Lulla Family

अंग 1279

अंग
1279
राग मलार
राग: मलार · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मनमुख दूजी तरफ है वेखहु नदरि निहालि ॥
फाही फाथे मिरग जिउ सिरि दीसै जमकालु ॥
खुधिआ त्रिसना निंदा बुरी कामु क्रोधु विकरालु ॥
एनी अखी नदरि न आवई जिचरु सबदि न करे बीचारु ॥
तुधु भावै संतोखीआं चूकै आल जंजालु ॥
मूलु रहै गुरु सेविऐ गुर पउड़ी बोहिथु ॥
नानक लगी ततु लै तूं सचा मनि सचु ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: ध्यान से देखो। मन के पीछे चलने वाले मनुष्य का दूसरा पक्ष ही होता है (भाव। उसकी हालत इसके उलट होती है) जाल में फसे हिरन की तरह जमकाल (भाव। मौत का डर) सदा उसके सिर पर (खड़ा) दिखाई देता है; (आत्मिक मौत उस पर अपना जोर डाले रखती है)। (माया की) चंदरी भूख-प्यास और निंदा। काम और डरावना क्रोध (उसको सदा सताते हैं। पर ये हालत उसको) इन आँखों से (तब तक) नहीं दिखती जब तक वह गुरू-शबद में विचार नहीं करता। (हे प्रभू !) जब आपको अच्छा लगे तब (ये आँखें) संतोष में आती है (भाव। भूख-तृष्णा खत्म होती है) और घर के जंजाल समाप्त होते हैं। गुरू की सेवा करने से (भाव। गुरू के हुकम में चलने से) जीव की नाम-रूपी राशि बनी रहती है। गुरू की पौ़ड़ी (भाव। सिमरन) के द्वारा (नाम-रूपी) जहाज़ प्राप्त हो जाता है। हे नानक ! जो जीव-स्त्री (इस सिमरन-रूप गुरू पउड़ी को) संभालती है वो अस्लियत पा लेती है। हे प्रभू ! आप सदा कायम रहने वाला उसके मन में सदा के लिए आ बसता है। 1।
महला 1 ॥
हेको पाधरु हेकु दरु गुर पउड़ी निज थानु ॥
रूड़उ ठाकुरु नानका सभि सुख साचउ नामु ॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ हे नानक ! (एक प्रभू ही) सुंदर पालनहार पति है (उस प्रभू का ही) एक दर (जीव का) निरोल अपनी जगह है (जहाँ कभी किसी ने दुत्कारना नहीं। इस ‘दर’ तक पहुंचने के लिए) गुरू की सीढ़ी (पौड़ी) (भाव। सिमरन ही) एक सीधा रास्ता है। (प्रभू का) सच्चा नाम (सिमरना) ही सारे सुखों (का मूल) है। 2।
पउड़ी ॥
आपीन॑ै आपु साजि आपु पछाणिआ ॥
अंबरु धरति विछोड़ि चंदोआ ताणिआ ॥
विणु थंम॑ा गगनु रहाइ सबदु नीसाणिआ ॥
सूरजु चंदु उपाइ जोति समाणिआ ॥
कीए राति दिनंतु चोज विडाणिआ ॥
तीरथ धरम वीचार नावण पुरबाणिआ ॥
तुधु सरि अवरु न कोइ कि आखि वखाणिआ ॥
सचै तखति निवासु होर आवण जाणिआ ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (प्रभू ने) स्वयं ही अपने आप को प्रकट करके अपनी अस्लियत समझाई है। आकाश और धरती को अलग-अलग करके (ये आकाश उसने मानो। अपने तख़्त पर) चंदोआ ताना हुआ है; (सारे जगत रूपी दरबार पर) आकाश को स्तम्भों के बगैर टिका के अपने हूकम को नगारा बनाया है। अपनी जोति टिकाई है; (जीवों के कार्य-व्यवहार के लिए) रात और दिन (-रूप) आश्चर्य भरे तमाशे बना दिए हैं। पर्वों के समय तीर्थों पर नहाने आदि के धार्मिक ख्याल (भी प्रभू ने स्वयं ही जीवों के अंदर पैदा किए हैं)। (हे प्रभू !) (आपकी इस आश्चर्यजनक खेल का) क्या बयान करें। आपके जैसा और कोई नहीं है; आप तो सदा कायम रहने वाले तख़्त पर बैठा है और (सृष्टि) पैदा होती है (और नाश होती है)। 1।
सलोक मः 1 ॥
नानक सावणि जे वसै चहु ओमाहा होइ ॥
नागां मिरगां मछीआं रसीआं घरि धनु होइ ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ हे नानक ! अगर सावन के महीने बरसात हो तो चार धड़ों में उल्लास होता है- साँपों को। हिरनों को। मछलियों को और रसों के आशिकों को जिनके घर में (रस भोगने के लिए) धन हो। 1।
मः 1 ॥
नानक सावणि जे वसै चहु वेछोड़ा होइ ॥
गाई पुता निरधना पंथी चाकरु होइ ॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ हे नानक ! सावन में अगर वर्षा हो तो चार पक्षों को (उल्लास से) विछोड़ा (भी। भाव। दुख) होता है। बैलों को (क्योंकि बरसात पड़ने से ये हल में जोते जाते हैं)। गरीबों को (जिनकी मेहनत मजदूरी में रुकावट आती है)। राहियों को और नौकर व्यक्तियों को। 2।
पउड़ी ॥
तू सचा सचिआरु जिनि सचु वरताइआ ॥
बैठा ताड़ी लाइ कवलु छपाइआ ॥
ब्रहमै वडा कहाइ अंतु न पाइआ ॥
ना तिसु बापु न माइ किनि तू जाइआ ॥
ना तिसु रूपु न रेख वरन सबाइआ ॥
ना तिसु भुख पिआस रजा धाइआ ॥
गुर महि आपु समोइ सबदु वरताइआ ॥
सचे ही पतीआइ सचि समाइआ ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे प्रभू !) आप सदा कायम रहने वाला है। आप ऐसी हस्ती का मालिक (सचिआर) है कि जिस ने (अपनी यह) हस्ती (हर जगह) पसारी हुई है; अभी सृष्टि की उत्पक्ति नहीं हुई थी जब आप (अपने आप में) समाधि लगाए बैठा था। ब्रहमा ने (भी जो जगत को रचने वाला माना जाता है यह भेद ना समझा और अपने आप को ही सबसे) बड़ा कहलवाया। उसको आपकी सार ना आई। (हे प्रभू !) आपको किसने पैदा किया है। (भाव। आपको जनम देने वाला कोई नहीं है)। (हे भाई !) उस (प्रभू) का ना कोई पिता है ना माँ; ना उसका कोई (खास) स्वरूप है ना निशान; सारे रूप-रंग उसके हैं; उसको कोई भूख-प्यास नहीं। संतुष्ट-तृप्त है। (हे भाई !) प्रभू अपने आप को गुरू में लीन करके (अपना) शबद (भाव। संदेश) (सारे जगत में) बाँट रहा है। और गुरू इस सदा कायम रहने वाले प्रभू में पतीज के सदा-स्थिर प्रभू में ही जुड़ा रहता है। 2।
सलोक मः 1 ॥
वैदु बुलाइआ वैदगी पकड़ि ढंढोले बांह ॥
भोला वैदु न जाणई करक कलेजे माहि ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ हकीम (मरीज़ को) दवाई देने के लिए बुलाया जाता है। वह (मरीज की) बाँह पकड़ के (नाड़ी) टटोलता है (और मर्ज़ तलाशने का यतन करता है। पर) अंजान हकीम यह नहीं जानता कि (प्रभू से विछोड़े की) पीड़ा (बिरही बंदों के) दिल में हुआ करती है। 1।
मः 2 ॥
वैदा वैदु सुवैदु तू पहिलां रोगु पछाणु ॥
ऐसा दारू लोड़ि लहु जितु वंञै रोगा घाणि ॥
जितु दारू रोग उठिअहि तनि सुखु वसै आइ ॥
रोगु गवाइहि आपणा त नानक वैदु सदाइ ॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ (हे भाई ! तब ही) आप हकीमों का हकीम है (सबसे बढ़िया हकीम है) (तब ही) आप समझदार वैद्य (कहलवा सकता) है। (हे भाई !) पहले (अपना ही आत्मिक) रोग ढूँढ (और उसकी) ऐसी दवाई तलाश ले जिससे सारे (आत्मिक) रोग दूर हो जाएं जिस दवाई से (सारे) रोग उठाए जा सकें और शरीर में सुख आ बसे। हे नानक ! (कह- हे भाई !) अगर आप (पहले) अपना रोग दूर कर ले तो (अपने आप को) हकीम कहलवा (कहलवाने का हकदार है)।
पउड़ी ॥
ब्रहमा बिसनु महेसु देव उपाइआ ॥
ब्रहमे दिते बेद पूजा लाइआ ॥
दस अवतारी रामु राजा आइआ ॥
दैता मारे धाइ हुकमि सबाइआ ॥
ईस महेसुरु सेव तिन॑ी अंतु न पाइआ ॥
सची कीमति पाइ तखतु रचाइआ ॥
दुनीआ धंधै लाइ आपु छपाइआ ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (परमात्मा ने स्वयं ही) ब्रहमा। विष्णु और शिव- (ये तीन) देवता पैदा किए। ब्रहमा को उसने वेद दे दिए (भाव। वेदों का कर्ता बनाया और लोगों को इनके द्वारा बताई गई) पूजा कराने में उलझा दिया। (विष्णू) दस अवतारों में राजा राम (आदि) रूप धारण करता रहा और हमले कर के दैत्यों को मारता रहा (पर। ये) सारे (अवतार प्रभू के ही) हुकम में हुए। शिव (के 11 रुद्र) अवतारों ने सेवा की (भाव। तप साधना की। पर उन्होंने भी प्रभू का) अंत नहीं पाया। (प्रभू ने) सदा अटल रहने वाले मूल वाली (अपनी सक्ता) पा के (यह जगत। मानो। अपना) तख़्त बनाया है। इसमें दुनिया (के जीवों) को धंधे में उलझा के (प्रभू ने) अपने आप को छुपा रखा है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।