बाबीहा बेनती करे करि किरपा देहु जीअ दान ॥
जल बिनु पिआस न ऊतरै छुटकि जांहि मेरे प्रान ॥
तू सुखदाता बेअंतु है गुणदाता नेधानु ॥
नानक गुरमुखि बखसि लए अंति बेली होइ भगवानु ॥2॥
आपे जगतु उपाइ कै गुण अउगण करे बीचारु ॥
त्रै गुण सरब जंजालु है नामि न धरे पिआरु ॥
गुण छोडि अउगण कमावदे दरगह होहि खुआरु ॥
जूऐ जनमु तिनी हारिआ कितु आए संसारि ॥
सचै सबदि मनु मारिआ अहिनिसि नामि पिआरि ॥
जिनी पुरखी उरि धारिआ सचा अलख अपारु ॥
तू गुणदाता निधानु हहि असी अवगणिआर ॥
जिसु बखसे सो पाइसी गुर सबदी वीचारु ॥13॥
राति न विहावी साकतां जिन॑ा विसरै नाउ ॥
राती दिनस सुहेलीआ नानक हरि गुण गांउ ॥1॥
रतन जवेहर माणका हभे मणी मथंनि ॥
नानक जो प्रभि भाणिआ सचै दरि सोहंनि ॥2॥
सचा सतिगुरु सेवि सचु सम॑ालिआ ॥
अंति खलोआ आइ जि सतिगुर अगै घालिआ ॥
पोहि न सकै जमकालु सचा रखवालिआ ॥
गुर साखी जोति जगाइ दीवा बालिआ ॥
मनमुख विणु नावै कूड़िआर फिरहि बेतालिआ ॥
पसू माणस चंमि पलेटे अंदरहु कालिआ ॥
सभो वरतै सचु सचै सबदि निहालिआ ॥
नानक नामु निधानु है पूरै गुरि देखालिआ ॥14॥
बाबीहै हुकमु पछाणिआ गुर कै सहजि सुभाइ ॥
मेघु वरसै दइआ करि गूड़ी छहबर लाइ ॥
बाबीहे कूक पुकार रहि गई सुखु वसिआ मनि आइ ॥
नानक सो सालाहीऐ जि देंदा सभनां जीआ रिजकु समाइ ॥1॥
चात्रिक तू न जाणही किआ तुधु विचि तिखा है कितु पीतै तिख जाइ ॥
दूजै भाइ भरंमिआ अंम्रित जलु पलै न पाइ ॥
नदरि करे जे आपणी तां सतिगुरु मिलै सुभाइ ॥
नानक सतिगुर ते अंम्रित जलु पाइआ सहजे रहिआ समाइ ॥2॥
इकि वण खंडि बैसहि जाइ सदु न देवही ॥
इकि पाला ककरु भंनि सीतलु जलु हेंवही ॥
इकि भसम चड़॑ावहि अंगि मैलु न धोवही ॥
इकि जटा बिकट बिकराल कुलु घरु खोवही ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “महला 3॥ (जब) (जीव-) पपीहा (प्रभू के आगे) विनती करता है कि – (हे प्रभू !) मेहर करके मुझे जीवन-दाति बख्श; आपके नाम-अमृत के बिना (मेरी) तृष्णा खत्म नहीं होती।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।