Lulla Family

अंग 1280

अंग
1280
राग मलार
राग: मलार · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
धरमु कराए करम धुरहु फुरमाइआ ॥3॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: (यह भी) धुर से (प्रभू का ही) फुरमान है कि धर्मराज (जीवों से अच्छे-बुरे) काम करवा रहा है। 3।
सलोक मः 2 ॥
सावणु आइआ हे सखी कंतै चिति करेहु ॥
नानक झूरि मरहि दोहागणी जिन॑ अवरी लागा नेहु ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 2॥ हे सखी ! सावन (का महीना) आया है (भाव। गुरू के द्वारा नाम-अमृत की बरखा हो रही है) पति (-प्रभू) को हृदय में परो लो। हे नानक ! जिन (जीव-सि्त्रयों) का प्यार (प्रभू-पति को छोड़ के) औरों के साथ है वे दुर्भागिनियाँ दुखी होती हैं। 1।
मः 2 ॥
सावणु आइआ हे सखी जलहरु बरसनहारु ॥
नानक सुखि सवनु सोहागणी जिन॑ सह नालि पिआरु ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ हे सखी ! सावन (भाव। ‘नाम’ की बरखा का समय) आया है। बादल बरसने लगा है (भाव। गुरू मेहर कर रहा है)। हे नानक ! (इस सोहावने समय) जिन (जीव-सि्त्रयों का) पति (-प्रभू) के साथ प्यार बना हुआ है वे भाग्यशाली सुखद सावन (मनाएं) (भाव। सुखी जीवन व्यतीत करें)। 2।
पउड़ी ॥
आपे छिंझ पवाइ मलाखाड़ा रचिआ ॥
लथे भड़थू पाइ गुरमुखि मचिआ ॥
मनमुख मारे पछाड़ि मूरख कचिआ ॥
आपि भिड़ै मारे आपि आपि कारजु रचिआ ॥
सभना खसमु एकु है गुरमुखि जाणीऐ ॥
हुकमी लिखै सिरि लेखु विणु कलम मसवाणीऐ ॥
सतसंगति मेलापु जिथै हरि गुण सदा वखाणीऐ ॥
नानक सचा सबदु सलाहि सचु पछाणीऐ ॥4॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (प्रभू ने) खुद ही छिंज डलवा के (भाव। जगत रचना कर के) (यह जगत। मानो) पहलवानों के दंगल के लिए स्थल बनाया है; (जीव-रूप पहलवान) शोर मचा के (यहाँ) उतरे हैं (भाव। बेअंत जीव बड़ी तेजी से दबादब जगत में जनम ले के चले आ रहे हैं)। (इनमें से) वे मनुष्य जो गुरू के सन्मुख हैं चढ़दीकला में हैं। (पर) मन के पीछे चलने वाले कच्चे मूर्खों को पटख़नी दे के (भाव। मुँह भार) मारता है; (जीवों में व्यापक हो के) प्रभू स्वयं ही लड़ रहा है। स्वयं ही मार रहा है उसने खुद ही (यह छिंझ का) कारज रचा है। सब जीवों का मालिक एक प्रभू ही है। इस बात की समझ गुरू के सन्मुख होने से आती है। अपने हुकम अनुसार ही (हरेक जीव के) सिर पर कलम-दवात के बिना ही (रज़ा का) लेख लिख रहा है। (उस प्रभू का) मिलाप सत्संग में ही हो सकता है जहाँ सदा प्रभू के गुण कथे जाते हैं। हे नानक ! (गुरू का) सच्चा शबद गा के सदा कायम रहने वाला प्रभू पहचाना जा सकता है (भाव। प्रभू की सार पड़ती है। प्रभू के साथ जान-पहचान बनती है)। 4।
सलोक मः 3 ॥
ऊंनवि ऊंनवि आइआ अवरि करेंदा वंन ॥
किआ जाणा तिसु साह सिउ केव रहसी रंगु ॥
रंगु रहिआ तिन॑ कामणी जिन॑ मनि भउ भाउ होइ ॥
नानक भै भाइ बाहरी तिन तनि सुखु न होइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ (गुरू-रूप बादल) झुक झुक के आया है (भाव। मेहर करने के लिए तैयार है) और कई तरह के रंग दिखा रहा है (भाव। गुरू कई किसम के करिश्मे करता है); पर। क्या पता मेरा उस (नाम-खजाने के) शाह के साथ कैसे साथ बना रहेगा। (उस मेहरों के सांई के साथ) उन (जीव-) सि्त्रयों का प्यार टिका रहता है जिनके मन में उसका डर और प्यार है। हे नानक ! जो डर और प्यार से वंचित हैं उनके शरीर में सुख नहीं होता। 1।
मः 3 ॥
ऊंनवि ऊंनवि आइआ वरसै नीरु निपंगु ॥
नानक दुखु लागा तिन॑ कामणी जिन॑ कंतै सिउ मनि भंगु ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (गुरू-बादल) झुक झुक के आया है और साफ जल बरसा रहा है; पर। हे नानक ! उन (जीव-) सि्त्रयों को (फिर भी) दुख व्याप रहा है जिनके मन में पति-प्रभू से विछोड़ा है। 2।
पउड़ी ॥
दोवै तरफा उपाइ इकु वरतिआ ॥
बेद बाणी वरताइ अंदरि वादु घतिआ ॥
परविरति निरविरति हाठा दोवै विचि धरमु फिरै रैबारिआ ॥
मनमुख कचे कूड़िआर तिन॑ी निहचउ दरगह हारिआ ॥
गुरमती सबदि सूर है कामु क्रोधु जिन॑ी मारिआ ॥
सचै अंदरि महलि सबदि सवारिआ ॥
से भगत तुधु भावदे सचै नाइ पिआरिआ ॥
सतिगुरु सेवनि आपणा तिन॑ा विटहु हउ वारिआ ॥5॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (‘गुरमुख’ और ‘मनमुख’) दोनों किस्मों के जीव पैदा करके (दोनों में) प्रभू स्वयं मौजूद है। धार्मिक उपदेश (-वेद बाणी) भी उसने खुद ही किया है (और इस तरह ‘गुरमुख’ और ‘मनमुख’ के अंदर अलग-अलग ‘विचार’ डाल के। दोनों धड़ों के) अंदर झगड़ा भी उसने खुद ही डाला है। जगत के धंधों में खचित होना और जगत से निर्लिप रहना- ये दोनों पक्ष उसने खुद ही बना दिए हैं और खुद ही ‘धर्म’ (-रूप हो के दोनों के बीच) विचोला बना हुआ है; पर। मन के पीछे चलने वाले मूर्ख झूठ के व्यापारी हैं वे जरूर प्रभू की दरगाह में बाजी हार जाते हैं। जिन्होंने गुरू की मति का आसरा लिया वे गुरू-शबद की बरकति से शूरवीर बन गए क्योंकि उन्होंने काम और क्रोध को जीत लिया; वे गुरू-शबद के द्वारा सच्चे प्रभू की हजूरी में सुर्खरू हो गए। (हे प्रभू !) वह आपके भगत आपको अच्छे लगते हैं। क्योंकि वे आपके सदा कायम रहने वाले नाम में प्यार पाते हैं। जो मनुष्य अपने सतिगुरू को सेवते हैं (भाव। जो गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलते हैं)। मैं उन पर से बलिहार जाता हूँ। 5।
सलोक मः 3 ॥
ऊंनवि ऊंनवि आइआ वरसै लाइ झड़ी ॥
नानक भाणै चलै कंत कै सु माणे सदा रली ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ (गुरू-बादल) झुक-झुक के आया है और झड़ी लगा के बरस रहा है (भाव। गुरू ‘नाम’-उपदेश की बरखा कर रहा है); पर। हे नानक ! (इस उपदेश को सुन के) जो मनुष्य पति (-प्रभू) की रज़ा में चलता है वही (उस ‘उपदेश’-बरखा का) आनंद लेता है। 1।
मः 3 ॥
किआ उठि उठि देखहु बपुड़ें इसु मेघै हथि किछु नाहि ॥
जिनि एहु मेघु पठाइआ तिसु राखहु मन मांहि ॥
तिस नो मंनि वसाइसी जा कउ नदरि करेइ ॥
नानक नदरी बाहरी सभ करण पलाह करेइ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे बेचारे लोगो ! इस बादल को उठ-उठ के क्या देखते हैं। इसके अपने वश में कुछ भी नहीं (कि ये बरखा कर सके)। (हे भाई !) जिस मालिक ने यह बादल भेजा है उसको अपने मन में चेते करो। (पर यह किसी के वश की बात नहीं) जिस जीव पर प्रभू स्वयं मेहर की नज़र करता है उसके मन में (अपना आप) बसाता है। हे नानक ! प्रभू के मेहर की नज़र के बिना सारी सृष्टि तरले ले रही है। 2।
पउड़ी ॥
सो हरि सदा सरेवीऐ जिसु करत न लागै वार ॥
आडाणे आकास करि खिन महि ढाहि उसारणहार ॥
आपे जगतु उपाइ कै कुदरति करे वीचार ॥
मनमुख अगै लेखा मंगीऐ बहुती होवै मार ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे भाई !) उस प्रभू को सदा सिमरें जिसको (जगत) बनाने में देर नहीं लगती; यह तने हुए आकाश बना के एक पलक में नाश करके (दोबारा) बनाने में समर्थ है। प्रभू स्वयं ही जगत पैदा करके स्वयं ही इस रचना का ख़्याल रखता है। पर। जो मनुष्य (ऐसे प्रभू को बिसार के) अपने मन के पीछे चलता है (और विकारों में प्रवृति होता है) उससे आगे जा के उसके किए कर्मों का लेखा माँगा जाता है (विकारों के कारण) उसको मार पड़ती है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(यह भी) धुर से (प्रभू का ही) फुरमान है कि धर्मराज (जीवों से अच्छे-बुरे) काम करवा रहा है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।