ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
मेरा मनु साध जनां मिलि हरिआ ॥
हउ बलि बलि बलि बलि साध जनां कउ मिलि संगति पारि उतरिआ ॥1॥ रहाउ ॥
हरि हरि क्रिपा करहु प्रभ अपनी हम साध जनां पग परिआ ॥
धनु धनु साध जिन हरि प्रभु जानिआ मिलि साधू पतित उधरिआ ॥1॥
मनूआ चलै चलै बहु बहु बिधि मिलि साधू वसगति करिआ ॥
जिउं जल तंतु पसारिओ बधकि ग्रसि मीना वसगति खरिआ ॥2॥
हरि के संत संत भल नीके मिलि संत जना मलु लहीआ ॥
हउमै दुरतु गइआ सभु नीकरि जिउ साबुनि कापरु करिआ ॥3॥
मसतकि लिलाटि लिखिआ धुरि ठाकुरि गुर सतिगुर चरन उर धरिआ ॥
सभु दालदु दूख भंज प्रभु पाइआ जन नानक नामि उधरिआ ॥4॥1॥
मेरा मनु संत जना पग रेन ॥
हरि हरि कथा सुनी मिलि संगति मनु कोरा हरि रंगि भेन ॥1॥ रहाउ ॥
हम अचित अचेत न जानहि गति मिति गुरि कीए सुचित चितेन ॥
प्रभि दीन दइआलि कीओ अंगीक्रितु मनि हरि हरि नामु जपेन ॥1॥
हरि के संत मिलहि मन प्रीतम कटि देवउ हीअरा तेन ॥
हरि के संत मिले हरि मिलिआ हम कीए पतित पवेन ॥2॥
हरि के जन ऊतम जगि कहीअहि जिन मिलिआ पाथर सेन ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु कानड़ा चउपदे महला 4 घरु 1 वह अनंतशक्ति परमात्मा एक है, नाम उसका सत्य है, वह सृष्टि को बनानेवाला है, सर्वशक्तिमान है, वह निर्भय है, वह वैर भावना से रहित है, वह कालातीत ब्रह्म-मू।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।