Lulla Family

अंग 1278

अंग
1278
राग मलार
राग: मलार · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुर कै सबदि रहिआ भरपूरि ॥7॥
आपे बखसे देइ पिआरु ॥
हउमै रोगु वडा संसारि ॥
गुर किरपा ते एहु रोगु जाइ ॥
नानक साचे साचि समाइ ॥8॥1॥3॥5॥8॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गुरू के शबद के द्वारा उनको हर जगह व्यापक दिखाई देता है। 7। हे भाई ! (जिस मनुष्य पर प्रभू) स्वयं कृपा करता है। (उसको अपने) प्यार (की दाति) देता है। (वैसे तो) जगत में अहंकार का बहुत बड़ा रोग है। हे नानक ! गुरू की कृपा से (जिस मनुष्य के अंदर से) ये रोग दूर होता है वे हर वक्त सदा कायम रहने वाले परमात्मा (की याद) में लीन रहता है। 8। 1। 3। 5। 8।
रागु मलार छंत महला 5 ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
प्रीतम प्रेम भगति के दाते ॥
अपने जन संगि राते ॥
जन संगि राते दिनसु राते इक निमख मनहु न वीसरै ॥
गोपाल गुण निधि सदा संगे सरब गुण जगदीसरै ॥
मनु मोहि लीना चरन संगे नाम रसि जन माते ॥
नानक प्रीतम क्रिपाल सदहूं किनै कोटि मधे जाते ॥1॥
प्रीतम तेरी गति अगम अपारे ॥
महा पतित तुम॑ तारे ॥
पतित पावन भगति वछल क्रिपा सिंधु सुआमीआ ॥
संतसंगे भजु निसंगे रंउ सदा अंतरजामीआ ॥
कोटि जनम भ्रमंत जोनी ते नाम सिमरत तारे ॥
नानक दरस पिआस हरि जीउ आपि लेहु सम॑ारे ॥2॥
हरि चरन कमल मनु लीना ॥
प्रभ जल जन तेरे मीना ॥
जल मीन प्रभ जीउ एक तूहै भिंन आन न जानीऐ ॥
गहि भुजा लेवहु नामु देवहु तउ प्रसादी मानीऐ ॥
भजु साधसंगे एक रंगे क्रिपाल गोबिद दीना ॥
अनाथ नीच सरणाइ नानक करि मइआ अपुना कीना ॥3॥
आपस कउ आपु मिलाइआ ॥
भ्रम भंजन हरि राइआ ॥
आचरज सुआमी अंतरजामी मिले गुण निधि पिआरिआ ॥
महा मंगल सूख उपजे गोबिंद गुण नित सारिआ ॥
मिलि संगि सोहे देखि मोहे पुरबि लिखिआ पाइआ ॥
बिनवंति नानक सरनि तिन की जिन॑ी हरि हरि धिआइआ ॥4॥1॥
वार मलार की महला 1 राणे कैलास तथा मालदे की धुनि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक महला 3 ॥
गुरि मिलिऐ मनु रहसीऐ जिउ वुठै धरणि सीगारु ॥
सभ दिसै हरीआवली सर भरे सुभर ताल ॥
अंदरु रचै सच रंगि जिउ मंजीठै लालु ॥
कमलु विगसै सचु मनि गुर कै सबदि निहालु ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: रागु मलार छंत महला 5 ॥ सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! प्रीतम प्रभू जी (अपने भक्तों को) प्यार की दाति देने वाले हैं। भगती की दाति देने वाले हैं। प्रभू जी अपने सेवकों के साथ रति रहते हैं। दिन-रात अपनें सेवकों के साथ रति रहते हैं। हे भाई ! प्रभू (अपने सेवकों के) मन से आँख झपकने जितने समय के लिए भी नहीं भूलता। जगत का पालनहार प्रभू सारे गुणों का खजाना है। सदा (सब जीवों के) साथ है। जगत के मालिक प्रभू में सारे ही गुण हैं। हे भाई ! प्रभू अपने जनों का मन अपने चरणों में मस्त करे रखता है। (उसके) सेवक (उसके) नाम के स्वाद में मगन रहते हैं। हे नानक ! प्रीतम प्रभू सदा ही दया का घर है। करोड़ों में से किसी विरले ने (उसके साथ) गहरी सांझ बनाई है। 1। हे प्रीतम प्रभू ! आपकी ऊँची आत्मिक अवस्था अपहुँच है बेअंत है। बड़े-बड़े पापियों को आप (संसार-समुंद्र से) पार लंघाता । हे पापियों को पवित्र करने वाले ! हे भगती के साथ प्यार करने वाले स्वामी ! आप दया का समुंद्र है। (हे मन !) साध-संगति में (टिक के) शर्म उतार के। उस अंतरजामी प्रभू का सदा भजन किया कर। सिमरन किया कर। हे भाई ! जो जीव करोड़ों जनमों से जूनियों में भटकते फिरते थे। वे प्रभू का नाम सिमर के (जूनियों के चक्करों में से) पार लांघ गए। हे नानक ! (कह-) हे प्रभू जी ! (मुझे) आपके दर्शनों की तमन्ना है। मुझे अपना बना लो। 2। हे हरी ! (मेहर कर। मेरा) मन आपके सुंदर चरणों में लीन रहे। हे प्रभू ! आप पानी है। आपके सेवक (पानियों की) मछलियाँ है (आपसे विछुड़ कर जी नहीं सकते)। हे प्रभू जी ! पानी और मछलियाँ आप खुद ही है। (आपसे) अलग कोई और नहीं जाना जा सकता। हे प्रभू ! (मेरी) बाँह पकड़ ले (मुझे अपना) नाम दे। आपकी मेहर से ही (आपके दर पर) आदर पाया जा सकता है। हे भाई ! साध-संगति में (टिक के) दीनों पर दया करने वाले प्रभू के प्रेम में जुड़ के (उसका) भजन किया कर। हे नानक ! शरण आए निखसमों और नीचों को भी मेहर कर के प्रभू अपना बना लेता है। 3। हे भाई ! प्रभू-पातशाह (जीवों की) भटकना दूर करने वाला है (और जीवों को अपने साथ मिलाने वाला है। पर जीवों में भी वह स्वयं ही स्वयं है। सो। जीवों को अपने साथ मिला के वह) अपने आप को अपना आप (ही) मिलाता है। हे भाई ! मालिक-प्रभू आश्चर्य-रूप है सबके दिल की जानने वाला है। वह गुणों का खजाना प्रभू जिन अपने प्यारों से मिल जाता है। वे सदा उस गोबिंद के गुण अपने हृदय में बसाते हैं। उनके अंदर महान खुशियां और महान सुख पैदा हो जाते हैं। पर। हे भाई ! पूर्बले जन्म में (प्राप्ति का लेख) लिखा हुआ (जिनके माथे के ऊपर) उघड़ आया। वे प्रभू के साथ मिल के सुंदर जीवन वाले बन गए। वे उसका दर्शन करके उसमें मगन हो गए। नानक विनती करता है- जिन्होने सदा परमात्मा का ध्यान धरा है। मैं उनकी शरण पड़ता हूँ। 4। 1। वार मलार की महला 1 राणे कैलास तथा मालदे की धुनि ॥ सतिगुर प्रसादि ॥ श्लोक महला 3॥ अगर गुरू मिल जाए तो मन खिल उठता है जैसे बरसात होने पर धरती सज जाती है। सारी (धरती) हरी ही हरी दिखाई देती है सरोवर और तालाब नाको नाक पानी से भर जाते हैं (इसी तरह जिसको गुरू मिलता है उसका) मन सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू के प्यार में रच जाता है और मजीठ की तरह लाल (पक्के प्यार-रंग वाला) हो जाता है। उसका हृदय-कमल खिल उठता है। सच्चा प्रभू (उसके) मन में (आ बसता है) गुरू के शबद की बरकति से वह सदा प्रसन्न रहता है। पर।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू के शबद के द्वारा उनको हर जगह व्यापक दिखाई देता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।