परमेसरु होआ दइआलु ॥
मेघु वरसै अंम्रित धार ॥
सगले जीअ जंत त्रिपतासे ॥
कारज आए पूरे रासे ॥1॥
सदा सदा मन नामु सम॑ालि ॥
गुर पूरे की सेवा पाइआ ऐथै ओथै निबहै नालि ॥1॥ रहाउ ॥
दुखु भंना भै भंजनहार ॥
आपणिआ जीआ की कीती सार ॥
राखनहार सदा मिहरवान ॥
सदा सदा जाईऐ कुरबान ॥2॥
कालु गवाइआ करतै आपि ॥
सदा सदा मन तिस नो जापि ॥
द्रिसटि धारि राखे सभि जंत ॥
गुण गावहु नित नित भगवंत ॥3॥
एको करता आपे आप ॥
हरि के भगत जाणहि परताप ॥
नावै की पैज रखदा आइआ ॥
नानकु बोलै तिस का बोलाइआ ॥4॥3॥21॥
गुर सरणाई सगल निधान ॥
साची दरगहि पाईऐ मानु ॥
भ्रमु भउ दूखु दरदु सभु जाइ ॥
साधसंगि सद हरि गुण गाइ ॥1॥
मन मेरे गुरु पूरा सालाहि ॥
नामु निधानु जपहु दिनु राती मन चिंदे फल पाइ ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुर जेवडु अवरु न कोइ ॥
गुरु पारब्रहमु परमेसरु सोइ ॥
जनम मरण दूख ते राखै ॥
माइआ बिखु फिरि बहुड़ि न चाखै ॥2॥
गुर की महिमा कथनु न जाइ ॥
गुरु परमेसरु साचै नाइ ॥
सचु संजमु करणी सभु साची ॥
सो मनु निरमलु जो गुर संगि राची ॥3॥
गुरु पूरा पाईऐ वड भागि ॥
कामु क्रोधु लोभु मन ते तिआगि ॥
करि किरपा गुर चरण निवासि ॥
नानक की प्रभ सचु अरदासि ॥4॥4॥22॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुर मनारि प्रिअ दइआर सिउ रंगु कीआ ॥
कीनो री सगल संीगार ॥
तजिओ री सगल बिकार ॥
धावतो असथिरु थीआ ॥1॥ रहाउ ॥
ऐसे रे मन पाइ कै आपु गवाइ कै करि साधन सिउ संगु ॥
बाजे बजहि म्रिदंग अनाहद कोकिल री राम नामु बोलै मधुर बैन अति सुहीआ ॥1॥
ऐसी तेरे दरसन की सोभ अति अपार प्रिअ अमोघ तैसे ही संगि संत बने ॥
भव उतार नाम भने ॥
रम राम राम माल ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) मैं उनसे सदा सदके जाता हूँ।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।