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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1290 · मलार

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अंग
1290
मलार
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  1. इसत्री पुरखै जां निसि मेला ओथै मंधु कमाही ॥
  2. हउ किआ आखा इक जीभ तेरा अंतु न किन ही पाइआ ॥
  3. नानक माइआ करम बिरखु फल अंम्रित फल विसु ॥
  4. नानक दुनीआ कीआं वडिआईआं अगी सेती जालि ॥
  5. सिरि सिरि होइ निबेड़ु हुकमि चलाइआ ॥

इसत्री पुरखै जां निसि मेला ओथै मंधु कमाही ॥

अंग 1289 से चला आ रहा अंश

इसत्री पुरखै जां निसि मेला ओथै मंधु कमाही ॥
मासहु निंमे मासहु जंमे हम मासै के भांडे ॥
गिआनु धिआनु कछु सूझै नाही चतुरु कहावै पांडे ॥
बाहर का मासु मंदा सुआमी घर का मासु चंगेरा ॥
जीअ जंत सभि मासहु होए जीइ लइआ वासेरा ॥
अभखु भखहि भखु तजि छोडहि अंधु गुरू जिन केरा ॥
मासहु निंमे मासहु जंमे हम मासै के भांडे ॥
गिआनु धिआनु कछु सूझै नाही चतुरु कहावै पांडे ॥
मासु पुराणी मासु कतेबंी चहु जुगि मासु कमाणा ॥
जजि काजि वीआहि सुहावै ओथै मासु समाणा ॥
इसत्री पुरख निपजहि मासहु पातिसाह सुलतानां ॥
जे ओइ दिसहि नरकि जांदे तां उन॑ का दानु न लैणा ॥
देंदा नरकि सुरगि लैदे देखहु एहु धिङाणा ॥
आपि न बूझै लोक बुझाए पांडे खरा सिआणा ॥
पांडे तू जाणै ही नाही किथहु मासु उपंना ॥
तोइअहु अंनु कमादु कपाहां तोइअहु त्रिभवणु गंना ॥
तोआ आखै हउ बहु बिधि हछा तोऐ बहुतु बिकारा ॥
एते रस छोडि होवै संनिआसी नानकु कहै विचारा ॥2॥

हिन्दी अर्थ: जब रात को औरत और मर्द इकट्ठे होते हैं तब भी (माँस के साथ ही) मंद (भाव। भोग) करते हैं। हम सारे माँस के पुतले हैं। हमारा आरम्भ माँस से ही हुआ। हम माँस से ही पैदा हुए। (माँस का त्यागी) पण्डित (माँस की चर्चा छेड़ के ऐसे ही अपने आप को) समझदार कहलवाता है। (दरअसल।) इसको ना समझ है ना ही सुरति है। (भला बताओ।) पंडित जी ! (ये क्या कि) बाहर से लाया हुआ माँस बुरा और घर का (बरता हुआ) माँस अच्छा। (फिर) सारे जीव-जंतु माँस से पैदा हुए हैं। जिंद ने (अर्थात प्राणों ने माँस में ही) डेरा लगाया हुआ है; सो। जिनको रास्ता बताने वाला खुद अंधा है वह ना-खाने-योग्य चीज (भाव। पराया हॅक) तो खाते हैं और खाने-योग्य चीज (भाव। जिस चीज से जिंदगी का आरम्भ हुआ) को त्यागते हैं। हम सभी माँस के पुतले हैं। हमारा आरम्भ माँस से ही हुआ है। हम माँस से ही पैदा हुए। (माँस का त्यागी) पंडित (माँस की चर्चा छेड़ के ऐसे ही अपने आप को) समझदार कहलवाता है। (असलियत में) इसको ना समझ है ना सुरति है। पुराणों में माँस (का वर्णन) है। मुसलमानी मज़हबी किताबों में भी माँस (के प्रयोग का जिक्र) है; जगत के आरम्भ से माँस का उपयोग होता चला आया है। यज्ञ में। (शादी) ब्याह आदि कारजों में (माँस का प्रयोग) प्रधान है। उन जगहों पर माँस बरता जाता रहा है। औरत, मर्द, शाह। पातिशाह... सारे माँस से ही पैदा हुए हें। अगर ये सारे (माँस से बनने के कारण) नर्क में पड़ते दिखते हैं तो उनसे (माँस-त्यागी पंडित को) दान भी नहीं लेना चाहिए। (नहीं तो) देखिए। ये आश्चर्य भरे धक्केशाही की बात है कि दान देने वाले नर्क में जाएं और लेने वाले स्वर्ग में। (दरअसल) हे पंडित ! आप खासे चतुर हैं। आपको खुद को (माँस खाने के मामले की) समझ नहीं। पर आप लोगों को समझाते हैं। हे पंडित ! आपको ये पता ही नहीं कि माँस कहाँ से पैदा हुआ। (देख।) पानी से अन्न पैदा होता है। कमाद गन्ना उगता है और कपास उगती है। पानी से ही सारा संसार पैदा होता है। पानी कहता है कि मैं कई तरीकों से भलाई करता हूँ (भाव। जीव को पालने के लिए कई किसमों की खुराक़-पोशाक पैदा करता हूँ)। ये सारी तब्दीलियां (भाव। बेअंत किस्मों के पदार्थ) पानी में ही हैं। सो। नानक यह विचार की बात बताता है (कि अगर सच्चा त्यागी बनना है तो) इन सारे पदार्थों के चस्के छोड़ के त्यागी बने (क्योंकि माँस की उत्पक्ति भी पानी से ही है और अन्न-कमाद आदि की उत्पक्ति भी पानी से ही है)। 2।

हउ किआ आखा इक जीभ तेरा अंतु न किन ही पाइआ ॥

पउड़ी ॥
हउ किआ आखा इक जीभ तेरा अंतु न किन ही पाइआ ॥
सचा सबदु वीचारि से तुझ ही माहि समाइआ ॥
इकि भगवा वेसु करि भरमदे विणु सतिगुर किनै न पाइआ ॥
देस दिसंतर भवि थके तुधु अंदरि आपु लुकाइआ ॥
गुर का सबदु रतंनु है करि चानणु आपि दिखाइआ ॥
आपणा आपु पछाणिआ गुरमती सचि समाइआ ॥
आवा गउणु बजारीआ बाजारु जिनी रचाइआ ॥
इकु थिरु सचा सालाहणा जिन मनि सचा भाइआ ॥25॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे प्रभू !) मेरी एक जीभ है। मैं आपके कौन-कौन से गुण बयान करूँ। आपका अंत किसी ने नहीं पाया। जो मनुष्य आपकी सिफतसालाह का शबद विचारते हैं वे आपके में ही लीन हो जाते हैं। कई मनुष्य भगवा भेष बना के भटकते फिरते हैं। पर गुरू की शरण आए बिना (हे प्रभू !) आपको किसी ने नहीं पाया। ये लोग (बाहर) देश-देशांतरों में भटकते खप गए। पर आपने अपने आप को (जीव के) अंदर छुपा रखा है। सतिगुरू का शबद (मानो) एक चमकता मोती है (जिस किसी को प्रभू ने) यह मोती बख्शा है। उसके हृदय में (प्रभू ने) खुद प्रकाश करके (उसको अपना आप) दिखाया है; (वह भाग्यशाली मनुष्य) अपनी अस्लियत को पहचान लेते हैं और गुरू की शिक्षा के माध्यम से सच्चे प्रभू में लीन हो जाते हैं। (पर) जिन (भेषधारियों ने) दिखावे का ढोंग रचा हुआ है उन पाखण्डियों को जनम-मरण (का चक्कर) मिलता है; और। जिनको मन में सच्चा प्रभू प्यारा लगता है वे सदा स्थिर रहने वाले एक प्रभू के गुण गाते हैं। 25।

नानक माइआ करम बिरखु फल अंम्रित फल विसु ॥

सलोक मः 1 ॥
नानक माइआ करम बिरखु फल अंम्रित फल विसु ॥
सभ कारण करता करे जिसु खवाले तिसु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ हे नानक ! (जीवों के किए) कर्मों अनुसार (मनुष्य-शरीर रूप) माया का (रचा) वृक्ष (उगता) है (इसको) अमृत (भाव। नाम सुख) और जहर (भाव। मोह-दुख) दो किस्मों के फल लगते हैं। करतार स्वयं (अमृत और विष दो किस्मों के फलों के) सारे वसीले बनाता है। जिस जीव को जो फल खिलाता है उसको (वही खाना पड़त है)। 1।

नानक दुनीआ कीआं वडिआईआं अगी सेती जालि ॥

मः 2 ॥
नानक दुनीआ कीआं वडिआईआं अगी सेती जालि ॥
एनी जलीईं नामु विसारिआ इक न चलीआ नालि ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ हे नानक ! दुनिया की वडियाइयो को आग से जला दे। इन चंदरियों ने (मनुष्य से) प्रभू का नाम भुलवा दिया है (पर। इनमें से) एक भी (मरणोपरांत) साथ नहीं जाती। 2।

सिरि सिरि होइ निबेड़ु हुकमि चलाइआ ॥

पउड़ी ॥
सिरि सिरि होइ निबेड़ु हुकमि चलाइआ ॥
तेरै हथि निबेड़ु तूहै मनि भाइआ ॥
कालु चलाए बंनि कोइ न रखसी ॥
जरु जरवाणा कंनि॑ चड़िआ नचसी ॥
सतिगुरु बोहिथु बेड़ु सचा रखसी ॥
अगनि भखै भड़हाड़ु अनदिनु भखसी ॥
फाथा चुगै चोग हुकमी छुटसी ॥
करता करे सु होगु कूड़ु निखुटसी ॥26॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे प्रभू ! सारे जगत को आप) अपने हुकम में चला रहे हैं (कहीं भेखी दिखावे का ढोंग रच रहे हैं। कहीं आपको प्यार करने वाले आपकी सिफतसालाह कर रहे हैं; इनके कर्मों के अनुसार 'आवागवन' और आपका प्यार आपके ही हुकम में) अलग-अलग फैसला (होता है)। सारा फैसला आपके ही हाथ में है। आप ही (मेरे) मन को प्यारे लगते हैं। जब मौत। बाँध के (जीव को) ले चलती है। कोई इसको रख नहीं सकता; ज़ालिम बुढ़ापा (हरेक के) कंधे पर चढ़ के नाचता है (भाव। मौत का संदेशा दे रहा है जिसके आगे किसी की पेश नहीं चलती)। सतिगुरू ही सच्चा जहाज़ है सच्चा बेड़ा है जो (मौत के डर से) बचाता है। (जगत की तृष्णा की) आग के शोले भड़क रहे हैं। हर वक्त भड़कते रहते हैं (इन शोलों में) फसा हुआ जीव चोगा चुग रहा है; प्रभू के हुकम अनुसार ही इसमें से बच सकता है क्योंकि जो कुछ करतार करता है वही होता है। झूठ (का व्यापार। भाव। तृष्णा-अधीन हो के मायावी पदार्थों के पीछे दौड़ना) जीव के साथ नहीं निभता। 26।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 2: गुरु अंगद देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1290 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।