Lulla Family

अंग 1281

अंग
1281
राग मलार
राग: मलार · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुरमुखि पति सिउ लेखा निबड़ै बखसे सिफति भंडार ॥
ओथै हथु न अपड़ै कूक न सुणीऐ पुकार ॥
ओथै सतिगुरु बेली होवै कढि लए अंती वार ॥
एना जंता नो होर सेवा नही सतिगुरु सिरि करतार ॥6॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: गुरू के हुकम में चलने वाले बंदे का लेखा बाइज्जत निपटता है क्योंकि गुरू उसको सिफत-सालाह के खजाने बख्शता है। किए हुए कर्मों का लेखा होने के वक्त किसी और की पेश नहीं जाती। और उस वक्त किसी कूक-पुकार का भी कोई फायदा नहीं होता। उस वक्त वास्ते तो सतिगुरू ही मददगार होता है क्योंकि आखिर गुरू ही विकारों से बाहर निकालता है। किसी और किस्म की सेवा इन जीवों के लिए लाभदायक नहीं। अकाल-पुरख का भेजा हुआ सतिगुरू ही जीवों के सिर पर हाथ रखता है। 6।
सलोक मः 3 ॥
बाबीहा जिस नो तू पूकारदा तिस नो लोचै सभु कोइ ॥
अपणी किरपा करि कै वससी वणु त्रिणु हरिआ होइ ॥
गुर परसादी पाईऐ विरला बूझै कोइ ॥
बहदिआ उठदिआ नित धिआईऐ सदा सदा सुखु होइ ॥
नानक अंम्रितु सद ही वरसदा गुरमुखि देवै हरि सोइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे बिरही जीव ! जिस प्रभू को मिलने के लिए आप तरले ले रहा है। उसको मिलने की तमन्ना हरेक जीव रखता है। जब वह प्रभू स्वयं मेहर कर के (‘नाम’ की) बरखा करेगा तो सारी सृष्टि (सारी बनस्पति) हरी हो जाएगी। कोई विरला बंदा समझता है कि (‘नाम-अमृत’) गुरू की कृपा से मिलता है; अगर बैठते-उठते हर वक्त प्रभू को सिमरें तो सदा ही सुख प्राप्त होता है। हे नानक ! प्रभू के आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल की बरखा तो सदा ही हो रही है। पर वह प्रभू यह दाति उस मनुष्य को देता है जो गुरू के सन्मुख रहता है। 1।
मः 3 ॥
कलमलि होई मेदनी अरदासि करे लिव लाइ ॥
सचै सुणिआ कंनु दे धीरक देवै सहजि सुभाइ ॥
इंद्रै नो फुरमाइआ वुठा छहबर लाइ ॥
अनु धनु उपजै बहु घणा कीमति कहणु न जाइ ॥
नानक नामु सलाहि तू सभना जीआ देदा रिजकु संबाहि ॥
जितु खाधै सुखु ऊपजै फिरि दूखु न लागै आइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (जब) धरती (वर्षा के बग़ैर) व्याकुल होती है तो एक-मन हो के प्रार्थना करती है तो सदा-स्थिर सच्चा प्रभू (इस आरजू को) ध्यान से सुनता है। और सहज ही अपने सदा के बने स्वभाव अनुसार (धरती को) धीरज देता है; इन्द्र को आज्ञा देता है। वह झड़ी लगा के बरखा करता है; बेअंत अनाज (-रूप) धन पैदा होता है। (प्रभू की इस बख्शिश का) मूल्य नहीं पाया जा सकता। हे नानक ! जो प्रभू सब जीवों को रिजक पहुँचाता है उसके नाम की सराहना करो; इस नाम-भोजन के खाने से सुख पैदा होता है (सुख भी ऐसा कि) फिर कभी दुख आ के नहीं लगता। 2।
पउड़ी ॥
हरि जीउ सचा सचु तू सचे लैहि मिलाइ ॥
दूजै दूजी तरफ है कूड़ि मिलै न मिलिआ जाइ ॥
आपे जोड़ि विछोड़िऐ आपे कुदरति देइ दिखाइ ॥
मोहु सोगु विजोगु है पूरबि लिखिआ कमाइ ॥
हउ बलिहारी तिन कउ जो हरि चरणी रहै लिव लाइ ॥
जिउ जल महि कमलु अलिपतु है ऐसी बणत बणाइ ॥
से सुखीए सदा सोहणे जिन॑ विचहु आपु गवाइ ॥
तिन॑ सोगु विजोगु कदे नही जो हरि कै अंकि समाइ ॥7॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू जी ! आप सदा कायम रहने वाला है। जो आपका रूप हैं जाता है आप उसको (अपने में) मिला लेता है। जो मनुष्य माया में लगा हुआ है उसका (सत्य के उलट) दूसरा पक्ष है (भाव। वह दूसरी तरफ। झूठ की ओर जाता है। और) झूठ से (भाव। झूठ में लग के) प्रभू नहीं मिलता। प्रभू को मिला नहीं जा सकता। प्रभू बिछोड़े हुए जीव को भी स्वयं ही (अपने चरणों में) जोड़ता है। स्वयं ही अपनी यह वडिआई दिखाता है। (झूठ में लगे हुए बंदे को) मोह चिंता विछोड़ा व्यापता है। वह (दोबारा) वही काम करता जाता है जो पिछले किए कर्मों के अनुसार (उसके माथे पर) लिखा है; जो मनुष्य प्रभू के चरणों में सुरति जोड़ के रखते हैं। मैं उन पर से सदके हूँ; प्रभू ने ऐसी बनतर बना रखी है (कि उसके चरणों में जुड़ने वाले इस तरह जगत से निर्लिप रहते हैं) जैसे पानी में कमल का फूल अछोह रहता है। जो मनुष्य अपने अंदर से आपा-भाव गवाते हैं वे सदा सुखी रहते हैं और सुंदर लगते हैं (सुंदर जीवन वाले बन जाते हैं)। जो प्रभू की गोद में टिके रहते हैं उनको कभी चिंता और विछोड़ा नहीं व्यापता। 7।
सलोक मः 3 ॥
नानक सो सालाहीऐ जिसु वसि सभु किछु होइ ॥
तिसै सरेविहु प्राणीहो तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥
गुरमुखि हरि प्रभु मनि वसै तां सदा सदा सुखु होइ ॥
सहसा मूलि न होवई सभ चिंता विचहु जाइ ॥
जो किछु होइ सु सहजे होइ कहणा किछू न जाइ ॥
सचा साहिबु मनि वसै तां मनि चिंदिआ फलु पाइ ॥
नानक तिन का आखिआ आपि सुणे जि लइअनु पंनै पाइ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे नानक ! जिस प्रभू के वश में हरेक बात है उसकी सदा वडिआई करनी चाहिए। उसके बिना (उस जैसा) और कोई नहीं। हे लोगो ! उस प्रभू को ही सिमरो। (अगर) गुरू के द्वारा हरी-प्रभू मन में आ बसे तो (मन में) सदा ही सुख बना रहता है। तौखला (व्याकुलता) बिल्कुल नहीं रहता। सारी चिंता मन में से निकल जाती है। जो कुछ (जगत में) बरत रहा है वह रज़ा में ही हो रहा दिखता है उस पर कोई ऐतराज़ (मन में) उठता ही नहीं। अगर सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू मन में आ बसे तो मन में चितवा हुआ (हरेक) फल हासिल होता है। हे नानक ! जिनको प्रभू ने अपने लेखे में लिख लिया है (भाव। जिन पर मेहर की नज़र करता है) उनकी अरदास ध्यान से सुनता है। 1।
मः 3 ॥
अंम्रितु सदा वरसदा बूझनि बूझणहार ॥
गुरमुखि जिन॑ी बुझिआ हरि अंम्रितु रखिआ उरि धारि ॥
हरि अंम्रितु पीवहि सदा रंगि राते हउमै त्रिसना मारि ॥
अंम्रितु हरि का नामु है वरसै किरपा धारि ॥
नानक गुरमुखि नदरी आइआ हरि आतम रामु मुरारि ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ अमृत’ की बरखा हो रही है (पर इस भेद को) वही समझते हैं जो समझने-योग्य हैं; जिन्होंने गुरू से (यह भेद) समझ लिया है। वे ‘अमृत’ हृदय में संभाल के रखते हैं; वे मनुष्य अहंकार और (माया की) तृष्णा मिटा के। प्रभू के प्यार में रंगे हुए सदा ‘अमृत’ पीते हैं। (वह अमृत क्या है।) ‘अमृत’ प्रभू का ‘नाम’ है और इसकी बरखा होती है प्रभू की कृपा से। हे नानक ! सबमें व्यापक मुरारी परमात्मा सतिगुरू के माध्यम से ही नज़र आता है। 2।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू के हुकम में चलने वाले बंदे का लेखा बाइज्जत निपटता है क्योंकि गुरू उसको सिफत-सालाह के खजाने बख्शता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।