नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ हवा पनी और आग (आदि तत्वों का मेल मिला के और उसमें जीवात्मा डाल के प्रभू ने) जीव बनाया। (तत्व सब जीवों में एक समान हैं। पर आश्चर्यजनक खेल यह है कि) इनको कईयों को दुख और कईयों को सुख (मिल रहे हैं)। कई धरती पर हैं (भाव। साधारण सी हालत में हैं) कई (मानो) पाताल में पड़े हुए हैं (भाव। कई उभरे हुए उच्च दर्जे पर हैं) कई (मानो) आकाश में हैं (भाव। कई हुकम चला रहे हैं)। और कई (राजाओं के) दरबार में वज़ीर बने हुए हैं। कई लोगों की बड़ी उमर है। कई (कम उम्र में) मर के दुखी होते हैं। कई लोग (औरों को भी) दे के स्वयं भी बरतते हैं (पर। उनका धन) खत्म नहीं होता। कई सदा कंगाल फिरते हैं। प्रभू अपने हुकम अनुसार एक पलक में लाखों जीव पैदा करता है लाखों नाश करता है। हरेक जीव (अपने किए कर्मों के अनुसार रज़ा-रूपी) नाथ में जकड़ा हुआ है। जिस पर वह बख्शिश करता है उसके बँधन तोड़ता है। पर। प्रभू खुद कर्मों के लेखे से ऊपर है। उसका कोई रंग-रूप नहीं है और कोई चक्र-चिन्ह नहीं। उसके स्वरूप का बयान नहीं किया जा सकता; वैसे वह हर जगह अस्तित्व वाला दिखता है। हे नानक ! जीव जो कुछ कर रहे हैं और बोल रहे हैं वह सब प्रभू द्वारा रची हुई कार ही है। और वह स्वयं ऐसा है जिसका बयान नहीं किया जा सकता। जो मनुष्य उस अकॅथ प्रभू की बातें सुनता है (भाव। गुण गाता है) उसको ऊँची समझ प्राप्त होती है उसको सुख मिलता है (मानो) उसको रिद्धियाँ-सिद्धियाँ मिल गई हों। 1।
मः 1 ॥ अजरु जरै त नउ कुल बंधु ॥ पूजै प्राण होवै थिरु कंधु ॥ कहां ते आइआ कहां एहु जाणु ॥ जीवत मरत रहै परवाणु ॥ हुकमै बूझै ततु पछाणै ॥ इहु परसादु गुरू ते जाणै ॥ होंदा फड़ीअगु नानक जाणु ॥ ना हउ ना मै जूनी पाणु ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ जब मनुष्य मन की उस अवस्था पर काबू पा लेता है जिस पर काबू पाना कठिन होता है (भाव। जब मनुष्य मन को विकारों में गिरने से रोक लेता है। जब मनुष्य श्वास-श्वास प्रभू को सिमरता है तो इसके नौ की नौ (कर्म और ज्ञान) इन्द्रियाँ जायज़ सीमा में रहती हैं। इसका शरीर विकारों से अडोल हो जाता है। कहाँ से आया और कहाँ इसने जाना है। (भाव। इसका ‘जनम-मरण का चक्कर’ मिट जाता है)। जीवत-भाव (फायदे वाली ख्वाहिशों) से मर के (प्रभू के दर पर) परवान हो जाता है। तब जीव परमात्मा की रज़ा को समझ लेता है। अस्लियत को पहचान लेता है- ये मेहर इसको गुरू से मिलती है। सो। हे नानक ! ये समझ लो कि वही फसता है जो कहता है ‘मैं हूँ’ ‘मैं हूँ’ जहाँ ‘हउ’ नहीं वहाँ ‘मैं’ नहीं। वहाँ दुनिया में पड़ने (के लिए दुख भी) नहीं। 2।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे भाई !) प्रभू का ‘नाम’ पढ़ना चाहिए। सिफतसालाह पढ़नी चाहिए। ‘नाम’ के बिना और बुद्धिमक्ता व्यर्थ हैं; (‘नाम’ ही सच्चा व्यापार है। इस) सच्चे व्यापार के बिना जीवन व्यर्थ जाता है। (इन और-और किस्मों की बुद्धियों और चतुराईयों से) कभी किसी ने प्रभू का अंत नहीं पाया। उसका परला-उरला किनारा नहीं पाया। (हाँ। इन अक्लों के कारण) सारा जगत अहंकार में अंधा हो जाता है। इन (नाम-हीन विद्वानों) को ‘सत्य’ (भाव। ‘नाम’ सिमरना) अच्छा नहीं लगता। (ज्यों-ज्यों) ये नाम भुला के चलते हैं (‘अहंकार’ के कारण। मानो।) कड़ाहे में तले जाते हैं (इनके हृदय में पैदा होई हुई) दुविधा। मानो। जलती हुई आग में तेल डाला जाता है (भाव। ‘दुविधा’ के कारण विद्या से पैदा हुआ अहंकार और ज्यादा दुखी करता है)। (ऐसा व्यक्ति जगत में) आता है और मर जाता है (भाव। व्यर्थ जीवन गुजार जाता है। और सारी उम्र) अवैड़ा ही भ्रमित होता फिरता है। हे नानक ! सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू में उस बँदे का मेल होता है जो उस सच्चे (के प्यार) में रंगा होता है। 24।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ सबसे पहले माँस (भाव। पिता के वीर्य) से ही (जीव के अस्तित्व का) आरम्भ होता है। (फिर) माँस (भाव। माँ के पेट) में ही इसका बसेवा होता है; जब (पुतले में) जान पड़ती है तब भी (जीभ-रूपी) माँस मुँह में मिलता है (इसके शरीर की सारी ही घाड़त) हड्डी चमड़ी और शरीर सब कुछ मास (ही बनता है)। जब (माँ के पेट-रूप) माँस में से बाहर भेजा जाता है तो भी स्तन (-रूप) माँस खुराक मिलती है; इसका मुँह भी माँस का है जीभ भी मास की है। माँस में ही साँस लेता है। जब जवान होता है और ब्याहा जाता है तो भी (स्त्री-रूप) माँस ही घर ले के आता है; (फिर) माँस से ही (बच्चा-रूप) माँस पैदा होता है; (सो। जगत का सारा) साक-संबंध माँस से ही है। (माँस खाने व ना खाने पर निर्णय समझने की जगह) यदि सतिगुरू मिल जाए तो प्रभू की रज़ा समझें तब जीव (का जगत में आना) सफल होता है (नहीं तो जीव का पैदा होने से लेकर मरने तक माँस से इतना गहरा वास्ता पड़ता है कि) अपने जोर से इससे बचने से कोई मुक्ति नहीं होती। और हे नानक ! (इस किस्म की) चर्चा से (सिर्फ) हानि ही होती है। 1।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (अपनी तरफ़ से माँ का त्यागी) मूर्ख (पण्डित) मास-मास कह के चर्चा करता है। पर। ना इसको आत्मिक जीवन की समझ ना ही इसको सुरति है (वरना। ये ध्यान से बिचारे कि) माँस और साग में क्या फर्क है। और किस (के खाने) में पाप है। (पुराने समय में भी। लोग) देवताओं के स्वभाव के अनुसार (भाव। देवताओं को खुश करने के लिए) गैंडा मार के हवन और यज्ञ करते थे। जो मनुष्य (अपनी ओर से) माँस त्याग के (जब कभी कहीं माँस देखते हैं तो) बैठ के अपना नाक बँद कर लेते हैं (कि माँस की बदबू आ गई है) वे रात को मनुष्य को खा जाते हैं (भाव। छुप के मनुष्यों का लहू पीने के मनसूबे घड़ते हैं); (माँस ना खाने का यह) पाखण्ड करके लोगों को दिखाते हैं। वैसे इनको खुद ना समझ है ना ही सुरति है। पर। हे नानक ! किसी अंधे मनुष्य को समझाने का कोई लाभ नहीं। (यदि कोई इसको) समझाए भी। तो भी ये समझाए समझते नहीं हैं। (अगर कहो अंधा कौन है तो) अंधा वह है जो अंधों वाले काम करता है। जिसके दिल में वह आँखें नहीं हैं (भाव। जो समझ से विहीन है)। (नहीं तो सोचने वाली बात है कि खुद भी तो) माता और पिता के रक्त से हुए हैं और मछली (आदि) के माँस से परहेज़ करते हैं (भाव। माँस से ही पैदा हो के मांस से परहेज़ करने का क्या भाव। पहले भी तो माता-पिता के मास से ही शरीर पला है)। (फिर।)
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “श्लोक महला 1॥ हवा पनी और आग (आदि तत्वों का मेल मिला के और उसमें जीवात्मा डाल के प्रभू ने) जीव बनाया।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।