इसत्री पुरखै जां निसि मेला ओथै मंधु कमाही ॥ मासहु निंमे मासहु जंमे हम मासै के भांडे ॥ गिआनु धिआनु कछु सूझै नाही चतुरु कहावै पांडे ॥ बाहर का मासु मंदा सुआमी घर का मासु चंगेरा ॥ जीअ जंत सभि मासहु होए जीइ लइआ वासेरा ॥ अभखु भखहि भखु तजि छोडहि अंधु गुरू जिन केरा ॥ मासहु निंमे मासहु जंमे हम मासै के भांडे ॥ गिआनु धिआनु कछु सूझै नाही चतुरु कहावै पांडे ॥ मासु पुराणी मासु कतेबंी चहु जुगि मासु कमाणा ॥ जजि काजि वीआहि सुहावै ओथै मासु समाणा ॥ इसत्री पुरख निपजहि मासहु पातिसाह सुलतानां ॥ जे ओइ दिसहि नरकि जांदे तां उन॑ का दानु न लैणा ॥ देंदा नरकि सुरगि लैदे देखहु एहु धिङाणा ॥ आपि न बूझै लोक बुझाए पांडे खरा सिआणा ॥ पांडे तू जाणै ही नाही किथहु मासु उपंना ॥ तोइअहु अंनु कमादु कपाहां तोइअहु त्रिभवणु गंना ॥ तोआ आखै हउ बहु बिधि हछा तोऐ बहुतु बिकारा ॥ एते रस छोडि होवै संनिआसी नानकु कहै विचारा ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: जब रात को औरत और मर्द इकट्ठे होते हैं तब भी (माँस के साथ ही) मंद (भाव। भोग) करते हैं। हम सारे माँस के पुतले हैं। हमारा आरम्भ माँस से ही हुआ। हम माँस से ही पैदा हुए। (माँस का त्यागी) पण्डित (माँस की चर्चा छेड़ के ऐसे ही अपने आप को) समझदार कहलवाता है। (दरअसल।) इसको ना समझ है ना ही सुरति है। (भला बताओ।) पंडित जी ! (ये क्या कि) बाहर से लाया हुआ माँस बुरा और घर का (बरता हुआ) माँस अच्छा। (फिर) सारे जीव-जंतु माँस से पैदा हुए हैं। जिंद ने (अर्थात प्राणों ने माँस में ही) डेरा लगाया हुआ है; सो। जिनको रास्ता बताने वाला खुद अंधा है वह ना-खाने-योग्य चीज (भाव। पराया हॅक) तो खाते हैं और खाने-योग्य चीज (भाव। जिस चीज से जिंदगी का आरम्भ हुआ) को त्यागते हैं। हम सभी माँस के पुतले हैं। हमारा आरम्भ माँस से ही हुआ है। हम माँस से ही पैदा हुए। (माँस का त्यागी) पंडित (माँस की चर्चा छेड़ के ऐसे ही अपने आप को) समझदार कहलवाता है। (असलियत में) इसको ना समझ है ना सुरति है। पुराणों में माँस (का वर्णन) है। मुसलमानी मज़हबी किताबों में भी माँस (के प्रयोग का जिक्र) है; जगत के आरम्भ से माँस का उपयोग होता चला आया है। यज्ञ में। (शादी) ब्याह आदि कारजों में (माँस का प्रयोग) प्रधान है। उन जगहों पर माँस बरता जाता रहा है। औरत। मर्द। शाह। पातिशाह… सारे माँस से ही पैदा हुए हें। अगर ये सारे (माँस से बनने के कारण) नर्क में पड़ते दिखते हैं तो उनसे (माँस-त्यागी पंडित को) दान भी नहीं लेना चाहिए। (नहीं तो) देखिए। ये आश्चर्य भरे धक्केशाही की बात है कि दान देने वाले नर्क में जाएं और लेने वाले स्वर्ग में। (दरअसल) हे पंडित ! आप खासा चतुर है। आपको खुद को (माँस खाने के मामले की) समझ नहीं। पर आप लोगों को समझाता है। हे पंडित ! आपको ये पता ही नहीं कि माँस कहाँ से पैदा हुआ। (देख।) पानी से अन्न पैदा होता है। कमाद गन्ना उगता है और कपास उगती है। पानी से ही सारा संसार पैदा होता है। पानी कहता है कि मैं कई तरीकों से भलाई करता हूँ (भाव। जीव को पालने के लिए कई किसमों की खुराक़-पोशाक पैदा करता हूँ)। ये सारी तब्दीलियां (भाव। बेअंत किस्मों के पदार्थ) पानी में ही हैं। सो। नानक यह विचार की बात बताता है (कि अगर सच्चा त्यागी बनना है तो) इन सारे पदार्थों के चस्के छोड़ के त्यागी बने (क्योंकि माँस की उत्पक्ति भी पानी से ही है और अन्न-कमाद आदि की उत्पक्ति भी पानी से ही है)। 2।
पउड़ी ॥ हउ किआ आखा इक जीभ तेरा अंतु न किन ही पाइआ ॥ सचा सबदु वीचारि से तुझ ही माहि समाइआ ॥ इकि भगवा वेसु करि भरमदे विणु सतिगुर किनै न पाइआ ॥ देस दिसंतर भवि थके तुधु अंदरि आपु लुकाइआ ॥ गुर का सबदु रतंनु है करि चानणु आपि दिखाइआ ॥ आपणा आपु पछाणिआ गुरमती सचि समाइआ ॥ आवा गउणु बजारीआ बाजारु जिनी रचाइआ ॥ इकु थिरु सचा सालाहणा जिन मनि सचा भाइआ ॥25॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे प्रभू !) मेरी एक जीभ है। मैं आपके कौन-कौन से गुण बयान करूँ। आपका अंत किसी ने नहीं पाया। जो मनुष्य आपकी सिफतसालाह का शबद विचारते हैं वे आपके में ही लीन हैं जाते हैं। कई मनुष्य भगवा भेष बना के भटकते फिरते हैं। पर गुरू की शरण आए बिना (हे प्रभू !) आपको किसी ने नहीं पाया। ये लोग (बाहर) देश-देशांतरों में भटकते खप गए। पर आपने अपने आप को (जीव के) अंदर छुपा रखा है। सतिगुरू का शबद (मानो) एक चमकता मोती है (जिस किसी को प्रभू ने) यह मोती बख्शा है। उसके हृदय में (प्रभू ने) खुद प्रकाश करके (उसको अपना आप) दिखाया है; (वह भाग्यशाली मनुष्य) अपनी अस्लियत को पहचान लेते हैं और गुरू की शिक्षा के माध्यम से सच्चे प्रभू में लीन हो जाते हैं। (पर) जिन (भेषधारियों ने) दिखावे का ढोंग रचा हुआ है उन पाखण्डियों को जनम-मरण (का चक्कर) मिलता है; और। जिनको मन में सच्चा प्रभू प्यारा लगता है वे सदा स्थिर रहने वाले एक प्रभू के गुण गाते हैं। 25।
सलोक मः 1 ॥ नानक माइआ करम बिरखु फल अंम्रित फल विसु ॥ सभ कारण करता करे जिसु खवाले तिसु ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ हे नानक ! (जीवों के किए) कर्मों अनुसार (मनुष्य-शरीर रूप) माया का (रचा) वृक्ष (उगता) है (इसको) अमृत (भाव। नाम सुख) और जहर (भाव। मोह-दुख) दो किस्मों के फल लगते हैं। करतार स्वयं (अमृत और विष दो किस्मों के फलों के) सारे वसीले बनाता है। जिस जीव को जो फल खिलाता है उसको (वही खाना पड़त है)। 1।
मः 2 ॥ नानक दुनीआ कीआं वडिआईआं अगी सेती जालि ॥ एनी जलीईं नामु विसारिआ इक न चलीआ नालि ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: महला 2॥ हे नानक ! दुनिया की वडियाइयो को आग से जला दे। इन चंदरियों ने (मनुष्य से) प्रभू का नाम भुलवा दिया है (पर। इनमें से) एक भी (मरणोपरांत) साथ नहीं जाती। 2।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे प्रभू ! सारे जगत को आप) अपने हुकम में चला रहा है (कहीं भेखी दिखावे का ढोंग रच रहे हैं। कहीं आपको प्यार करने वाले आपकी सिफतसालाह कर रहे हैं; इनके कर्मों के अनुसार ‘आवागवन’ और आपका प्यार आपके ही हुकम में) अलग-अलग फैसला (होता है)। सारा फैसला आपके ही हाथ में है। आप ही (मेरे) मन को प्यारा लगता है। जब मौत। बाँध के (जीव को) ले चलती है। कोई इसको रख नहीं सकता; ज़ालिम बुढ़ापा (हरेक के) कंधे पर चढ़ के नाचता है (भाव। मौत का संदेशा दे रहा है जिसके आगे किसी की पेश नहीं चलती)। सतिगुरू ही सच्चा जहाज़ है सच्चा बेड़ा है जो (मौत के डर से) बचाता है। (जगत की तृष्णा की) आग के शोले भड़क रहे हैं। हर वक्त भड़कते रहते हैं (इन शोलों में) फसा हुआ जीव चोगा चुग रहा है; प्रभू के हुकम अनुसार ही इसमें से बच सकता है क्योंकि जो कुछ करतार करता है वही होता है। झूठ (का व्यापार। भाव। तृष्णा-अधीन हो के मायावी पदार्थों के पीछे दौड़ना) जीव के साथ नहीं निभता। 26।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जब रात को औरत और मर्द इकट्ठे होते हैं तब भी (माँस के साथ ही) मंद (भाव।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।