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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1281 · मलार

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अंग
1281
मलार
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  1. गुरमुखि पति सिउ लेखा निबड़ै बखसे सिफति भंडार ॥
  2. बाबीहा जिस नो तू पूकारदा तिस नो लोचै सभु कोइ ॥
  3. कलमलि होई मेदनी अरदासि करे लिव लाइ ॥
  4. हरि जीउ सचा सचु तू सचे लैहि मिलाइ ॥
  5. नानक सो सालाहीऐ जिसु वसि सभु किछु होइ ॥
  6. अंम्रितु सदा वरसदा बूझनि बूझणहार ॥

गुरु नानक देव जी · मलार की वार, पउड़ी · राग मलार

गुरमुखि पति सिउ लेखा निबड़ै बखसे सिफति भंडार ॥

अंग 1280 से चला आ रहा अंश

गुरमुखि पति सिउ लेखा निबड़ै बखसे सिफति भंडार ॥
ओथै हथु न अपड़ै कूक न सुणीऐ पुकार ॥
ओथै सतिगुरु बेली होवै कढि लए अंती वार ॥
एना जंता नो होर सेवा नही सतिगुरु सिरि करतार ॥6॥

हिन्दी अर्थ: गुरू के हुकम में चलने वाले बंदे का लेखा बाइज्जत निपटता है क्योंकि गुरू उसको सिफत-सालाह के खजाने बख्शता है। किए हुए कर्मों का लेखा होने के वक्त किसी और की पेश नहीं जाती। और उस वक्त किसी कूक-पुकार का भी कोई फायदा नहीं होता। उस वक्त वास्ते तो सतिगुरू ही मददगार होता है क्योंकि आखिर गुरू ही विकारों से बाहर निकालता है। किसी और किस्म की सेवा इन जीवों के लिए लाभदायक नहीं। अकाल-पुरख का भेजा हुआ सतिगुरू ही जीवों के सिर पर हाथ रखता है। 6।

गुरु अमर दास जी · मलार की वार, सलोक · राग मलार

बाबीहा जिस नो तू पूकारदा तिस नो लोचै सभु कोइ ॥

सलोक मः 3 ॥
बाबीहा जिस नो तू पूकारदा तिस नो लोचै सभु कोइ ॥
अपणी किरपा करि कै वससी वणु त्रिणु हरिआ होइ ॥
गुर परसादी पाईऐ विरला बूझै कोइ ॥
बहदिआ उठदिआ नित धिआईऐ सदा सदा सुखु होइ ॥
नानक अंम्रितु सद ही वरसदा गुरमुखि देवै हरि सोइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे बिरही जीव ! जिस प्रभू को मिलने के लिए आप तरले ले रहे हैं। उसको मिलने की तमन्ना हरेक जीव रखता है। जब वह प्रभू स्वयं मेहर कर के ('नाम' की) बरखा करेगा तो सारी सृष्टि (सारी बनस्पति) हरी हो जाएगी। कोई विरला बंदा समझता है कि ('नाम-अमृत') गुरू की कृपा से मिलता है; अगर बैठते-उठते हर वक्त प्रभू को सिमरें तो सदा ही सुख प्राप्त होता है। हे नानक ! प्रभू के आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल की बरखा तो सदा ही हो रही है। पर वह प्रभू यह दाति उस मनुष्य को देता है जो गुरू के सन्मुख रहता है। 1।

गुरु अमर दास जी · मलार की वार, सलोक · राग मलार

कलमलि होई मेदनी अरदासि करे लिव लाइ ॥

मः 3 ॥
कलमलि होई मेदनी अरदासि करे लिव लाइ ॥
सचै सुणिआ कंनु दे धीरक देवै सहजि सुभाइ ॥
इंद्रै नो फुरमाइआ वुठा छहबर लाइ ॥
अनु धनु उपजै बहु घणा कीमति कहणु न जाइ ॥
नानक नामु सलाहि तू सभना जीआ देदा रिजकु संबाहि ॥
जितु खाधै सुखु ऊपजै फिरि दूखु न लागै आइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (जब) धरती (वर्षा के बग़ैर) व्याकुल होती है तो एक-मन हो के प्रार्थना करती है तो सदा-स्थिर सच्चा प्रभू (इस आरजू को) ध्यान से सुनता है। और सहज ही अपने सदा के बने स्वभाव अनुसार (धरती को) धीरज देता है; इन्द्र को आज्ञा देता है। वह झड़ी लगा के बरखा करता है; बेअंत अनाज (-रूप) धन पैदा होता है। (प्रभू की इस बख्शिश का) मूल्य नहीं पाया जा सकता। हे नानक ! जो प्रभू सब जीवों को रिजक पहुँचाता है उसके नाम की सराहना करो; इस नाम-भोजन के खाने से सुख पैदा होता है (सुख भी ऐसा कि) फिर कभी दुख आ के नहीं लगता। 2।

गुरु नानक देव जी · मलार की वार, पउड़ी · राग मलार

हरि जीउ सचा सचु तू सचे लैहि मिलाइ ॥

पउड़ी ॥
हरि जीउ सचा सचु तू सचे लैहि मिलाइ ॥
दूजै दूजी तरफ है कूड़ि मिलै न मिलिआ जाइ ॥
आपे जोड़ि विछोड़िऐ आपे कुदरति देइ दिखाइ ॥
मोहु सोगु विजोगु है पूरबि लिखिआ कमाइ ॥
हउ बलिहारी तिन कउ जो हरि चरणी रहै लिव लाइ ॥
जिउ जल महि कमलु अलिपतु है ऐसी बणत बणाइ ॥
से सुखीए सदा सोहणे जिन॑ विचहु आपु गवाइ ॥
तिन॑ सोगु विजोगु कदे नही जो हरि कै अंकि समाइ ॥7॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू जी ! आप सदा कायम रहने वाले हैं। जो आपका रूप हो जाता है आप उसको (अपने में) मिला लेते हैं। जो मनुष्य माया में लगा हुआ है उसका (सत्य के उलट) दूसरा पक्ष है (भाव। वह दूसरी तरफ। झूठ की ओर जाता है। और) झूठ से (भाव। झूठ में लग के) प्रभू नहीं मिलता। प्रभू को मिला नहीं जा सकता। प्रभू बिछोड़े हुए जीव को भी स्वयं ही (अपने चरणों में) जोड़ता है। स्वयं ही अपनी यह वडिआई दिखाता है। (झूठ में लगे हुए बंदे को) मोह चिंता विछोड़ा व्यापता है। वह (दोबारा) वही काम करता जाता है जो पिछले किए कर्मों के अनुसार (उसके माथे पर) लिखा है; जो मनुष्य प्रभू के चरणों में सुरति जोड़ के रखते हैं। मैं उन पर से सदके हूँ; प्रभू ने ऐसी बनतर बना रखी है (कि उसके चरणों में जुड़ने वाले इस तरह जगत से निर्लिप रहते हैं) जैसे पानी में कमल का फूल अछोह रहता है। जो मनुष्य अपने अंदर से आपा-भाव गवाते हैं वे सदा सुखी रहते हैं और सुंदर लगते हैं (सुंदर जीवन वाले बन जाते हैं)। जो प्रभू की गोद में टिके रहते हैं उनको कभी चिंता और विछोड़ा नहीं व्यापता। 7।

गुरु अमर दास जी · मलार की वार, सलोक · राग मलार

नानक सो सालाहीऐ जिसु वसि सभु किछु होइ ॥

सलोक मः 3 ॥
नानक सो सालाहीऐ जिसु वसि सभु किछु होइ ॥
तिसै सरेविहु प्राणीहो तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥
गुरमुखि हरि प्रभु मनि वसै तां सदा सदा सुखु होइ ॥
सहसा मूलि न होवई सभ चिंता विचहु जाइ ॥
जो किछु होइ सु सहजे होइ कहणा किछू न जाइ ॥
सचा साहिबु मनि वसै तां मनि चिंदिआ फलु पाइ ॥
नानक तिन का आखिआ आपि सुणे जि लइअनु पंनै पाइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे नानक ! जिस प्रभू के वश में हरेक बात है उसकी सदा वडिआई करनी चाहिए। उसके बिना (उस जैसा) और कोई नहीं। हे लोगो ! उस प्रभू को ही सिमरो। (अगर) गुरू के द्वारा हरी-प्रभू मन में आ बसे तो (मन में) सदा ही सुख बना रहता है। तौखला (व्याकुलता) बिल्कुल नहीं रहता। सारी चिंता मन में से निकल जाती है। जो कुछ (जगत में) बरत रहा है वह रज़ा में ही हो रहा दिखता है उस पर कोई ऐतराज़ (मन में) उठता ही नहीं। अगर सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू मन में आ बसे तो मन में चितवा हुआ (हरेक) फल हासिल होता है। हे नानक ! जिनको प्रभू ने अपने लेखे में लिख लिया है (भाव। जिन पर मेहर की नज़र करता है) उनकी अरदास ध्यान से सुनता है। 1।

गुरु अमर दास जी · मलार की वार, सलोक · राग मलार

अंम्रितु सदा वरसदा बूझनि बूझणहार ॥

मः 3 ॥
अंम्रितु सदा वरसदा बूझनि बूझणहार ॥
गुरमुखि जिन॑ी बुझिआ हरि अंम्रितु रखिआ उरि धारि ॥
हरि अंम्रितु पीवहि सदा रंगि राते हउमै त्रिसना मारि ॥
अंम्रितु हरि का नामु है वरसै किरपा धारि ॥
नानक गुरमुखि नदरी आइआ हरि आतम रामु मुरारि ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ अमृत' की बरखा हो रही है (पर इस भेद को) वही समझते हैं जो समझने-योग्य हैं; जिन्होंने गुरू से (यह भेद) समझ लिया है। वे 'अमृत' हृदय में संभाल के रखते हैं; वे मनुष्य अहंकार और (माया की) तृष्णा मिटा के। प्रभू के प्यार में रंगे हुए सदा 'अमृत' पीते हैं। (वह अमृत क्या है।) 'अमृत' प्रभू का 'नाम' है और इसकी बरखा होती है प्रभू की कृपा से। हे नानक ! सबमें व्यापक मुरारी परमात्मा सतिगुरू के माध्यम से ही नज़र आता है। 2।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 3: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1281 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।