आपे बखसे देइ पिआरु ॥
हउमै रोगु वडा संसारि ॥
गुर किरपा ते एहु रोगु जाइ ॥
नानक साचे साचि समाइ ॥8॥1॥3॥5॥8॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
प्रीतम प्रेम भगति के दाते ॥
अपने जन संगि राते ॥
जन संगि राते दिनसु राते इक निमख मनहु न वीसरै ॥
गोपाल गुण निधि सदा संगे सरब गुण जगदीसरै ॥
मनु मोहि लीना चरन संगे नाम रसि जन माते ॥
नानक प्रीतम क्रिपाल सदहूं किनै कोटि मधे जाते ॥1॥
प्रीतम तेरी गति अगम अपारे ॥
महा पतित तुम॑ तारे ॥
पतित पावन भगति वछल क्रिपा सिंधु सुआमीआ ॥
संतसंगे भजु निसंगे रंउ सदा अंतरजामीआ ॥
कोटि जनम भ्रमंत जोनी ते नाम सिमरत तारे ॥
नानक दरस पिआस हरि जीउ आपि लेहु सम॑ारे ॥2॥
हरि चरन कमल मनु लीना ॥
प्रभ जल जन तेरे मीना ॥
जल मीन प्रभ जीउ एक तूहै भिंन आन न जानीऐ ॥
गहि भुजा लेवहु नामु देवहु तउ प्रसादी मानीऐ ॥
भजु साधसंगे एक रंगे क्रिपाल गोबिद दीना ॥
अनाथ नीच सरणाइ नानक करि मइआ अपुना कीना ॥3॥
आपस कउ आपु मिलाइआ ॥
भ्रम भंजन हरि राइआ ॥
आचरज सुआमी अंतरजामी मिले गुण निधि पिआरिआ ॥
महा मंगल सूख उपजे गोबिंद गुण नित सारिआ ॥
मिलि संगि सोहे देखि मोहे पुरबि लिखिआ पाइआ ॥
बिनवंति नानक सरनि तिन की जिन॑ी हरि हरि धिआइआ ॥4॥1॥
वार मलार की महला 1 राणे कैलास तथा मालदे की धुनि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक महला 3 ॥
गुरि मिलिऐ मनु रहसीऐ जिउ वुठै धरणि सीगारु ॥
सभ दिसै हरीआवली सर भरे सुभर ताल ॥
अंदरु रचै सच रंगि जिउ मंजीठै लालु ॥
कमलु विगसै सचु मनि गुर कै सबदि निहालु ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू के शबद के द्वारा उनको हर जगह व्यापक दिखाई देता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।