अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है वह अपने आत्मिक जीवन को पड़तालता रहता है। और उसका प्यार (इन भूख प्यास आदि वाले पदार्थों की जगह) सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू में बनता जाता है। पर। हे नानक ! यह दाति वह स्वयं ही देता है। किसी और के आगे कुछ भी नहीं कहा जा सकता। 10।
सलोक मः 3 ॥ बाबीहा एहु जगतु है मत को भरमि भुलाइ ॥ इहु बाबींहा पसू है इस नो बूझणु नाहि ॥ अंम्रितु हरि का नामु है जितु पीतै तिख जाइ ॥ नानक गुरमुखि जिन॑ पीआ तिन॑ बहुड़ि न लागी आइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ (शब्द पपीहा सुन के) कहीं कोई भुलेखा खा जाए। पपीहा यह जगत है। यह पपीहा (-जीव) पशू (-स्वभाव) है। इसको ये समझ नहीं (कि) परमात्मा का नाम (ऐसा) अमृत है जिसको पीने से (माया की) प्यास मिट जाती है। हे नानक ! जिन लोगों ने गुरू के सन्मुख हो के (नाम-अमृत) पीया है उनको दोबारा (माया की) प्यास नहीं लगती। 1।
मः 3 ॥ मलारु सीतल रागु है हरि धिआइऐ सांति होइ ॥ हरि जीउ अपणी क्रिपा करे तां वरतै सभ लोइ ॥ वुठै जीआ जुगति होइ धरणी नो सीगारु होइ ॥ नानक इहु जगतु सभु जलु है जल ही ते सभ कोइ ॥ गुर परसादी को विरला बूझै सो जनु मुकतु सदा होइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (चाहे) ‘मलार’ राग ठंडा राग है (भाव। शीतलता देने वाला है)। पर (असल) शांति तब ही आती है जब (इस राग के द्वारा) प्रभू की सिफत-सालाह करें। यदि प्रभू अपनी दया करे तो (यह शांति) सारे जगत में (यूँ) फैल जाए। जैसे वर्षा होने पर जीवों में जीवन-जुगति (भाव। सक्ता) आ जाती है और धरती को भी हरी-भरी सुंदरता मिल जाती है। हे नानक ! (असल में) यह जगत परमात्मा का रूप है (क्योंकि) हरेक जीव परमात्मा से ही पैदा होता है; पर कोई विरला व्यक्ति (यह बात) गुरू की मेहर से समझता है (और जो समझ लेता है) वह मनुष्य विकारों से रहित हो जाता है। 2।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! आप सदा कायम रहने वाला बेपरवाह (बेमुथाज) मालिक है; आप स्वयं ही सब कुछ (करने कराने योग्य) है। किस दूसरे को मैं आपके जैसा मानूँ। (दुनिया की किसी वडिआई को प्राप्त करके) मनुष्य का (कोई) अहंकार करना व्यर्थ है आपकी वडिआई ही सदा कायम रहने वाली है। तूने ही ‘जनम मरण’ (की मर्यादा) बना के सृष्टी पैदा की है। जो मनुष्य अपने गुरू के कहे पर चलता है उसका (जगत में) आना सफल है। अगर मनुष्य के अंदर से अहंकार दूर हो जाए तो (तृष्णा आदि के अधीन हो के) तौखले करने की आवश्यक्ता नहीं रह जाती। (पर) अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य मोह-रूप अंधेरे में (इस तरह) भटक रहा है। जैसे (राह से) भूला हुआ मनुष्य जंगलों में (भटकता है)। प्रभू अपने ‘नाम’ का यह किनका मात्र दे के बेअंत पाप काट देता है। 11।
सलोक मः 3 ॥ बाबीहा खसमै का महलु न जाणही महलु देखि अरदासि पाइ ॥ आपणै भाणै बहुता बोलहि बोलिआ थाइ न पाइ ॥ खसमु वडा दातारु है जो इछे सो फल पाइ ॥ बाबीहा किआ बपुड़ा जगतै की तिख जाइ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे (जीव) पपीहे ! आप अपने मालिक का घर नहीं जानता (तभी माया की तृष्णा से आतुर हैं रहा है)। (मालिक का) घर देखने के लिए प्रार्थना कर। (जब तक) आप अपने (मन की) मर्जी के पीछे चल के बहुत ज्यादा बोलता है। यह बोलना प्रवान नहीं होता। (हे जीव !) मालिक बहुत बख्शिशें करने वाला है (उसके दर पर पड़ने से) जो माँगें सो मिल जाता है। यह (जीव) पपीहा बेचारा क्या है। (प्रभू के दर पर अरजोई करने से) सारे जगत की (माया की) प्यास मिट जाती है। 1।
मः 3 ॥ बाबीहा भिंनी रैणि बोलिआ सहजे सचि सुभाइ ॥ इहु जलु मेरा जीउ है जल बिनु रहणु न जाइ ॥ गुर सबदी जलु पाईऐ विचहु आपु गवाइ ॥ नानक जिसु बिनु चसा न जीवदी सो सतिगुरि दीआ मिलाइ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (जब) (जीव-) पपीहा अमृत बेला में अडोल अवस्था में प्रभू-चरणों में जुड़ के (जुड़े) मन की मौज से अरजोई करता है कि प्रभू का नाम मेरी जिंद है। ‘नाम’ के बिना मैं जी नहीं सकता। (तो इस तरह) मन में से स्वैभाव गवा के गुरू के शबद से नाम-अमृत मिलता है। हे नानक ! जिस प्रभू के बिना एक पलक भर भी जीया नहीं जा सकता। सतिगुरू ने (अरजोई करने वाले को) वह प्रभू मिला दिया है (भाव। मिला देता है)। 2।
पउड़ी ॥ खंड पताल असंख मै गणत न होई ॥ तू करता गोविंदु तुधु सिरजी तुधै गोई ॥ लख चउरासीह मेदनी तुझ ही ते होई ॥ इकि राजे खान मलूक कहहि कहावहि कोई ॥ इकि साह सदावहि संचि धनु दूजै पति खोई ॥ इकि दाते इक मंगते सभना सिरि सोई ॥ विणु नावै बाजारीआ भीहावलि होई ॥ कूड़ निखुटे नानका सचु करे सु होई ॥12॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (इस सृष्टि के) बेअंत धरतियां और पाताल हैं। मुझसे गिने नहीं जा सकते। (हे प्रभू !) आप (इस सृष्टि को) पैदा करने वाला है आप ही इसकी सार लेने वाला है। तूने ही पैदा की है आप ही नाश करता है। सृष्टि की चौरासी लाख जूनियाँ आपसे ही पैदा हुई हैं। (यहाँ) कई अपने-आप को राजे-ख़ान और मलिक कहते हैं और कहलवाते हैं। कई धन एकत्र करके (अपने आप को) शाह कहलवाते हैं। (पर) इस दूसरे मोह में पड़ कर इज्जत गवा लेते हैं। यहाँ कई दाते हैं कई मँगते हैं (पर। क्या दाते और क्या मँगते) सबके सिर पर वह प्रभू ही पति है। (चाहे राजे कहलवाएं अथवा शाहूकार कहलवाएं) प्रभू के नाम के बिना जीव (मानो) बहु-रूपिए हैं (धरती इनके भार से) भय-भीत हुई है। हे नानक ! (ये राजे और शाहूकार आदि) झूठ के सौदे खत्म हो जाते हैं (भाव। तृष्णा के अधीन हो के राज-धन का घमण्ड झूठा है।) जो कुछ सदा स्थिर रहने वाला प्रभू करता है वही होता है। 12।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे (जीव-) पपीहे ! गुणवान (जीव-स्त्री) को ईश्वर का घर मिल जाता है। पर गुणहीन उससे सदा दूर रहती है। हे (जीव-) पपीहे ! आपके अंदर ही रॅब बसता है। गुरू के सन्मुख होने से सदा अंग-संग दिखता है (गुरू की शरण पड़ने से) किसी कूक-पुकार की जरूरत नहीं रहती। मेहर के साई की मेहरों से निहाल हो जाया जाता है। हे नानक ! प्रभू के नाम में रंगे हुए बंदे गुरू के शबद में (जुड़ के) घाल-कमाई करके आत्मिक अडोलता में टिके रह के उसको मिल जाते हैं। 1।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है वह अपने आत्मिक जीवन को पड़तालता रहता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।