Lulla Family

अंग 1271

अंग
1271
राग मलार
राग: मलार · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नानक तिन कै सद कुरबाणे ॥4॥2॥20॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) मैं उनसे सदा सदके जाता हूँ। 4। 2। 20।
मलार महला 5 ॥
परमेसरु होआ दइआलु ॥
मेघु वरसै अंम्रित धार ॥
सगले जीअ जंत त्रिपतासे ॥
कारज आए पूरे रासे ॥1॥
सदा सदा मन नामु सम॑ालि ॥
गुर पूरे की सेवा पाइआ ऐथै ओथै निबहै नालि ॥1॥ रहाउ ॥
दुखु भंना भै भंजनहार ॥
आपणिआ जीआ की कीती सार ॥
राखनहार सदा मिहरवान ॥
सदा सदा जाईऐ कुरबान ॥2॥
कालु गवाइआ करतै आपि ॥
सदा सदा मन तिस नो जापि ॥
द्रिसटि धारि राखे सभि जंत ॥
गुण गावहु नित नित भगवंत ॥3॥
एको करता आपे आप ॥
हरि के भगत जाणहि परताप ॥
नावै की पैज रखदा आइआ ॥
नानकु बोलै तिस का बोलाइआ ॥4॥3॥21॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे भाई ! (जिस मनुष्य पर) परमात्मा दयावान होता है (उसके हृदय में गुरू का उपदेश रूपी) बादल आत्मि्क जीवन देने वाले नाम-जल की धाराओं की बरखा करता है। (जिन पर यह बरखा होती है। वह) सारे जीव (माया की तृष्णा से) तृप्त हो जाते हैं। उनके सारे काम सफल हो जाते हैं। 1। हे (मेरे) मन ! सदा ही परमात्मा का नाम याद करता रह (यह नाम) पूरे गुरू की शरण पड़ने से मिलता है। और इस लोक और परलोक में (जीव का) साथ देता है। 1। रहाउ। (जीवों का) हरेक दुख दूर किया है और (जीवों के) सारे डर नाश करने वाले उस प्रभू ने अपने पैदा किए हुए जीवों की सदा संभाल की है। हे भाई ! रक्षा करने की समर्था वाला परमात्मा (जीवों पर) सदा दयावान रहता है। उसके (चरणों) से सदा सदके जाना चाहिए। 2। (जिसने भी नाम जपा है) करतार ने (उसके सिर पर से आत्मिक) मौत दूर कर दी। हे मन ! सदा ही सदा ही उस परमात्मा का नाम जपा कर। (उस भगवान ने) मेहर निगाह करके सारे जीवों की (सदा) रक्षा की है हे भाई ! भगवान के गुण सदा ही गाते रहो। 3। हे भाई ! करतार स्वयं ही स्वयं (हर जगह मौजूद) है उसके भगत उसका तेज-प्रताप जानते हैं। (वह शरण-योग्य है। शरण पड़े हुओं की बाँह पकड़ता है। अपने इस) नाम की लाज वह (सदा ही) रखता । उसका दास नानक उस (करतार) का प्रेरित किया हुआ ही (उसकी सिफत-सालाह का बोल) बोलता है। 4। 3। 21।
मलार महला 5 ॥
गुर सरणाई सगल निधान ॥
साची दरगहि पाईऐ मानु ॥
भ्रमु भउ दूखु दरदु सभु जाइ ॥
साधसंगि सद हरि गुण गाइ ॥1॥
मन मेरे गुरु पूरा सालाहि ॥
नामु निधानु जपहु दिनु राती मन चिंदे फल पाइ ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुर जेवडु अवरु न कोइ ॥
गुरु पारब्रहमु परमेसरु सोइ ॥
जनम मरण दूख ते राखै ॥
माइआ बिखु फिरि बहुड़ि न चाखै ॥2॥
गुर की महिमा कथनु न जाइ ॥
गुरु परमेसरु साचै नाइ ॥
सचु संजमु करणी सभु साची ॥
सो मनु निरमलु जो गुर संगि राची ॥3॥
गुरु पूरा पाईऐ वड भागि ॥
कामु क्रोधु लोभु मन ते तिआगि ॥
करि किरपा गुर चरण निवासि ॥
नानक की प्रभ सचु अरदासि ॥4॥4॥22॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे भाई ! गुरू की शरण पड़े रहने पर सारे खजाने (मिल जाते हैं); सदा कायम रहने वाली ईश्वरीय दरगाह में आदर मिलता है। (उसका) भरम। डर। हरेक दुख-दर्द दूर हो जाता है। (जो मनुष्य गाता है।) हे भाई ! गुरू की संगति में रह के सदा परमात्मा के गुण गाया कर ।1। हे मेरे मन ! पूरे गुरू की (सदा) सिफत-सालाह किया कर। (गुरू की शरण पड़ कर) दिन-रात परमात्मा का नाम जपा कर (यही है सारे सुखों का) खजाना। (जो मनुष्य जपता है। वह) मन-इच्छित फल प्राप्त कर लेता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (बख्शिशें करने में) गुरू के बराबर को और कोई नहीं। वह गुरू पारब्रहम है। गुरू परमेश्वर है। गुरू पैदा होने-मरने के चक्करों के दुखों से बचाता है। (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह) आत्मिक मौत लाने वाली माया के जहर को बार-बार स्वाद लगा-लगा के नहीं चखता रहता। 2। हे भाई ! गुरू की वडिआई बयान नहीं की जा सकती। गुरू परमेश्वर (का रूप) है। गुरू (परमात्मा के) सदा कायम रहने वाले नाम में (लीन रहता है)। परमात्मा का नाम सिमरते रहना- यही है गुरू का संयम। परमात्मा की सिफतसालाह करते रहना – यही है गुरू की करणी। जो मन गुरू की संगति में मस्त रहता है वह मन पवित्र हो जाता है। 3। हे भाई ! पूरा गुरू बड़ी किस्मत से मिलता है। (जिसको मिलता है। वह मनुष्य अपने) मन में से काम-क्रोध-लोभ (आदिक विकार) दूर कर के (गुरू की शरण पड़ा रहता है)। हे प्रभू ! (आपके सेवक) नानक की यह अरदास है कि मेहर कर के (मुझे) गुरू के चरणों में टिकाए रख। और। अपना सदा-स्थिर नाम बख्श। 4। 4। 22।
रागु मलार महला 5 पड़ताल घरु 3
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुर मनारि प्रिअ दइआर सिउ रंगु कीआ ॥
कीनो री सगल संीगार ॥
तजिओ री सगल बिकार ॥
धावतो असथिरु थीआ ॥1॥ रहाउ ॥
ऐसे रे मन पाइ कै आपु गवाइ कै करि साधन सिउ संगु ॥
बाजे बजहि म्रिदंग अनाहद कोकिल री राम नामु बोलै मधुर बैन अति सुहीआ ॥1॥
ऐसी तेरे दरसन की सोभ अति अपार प्रिअ अमोघ तैसे ही संगि संत बने ॥
भव उतार नाम भने ॥
रम राम राम माल ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: रागु मलार महला 5 पड़ताल घरु 3 सतिगुर प्रसादि ॥ हे सखी ! (जिस जीव-स्त्री ने अपने) गुरू की प्रसन्नता हासिल करके दया के श्रोत प्यारे प्रभू के साथ आत्मिक आनंद पाना शुरू कर दिया। उसने सारे (आत्मिक) श्रंृगार कर लिए (भाव। उसके अंदर ऊँचे आत्मिक गुण पैदा हो गए)। उसने सारे विकार त्याग दिए। उसका (पहला) भटकता मन डोलने से हट गया। 1। रहाउ। हे (मेरे) मन ! आप भी इसी तरह (प्रभू का मिलाप) हासिल कर के (अपने अंदर से) स्वै-भाव दूर करके संत-जनों की संगति किया कर (आपके अंदर ऐसा आनंद बना रहेगा।जैसे) एक-रस ढोल आदि साज़ बज रहे हैं। (आपकी जिहवा इस तरह) परमात्मा का नाम (उच्चारण करेगी। जैसे) कोयल मीठे और बहुत ही सुंदर बोल बोलती है। 1। हे प्यारे प्रभू ! हे बहुत बेअंत प्रभू ! आपके दर्शनों की महिमा ऐसी है कि सफलता के निशाने से कभी पीछे नहीं हटती। संसार-समुंद्र से पार लंघाने वाला आपका नाम जप-जप के आपके संत भी आपके चरणों में जुड़ के (आपके जैसे) बन जाते हैं। हे नानक ! जो सेवक परमात्मा के नाम की सुंदर माला अपने मन में फेरते रहते हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) मैं उनसे सदा सदके जाता हूँ।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।