआ सभु नीकरि जिउ साबुनि कापरु करिआ ॥3॥
मसतकि लिलाटि लिखिआ धुरि ठाकुरि गुर सतिगुर चरन उर धरिआ ॥
सभु दालदु दूख भंज प्रभु पाइआ जन नानक नामि उधरिआ ॥4॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: रागु कानड़ा चउपदे महला 4 घरु 1 वह अनंतशक्ति परमात्मा एक है, नाम उसका सत्य है, वह सृष्टि को बनानेवाला है, सर्वशक्तिमान है, वह निर्भय है, वह वैर भावना से रहित है, वह कालातीत ब्रह्म-मूर्ति सदा अमर है, वह जन्म-मरण के चक्र से रहित है, स्वजन्मा है, गुरु की कृपा से प्राप्त होता है। हे भाई ! मेरा मन संत-जनों को मिल के आत्मिक जीवन वाला बन गया है। मैं संत-जनों के सदके जाता हूँ। कुर्बान जाता हूँ। (संत-जनों की) संगति में मिल के (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाया जाता है। 1। रहाउ। हे हरी ! हे प्रभू ! (मेरे पर) अपनी मेहर कर। मैं संत-जनों के चरणों में लगा रहूँ। हे भाई ! शाबाश है संतजनों को जिन्होंने परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाली हुई है। संतजनों को मिल के विकारों में गिरे हुए मनुष्य विकारों से बच जाते हैं। 1। हे भाई ! (मनुष्य का) मन (आम तौर पर) कई तरीकों से सदा भटकता फिरता है। संत जनों को मिल के (इस तरह) वश में कर लिया जाता है। जैसे किसी शिकारी ने जाल बिछाया। और मछली को (काँटे में) फसा के काबू कर के ले गया। 2। हे भाई ! परमात्मा के सेवक संत-जन भले और अच्छे जीवन वाले होते हैं। संत-जनों को मिल के (मन की विकारों की) मैल उतर जाती है। जैसे साबुन के साथ कपड़ा (साफ) कर लिया जाता है। (वैसे ही संतजनों की संगति में मनुष्य के अंदर से) अहंकार का विकार सारा निकल जाता है। 3। हे दास नानक ! जिस मानव के माथे पर ठाकुर-प्रभु ने पराकाष्ठा दरगाहा से (गुरू -मिलाप का लेख) लिख दिया। उस ने गुरू के चरण अपने हृदय में बसा लिए। उस ने वह परमात्मा ढूँढ लिया जो सारी ग़रीबी सभी दुखों का नाश करन वाला है। वह मानव नाम में (जुड़ कर संसार-समुद्र से) पार गुज़र गया । 4। 1।
कानड़ा महला 4 ॥
मेरा मनु संत जना पग रेन ॥
हरि हरि कथा सुनी मिलि संगति मनु कोरा हरि रंगि भेन ॥1॥ रहाउ ॥
हम अचित अचेत न जानहि गति मिति गुरि कीए सुचित चितेन ॥
प्रभि दीन दइआलि कीओ अंगीक्रितु मनि हरि हरि नामु जपेन ॥1॥
हरि के संत मिलहि मन प्रीतम कटि देवउ हीअरा तेन ॥
हरि के संत मिले हरि मिलिआ हम कीए पतित पवेन ॥2॥
हरि के जन ऊतम जगि कहीअहि जिन मिलिआ पाथर सेन ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 4 ॥ हे भाई ! मेरा मन संत जनों के चरणों की धूड़ (माँगता है)। हे भाई ! संत जनों की संगति में मिल के (जिसने भी) परमात्मा की सिफत-सालाह सुनी। उसका कोरा मन परमात्मा के प्रेम-रंग में भीग गया। 1। रहाउ। हे भाई ! हम जीव (परमात्मा की ओर से) बे-ध्याने गाफिल रहते हैं हम नहीं जानते कि परमात्मा किस तरह की ऊँची अवस्था वाला है और कितना बेअंत बड़ा है। (जो गुरू की शरण पड़ गए। उनको) गुरू ने समझदार चित्त वाले बना दिया। दीनों पर दया करने वाले प्रभू ने जिसका पक्ष किया उसने अपने मन में परमात्मा का नाम जपना शुरू कर दिया। 1। हे भाई ! अगर (मेरे) मन के प्यारे संत-जन (मुझे) मिल जाएं। तो मैं उनको (अपना) हृदय काट के दे दूँ। (जिनको) परमात्मा के संत-जन मिल गए। उनको परमात्मा मिल गया। हे भाई ! संत जन हम जीवों को पतितों को पवित्र कर लेते हैं। 2। हे भाई ! परमात्मा के सेवक जगत में ऊँचें जीवन वाले कहलवाते हैं। क्योंकि उनको मिलने पर पत्थर (भी अंदर से) भीग जाते हैं (पत्थर-दिल मनुष्य भी नर्म-दिल हो जाते हैं)।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु कानड़ा चउपदे महला 4 घरु 1 वह अनंतशक्ति परमात्मा एक है, नाम उसका सत्य है, वह सृष्टि को बनानेवाला है, सर्वशक्तिमान है, वह निर्भय है, वह वैर भावना से रहित है, वह कालातीत ब्रह्म-मू।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।