ओथै हथु न अपड़ै कूक न सुणीऐ पुकार ॥
ओथै सतिगुरु बेली होवै कढि लए अंती वार ॥
एना जंता नो होर सेवा नही सतिगुरु सिरि करतार ॥6॥
बाबीहा जिस नो तू पूकारदा तिस नो लोचै सभु कोइ ॥
अपणी किरपा करि कै वससी वणु त्रिणु हरिआ होइ ॥
गुर परसादी पाईऐ विरला बूझै कोइ ॥
बहदिआ उठदिआ नित धिआईऐ सदा सदा सुखु होइ ॥
नानक अंम्रितु सद ही वरसदा गुरमुखि देवै हरि सोइ ॥1॥
कलमलि होई मेदनी अरदासि करे लिव लाइ ॥
सचै सुणिआ कंनु दे धीरक देवै सहजि सुभाइ ॥
इंद्रै नो फुरमाइआ वुठा छहबर लाइ ॥
अनु धनु उपजै बहु घणा कीमति कहणु न जाइ ॥
नानक नामु सलाहि तू सभना जीआ देदा रिजकु संबाहि ॥
जितु खाधै सुखु ऊपजै फिरि दूखु न लागै आइ ॥2॥
हरि जीउ सचा सचु तू सचे लैहि मिलाइ ॥
दूजै दूजी तरफ है कूड़ि मिलै न मिलिआ जाइ ॥
आपे जोड़ि विछोड़िऐ आपे कुदरति देइ दिखाइ ॥
मोहु सोगु विजोगु है पूरबि लिखिआ कमाइ ॥
हउ बलिहारी तिन कउ जो हरि चरणी रहै लिव लाइ ॥
जिउ जल महि कमलु अलिपतु है ऐसी बणत बणाइ ॥
से सुखीए सदा सोहणे जिन॑ विचहु आपु गवाइ ॥
तिन॑ सोगु विजोगु कदे नही जो हरि कै अंकि समाइ ॥7॥
नानक सो सालाहीऐ जिसु वसि सभु किछु होइ ॥
तिसै सरेविहु प्राणीहो तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥
गुरमुखि हरि प्रभु मनि वसै तां सदा सदा सुखु होइ ॥
सहसा मूलि न होवई सभ चिंता विचहु जाइ ॥
जो किछु होइ सु सहजे होइ कहणा किछू न जाइ ॥
सचा साहिबु मनि वसै तां मनि चिंदिआ फलु पाइ ॥
नानक तिन का आखिआ आपि सुणे जि लइअनु पंनै पाइ ॥1॥
अंम्रितु सदा वरसदा बूझनि बूझणहार ॥
गुरमुखि जिन॑ी बुझिआ हरि अंम्रितु रखिआ उरि धारि ॥
हरि अंम्रितु पीवहि सदा रंगि राते हउमै त्रिसना मारि ॥
अंम्रितु हरि का नामु है वरसै किरपा धारि ॥
नानक गुरमुखि नदरी आइआ हरि आतम रामु मुरारि ॥2॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू के हुकम में चलने वाले बंदे का लेखा बाइज्जत निपटता है क्योंकि गुरू उसको सिफत-सालाह के खजाने बख्शता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।