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अंग 1284

अंग
1284
राग मलार
राग: मलार · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मः 3 ॥
बाबीहा बेनती करे करि किरपा देहु जीअ दान ॥
जल बिनु पिआस न ऊतरै छुटकि जांहि मेरे प्रान ॥
तू सुखदाता बेअंतु है गुणदाता नेधानु ॥
नानक गुरमुखि बखसि लए अंति बेली होइ भगवानु ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (जब) (जीव-) पपीहा (प्रभू के आगे) विनती करता है कि – (हे प्रभू !) मेहर करके मुझे जीवन-दाति बख्श; आपके नाम-अमृत के बिना (मेरी) तृष्णा खत्म नहीं होती। (आपके नाम के बिना) मेरी जिंद व्याकुल हैं जाती है। आप सुख देने वाला है। आप बेअंत है। आप गुण बख्शने वाला है। और आप सारे गुणों का खजाना है। हे नानक ! (यह बिनती सुन के) भगवान गुरू के सन्मुख हुए मनुष्य पर मेहर करता है और अंत के समय उसका सहायक बनता है। 2।
पउड़ी ॥
आपे जगतु उपाइ कै गुण अउगण करे बीचारु ॥
त्रै गुण सरब जंजालु है नामि न धरे पिआरु ॥
गुण छोडि अउगण कमावदे दरगह होहि खुआरु ॥
जूऐ जनमु तिनी हारिआ कितु आए संसारि ॥
सचै सबदि मनु मारिआ अहिनिसि नामि पिआरि ॥
जिनी पुरखी उरि धारिआ सचा अलख अपारु ॥
तू गुणदाता निधानु हहि असी अवगणिआर ॥
जिसु बखसे सो पाइसी गुर सबदी वीचारु ॥13॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (प्रभू) स्वयं ही जगत बना के (जीवों के) गुणों और अवगुणों का लेखा करता है। (माया के) तीनों गुण (भी जो) निरे जंजाल (भाव। विकारों में फसाने वाले) ही हैं (ये भी प्रभू ने खुद ही रचे हैं। इसमें फस के जगत) प्रभू के नाम में प्यार नहीं डालता; (इस वास्ते जीव) गुण छोड़ के अवगुण कमाते हैं और (आखिर) प्रभू की हजूरी में शर्मिंदे होते हैं। ऐसे जीव (जैसे) जूए में मनुष्य-जन्म हार जाते हैं। उनका जगत में आना किसी अर्थ का नहीं होता। (पर) जिन मनुष्यों ने (गुरू के) सच्चे-शबद के द्वारा अपना मन वश में कर लिया है। जो दिन-रात प्रभू के नाम में प्यार डालते हैं। जिन्होंने अपने हृदय में सदा कायम रहने वाला अदृश्य और बेअंत प्रभू बसाया है (वे इस तरह विनती करते हैं) – हे प्रभू ! आप गुणों का दाता है। आप गुणों का खजाना है। हम जीव गुणहीन हैं”। गुरू के शबद से (ऐसी स्वच्छ) विचार वह मनुष्य प्राप्त करता है जिस पर (परमात्मा खुद) मेहर करता है। 13।
सलोक मः 5 ॥
राति न विहावी साकतां जिन॑ा विसरै नाउ ॥
राती दिनस सुहेलीआ नानक हरि गुण गांउ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ जो लोग परमात्मा के चरणों से विछड़े हुए हैं। जिनको करतार का नाम भूला हुआ है उनकी रात बीतने में नहीं आती (भाव। उनकी जिंदगी रूपी रात दुखों में ही बीतती है; वे इतने दुखी होते हैं कि उनको उम्र भारी प्रतीत होती है)। पर। हे नानक ! जो जीव-सि्त्रयाँ प्रभू के गुण गाती हैं उनके दिन-रात (भाव। सारी उम्र) सुख में गुजरते हैं। 1।
मः 5 ॥
रतन जवेहर माणका हभे मणी मथंनि ॥
नानक जो प्रभि भाणिआ सचै दरि सोहंनि ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ उनके माथे पर (जैसे) सारे रत्न जवाहर मोती और मणिं हैं (भाव। गुणों के कारण उनके माथे पर नूर ही नूर है) हे नानक ! जो जीव प्रभू को प्यारे लगने लगे हैं वे उस सदा स्थिर रहने वाले के दर पर शोभा पाते हैं। 2।
पउड़ी ॥
सचा सतिगुरु सेवि सचु सम॑ालिआ ॥
अंति खलोआ आइ जि सतिगुर अगै घालिआ ॥
पोहि न सकै जमकालु सचा रखवालिआ ॥
गुर साखी जोति जगाइ दीवा बालिआ ॥
मनमुख विणु नावै कूड़िआर फिरहि बेतालिआ ॥
पसू माणस चंमि पलेटे अंदरहु कालिआ ॥
सभो वरतै सचु सचै सबदि निहालिआ ॥
नानक नामु निधानु है पूरै गुरि देखालिआ ॥14॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जिन मनुष्यों ने सच्चे गुरू के हुकम में चल के सदा स्थिर रहने वाले प्रभू की आराधना की। जो कमाई उन्होंने गुरू के सन्मुख हो के की है वह अंत समय (जब और सारे रास्ते खत्म हो जाते हैं) उनका साथ आ देती है। सच्चा प्रभू उनके सिर पर रखवाला होता है। इसलिए मौत का डर उनको छू नहीं सकता। गुरू की बाणी-रूप जोति (उन्होंने अपने अंदर) जगाई हुई है। बाणी रूपी दीया प्रज्जवलित किया हुआ है। पर जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलते हैं वे प्रभू के नाम से वंचित होए हुए हैं और झूठ के व्यापारी हैं। बेताले भटकते फिरते हैं; वे (दरअसल) पशू हैं अंदर से काले हैं (देखने को) मनुष्य चमड़ी में लिपटे हुए हैं (भाव। देखने में मनुष्य दिखते हैं)। (पर। इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता) हर जगह सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू स्वयं बसता है- ये बात गुरू के सच्चे शबद के द्वारा ही देखी जा सकती है। हे नानक ! प्रभू का नाम ही (असल) खजाना है जो पूरे गुरू ने (किसी भाग्यशाली को) दिखाया है। 14।
सलोक मः 3 ॥
बाबीहै हुकमु पछाणिआ गुर कै सहजि सुभाइ ॥
मेघु वरसै दइआ करि गूड़ी छहबर लाइ ॥
बाबीहे कूक पुकार रहि गई सुखु वसिआ मनि आइ ॥
नानक सो सालाहीऐ जि देंदा सभनां जीआ रिजकु समाइ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जिस (जीव-) पपीहे ने आत्मिक अडोलता में टिक के गुरू के अनुसार चल के प्रभू का हुकम समझा है। (सतिगुरू-) बादल मेहर कर के लंबी झड़ी लगा के (उस पर ‘नाम’-अमृत की) बरखा करता है। उस (जीव-) पपीहे की कूक पुकार खत्म हो जाती है। उसके मन में सुख आ बसता है। हे नानक ! जो प्रभू सब जीवों को रोज़ी पहुँचाता है। उसकी ही सिफतसालाह करनी चाहिए। 1।
मः 3 ॥
चात्रिक तू न जाणही किआ तुधु विचि तिखा है कितु पीतै तिख जाइ ॥
दूजै भाइ भरंमिआ अंम्रित जलु पलै न पाइ ॥
नदरि करे जे आपणी तां सतिगुरु मिलै सुभाइ ॥
नानक सतिगुर ते अंम्रित जलु पाइआ सहजे रहिआ समाइ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे पपीहे (जीव) ! आपको नहीं पता कि आपके अंदर कौन सी प्यास है (जो आपको भटकना में डाल रही है; ना ही आपको यह पता है कि) क्या पीने से यह प्यास मिटेगी; आप माया के मोह में भटक रहा है। आपको (प्यास मिटाने के लिए) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल नहीं मिलता। अगर अकाल-पुरख अपनी मेहर की नजर करे तो उसकी रज़ा में गुरू मिल जाता है। हे नानक ! गुरू से आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल मिलता है (और उसकी बरकति से) अडोल अवस्था में टिके रहा जा जाता है। 2।
पउड़ी ॥
इकि वण खंडि बैसहि जाइ सदु न देवही ॥
इकि पाला ककरु भंनि सीतलु जलु हेंवही ॥
इकि भसम चड़॑ावहि अंगि मैलु न धोवही ॥
इकि जटा बिकट बिकराल कुलु घरु खोवही ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ कई मनुष्य जंगल में किसी एकांत में जा बैठते हैं और मौन धार लेते हैं। कई पाला-ओस तोड़ के ठंडा पानी सहते हैं (भाव। उस ठंडे पानी में बैठते हैं। जिस पर बर्फ जमी हुई है)। कई मनुष्य शरीर पर राख मलते हैं और (शरीर की) मैल कभी नहीं धोते (भाव। स्नान नहीं करते); कई मनुष्य मुश्किल डरावनी जटें बढ़ा लेते हैं (फकीर बन के अपनी) कुल और अपना घर गवा लेते हैं;

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “महला 3॥ (जब) (जीव-) पपीहा (प्रभू के आगे) विनती करता है कि – (हे प्रभू !) मेहर करके मुझे जीवन-दाति बख्श; आपके नाम-अमृत के बिना (मेरी) तृष्णा खत्म नहीं होती।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।