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1284
मलार
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- बाबीहा बेनती करे करि किरपा देहु जीअ दान ॥
- आपे जगतु उपाइ कै गुण अउगण करे बीचारु ॥
- राति न विहावी साकतां जिन॑ा विसरै नाउ ॥
- रतन जवेहर माणका हभे मणी मथंनि ॥
- सचा सतिगुरु सेवि सचु सम॑ालिआ ॥
- बाबीहै हुकमु पछाणिआ गुर कै सहजि सुभाइ ॥
- चात्रिक तू न जाणही किआ तुधु विचि तिखा है कितु पीतै तिख जाइ ॥
- इकि वण खंडि बैसहि जाइ सदु न देवही ॥
· मलार की वार, सलोक · राग मलार
बाबीहा बेनती करे करि किरपा देहु जीअ दान ॥
मः 3 ॥
बाबीहा बेनती करे करि किरपा देहु जीअ दान ॥
जल बिनु पिआस न ऊतरै छुटकि जांहि मेरे प्रान ॥
तू सुखदाता बेअंतु है गुणदाता नेधानु ॥
नानक गुरमुखि बखसि लए अंति बेली होइ भगवानु ॥2॥
बाबीहा बेनती करे करि किरपा देहु जीअ दान ॥
जल बिनु पिआस न ऊतरै छुटकि जांहि मेरे प्रान ॥
तू सुखदाता बेअंतु है गुणदाता नेधानु ॥
नानक गुरमुखि बखसि लए अंति बेली होइ भगवानु ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (जब) (जीव-) पपीहा (प्रभू के आगे) विनती करता है कि - (हे प्रभू !) मेहर करके मुझे जीवन-दाति बख्श; आपके नाम-अमृत के बिना (मेरी) तृष्णा खत्म नहीं होती। (आपके नाम के बिना) मेरी जिंद व्याकुल हो जाती है। आप सुख देने वाले हैं। आप बेअंत हैं। आप गुण बख्शने वाले हैं। और आप सारे गुणों का खजाना हैं। हे नानक ! (यह बिनती सुन के) भगवान गुरू के सन्मुख हुए मनुष्य पर मेहर करता है और अंत के समय उसका सहायक बनता है। 2।
· मलार की वार, पउड़ी · राग मलार
आपे जगतु उपाइ कै गुण अउगण करे बीचारु ॥
पउड़ी ॥
आपे जगतु उपाइ कै गुण अउगण करे बीचारु ॥
त्रै गुण सरब जंजालु है नामि न धरे पिआरु ॥
गुण छोडि अउगण कमावदे दरगह होहि खुआरु ॥
जूऐ जनमु तिनी हारिआ कितु आए संसारि ॥
सचै सबदि मनु मारिआ अहिनिसि नामि पिआरि ॥
जिनी पुरखी उरि धारिआ सचा अलख अपारु ॥
तू गुणदाता निधानु हहि असी अवगणिआर ॥
जिसु बखसे सो पाइसी गुर सबदी वीचारु ॥13॥
आपे जगतु उपाइ कै गुण अउगण करे बीचारु ॥
त्रै गुण सरब जंजालु है नामि न धरे पिआरु ॥
गुण छोडि अउगण कमावदे दरगह होहि खुआरु ॥
जूऐ जनमु तिनी हारिआ कितु आए संसारि ॥
सचै सबदि मनु मारिआ अहिनिसि नामि पिआरि ॥
जिनी पुरखी उरि धारिआ सचा अलख अपारु ॥
तू गुणदाता निधानु हहि असी अवगणिआर ॥
जिसु बखसे सो पाइसी गुर सबदी वीचारु ॥13॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (प्रभू) स्वयं ही जगत बना के (जीवों के) गुणों और अवगुणों का लेखा करता है। (माया के) तीनों गुण (भी जो) निरे जंजाल (भाव। विकारों में फसाने वाले) ही हैं (ये भी प्रभू ने खुद ही रचे हैं। इसमें फस के जगत) प्रभू के नाम में प्यार नहीं डालता; (इस वास्ते जीव) गुण छोड़ के अवगुण कमाते हैं और (आखिर) प्रभू की हजूरी में शर्मिंदे होते हैं। ऐसे जीव (जैसे) जूए में मनुष्य-जन्म हार जाते हैं। उनका जगत में आना किसी अर्थ का नहीं होता। (पर) जिन मनुष्यों ने (गुरू के) सच्चे-शबद के द्वारा अपना मन वश में कर लिया है। जो दिन-रात प्रभू के नाम में प्यार डालते हैं। जिन्होंने अपने हृदय में सदा कायम रहने वाला अदृश्य और बेअंत प्रभू बसाया है (वे इस तरह विनती करते हैं) - हे प्रभू ! आप गुणों के दाता हैं। आप गुणों का खजाना हैं। हम जीव गुणहीन हैं"। गुरू के शबद से (ऐसी स्वच्छ) विचार वह मनुष्य प्राप्त करता है जिस पर (परमात्मा खुद) मेहर करता है। 13।
· मलार की वार, सलोक · राग मलार
राति न विहावी साकतां जिन॑ा विसरै नाउ ॥
सलोक मः 5 ॥
राति न विहावी साकतां जिन॑ा विसरै नाउ ॥
राती दिनस सुहेलीआ नानक हरि गुण गांउ ॥1॥
राति न विहावी साकतां जिन॑ा विसरै नाउ ॥
राती दिनस सुहेलीआ नानक हरि गुण गांउ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ जो लोग परमात्मा के चरणों से विछड़े हुए हैं। जिनको करतार का नाम भूला हुआ है उनकी रात बीतने में नहीं आती (भाव। उनकी जिंदगी रूपी रात दुखों में ही बीतती है; वे इतने दुखी होते हैं कि उनको उम्र भारी प्रतीत होती है)। पर। हे नानक ! जो जीव-सि्त्रयाँ प्रभू के गुण गाती हैं उनके दिन-रात (भाव। सारी उम्र) सुख में गुजरते हैं। 1।
· मलार की वार, सलोक · राग मलार
रतन जवेहर माणका हभे मणी मथंनि ॥
मः 5 ॥
रतन जवेहर माणका हभे मणी मथंनि ॥
नानक जो प्रभि भाणिआ सचै दरि सोहंनि ॥2॥
रतन जवेहर माणका हभे मणी मथंनि ॥
नानक जो प्रभि भाणिआ सचै दरि सोहंनि ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ उनके माथे पर (जैसे) सारे रत्न जवाहर मोती और मणिं हैं (भाव। गुणों के कारण उनके माथे पर नूर ही नूर है) हे नानक ! जो जीव प्रभू को प्यारे लगने लगे हैं वे उस सदा स्थिर रहने वाले के दर पर शोभा पाते हैं। 2।
· मलार की वार, पउड़ी · राग मलार
सचा सतिगुरु सेवि सचु सम॑ालिआ ॥
पउड़ी ॥
सचा सतिगुरु सेवि सचु सम॑ालिआ ॥
अंति खलोआ आइ जि सतिगुर अगै घालिआ ॥
पोहि न सकै जमकालु सचा रखवालिआ ॥
गुर साखी जोति जगाइ दीवा बालिआ ॥
मनमुख विणु नावै कूड़िआर फिरहि बेतालिआ ॥
पसू माणस चंमि पलेटे अंदरहु कालिआ ॥
सभो वरतै सचु सचै सबदि निहालिआ ॥
नानक नामु निधानु है पूरै गुरि देखालिआ ॥14॥
सचा सतिगुरु सेवि सचु सम॑ालिआ ॥
अंति खलोआ आइ जि सतिगुर अगै घालिआ ॥
पोहि न सकै जमकालु सचा रखवालिआ ॥
गुर साखी जोति जगाइ दीवा बालिआ ॥
मनमुख विणु नावै कूड़िआर फिरहि बेतालिआ ॥
पसू माणस चंमि पलेटे अंदरहु कालिआ ॥
सभो वरतै सचु सचै सबदि निहालिआ ॥
नानक नामु निधानु है पूरै गुरि देखालिआ ॥14॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जिन मनुष्यों ने सच्चे गुरू के हुकम में चल के सदा स्थिर रहने वाले प्रभू की आराधना की। जो कमाई उन्होंने गुरू के सन्मुख हो के की है वह अंत समय (जब और सारे रास्ते खत्म हो जाते हैं) उनका साथ आ देती है। सच्चा प्रभू उनके सिर पर रखवाला होता है। इसलिए मौत का डर उनको छू नहीं सकता। गुरू की बाणी-रूप जोति (उन्होंने अपने अंदर) जगाई हुई है। बाणी रूपी दीया प्रज्जवलित किया हुआ है। पर जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलते हैं वे प्रभू के नाम से वंचित होए हुए हैं और झूठ के व्यापारी हैं। बेताले भटकते फिरते हैं; वे (दरअसल) पशू हैं अंदर से काले हैं (देखने को) मनुष्य चमड़ी में लिपटे हुए हैं (भाव। देखने में मनुष्य दिखते हैं)। (पर। इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता) हर जगह सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू स्वयं बसता है- ये बात गुरू के सच्चे शबद के द्वारा ही देखी जा सकती है। हे नानक ! प्रभू का नाम ही (असल) खजाना है जो पूरे गुरू ने (किसी भाग्यशाली को) दिखाया है। 14।
· मलार की वार, सलोक · राग मलार
बाबीहै हुकमु पछाणिआ गुर कै सहजि सुभाइ ॥
सलोक मः 3 ॥
बाबीहै हुकमु पछाणिआ गुर कै सहजि सुभाइ ॥
मेघु वरसै दइआ करि गूड़ी छहबर लाइ ॥
बाबीहे कूक पुकार रहि गई सुखु वसिआ मनि आइ ॥
नानक सो सालाहीऐ जि देंदा सभनां जीआ रिजकु समाइ ॥1॥
बाबीहै हुकमु पछाणिआ गुर कै सहजि सुभाइ ॥
मेघु वरसै दइआ करि गूड़ी छहबर लाइ ॥
बाबीहे कूक पुकार रहि गई सुखु वसिआ मनि आइ ॥
नानक सो सालाहीऐ जि देंदा सभनां जीआ रिजकु समाइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जिस (जीव-) पपीहे ने आत्मिक अडोलता में टिक के गुरू के अनुसार चल के प्रभू का हुकम समझा है। (सतिगुरू-) बादल मेहर कर के लंबी झड़ी लगा के (उस पर 'नाम'-अमृत की) बरखा करता है। उस (जीव-) पपीहे की कूक पुकार खत्म हो जाती है। उसके मन में सुख आ बसता है। हे नानक ! जो प्रभू सब जीवों को रोज़ी पहुँचाता है। उसकी ही सिफतसालाह करनी चाहिए। 1।
· मलार की वार, सलोक · राग मलार
चात्रिक तू न जाणही किआ तुधु विचि तिखा है कितु पीतै तिख जाइ ॥
मः 3 ॥
चात्रिक तू न जाणही किआ तुधु विचि तिखा है कितु पीतै तिख जाइ ॥
दूजै भाइ भरंमिआ अंम्रित जलु पलै न पाइ ॥
नदरि करे जे आपणी तां सतिगुरु मिलै सुभाइ ॥
नानक सतिगुर ते अंम्रित जलु पाइआ सहजे रहिआ समाइ ॥2॥
चात्रिक तू न जाणही किआ तुधु विचि तिखा है कितु पीतै तिख जाइ ॥
दूजै भाइ भरंमिआ अंम्रित जलु पलै न पाइ ॥
नदरि करे जे आपणी तां सतिगुरु मिलै सुभाइ ॥
नानक सतिगुर ते अंम्रित जलु पाइआ सहजे रहिआ समाइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे पपीहे (जीव) ! आपको नहीं पता कि आपके अंदर कौन सी प्यास है (जो आपको भटकना में डाल रही है; ना ही आपको यह पता है कि) क्या पीने से यह प्यास मिटेगी; आप माया के मोह में भटक रहे हैं। आपको (प्यास मिटाने के लिए) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल नहीं मिलता। अगर अकाल-पुरख अपनी मेहर की नजर करे तो उसकी रज़ा में गुरू मिल जाता है। हे नानक ! गुरू से आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल मिलता है (और उसकी बरकति से) अडोल अवस्था में टिके रहा जा जाता है। 2।
· मलार की वार, पउड़ी · राग मलार
इकि वण खंडि बैसहि जाइ सदु न देवही ॥
पउड़ी ॥
इकि वण खंडि बैसहि जाइ सदु न देवही ॥
इकि पाला ककरु भंनि सीतलु जलु हेंवही ॥
इकि भसम चड़॑ावहि अंगि मैलु न धोवही ॥
इकि जटा बिकट बिकराल कुलु घरु खोवही ॥
इकि वण खंडि बैसहि जाइ सदु न देवही ॥
इकि पाला ककरु भंनि सीतलु जलु हेंवही ॥
इकि भसम चड़॑ावहि अंगि मैलु न धोवही ॥
इकि जटा बिकट बिकराल कुलु घरु खोवही ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ कई मनुष्य जंगल में किसी एकांत में जा बैठते हैं और मौन धार लेते हैं। कई पाला-ओस तोड़ के ठंडा पानी सहते हैं (भाव। उस ठंडे पानी में बैठते हैं। जिस पर बर्फ जमी हुई है)। कई मनुष्य शरीर पर राख मलते हैं और (शरीर की) मैल कभी नहीं धोते (भाव। स्नान नहीं करते); कई मनुष्य मुश्किल डरावनी जटें बढ़ा लेते हैं (फकीर बन के अपनी) कुल और अपना घर गवा लेते हैं;
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 3: गुरु अमर दास जी; महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1284 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।