Lulla Family

अंग 1287

अंग
1287
राग मलार
राग: मलार · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सलोक मः 1 ॥
राती कालु घटै दिनि कालु ॥
छिजै काइआ होइ परालु ॥
वरतणि वरतिआ सरब जंजालु ॥
भुलिआ चुकि गइआ तप तालु ॥
अंधा झखि झखि पइआ झेरि ॥
पिछै रोवहि लिआवहि फेरि ॥
बिनु बूझे किछु सूझै नाही ॥
मोइआ रोंहि रोंदे मरि जांहंी ॥
नानक खसमै एवै भावै ॥
सेई मुए जिनि चिति न आवै ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ ज्यों ज्यों रात दिन बीतते हैं उम्र का समय कम होता है। शरीर बुड्ढा होता जाता है और कमजोर पड़ता जाता है; जगत का वर्तण-व्यवहार (जीव के लिए) सारा जंजाल बनता जाता है (इसमें) भूले हुए को बँदगी की जाच बिसर जाती है। (जगत के वर्तण-व्यवहार में) अंधा हुआ जीव (इसमें) झखें मार-मार के (किसी लंबे) झमेले में पड़ता है। और। (उसके मरने के) बाद (उसके सन्बंधी) रोते हैं (और विरलाप करते हैं कि उसे कैसे) वापस ले आएं। समझने के बिना जगत को (वर्तण-व्यवहार में) कुछ सूझता नहीं। (मरने वाला तो) मर गया। (पीछे बचे हुए) रोते हैं और रो-रो के खपते हैं। पर। हे नानक ! पति-प्रभू को ऐसा ही अच्छा लगता है (कि जीव इसी तरह खपते रहें)। (असल में) आत्मिक मौत मरे हुए वही हैं जिनके हृदय में प्रभू नहीं बसता।
मः 1 ॥
मुआ पिआरु प्रीति मुई मुआ वैरु वादी ॥
वंनु गइआ रूपु विणसिआ दुखी देह रुली ॥
किथहु आइआ कह गइआ किहु न सीओ किहु सी ॥
मनि मुखि गला गोईआ कीता चाउ रली ॥
नानक सचे नाम बिनु सिर खुर पति पाटी ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (जब मनुष्य मर जाता है तो उसका वह) प्रीत-प्यार समाप्त हो जाता है (जो वह अपने सम्बन्धियों के साथ करता था) झगड़ों का मूल वैर भी खत्म हो जाता है; (शरीर का सुंदर) रंग-रूप नाश हो जाता है। बेचारा शरीर भी भूल जाता है (आग व मिट्टी आदि के हवाले हो जाता है)। (उसके संबन्धि व भाईचारे के लोग) मन में (विचार करते हैं) और मुँह से बातें करते हैं कि वह कहाँ से आया था और कहाँ चला गया। (भाव जहाँ से आया था वहीं चला गया) वह ऐसा नहीं था और इस प्रकार का था (भाव। उसमें फलाणे ऐब नहीं थे। और उसमें फलाणे गुण थे)। वह बड़े चाव से रलियां माण गया है। पर। हे नानक ! (लोग जो चाहे कहें) परमात्मा के नाम के बिना (लोगों द्वारा होई हुई) सारी की सारी इज्जत बेकार हो गई (समझो)। 2।
पउड़ी ॥
अंम्रित नामु सदा सुखदाता अंते होइ सखाई ॥
बाझु गुरू जगतु बउराना नावै सार न पाई ॥
सतिगुरु सेवहि से परवाणु जिन॑ जोती जोति मिलाई ॥
सो साहिबु सो सेवकु तेहा जिसु भाणा मंनि वसाई ॥
आपणै भाणै कहु किनि सुखु पाइआ अंधा अंधु कमाई ॥
बिखिआ कदे ही रजै नाही मूरख भुख न जाई ॥
दूजै सभु को लगि विगुता बिनु सतिगुर बूझ न पाई ॥
सतिगुरु सेवे सो सुखु पाए जिस नो किरपा करे रजाई ॥20॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ प्रभू का आत्मिक जीवन देने वाला नाम सदा सुख देने वाला है। आखिर (‘नाम’ ही) मित्र बनता है। पर। जगत। गुरू के बिना कमला सा हो रहा है। (क्योंकि गुरू के बिना इसको) नाम की कद्र नहीं पड़ती। जो लोग गुरू के कहे अनुसार चलते हैं (और इस तरह) जिन्होंने प्रभू में अपनी सुरति जोड़ी हुई है वे (प्रभू-दर पर) कबूल हैं। जिस मनुष्य को प्रभू अपना भाणा (मीठा करके) मनाता है वह सेवक वैसा ही हो जाता है जैसा प्रभू मालिक है। अपनी मर्जी के मुताबिक चलके कभी कोई मनुष्य सुख नहीं पाता। अंधा सदा अंधों वाले काम ही करता है; मूर्ख की (माया की) भूख कभी खत्म नहीं होती। माया में कभी वह तृप्त नहीं होता। माया में लग के हर कोई दुखी ही होता है। गुरू के बिना समझ नहीं पड़ती (कि माया का मोह दुख का मूल है)। जिस मनुष्य पर प्रभू मेहर करता है वह गुरू के कहे अनुसार चलता है और सुख पाता है। 20।
सलोक मः 1 ॥
सरमु धरमु दुइ नानका जे धनु पलै पाइ ॥
सो धनु मित्रु न कांढीऐ जितु सिरि चोटां खाइ ॥
जिन कै पलै धनु वसै तिन का नाउ फकीर ॥
जिन॑ कै हिरदै तू वसहि ते नर गुणी गहीर ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ हे नानक ! (जगत समझता है कि) अगर धन मिल जाए तो इज्जत बनी रहती है और धर्म कमाया जा सकता है। पर। जिस (धन) के कारण सिर पर चोटें पड़ें वह धन मित्र (भाव। श्रम धर्म में सहायक) नहीं कहा जा सकता। जिनके पास धन है उनका नाम ‘कंगाल’ है; (वे आत्मिक जीवन में कंगाल हैं); और। हे प्रभू ! जिनके हृदय में आप स्वयं आप बसता है वे हैं गुणों के समुंद्र। 1।
मः 1 ॥
दुखी दुनी सहेड़ीऐ जाइ त लगहि दुख ॥
नानक सचे नाम बिनु किसै न लथी भुख ॥
रूपी भुख न उतरै जां देखां तां भुख ॥
जेते रस सरीर के तेते लगहि दुख ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ दुख सह-सह के धन इकट्ठा किया जाता है। अगर यह गायब हो जाए तो भी दुख ही मारते हैं। हे नानक ! प्रभू के सच्चे नाम के बिना किसी की तृष्णा मिटती नहीं। रूप’ देखने से (रूप देखने की) तृष्णा नहीं जाती (बल्कि) ज्यों-ज्यों देखते जाएं त्यों-त्यों और तृष्णा बढ़ती जाती है। जिस्म के जितने भी ज्यादा चस्के हैं। उतने ही ज्यादा इसको दुख व्यापते हैं। 2।
मः 1 ॥
अंधी कंमी अंधु मनु मनि अंधै तनु अंधु ॥
चिकड़ि लाइऐ किआ थीऐ जां तुटै पथर बंधु ॥
बंधु तुटा बेड़ी नही ना तुलहा ना हाथ ॥
नानक सचे नाम विणु केते डुबे साथ ॥3॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ ज्यों-ज्यों विचार-हीन हो के बुरे काम किए जाएं। त्यों त्यों मन अंधा (भाव। विचारों से वंचित) होता जाता है; और मन विचार-हीन हुआ ज्ञानेन्द्रियां भी अंधी हो जाती हैं (भाव। आँखें-कान आदि भी बुरी तरफ ले चलते हैं)। सो। जब पत्थरों का बाँध (भाव। प्रभू के नाम के विचार का पक्का आसरा) टूट जाता है तब कीचड़ लगाने से कुछ नहीं बनता (भाव। और-और आसरे ढूँढने से)। (जब) बाँध टूट गया। ना बेड़ी रही। ना तुलहा रहा। ना (पानी का) थाह लग सका (भाव। पानी भी बहुत गहरा हुआ)। (ऐसी हालत में) हे नानक ! प्रभू के सच्चे नाम (-रूपी बाँध। बेड़ी। तुलहे) के बिना कई काफिले के काफिले डूब जाते हैं। 3।
मः 1 ॥
लख मण सुइना लख मण रुपा लख साहा सिरि साह ॥
लख लसकर लख वाजे नेजे लखी घोड़ी पातिसाह ॥
जिथै साइरु लंघणा अगनि पाणी असगाह ॥
कंधी दिसि न आवई धाही पवै कहाह ॥
नानक ओथै जाणीअहि साह केई पातिसाह ॥4॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ लाखों मन सोना हो और लाखों मन चाँदी- ऐसे लाखों धनवानों से भी बड़े धनी हों। लाखों सिपाहियों की फौजें हों लाखों बाजे बजते हों। नेजे-बरदार लाखों फौजी रसालियों के मालिक बादशाह हों; पर। जहाँ (विकारों की) आग और पानी का अथाह समुंद्र पार करना पड़ता है। (इस समुंद्र का) किनारा भी नहीं दिखता। हाय-हाय की कुरलाहट का शोर भी मचा हुआ है। वहाँ। हे नानक ! परखे जाते हैं कि (असल में) कौन धनी हैं और कौन बादशाह हैं (भाव। दुनिया का धन और बादशाही विकारों की आग में जलने और विकारों की लहरों में डूबने से बचा नहीं सकते; धन और बादशाहियत होते हुए भी ‘हाय-हाय’ नहीं मिटती)। 4।
पउड़ी ॥
इकना गलीं जंजीर बंदि रबाणीऐ ॥
बधे छुटहि सचि सचु पछाणीऐ ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (जो ‘बिखिआ’ में लगे रहे) उनके गलों में (माया के मोह के बँधन-रूप) जंजीरें पड़ी हुई हैं। वह। (मानो।) ईश्वर के बँदीखाने में (कैद) हैं; अगर सच्चे प्रभू की पहचान आ जाए (अगर सदा-स्थिर प्रभू के साथ गहरी सांझ बन जाए) तो सदा-स्थिर हरी-नाम के द्वारा ही (इन जंजीरों में) बंधे हुए छूट सकते हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “श्लोक महला 1॥ ज्यों ज्यों रात दिन बीतते हैं उम्र का समय कम होता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।