नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: इसलिए उस सच्चे प्रभू के साथ सांझ बनाएं। तब ही (नाम-सिमरन-रूप) लिखा हुआ (लेख) मिलता है यह सारा निर्णय प्रभू के हुकम में ही होता है। और इस की समझ (यहाँ जगत से) चलते वक्त ही पड़ती है। (सो।) गुरू के शबद के द्वारा उस प्रभू के साथ गहरी सांझ डालनी चाहिए जो संसार-समुंद्र से पार लंघाने से समर्थ है। चोरों व्यभचारियों और जूए-बाज़ (आदि विकारियों का हाल इस प्रकार होता है जैसे) कोल्हू में पीढ़े जा रहे हों। निंदकों और चुग़लख़ोरों को (मानो। निंदा और चुग़ली की) हथकड़ी लगी हुई है (भाव। इस बुरी वादी में से वे अपने आप को निकाल नहीं सकते)। पर जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हैं वे प्रभू में लीन हैं के प्रभू की हजूरी में आदर पाएं। 21।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 2॥ कंगाल का नाम बादशाह (रखा जाता है)। मूख का नाम पण्डित (रखा जाता है)। अंधे को पारखू (कहा जाता है) – (बस ! जगत) इस तरह की (उल्टी) बातें करता है। शरारत (करने वाले) का नाम चौधरी (पड़ जाता है) और झूठी औरत सबसे आगे जगह घेरती है (भाव। हर जगह प्रधान बनती है)। हे नानक ! यह है न्याय कलियुग का (भाव। जहाँ यह रवईया बरता जाता है वहाँ कलियुग का पहरा जानो)। पर। गुरू के सन्मुख होने से ही ये समझ आती है (कि यह तरीका व्यवहार गलत है। मन के पीछे चलने वाले लोग इस रवईए के आदी हुए रहते हैं)। 1।
मः 1 ॥ हरणां बाजां तै सिकदारां एन॑ा पड़ि॑आ नाउ ॥ फांधी लगी जाति फहाइनि अगै नाही थाउ ॥ सो पड़िआ सो पंडितु बीना जिन॑ी कमाणा नाउ ॥ पहिलो दे जड़ अंदरि जंमै ता उपरि होवै छांउ ॥ राजे सीह मुकदम कुते ॥ जाइ जगाइनि॑ बैठे सुते ॥ चाकर नहदा पाइनि॑ घाउ ॥ रतु पितु कुतिहो चटि जाहु ॥ जिथै जीआं होसी सार ॥ नकंी वढंी लाइतबार ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ हिरन। बाज़ और अहलकार- इनका नाम लोग ‘पढ़े हुए’ रखते हैं (पर ये कैसी विद्या है। यह तो) फंदा लिए हुए है जिस में अपनी ही जाति-भाईयों को फसाते हैं; प्रभू ही हजूरी में ऐसे पढ़े हुए मंजूर नहीं हैं। जिस-जिस ने ‘नाम’ की कमाई की है वही विद्वान है पंडित है और समझदार है (क्यों वृक्ष की) जड़ सबसे पहले (जमीन के) अंदर पैदा होती है तब ही (वृक्ष उग के) बाहर छाया बनती है (सो। सुखदाती विद्या वही है अगर पहले मनुष्य अपने मन में ‘नाम’ बीजे)। (‘नाम’ से वंचित विद्या का हाल देखो)। राजे (मानो) शेर हैं (उनके। पढ़े हुए) अहलकार (मानो) कुत्ते हैं। बैठे-सोए हुओं को (भाव। वक्त-बेवक्त जनता को) जा जगाते हैं (भाव। तंग करते हैं)। ये अहलकार (जैसे। शेरों के) नाखूनी पँजे नहुंद्रां हैं। जो (लोगों का) घात करते हैं। (राजे-शेर इन अहिलकार) कुक्तों से (लोगों का) लहू पीते हैं। पर जहाँ जीवों की (करणी की) परख होती है। वहाँ ऐसे (पढ़े हुए लोग) बे-ऐतबारों के नाक-कटे (समझे जाते हैं)। 2।
पउड़ी ॥ आपि उपाए मेदनी आपे करदा सार ॥ भै बिनु भरमु न कटीऐ नामि न लगै पिआरु ॥ सतिगुर ते भउ ऊपजै पाईऐ मोख दुआर ॥ भै ते सहजु पाईऐ मिलि जोती जोति अपार ॥ भै ते भैजलु लंघीऐ गुरमती वीचारु ॥ भै ते निरभउ पाईऐ जिस दा अंतु न पारावारु ॥ मनमुख भै की सार न जाणनी त्रिसना जलते करहि पुकार ॥ नानक नावै ही ते सुखु पाइआ गुरमती उरि धार ॥22॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (जो प्रभू) खुद जगत पैदा करता है और खुद ही इसकी संभाल करता है। (उसका) डर रखे बिना (माया के पीछे) भटकना (-रूपी बँधन) काटा नहीं जाता। ना ही उसके नाम में प्यार बनता है। प्रभू का डर गुरू की शरण पड़ने से होता है और (‘रबाणी बंद’ में से) खलासी का रास्ता मिलता है (क्योंकि प्रभू का) डर रखने से बेअंत प्रभू की जोति में जोति मिलाने से मन की अडोलता प्राप्त होती है। इस डर के कारण गुरमति द्वारा (उच्च) विचार बनती है। और। संसार-समुंद्र से पार लांघा जाता है। इस डर से ही डर-रहित प्रभू मिलता है जिसका अंत नहीं पाया जा सकता जिसका इस पार उस पार का किनारा नहीं मिलता। अपने मन के पीछे चलने वाले लोगों को प्रभू के डर (में रहने की) सार नहीं पड़ती (नतीजा यह निकलता है कि वह माया की) तृष्णा (आग) में जलते-विलकते हैं। हे नानक ! प्रभू के ‘नाम’ से ही सुख मिलता है और (यह ‘नाम’) गुरू की मति पर चलने से ही हृदय में टिकता है। 22।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ रूप की काम (-वासना) से मित्रता है। भूख का संबंध स्वाद से है। लोभ की धन के साथ अच्छी मिली हुई एकमेकता है (नींद से) ऊँघ रहे को सिकुड़ी हुई जगह ही पलंघ है। क्रोध बहुत बोलता है। (क्रोध में) अंधा (हुआ व्यक्ति) ख्वार हो के बद्-ज़बानी ही करता है। हे नानक ! प्रभू के नाम के बिना (मनुष्य के) मुँह में (बद्-कलामी की) बद्बू ही होती है (बोलने से ज्यादा) इसका चुप रहना ठीक है। 1।
मः 1 ॥ राजु मालु रूपु जाति जोबनु पंजे ठग ॥ एनी ठगीं जगु ठगिआ किनै न रखी लज ॥ एना ठगनि॑ ठग से जि गुर की पैरी पाहि ॥ नानक करमा बाहरे होरि केते मुठे जाहि ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ राज। धन। सुंदरता। (ऊँची) जाति। और जवानी -यह पाँचों ही (मानो) ठॅग हैं। इन ठगों ने जगत को ठॅग लिया है (जो भी इनके अड्डे चढ़ा) किसी ने (इनसे) अपनी इज्जत नहीं बचाई। इन (ठगों) को भी वह ठॅग (भाव। समझदार लोग) दाँव लगा जाते हैं (भाव। वह बंदे इनकी चाल में नहीं आते) जो सतिगुरू की शरण में आते है। (पर) हे नानक ! और बड़े भाग्यहीन (इनके हाथों में खेल के) लूटे जा रहे हैं। 2।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो मनुष्य विद्वान भी हो और चतुराई की बातें भी करना जानता हैं (‘तृष्णा’ के बारे में) उससे भी लेखा लिया जाता है (भाव। ‘तृष्णा’ उससे भी लेखा लेती है। निरी विद्या और चतुराई ‘तृष्णा’ से बचा नहीं सकती)। (क्योंकि) प्रभू के नाम के बिना (पढ़ा हुआ भी) झूठ का ही व्यापारी है। दुखी होता हैं कठिनाईयाँ ही उठाता है। उसकी (जिंदगी के) गलियां और रास्ते (तृष्णा की आग से) रुके हुए हैं (उनके बीच में से पार लांघना) मुश्किल है। गुरू-शबद के द्वारा संतोषी बंदों को सदा कायम रहने वाला बे-मुहताज परमात्मा मिलता है। प्रभू (मानो) बड़ा गहरा (समुंद्र) है। (विद्या और चुराई के आसरे) उसकी थाह नहीं लगाई जा सकती। (बल्कि। पढ़ा कूड़ियार’ विद्या के गुमान में रह के तृष्णा की) भरपूर चोटें खाता है; (भले ही पढ़ा हुआ हो) कोई मनुष्य गुरू (की शरण) के बिना (तृष्णा से) बच नहीं सकता। (परमात्मा का) नाम सिमरना चाहिए (अगर नाम सिमरें) तो बेशक इज्जत से प्रभू के दर पर पहुँचो। (सिमरन की बरकति से) यह निश्चय बनता है कि प्रभू अपने हुकम में जीवों को जीवन और रोज़ी देता है। 23।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “इसलिए उस सच्चे प्रभू के साथ सांझ बनाएं।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।